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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 419, कुल 638 में से

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'धनु' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को कुछ कठिनाइयों के साथ
धन-संग्रह में श्रेष्ठ सफलता मिलती है तथा कुछ मत-
भेदों के साथ कुटुम्ब का सुख भी प्राप्त होता है। ऐसा
व्यक्ति स्वार्थ-सिद्धि के लिए धर्म का पालन करता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
जातक को आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का
लाभ भी होता है। ऐसे व्यक्ति की भाग्योन्नति भी
अच्छी होती है।
'धनु' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : तृतीयभाव : सूर्य
तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों का सुख
कुछ असंतोष के साथ मिलता है तथा पराक्रम में
अत्यधिक वृद्धि होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में नवमभाव को
देखने से पुरुषार्थ द्वारा भाग्य की अत्यधिक वृद्धि होती
है, साथ ही धर्म का भी पालन होता है। ऐसा व्यक्ति
बड़ा हिम्मती तथा यशस्वी होता है।
'धनु' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
धनु लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को माता का सुख अधिक
मिलता है तथा भूमि, भवन का सुख भी प्राप्त होता
है। धर्म तथा भाग्य की उन्नति भी होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, सम्मान,
लाभ तथा सफलता के अवसर भी प्राप्त होते रहते हैं।