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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 638 में से

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'मेष' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेष लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि
पर स्थित उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक बड़ा
धनी तथा ऐश्वर्यशाली होता है। उसे कौटुम्बिक
सुख भी यथेष्ट मिलता है, परन्तु माता के पक्ष में
स्थित त्रुटि का अनुभव भी होता है।
सातवीं नीच दृष्टि से मित्र मंगल की राशि
वाले आठवें भाव को देखने के कारण जातक की
आयु, स्वास्थ्य तथा पुरातत्त्व विषयक त्रुटियों का
सामना करना पड़ता है। उसका दैनिक जीवन भी कुछ अशान्तिपूर्ण बना रहता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेष लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर
स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के पराक्रम में
वृद्धि होती है तथा उसे भाई-बहिनों का सुख
मिलता है। चौथे घर का स्वामी होने के कारण
चन्द्रमा जातकको भूमि, भवन, वाहन आदि का
सुख भी देता है।
सातवीं दृष्टि से मित्र गुरु की राशि से नवें
भाव को देखने के कारण जातक धर्मात्मा, उदार,
दानी, विद्वान्, भाग्यवान् तथा यशस्वी भी होता है। कुल मिला कर इस ग्रह स्थिति
वाला जातक जीवन में अनेक प्रकार की सफलताएँ प्राप्त करता रहता है।
'मेष' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मेष लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में स्वराशि पर स्थित चन्द्रमा के
प्रभाव से जातक को माता, भूमि, भवन, सम्पत्ति
आदि का पूर्ण सुख प्राप्त होता है तथा मनोरंजन के
साधन निरंतर उपलब्ध होते रहते हैं।
सातवीं दृष्टि से शत्रु शनि की राशि वाले
दशम भाव को देखने के कारण जातक का अपने पिता
से वैमनस्य रहता है तथा राज्य एवं सम्मान के क्षेत्र
में कमी बनी रहती है। कुल मिला कर-ऐसा जातक
सब प्रकार से सपन्न होते हुए भी यशस्वी सम्मानित नहीं हो पाता।