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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 638 में से

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'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : षष्ठभाव : राहु
छठे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में कठिनाइयाँ
उठाकर भी विजय प्राप्त करता है ।
ऐसा व्यक्ति बड़ा बहादुर, हिम्मती तथा
गुप्त युक्तियों का ज्ञाता होता है । अपना प्रभाव
स्थापित करने में उसे सफलता मिल जाती है ।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से
संकटों का सामना करना पड़ता है तथा दैनिक
व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं ।
व्यवसाय में भी कभी-कभी बड़े संकट आते
हैं, परन्तु यह अपनी गुप्त युक्ति, धैर्य और साहस
के बल पर उन सभी बाधाओं पर विजय प्राप्त
कर लेता है ।
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
तुला लग्न : अष्टमभाव : राहु
आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को आयु पर उसे बड़े संकट
आते हैं, परन्तु मृत्यु नहीं होती । पुरातत्त्व की हानि भी
होती है । दैनिक जीवन में भी अनेक संघर्ष, चिन्ता व
परेशानियों का सामना करना पड़ता है ।