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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 638 में से

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'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
दूसरे भाव में अपने शत्रु शुक्र की राशि
मेष लग्न: द्वितीयभाव: मंगल में स्थित मंगल के प्रभाव से जातक की धन-संचय
में कमी तथा शरीर में कष्ट का सामना करना
पड़ता है । चतुर्थ दृष्टि से पंचमभाव को देखने
के कारण जातक विद्या तथा संतान के पक्ष में कुछ
कठिनाइयों का सामना करता है । सातवीं दृष्टि से
अष्टमभाव को देखने के कारण दीर्घायु एवं पुरातत्त्व का
लाभ देता है। आठवीं दृष्टि से नवमभाव को देखने के
कारण भाग्योन्नति में भी रुकावटें डालता रहता है।
२४१
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
तीसरे भाव में अपने मित्र बुध की राशि पर
मेष लग्न : तृतीयभाव : मंगल स्थित मंगल के प्रभाव से जातक पराक्रमी तथा साहसी
होता है, परन्तु मंगल के षष्ठमेशी होने के कारण
भाई-बहिन के सुख में कमी आ जाती है ।
चौथी दृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण
जातक शत्रुजयी होता है और हिम्मत से काम लेकर
उन पर अपना प्रभाव डालता है। सातवीं दृष्टि के
मित्र बुध की राशि वाले नवमभाव को देखने के कारण
भाग्योन्नति करता है तथा आठवीं दृष्टि से शत्रु शनि
की राशि वाले दशमभाव को देखने के कारण राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में
कठिनाइयाँ भी उपस्थित करता रहता है ।
२४२
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
चौथे भाव में अपने मित्र चन्द्रमा की राशि पर
मेष लग्न : चतुर्थभाव : मंगल स्थित नीच के मंगल के प्रभाव से जातक को माता के
-सुख, भूमि, भवन तथा सुख के क्षेत्र में कमी रहती है ।
चौथी दृष्टि से शत्रु शुक्र की राशि वाले सप्तमभाव
को देखने के कारण स्त्री के सुख में कमी रहती
है । सातवीं उच्च दृष्टि से शत्रु शनि की राशि वाले
दशमभाव को देखने के कारण पिता एवं राज्य द्वारा
लाभ होता है । आठवीं दृष्टि के शत्रु शनि की राशि
वाले ग्यारहवें भाव को देखने के कारण लाभ प्राप्ति
२४३ के लिए जातक को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है ।