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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

६३६
(३२) उच्च राशिस्थ चन्द्रमा बुध के साथ बैठा
हो तो जातक मगध देश का राजा होता है। यदि चन्द्रमा
बलवान् हो तो जातक किसी भी अन्य स्थान का राजा
हो सकता है।
१६०४
(३३) जन्म-राशि का स्वामी लग्न में हो तथा
लग्नेश बली होकर केन्द्र में बैठा हो तो नीच कुल में उत्पन्न
व्यक्ति तो राजा होता है।
१६०५
(३४) मेष का सूर्य चन्द्रमा के साथ बैठा हो तो
ऐसा जातक राजा होता है।
१६०६
(३५) गुरु तथा शुक्र उच्च राशिस्थ होकर
केन्द्र अथवा त्रिकोण में बैठे हों, तो ऐसा जातक राजा
अथवा राजमंत्री होता है।
१६०७

६४०
(३६) पापग्रह लग्न में हो और उस पर कर्क
के गुरु की दृष्टि पड़ रही हो, तो ऐसा व्यक्ति बड़ा
धनी तथा यशस्वी राजा अथवा राजा के समान होता
है।
(३७) गुरु मकर राशि के अतिरिक्त किसी
और लग्न में बैठा हो अथवा कर्क राशिगत होकर कर्क
के नवांश में हो तो जातक राजा होता है।
(३८) गुरु चन्द्रमा के साथ केन्द्र में बैठा हो
तथा उस पर शुक्र की दृष्टि हो एवं कोई ग्रह नीच का
न हो तो ऐसा जातक यशस्वी राजा होता है।
(३६) द्वितीय भाव में बुध, शुक्र और गुरु बैठे
हों तथा सप्तम भाव में मंगल और चन्द्रमा हों, तो ऐसा
व्यक्ति शत्रुजयी एवं अत्यन्त प्रतापी राजा होता है।

६४१
(४०) शुक्र नवम भाव में हो, चन्द्रमा दशम
भाव में हो तथा अन्य सभी ग्रह एकादश भाव में हों
तो ऐसा जातक राजा होता है।
(४१) राहु तथा मगल षष्ठ भाव में हों
तथा बुध और सूर्य दशम भाव में हों, तो जातक
राजा होता है।
(४२) वृष में बुध, मिथुन में चन्द्रमा,
मकर में मंगल, सिंह में शनि, कन्या में सूर्य और
बुध तथा तुला में शुक्र हो, तो जातक महाराजा
होता है।
(४३) वृहस्पति उच्च का होकर लग्न में
बैठा हो तथा अन्य सभी गृह बुरे भी हों, तो भी
जातक दीर्घायु, सेनापति, धनी, सुखी राजमान्य
होता है।

६४२
(४४) धनु का मंगल और शुक्र, मीन का
बृहस्पति, तुला का बुध तथा नीच के शनि और
चन्द्रमा हों, तो ऐसा जातक धनहीन राजा होता
है।
(४५) मीन का शुक्र अथवा बुध हो,
द्वितीय भाव में राहु तथा लग्न में सूर्य हो तो
जातक भोगी, दानी, यशस्वी, राजमान्य एवं पृथ्वी
का स्वामी होता है।
(४६) तृतीय भाव में गुरु तथा एकादश
भाव में चन्द्रमा हो, तो जातक सब राजाओं में
प्रसिद्ध राजा होता है।
(४७) पंचम भाव में बुध तथा दशम भाव
में चन्द्रमा हो, तो जातक अपने वंश का पालन
करने वाला, बुद्धिमान्, जितेन्द्रिय तथा तपस्वी
राजा होता है।

६४३


[कुण्डली १६२०]

  • लग्न (७): शनि | २: ८ | ३: ९ | ४: १० | ५: ११ | ६: १२ | ७: १ | ८: २ | ९: ३ | १०: ४ | ११: ५ | १२: ६
  • चित्र संख्या: १६२०

(४८) तुला, धनु अथवा मीन राशि
का शनि लग्न में स्थित हो, तो ऐसा जातक
पृथ्वीपति (राजा) होता है।


[कुण्डली १६२१]

  • लग्न (७): — | ४: १० | ७ (१): सूर्य | १० (४): गुरु | ११ (५): चन्द्र, बुध, शुक्र
  • चित्र संख्या: १६२१

(४६) कर्क में 'गुरु', एकादश भाव में
चन्द्रमा, बुध और शुक्र तथा मेष राशि में सूर्य हो,
तो जातक पृथ्वीपति होता है।


[कुण्डली १६२२]

  • लग्न (१०): शनि, चन्द्र | ८ (५): शुक्र
  • चित्र संख्या: १६२२

(५०) लग्न में शनि और चन्द्रमा तथा
अष्टम भाव में शुक्र हो, तो ऐसा जातक वेश्याप्रेमी
मानी राजा होता है।


सिंहासन-योग

[कुण्डली १६२३]

  • लग्न (१०): — | २ (११): बुध, सूर्य | ३ (१२): — | ६ (३): मंगल, राहु | ८ (५): केतु, गुरु | ९ (६): — | १२ (९): शुक्र
  • चित्र संख्या: १६२३

षष्ठ, अष्टम, द्वितीय, तृतीय तथा द्वादश
भाव में सभी ग्रह विद्यमान हों, तो ऐसा जातक
राजसिंहासन पर बैठता है।

६४४
ध्वज-योग
अष्टम भाव में पाप-गृह तथा लग्न में
अन्य शुभ ग्रह हों, तो ऐसा जातक समाज का
नेता होता है।
हंस-योग
पंचम, नवम, सप्तम तथा लग्न—इन
भावों में सभी ग्रह हों, तो ऐसा जातक अपने कुल
को पालने वाला होता है।
चाप-योग
शुक्र तुला में, मंगल मेष में तथा गुरु
स्वराशि पर स्थित हो, तो ऐसा जातक राजा होता
है।
प्रथम चतुःसार योग
यदि सभी ग्रह चारों केन्द्रों में स्थित हों तो
ऐसा जातक महाधनी राजा होता है।

६४५
द्वितीय चतुःसार योग
यदि सभी ग्रह मेष, कर्क, तुला तथा मकर
इन चारों राशियों में स्थित हों, तो ऐसा जातक
महाधनी राजा होता है।
दण्ड-योग
यदि सभी ग्रह कर्क, मिथुन, मीन, कन्या
तथा धनु राशि में स्थित हों, तो ऐसा जातक
राज्य-सिंहासन पर बैठता है।
वापी-योग
यदि प्रथम, द्वितीय तथा द्वादश भाव के
अतिरिक्त अन्य सभी भावों में सभी ग्रहों की स्थिति
हो तो ऐसा जातक अपने कुल का प्रधान, गुणी,
धनी, प्रतापी, अत्यन्त धैर्यवान्, सुखी, प्रियवादी
तथा ऐश्वर्यशाली होता है।
कमी का योग
यदि सूर्यादि सातों ग्रह जन्म-कुण्डली के
दशम तथा एकादश भाव में स्थित हों अथवा अन्य
और सप्तम भाव में स्थित हों, तो नीच कुल में
उत्पन्न जातक भी राजा होता है।

६४६
अमर योग
यदि सभी पापग्रह केन्द्र में हों, अथवा सभी
शुभ ग्रह केन्द्र में हों तो इन दोनों प्रकार से अमर
योग बनता है। पापग्रहों के अमर योग में जन्म
लेने वाला जातक क्रूर-स्वभावी राजा तथा शुभ
ग्रहों के अमर योग में जन्म लेने वाला जातक
सौम्य-स्वभावी राजा होता है।
[कुण्डली १६३२]
एकावली योग
लग्न अथवा किसी भी भाव से आरम्भ
करके क्रमशः सातभावों में सात ग्रह स्थित हों, तो
ऐसा जातक महाराजा होता है।
[कुण्डली १६३३]
द्वितीय हंस-योग
सभी ग्रह मेष, कुम्भ, धनु, तुला, मकर
तथा वृश्चिक राशि में हों, तो ऐसा व्यक्ति राजा
अथवा राजपूजित एवं सब प्रकार के ऐश्वर्यों का
स्वामी होता है।
[कुण्डली १६३४]

६४७
पंचधा मैत्री-चक्र

सूर्यचन्द्रमंगलबुधगुरुशुक्रशनि
अधिमित्रचन्द्र, मंगलसूर्य, बुधसूर्य, चन्द्रशुक्र, चन्द्रबुध
मित्रगुरुमंगल, शुक्रशनिशनिगुरु
समशुक्रगुरु, बुधसूर्य, मंगलशुक्र, चन्द्र, मंगलसूर्य, चन्द्र, शनिबुध, मंगल, शुक्र
शत्रुबुधगुरु, शनिशुक्रगुरु, शनिमंगल, बुध
अधिशत्रुशनिबुध, शुक्रसूर्य, चन्द्र
कुण्डली चक्र (तुला लग्न - ७):
  • प्रथम भाव (तनु): ७
  • द्वितीय भाव (धन): ८
  • तृतीय भाव (सहज): ९
  • चतुर्थ भाव (सुख): १०
  • पञ्चम भाव (सुत): ११
  • षष्ठ भाव (रिपु): १२
  • सप्तम भाव (जाया): १
  • अष्टम भाव (आयु): २
  • नवम भाव (भाग्य): ३
  • दशम भाव (कर्म): ४
  • एकादश भाव (लाभ): ५
  • द्वादश भाव (व्यय): ६
    १६३५

सम्पूर्ण 1635 कुण्डलियों से युक्त
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