भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
४०६
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को धन, कुटुम्ब
का सामान्य सुख मिलता है, परन्तु भाई-बहिन के
सुख में कमी आती है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि
में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन
का सुख प्राप्त होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव की देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व की वृद्धि होती है। दसवीं
मित्र-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से आमदनी में अत्यधिक वृद्धि होती है। ऐसा
जातक सुखी तथा धनी जीवन बिताता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में स्वक्षेत्री 'शनि' के प्रभाव से
जातक को भाई-बहिनों का सुख प्राप्त होता है तथा
पराक्रम में वृद्धि होती है। माता, भूमि एवं भवन
का सुख भी मिलता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से
पंचमभाव को देखने से सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र
में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने
से कुछ कठिनाइयों के साथ भाग्य की उन्नति
होती है तथा मतभेदों के साथ धर्म का भी पालन
होता है। दसवीं उच्च तथा मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अच्छी तरह
चलता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव
से जातक को माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख
प्राप्त होता है। भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम
में भी वृद्धि होती है। तीसरी नीच-दृष्टि से षष्ठभाव
को देखने से शत्रु-पक्ष द्वारा अशान्ति मिलती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव की देखने
से पिता से मतभेद रहता है तथा राज्य एवं व्यवसाय
के क्षेत्र में भी अधिक सफलता नहीं मिलती। दसवीं
शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक
सौन्दर्य में कुछ कमी रहती है किन्तु जातक बहुत परिश्रमी होता है।
४१०
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में भ्रातृ 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को सन्तान-सुख तो
मिलता है, परन्तु सन्तान से मतभेद भी रहता है।
विद्या-बुद्धि पर्याप्त रहती है। माता से वैमनस्य
रहता है तथा भूमि-भवन का सामान्य सुख प्राप्त
होता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने
से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में पूर्ण सुख एवं सफ-
लता की प्राप्ति होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से आमदनी अच्छी रहती है।
दसवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से कुटुम्ब से वैमनस्य रहता है तथा अधिक
प्रयत्न करने पर भी धन का विशेष संचय नहीं हो पाता।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में युक्ति
से काम निकालता है। माता, भूमि तथा भवन का
सुख भी अल्प मात्रा में प्राप्त होता है। तीसरी मित्र
दृष्टि से अष्टमभाव की देखने से आयु तथा पुरातत्त्व
का लाभ होता है।
सातवीं उच्च दृष्टि से द्वादशभाव को देखने
से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के संबंध
से लाभ होता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीयभाव की देखने से पराक्रम की
वृद्धि होती है तथा विरोध रहते हुए भी भाई-बहिनों का सुख मिलता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा
दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सुख एवं सफलता की
प्राप्ति होती है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को
देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ भाग्य तथा धर्म
की उन्नति होती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने
से शारीरिक सौन्दर्य में कमी रहती है तथा श्रम
अधिक करना पड़ता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव की देखने से माता,
भूमि एवं भवन का यथेष्ट सुख प्राप्त होता है। दैनिक जीवन प्रभावशाली तथा
आमोदपूर्ण रहता है।
४११
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आयु तथा
पुरातत्त्व का लाभ होता है, परन्तु माता के सुख में
बहुत कमी आती है। भूमि, भवन तथा भाई-बहिनों
का सुख भी कम ही मिलता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि
से दशमभाव को देखने से पिता से वैमनस्य रहता
है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में हानि उठानी
पड़ती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव की
देखने से धन-संचय में कमी तथा कुटुम्ब से वैमनस्य
रहता है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से पंचमभाव को देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का
पक्ष अपूर्ण रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित शनि' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति
कुछ रुकावटों के साथ होती है तथा धर्म का पालन
भी कठिनाई सहित होता है। माता, भूमि तथा
भवन का सुख प्राप्त होता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से
एकादशभाव की देखने से आमदनी खूब रहती है तथा
धन का अच्छा लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से
स्वराशि में तृतीयभाव की देखने से भाई-बहिन
के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। दसवीं नीच तथा शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव
को देखने से शत्रु पक्ष में परेशानी रहती है तथा ननसाल पक्ष कमजोर रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक की कुछ कठिनाइयों के
साथ पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता,
सहयोग तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। भाई-बहिनों
का सुख भी कम ही मिलता है परन्तु पराक्रम में
वृद्धि होती है। तीसरी मित्र तथा उच्च दृष्टि से
द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है, परन्तु
बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव की देखने से माता से कुछ मतभेद
रहता है तथा भूमि, भवन का सुख प्राप्त होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव
को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलती है तथा घरेलू
जीवन सुखमय बना रहता है।
४१२
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी में
अच्छी वृद्धि होती है। भाई-बहिन, माता, भूमि
तथा भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है तथा परा-
क्रम भी बढ़ता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से प्रथम
भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कमी
आती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने
से कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या एवं सन्तान
का लाभ होता है। दसवी मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से जातक दीर्घायु होता
है तथा पुरातत्त्व का लाभ भी होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित उच्च के 'शनि' के प्रभाव से जातक का खर्च
अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से सुख एवं
लाभ की प्राप्ति भी होती है। भाई-बहिन, माता
तथा भवन के सुख में भी कुछ कमी आ जाती है।
तीसरी शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन-
संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कमी रहती है।
सातवीं नीच-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से
शत्रुपक्ष से परेशानी रहती है। दसवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से आयु
तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति अधिक धनी न होते हुए भी अमीरी
ढंग से जीवन बिताता है।
'वृश्चिक' लग्न में 'राहु'
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : प्रथमभाव : राहु
पहले भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक के शरीर में किसी
गुप्त कष्ट अथवा चिन्ता का निवास रहता है। कभी-
कभी उसे मृत्यु-तुल्य शारीरिक कष्ट भी होता है।
वह उन्नति के लिए कठिन परिश्रम करता है तथा
गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है। ऐसा व्यक्ति
तेज स्वभाव का, स्वार्थी तथा असुन्दर होता है।
४१३
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : राहु
[कुण्डली संख्या २६४ : लग्न ८, द्वितीय भाव ९ में राहु]
दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को धन-प्राप्ति के लिए कठिन
परिश्रम करना पड़ता है तथा कुटुम्ब के विषय में चिन्ताएँ
बनी रहती हैं।
अनेक गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर भी वह
ऋणी ही बना रहता है। आर्थिक चिन्ताओं से छुटकारा
नहीं पाता।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : तृतीयभाव : राहु
[कुण्डली संख्या २६५ : लग्न ८, तृतीय भाव १० में राहु]
तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि
होती है। उसे भाई-बहिनों का सुख भी खूब मिलता है,
परन्तु उनके बारे में चिन्ताएँ भी बनी रहती हैं।
ऐसा व्यक्ति चतुर, हिम्मत वाला, धैर्यवान्,
असाधारण साहसी तथा कठिन परिश्रमी होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : राहु
[कुण्डली संख्या २६६ : लग्न ८, चतुर्थ भाव ११ में राहु]
चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के
सुख में कुछ कमी बनी रहती है।
कभी-कभी पारिवारिक संकटों का सामना भी
करना पड़ता है, जिनके निराकरण के लिए उसे गुप्त
युक्तियों, हिम्मत तथा धैर्य का सहारा लेना पड़ता है।
ऐसा व्यक्ति होशियार तथा परिश्रमी भी होता है।
४१४
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : राहु
पांचवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को विद्याध्ययन तथा सन्तान के
पक्ष में कठिनाइयां आती हैं, बाद में कुछ सफलता भी
मिलती है।
ऐसा व्यक्ति चतुर, गुप्त युक्तियों में प्रवीण तथा
हर समय चिन्तित रहने वाला होता है, परन्तु वह अपनी
परेशानियों को किसी पर प्रकट नहीं करता।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : राहु
छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रुओं पर अत्यधिक प्रभाव
रखता है तथा उन पर विजयी होता है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त चातुर्य, धैर्य, हिम्मत, कठिन
परिश्रम तथा युक्तियों के बल पर हर प्रकार की कठिना-
इयों पर विजय पाता रहता है तथा कभी भी हिम्मत
नहीं हारता।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में
कठिनाइयां आती हैं। कभी-कभी स्त्री अथवा व्यवसाय
के कारण घोर संकटों में भी फंस जाना पड़ता है,
परन्तु वह अपनी हिम्मत, युक्ति, चतुराई एवं धैर्य के
बल पर उन सब कठिनाइयों को पार कर जाता है।
४१५
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : अष्टमभाव : राहु
आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को पुरातत्त्व का लाभ होता
है तथा आयु में वृद्धि होती है। उसका जीवन उमंग एवं
उत्साह से भरा रहता है। वह बड़े ठाठ-बाट की जिंदगी
बिताता है, परन्तु कभी-कभी उसे हानि भी उठानी
पड़ती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा यशस्वी भी होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : नवमभाव : राहु
नवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को भाग्योन्नति में बहुत
बाधाएँ आती हैं तथा धर्म के प्रति भी अश्रद्धा रहती है।
वह मानसिक चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है। कई बार
निराश भी हो जाता है। अनेक प्रकार के कष्ट भोगने के
बाद अन्त में उसे थोड़ी-बहुत सफलता मिलती है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : दशमभाव : राहु
दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को अपने पिता द्वारा परेशानी
रहती है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी कष्ट
उठाने पड़ते हैं। कभी-कभी वह अत्यधिक निराश भी हो
जाता है। अन्त में धैर्य, साहस एवं चातुर्य के बल पर
किसी प्रकार उन संकटों पर विजय पाकर थोड़ी-बहुत
उन्नति कर लेता है।
४१६
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : राहु
ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी के क्षेत्र में खूब
सफलता मिलती है। वह अधिक मुनाफा कमाने के लिए
उचित-अनुचित का विचार भी नहीं करता।
ऐसा व्यक्ति घोर स्वार्थी तथा चतुर होता है।
कभी-कभी उसे आकस्मिक धन-लाभ होता है, तो कभी
अचानक ही भारी घाटा भी चला जाता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : राहु
बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता
है, जिसके कारण उसे परेशानियां रहती हैं। बाहरी
स्थानों के सम्बन्ध से उसे कुछ कठिनाइयों के साथ
लाभ भी होता है। कभी आकस्मिक धन-लाभ तो
कभी आकस्मिक धन-हानि के अवसर भी उपस्थित
होते हैं। अन्य प्रकार के कष्ट भी उठाने पड़ते हैं।
'वृश्चिक' लग्न में 'केतु'
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : प्रथमभाव : केतु
पहले भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक के शरीर में कई बार चोट
लगती है तथा शारीरिक सौन्दर्य में कमी आ जाती है।
ऐसा व्यक्ति स्वभाव का उग्र, दिमाग का
कमजोर तथा कठिन शारीरिक श्रम करने वाला होता
है। उसके शरीर पर चोट आदि का कोई स्थायी
चिन्ह भी बनता है।
४१७
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वितीयभाव : केतु
दूसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक धन-प्राप्ति के
लिए प्रयत्न करता है। कभी-कभी आकस्मिक रूप
से भी धन-लाभ हो जाता है। कौटुम्बिक सुख में
कुछ कमी बनी रहती है।
ऐसा व्यक्ति अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने
के लिए सदैव सतर्क बना रहता है।
६७६
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : तृतीयभाव : केतु
तीसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में
अत्यधिक वृद्धि होती है। भाई-बहिनों के संबंध
के कष्ट का अनुभव होता है।
झगड़े-झंझटों में उसे सफलता प्राप्त
होती है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, परिश्रमी,
धैर्यवान् तथा हिम्मती होता है।
६७७
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : चतुर्थभाव : केतु
चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की अपनी माता
के कारण परेशानी उठानी पड़ती है। भूमि तथा
भवन के सुख में भी कमी रहती है। चित्त सदैव
अशान्त रहता है।
कठिन परिश्रम के बाद उसे कुछ चैन
मिलता है। स्थान बदल देने अर्थात् परदेश में
रहने से कुछ सुख मिलता है। घर में उसे सदैव
अशान्ति ही बनी रहती है।
६७८
४१८
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : पंचमभाव : केतु
पाँचवें भाव में शत्रु 'बुध' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को विद्याध्ययन
में कठिनाइयाँ आती हैं तथा सन्तान-पक्ष से भी
कष्ट मिलता है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, दृढ़-निश्चयी,
गुप्त युक्तियों से काम लेने वाला, धैर्यवान् तथा
निडर होता है। वह अपनी गुप्त चिन्ताओं को
किसी पर प्रकट नहीं होने देता ।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : षष्ठभाव : केतु
छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर
अपना विशेष प्रभाव रखता है। वह झगड़ों,
कठिनाइयों आदि पर अपने साहस, गुप्त युक्ति,
धैर्य, परिश्रम एवं बहादुरी के बल पर विजयपाता
है। उसका ननिहाल-पक्ष कमजोर रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : सप्तमभाव : केतु
सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से
घोर कष्ट मिलता है। गृहस्थ जीवन में अनेक
संकट उठ खड़े होते हैं, दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में
भी बड़ी कठिनाइयां आती हैं।
ऐसा व्यक्ति अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य
साहस आदि के बल पर संकटों का कुछ निवारण
कर पाने में समर्थ हो जाता है।
४१६
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : अष्टमभाव : केतु
आठवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित नीच के 'केतु' के प्रभाव से जातक को
अपने जीवन में अनेक बार मृत्यु-तुल्य कष्टों का
सामना करना होता है। पुरातत्त्व की भी हानि
होती है।
ऐसा व्यक्ति जीवन-निर्वाह के लिए
कठिन परिश्रम करता है तथा गुप्त युक्तियों का
आश्रय लेता है परन्तु संकटों से मुक्ति नहीं मिल
पाती।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : नवमभाव : केतु
नवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति
में बड़े संकट आते हैं तथा धर्म की हानि होती है।
ऐसा व्यक्ति हर समय चिन्ताओं से घिरा
रहता है। कभी-कभी घोर संकटों का सामना भी
करता है। गुप्त युक्तियों एवं कठिन परिश्रम के
बल पर भाग्य को बनाने की चेष्टा करते रहने पर
भी सफलता नहीं मिल पाती।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : दशमभाव : केतु
दसवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को अपने पिता
द्वारा कष्ट प्राप्त होता है। राज्य के क्षेत्र में मान-
भंग होता है तथा व्यवसाय-क्षेत्र में घोर संकट
आते रहते हैं। यद्यपि वह धैर्य, हिम्मत एवं गुप्त
युक्तियों के आश्रय से अन्ततः थोड़ी-बहुत राहत भी
प्राप्त कर लेता है, परन्तु उसका जीवन सुख से
नहीं बीतता।
४२०
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : एकादशभाव : केतु
ग्यारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की
आमदनी अच्छी रहती है। कभी-कभी आकस्मिक धन का लाभ होता है तो कभी-कभी संकट भी आते हैं।
ऐसा व्यक्ति चालाक, स्वार्थी, धूर्त तथा मतलबी होता है। उसे अपनी आमदनी से कभी सन्तोष नहीं होता।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
वृश्चिक लग्न : द्वादशभाव : केतु
बारहवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के संबंध से लाभ भी मिलता है।
वह गुप्त युक्ति, चातुर्य तथा परिश्रम के बल पर अपने खर्च को चलाता है, परन्तु कभी-कभी उसे घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है। फिर भी वह अपने धैर्य को कभी नहीं छोड़ता।
४२१
'धनु' लग्न
+---------------+---------------+
| १० \ ९ / ८ |
| \ 'धनु' लग्न / |
| ११ \ / ७ |
|-----------+-------+-----------|
| \ १२ / \ ६ / |
| \ / ३ \ / |
| १ \ / \ / ५ |
|-------+---------------+-------|
| \ २ / |
| \ / |
| \ ४ / |
+---------------+---------------+
६८७
['धनु' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित
विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन]
'धनु' लग्न का फलादेश
'धनु' लग्न में लग्न लेने वाला जातक पिंगलवर्ण, बड़े दाँतों वाला घोड़े-जैसी
जाँघों वाला तथा सुन्दर स्वरूप वाला होता है। वह अत्यन्त कार्य-कुशल, प्रतिभा-
शाली, बुद्धिमान्, सतोगुणी, श्रेष्ठ स्वभाव वाला, सत्य-प्रतिज्ञ, पराक्रमी, तथा
ऐश्वर्यवान् होता है।
ऐसा व्यक्ति यात्रा-प्रेमी, व्यवसायी, ब्राह्मण तथा देवताओं का भक्त, प्रेम के
वश में रहने वाला, मित्रों के काम आने वाला, अनेक कलाओं का जानकार अथवा
कवि तथा लेखक होता है। उसे घोड़े पालने का शौक भी होता है।
'धनु' लग्न में जन्म लेने वाला जातक बाल्यावस्था में अधिक सुख भोगता है,
मध्यमावस्था में सामान्य जीवन व्यतीत करता है तथा अन्तिमावस्था में धन-धान्य
पूर्ण होता है। २२ अथवा २३ वर्ष की आयु में उसे धन का विशेष लाभ होता है।
४२२
'धनु' लग्न वालों के अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न
ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या ६८८ से १०६५ के
बीच देखना चाहिए ।
गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे
आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए ।
'धनु' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश
१. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६८८ से ६९९ के बीच देखना
चाहिए ।
२. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'सूर्य'—
(क) 'मेष' राशि पर ही तो संख्या ६८८
(ख) 'वृष' राशि पर ही तो संख्या ६८९
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६९०
(घ) 'कर्क' राशि पर ही तो संख्या ६९१
(च) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६९२
(छ) 'कन्या' राशि पर ही तो संख्या ६९३
(छ) 'तुला' राशि पर ही तो संख्या ६९४
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६९५
(झ) 'धनु' राशि पर ही तो संख्या ६९६
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६९७
(ट) .'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६९८
(ठ) 'मीन' राशि पर ही तो संख्या ६९९
'धनु' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश
१. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'चन्द्रमा' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १००० से १०११ के बीच
देखना चाहिए।
२. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
४२३
'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस दिन 'चन्द्रमा'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०००
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १००१
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १००२
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १००३
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १००४
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १००५
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १००६
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १००७
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १००८
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १००९
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०१०
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या-१०११
'धनु' लग्न में 'मंगल' का फलादेश
१. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'मंगल' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०१२ से १०२३ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'धनु' लग्नवालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'मंगल'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०१२
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०१३
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०१४
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०१५
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०१६
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०१७
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०१८
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०१९
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०२०
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०२१
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०२२
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०२३
४२४
'धनु' लग्न में 'बुध' का फलादेश
१. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०२४ से १०३५ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'बुध'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०२४
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०२५
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०२६
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०२७
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०२८
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०२९
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०३०
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०३१
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०३२
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०३३
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०३४
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०३५
'धनु' लग्न में 'गुरु' का फलादेश
१. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०३६ से १०४७ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'बुध'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०३६
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०३७
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०३८
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०३९
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०४०
४२५
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०४१
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०४२
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०४३
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०४४
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०४५
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०४६
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०४७
'धनु' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश
१. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०४८ से १०५६ के बीच देखना
चाहिए।
'धनु' लग्नवालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का
अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'शुक्र'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०४८
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०४६
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०५०
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०५१
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०५२
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०५३
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०५४
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०५५
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०५६
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०५७
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०५८
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०५६
'धनु' लग्न में 'शनि' का फलादेश
१. 'धनु' लग्नवालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६२४ से ६३५ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'
४२६
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में ‘शनि’—
(क) ‘मेष’ राशि पर हो तो संख्या १०६०
(ख) ‘वृष’ राशि पर हो तो संख्या १०६१
(ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या १०६२
(घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या १०६३
(ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या १०६४
(च) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या १०६५
(छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या १०६६
(ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या १०६७
(झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या १०६८
(ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या १०६६
(ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या १०७०
(ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या १०७१
‘धनु’ लग्न में ‘राहु’ का फलादेश
१ ‘धनु’ लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
‘राहु’ का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०७२ से १०८३ के बीच देखना
चाहिए।
२- ‘धनु’ लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित ‘राहु’
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में ‘राहु’—
(क) ‘मेष’ राशि पर हो तो संख्या १०७२
(ख) ‘वृष’ राशि पर हो तो संख्या १०७३
(ग) ‘मिथुन’ राशि पर हो तो संख्या १०७४
(घ) ‘कर्क’ राशि पर हो तो संख्या १०७५
(ङ) ‘सिंह’ राशि पर हो तो संख्या १०७६
(थ) ‘कन्या’ राशि पर हो तो संख्या १०७७
(छ) ‘तुला’ राशि पर हो तो संख्या १०७८
(ज) ‘वृश्चिक’ राशि पर हो तो संख्या १०७६
(झ) ‘धनु’ राशि पर हो तो संख्या १०८०
(ञ) ‘मकर’ राशि पर हो तो संख्या १०८१
(ट) ‘कुम्भ’ राशि पर हो तो संख्या १०८२
(ठ) ‘मीन’ राशि पर हो तो संख्या १०८३
४२७
'धनु' लग्न में 'केतु' का फलादेश
१. 'धनु' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या १०८४ से १०९५ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'धनु' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित. 'केतु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'केतु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या १०८४
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या १०८५
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या १०८६
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या १०८७
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या १०८८
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या १०८९
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या १०९०
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या १०९१
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या १०९२
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या १०९३
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या १०९४
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या १०९५
'धनु' लग्न में सूर्य
'धनु' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : प्रथमभाव : सूर्य
[कुण्डली: लग्न (प्रथम भाव) में ९, सू०; द्वितीय भाव में १०; तृतीय भाव में ११; चतुर्थ भाव में १२; पंचम भाव में १; षष्ठ भाव में २; सप्तम भाव में ३; अष्टम भाव में ४; नवम भाव में ५; दशम भाव में ६; एकादश भाव में ७; द्वादश भाव में ८।]
केन्द्र तथा शरीर-स्थान में अपने मित्र 'गुरु' की
राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को उत्तम
शक्तिशाली शरीर की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति
भाग्यशाली, धार्मिक रुचि वाला तथा आस्तिक होता
है। सातवीं दृष्टि से बुध की राशि में सप्तमभाव को
देखने से जातक को सुन्दर स्त्री का सहयोग और
गृहस्थ-सुख प्राप्त होता है। साथ ही दैनिक व्यवसाय
में लाभ भी होता है।
४२८
'धनु' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ
धन-संग्रह में श्रेष्ठ सफलता मिलती है तथा कुछ मत-
भेदों के साथ कुटुम्ब का सुख भी प्राप्त होता है। ऐसा
व्यक्ति स्वार्थ-सिद्धि के लिए धर्म का पालन करता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
जातक को आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का
लाभ भी होता है। ऐसे व्यक्ति की भाग्योन्नति भी
अच्छी होती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : तृतीयभाव : सूर्य
तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों का सुख
कुछ असंतोष के साथ मिलता है तथा पराक्रम में
अत्यधिक वृद्धि होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को
देखने से पुरुषार्थ द्वारा भाग्य की अत्यधिक वृद्धि होती
है, साथ ही धर्म का भी पालन होता है। ऐसा व्यक्ति
बड़ा हिम्मती तथा यशस्वी होता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को माता का सुख अधिक
मिलता है तथा भूमि, भवन का सुख भी प्राप्त होता
है। धर्म तथा भाग्य की उन्नति भी होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, सम्मान,
लाभ तथा सफलता के अवसर भी प्राप्त होते रहते हैं।