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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 638 में से

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'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को पितृपक्ष से धन
की प्राप्ति होती है तथा कौटुम्बिक सुख भी मिलता
है। राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी लाभ होता
है, परन्तु पिता के सुख में कुछ कमी रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति भी प्राप्त होती
है। ऐसा व्यक्ति का दैनिक जीवन सुखी तथा प्रभाव-
पूर्ण बना रहता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : तृतीयभाव : सूर्य
तीसरे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि
होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कुछ कमी
रहती है। पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में
भी सफलताएँ प्राप्त होती हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवम भाव को देखने
से धर्म तथा भाग्य की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति
तेजस्वी तथा पुरुषार्थी होता है।
'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
वृश्चिकलग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक का अपनी माता
के साथ मतभेद रहता है तथा भूमि-भवन के सुख में
कुछ कमी आती है। घरेलू सुख में भी कुछ त्रुटियाँ
बनी रहती हैं।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में दशम भाव को
देखने से राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में
सहयोग सम्मान, लाभ तथा सफलता की प्राप्ति
होती है। ऐसा व्यक्ति स्वयं उन्नति करता है।