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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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द्वितीय चतुःसार योग
यदि सभी ग्रह मेष, कर्क, तुला तथा मकर
इन चारों राशियों में स्थित हों, तो ऐसा जातक
महाधनी राजा होता है।
दण्ड-योग
यदि सभी ग्रह कर्क, मिथुन, मीन, कन्या
तथा धनु राशि में स्थित हों, तो ऐसा जातक
राज्य-सिंहासन पर बैठता है।
वापी-योग
यदि प्रथम, द्वितीय तथा द्वादश भाव के
अतिरिक्त अन्य सभी भावों में सभी ग्रहों की स्थिति
हो तो ऐसा जातक अपने कुल का प्रधान, गुणी,
धनी, प्रतापी, अत्यन्त धैर्यवान्, सुखी, प्रियवादी
तथा ऐश्वर्यशाली होता है।
कमी का योग
यदि सूर्यादि सातों ग्रह जन्म-कुण्डली के
दशम तथा एकादश भाव में स्थित हों अथवा अन्य
और सप्तम भाव में स्थित हों, तो नीच कुल में
उत्पन्न जातक भी राजा होता है।