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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

६४४
ध्वज-योग
अष्टम भाव में पाप-गृह तथा लग्न में
अन्य शुभ ग्रह हों, तो ऐसा जातक समाज का
नेता होता है।
हंस-योग
पंचम, नवम, सप्तम तथा लग्न—इन
भावों में सभी ग्रह हों, तो ऐसा जातक अपने कुल
को पालने वाला होता है।
चाप-योग
शुक्र तुला में, मंगल मेष में तथा गुरु
स्वराशि पर स्थित हो, तो ऐसा जातक राजा होता
है।
प्रथम चतुःसार योग
यदि सभी ग्रह चारों केन्द्रों में स्थित हों तो
ऐसा जातक महाधनी राजा होता है।

६४५
द्वितीय चतुःसार योग
यदि सभी ग्रह मेष, कर्क, तुला तथा मकर
इन चारों राशियों में स्थित हों, तो ऐसा जातक
महाधनी राजा होता है।
दण्ड-योग
यदि सभी ग्रह कर्क, मिथुन, मीन, कन्या
तथा धनु राशि में स्थित हों, तो ऐसा जातक
राज्य-सिंहासन पर बैठता है।
वापी-योग
यदि प्रथम, द्वितीय तथा द्वादश भाव के
अतिरिक्त अन्य सभी भावों में सभी ग्रहों की स्थिति
हो तो ऐसा जातक अपने कुल का प्रधान, गुणी,
धनी, प्रतापी, अत्यन्त धैर्यवान्, सुखी, प्रियवादी
तथा ऐश्वर्यशाली होता है।
कमी का योग
यदि सूर्यादि सातों ग्रह जन्म-कुण्डली के
दशम तथा एकादश भाव में स्थित हों अथवा अन्य
और सप्तम भाव में स्थित हों, तो नीच कुल में
उत्पन्न जातक भी राजा होता है।

६४६
अमर योग
यदि सभी पापग्रह केन्द्र में हों, अथवा सभी
शुभ ग्रह केन्द्र में हों तो इन दोनों प्रकार से अमर
योग बनता है। पापग्रहों के अमर योग में जन्म
लेने वाला जातक क्रूर-स्वभावी राजा तथा शुभ
ग्रहों के अमर योग में जन्म लेने वाला जातक
सौम्य-स्वभावी राजा होता है।
[कुण्डली १६३२]
एकावली योग
लग्न अथवा किसी भी भाव से आरम्भ
करके क्रमशः सातभावों में सात ग्रह स्थित हों, तो
ऐसा जातक महाराजा होता है।
[कुण्डली १६३३]
द्वितीय हंस-योग
सभी ग्रह मेष, कुम्भ, धनु, तुला, मकर
तथा वृश्चिक राशि में हों, तो ऐसा व्यक्ति राजा
अथवा राजपूजित एवं सब प्रकार के ऐश्वर्यों का
स्वामी होता है।
[कुण्डली १६३४]

६४७
पंचधा मैत्री-चक्र

सूर्यचन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि
अधिमित्रचन्द्र, मंगलसूर्य, बुधसूर्य, चन्द्रशुक्र, चन्द्रबुध
मित्रगुरुमंगल, शुक्रशनिशनिगुरु
समशुक्रगुरु, बुधसूर्य, मंगलशुक्र, चन्द्र, मंगलसूर्य, चन्द्र, शनिबुध, मंगल, शुक्र
शत्रुबुधगुरु, शनिशुक्रगुरु, शनिमंगल, बुध
अधिशत्रुशनिबुध, शुक्रसूर्य, चन्द्र
कुण्डली चक्र (तुला लग्न - ७):
  • प्रथम भाव (तनु): ७
  • द्वितीय भाव (धन): ८
  • तृतीय भाव (सहज): ९
  • चतुर्थ भाव (सुख): १०
  • पञ्चम भाव (सुत): ११
  • षष्ठ भाव (रिपु): १२
  • सप्तम भाव (जाया): १
  • अष्टम भाव (आयु): २
  • नवम भाव (भाग्य): ३
  • दशम भाव (कर्म): ४
  • एकादश भाव (लाभ): ५
  • द्वादश भाव (व्यय): ६
    १६३५

सम्पूर्ण 1635 कुण्डलियों से युक्त
भृगु-संहिता फलित-दर्पण
(फलित-प्रकाश)
Bhrigu-Sanhita Phalit-Darpan
(Phalit-Prakash)