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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ४५
❖ वीर्ये रक्ते मले च शरीरारम्भके वाग्भटोक्तपरिमाणमिते शुद्ध.जीवोवसति न तु दुष्टे प्रवृद्धे च
रक्तस्रावणोपदेशस्य वैयर्थ्यप्रसङ्गात् ।।२६।।
‘जीव, रक्त और मल में रहता है' इसका अभिप्राय यह है कि वाग्भट में कहे हुए रक्तादि के जो परिमाण हैं उन
परिमाणों में स्थित अतएव शरीरारम्भक (शरीर को ठीक रखनेवाले) विशुद्ध रक्तादि में ही विशेषरूप से जीव रहता है,
क्योंकि यदि ऐसा नहीं माना जाय तो दोष युक्त तथा बढ़े हुए रक्त के निकालने का जो उपदेश ऋषियों ने दिया है वह
अनुचित समझा जायगा ।।२६।।
अथ रक्तस्य स्थानमाह-
यकृत् प्लीहा च रक्तस्य मुख्यस्थानन्तयोः स्थितम् । अन्यत्र संस्थितवतां रक्तानां पोषकं भवेत् ।।१४१।।
रक्त के स्थान—यकृत् (कलेजा) और प्लीहा (तिल्ली) ये दोनों रक्त के मुक्त स्थान हैं, इन दोनों स्थानों में स्थित
जो रक्त है वही दूसरे स्थानों में स्थित रक्तों को परिपुष्ट करनेवाला होता है ।।१४१।।
अथ मांसस्य स्वरूपमाह-
शोणितं स्वाग्निना पक्वं वायुना च घनीकृतम् । तदेव मांसं जानीयात्तस्य भेदानपि ब्रुवे ।।१४२।।
मांस के स्वरूप—रक्त जब अपने अग्नि (ऊष्मा) द्वारा परिपक्व हो जाने पर वायु के द्वारा घन (जमकर कड़ा)
हो जाता है तब 'मांस' इस नाम से कहा जाता है। उस मांस के जितने भेद होते हैं उन सबों को कहते हैं ।।१४२।।
❖ शोणितमिति। शोणितस्थानगतत्वाद्रस एव शोणितसंज्ञां लभते। एवमग्रे रसस्यैव
मांसादिव्यपदेशः ।।१४२।।
उपर्युक्त श्लोक का तात्पर्य यह है कि रस ही जब रक्तस्थान में पहुँचता है तब रक्त नाम से और जब उसके आगे
मांसादि के स्थानों में पहुँचता है तब मांसादि नाम से कहा जाता है अर्थात् रक्त-मांसादि सम्पूर्ण धातु एक रस का ही
परिणाम है ।।१४२।।
अथ मांसस्य पेशीमाह-
यथाऽर्थमूष्मणा युक्तो वायुः स्रोतांसि दारयेत् । अनुप्रविश्य पिशितं पेशीर्विभजते तथा ।।१४३।।
मांस पेशी—वायु जैसा प्रयोजन है उसके अनुसार ऊष्मा से युक्त होकर स्रोतों (शिराओं) को विदीर्ण करता हुआ
मांस के भीतर प्रवेश कर उसे पेशी के रूप में विभक्त करता है अर्थात् सूत्र के गुच्छे के रूप में परिणत कर देता है ।।१४३।।
❖ यथाऽर्थ=यथाप्रयोजनम् ।।१४३।।
'यथाऽर्थ' पद में 'अर्थ' पद का 'प्रयोजन' अर्थ होने से 'यथाऽर्थ' का 'जैसे प्रयोजन है उसके अनुसार' यह अर्थ
होता है ।।१४३।।
अथ मांसपेशीनां संख्यामाह-
मांसपेश्यः समाख्याता नृणां पञ्च शतानि हि ।।१४४।।
तासां शतानि चत्वारि शाखासु कथितान्यथ ।
कोष्ठे षडुत्तरा षष्टिः कथिता मुनिपुङ्गवैः । ग्रीवाया ऊर्ध्वगास्तास्तु चतुस्त्रिंशत् प्रकीर्त्तिताः ।।१४५।।
मांसपेशियों की संख्या—मनुष्यों के शरीर में कुल ५०० मांसपेशियां हैं, उनमें ४०० चारों शाखाओं में अर्थात्
दोनों हाथों और दोनों पैरों में और उसके बाद कोष्ठ में अर्थात् गर्दन के नीचे से लेकर कमर तक ६६ और गर्दन के ऊपर
भाग में ३४ मांसपेशियाँ होती हैं ।।१४४-१४५।।

४६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
❖ एकैकस्यानु पादाङ्गुल्यां तिस्रस्तिस्रस्ताः पञ्चदश १५ । पादाग्रे दश १० । पादोपरि कूर्चसन्निविष्टा
दश १० । गुल्फतलयोर्दश १० । गुल्फजानुनोरन्तरे विंशतिः २० । जानुनि पञ्च ५ । ऊरौ विंशतिः २० ।
वङ्क्षणे दश १०। एवमेकस्मिन् सक्थिनि शतं भवन्ति । एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ। एतासां
समष्टिश्श्रुतुःशतम् ।
शाखागत मांसपेशियाँ-एक एक पैर की अङ्गुलियों में तीन तीन हैं इस प्रकार पाँचों अङ्गुलियों में कुल पन्द्रह,
पैर के अग्रभाग में दश और पैर के ऊपर कूर्चस्थान में दश, गुल्फ और तालुओं में दश, गुल्फ और जानु के बीच में
बीस और घुटने में पाँच, जाँघ में बीस और वङ्क्षण (ऊरु की सन्धि) में दश मांसपेशियाँ हैं, इस प्रकार सब मिलकर
एक सक्थि अर्थात् पाँव के पंजे से लेकर जाँघ की सन्धि तक एक सौ मांसपेशियां हैं, इसी प्रकार दूसरे पाँव तथा दोनों
बाहुओं में भी एक सौ मांसपेशियाँ होती हैं। इन सब का योगफल चार सौ होता है॥
अथ कोष्ठगताः प्राह-
❖ गुदे तिस्रः ३ । शेफस्यैका १ । सेवन्यामेका १ । वृषणयोद्वे २ । स्फिचोः पञ्च ५ पञ्च ५ ।
वस्तिमूर्धनि द्वे २ । उदरे पञ्च ५ । नाभ्यामेका १ । १पृष्ठोर्ध्वसन्निविष्टा उभयतः पञ्च ५ । पञ्च ५ दीर्घाः ।
पार्श्वयोः षट् ६ । वक्षसि दश १० । अक्षकांसौ प्रतिसमन्तात् सप्त ७ । अक्षकौ अषुआ इति लोके । अंसौ
स्कन्धौ । हृदि द्वे २ । यकृति द्वे २ । प्लीह्नि द्व २ उण्डुके२ द्वे २ । एतासां समष्टिः षट्षष्टिः ६६ ।।
कोष्ठगत मांसपेशियाँ-गुदा में तीन, लिङ्ग में एक, सेवनी अर्थात् सीवन में एक, दोनों अण्डकोषों में दो, दोनों
तरफ के स्फिचों (कूलों) में पाँच-पाँच, वस्ति के ऊपर भाग में दो, उदर में पाँच, नाभि में एक, पीठ के ऊपर मेरुदण्ड
के दोनों तरफ लगी हुई लम्बी लम्बी पाँच-पाँच (मिलकर दस), दोनों तरफ की पँसुलियों में तीन-तीन (मिलकर छ),
छाती में दस, हँसुली और कन्धे के चारों तरफ सात, (यहाँ 'अक्षक' से लोक में प्रसिद्ध 'अखुआ' तथा 'अंस' से 'स्कन्ध'
समझना चाहिये। हृदय में दो, यकृत् में दो, प्लीहा में दो और उण्डुक (मलाशय) में दो मांसपेशियाँ होती हैं। इन सब
का योगफल ६६ होता है।
अथ ग्रीवोर्ध्वगाः प्राह-
ग्रीवायाञ्चतस्रः ४ । हन्वोरष्टौ ८ । एका काकलके कण्ठमणौ ३घण्टिकायामिति यावत् । गले एका
१ । तालुनि द्वे २ । जिह्वायामेका १ । ओष्ठयोर्द्वे २ । नासायां द्वे २ । नेत्रयोर्द्वे २ । गण्डयोश्चतस्रः ४ ।
कर्णयोर्द्वे २ । ललाटे चतस्रः ४ । शिरस्येका १ । आसां समष्टिः चतुस्त्रिंशत् ३४ । एवं मांसपेश्यः पञ्च
शतानि ५०० भवन्ति ।।१४४-१४५।।
गर्दन के ऊपर भाग की मांसपेशियाँ-गर्दन में चार, दोनों हनुओं (कपोलों) के नीचे भागों में आठ, काकलक
(कण्ठमणि) में एक, (कण्डमणि को लोक में घण्टिका (टेंटुआ) कहते हैं) गले में एक, तालु में दो, जिह्वा में एक,
दोनों ओठों में दो, दोनों नाक में दो, दोनों नेत्रों में दो, दोनों गण्डस्थलों में चार, दोनों कानों में दो, ललाट में चार और
शिर में एक मांसपेशियाँ होती हैं। इन सबों का योगफल चौंतीस होता है। इस प्रकार सब मिलकर संपूर्ण शरीर में पाँच
सौ मांसपेशियाँ होती हैं ।।१४४-१४५।।
स्त्रीणामपि भवन््येताः किन्तु विंशतिरुत्तरा । गर्भाशये गर्भमार्गे योनौ च स्तनयोरपि ।।१४६।।
स्त्रियों के भी इतनी ही मांसपेशियाँ होती हैं किन्तु गर्भाशय, गर्भमार्ग, योनि तथा दोनों स्तनों में बीस मांसपेशियाँ
अधिक होती है ।।१४६।।
१. 'पृष्ठोर्ध्वमि'ति पाठान्तरम् । २. 'तुण्डके' इति पाठान्तरं प्रामादिकम् । ३. 'घुण्टिकायामि'ति पाठान्तरम् ।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ४७
❖ एताः पञ्चशतानि कांसपेश्यः स्त्रीणामधिका विंशतिर्यथा—गर्भाशये तिस्रः ३ । गर्भच्छिद्रसंस्थिताः
शुक्रार्त्तवप्रवेशिन्यस्तिस्रः ३ । योनावभ्यन्तरतो मुखश्रिते प्रसुते द्वे २ । योनावेव वहिर्निर्गते स्रोतः पार्श्वद्वयस्थितेवर्तुले
योनिकर्णिकितियावत् द्वे २ । स्तनयोः पञ्च ५ पञ्च ५ । यौवने तासां वृद्धिर्भवति ।।१४६।।
स्त्रियों के बीस अधिक मांसपेशियाँ—गर्भाशय में तीन, गर्भछिद्र अर्थात् गर्भमार्ग में स्थित शुक्र और आर्तव
को गर्भाशय में प्रवेश करानेवाली तीन, योनि के भीतर मुखभाग की तरफ फैली हुई दो और योनि में ही बाहर की ओर
निकली हुई स्रोत अर्थात् छिद्र के दोनों पार्श्वों में स्थित वर्तुलाकार (गोलाकार) योनिकर्णिका में दो तथा दोनों स्तनों में
पाँच-पाँच मांसपेशियाँ होती हैं। युवावस्था होने पर स्त्रियों में इन मांसपेशियों की वृद्धि होती है ॥१४६॥
पुंसां पेश्यः पुरस्ताद्याः प्रोक्ता मेहनमुष्कजाः । स्त्रीणामावृत्य तिष्ठन्ति फल

४८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
अथास्थ्नः स्वरूपमाह-
मेदो यत् स्वाग्निना पक्वं वायुना चातिशोषितम् ।।१५१।।
तदस्थिसंज्ञां लभते स सारः सर्वविग्रहे। अभ्यन्तरगतैः सारैर्यथा तिष्ठन्ति भूरुहाः ।।१५२।।
अस्थिसारैस्तथा देहा ध्रियन्ते देहिनो ध्रुवम्। तस्माच्चिरविनष्टेषु त्वङ्मांसेषु शरीरिणाम् ।।
अस्थीनि न विनश्यन्ति सारा एतानि सर्वथा ।।१५३।।
हड्डियों के स्वरूप—जब मेद (चर्बी) अपने अग्नि की गर्मी से परिपक्व होकर वायु से अत्यन्त सूख जाता है
तब उसका अस्थि नाम पड़ जाता है और वही अस्थि (हड्डी) सम्पूर्ण शरीर में सार (दृढ़) पदार्थ है। जिस प्रकार सब वृक्षों
के भीतर सार होने पर वे दृढ़रूप से ठहरे रहते हैं, उसी प्रकार प्राणियों के भी शरीर; अन्दर में स्थित सारस्वरूप हड्डियों
के द्वारा ही ठहरे रहते हैं। इसीसे प्राणियों के चमड़े और मांस के भली-भाँति नष्ट हो जाने पर भी हड्डियाँ नष्ट नहीं होतीं।
अतः ये हड्डियाँ सार (दृढ़ पदार्थ) कही जाती हैं ।।१५१-१५३।।
आथास्थ्नां संख्यामाह-
शल्यतन्त्रेऽस्थिखण्डानां शतत्रयमुदाहृतम् ।।१५४।।
तान्येवात्र निगद्यन्ते तेषां स्थानानि यानि च।
सविंशतिशतं त्वस्थ्नां शाखासु कथितं बुधैः ।।१५५।।
पार्श्वयोः श्रोणिफलके वक्षःपृष्ठोदरेषु च ।।
जानीयाद्भिषगेतेषु शतं सप्तदशोत्तरम्। ग्रीवायामूर्ध्वगां विद्यादस्थ्नां षष्टिं त्रिसंयुताम् ।।१५६।।
हड्डियों की संख्या—शल्यतन्त्र में हड्डियों के टुकड़ों की संख्या जो तीन सौ कही हुई है तथा उन हड्डियों के जो-
जो स्थान हैं उन्हें भी कह रहे हैं। पण्डितों ने शाखाओं (हाथ पैरों) में एक सौ बीस, दोनों पाश्र्वों (पँसुलियों) में और
श्रोणिफल (कटिप्रदेश) तथा वक्षःस्थल पीठ और उदर इन सब स्थानों में एक सौ सत्रह, ग्रीवा (गर्दन) तथा ग्रीवा के ऊपर
तिरसठ हड्डियाँ कही हैं ऐसा वैद्यों को जानना चाहिये ।।१५४-१५६।।
तानि शाखागतान्याह-
❖ एकैकस्यां पादाङ्गुल्यां त्रीणि त्रीणि तानि पञ्चदश १५। पादतले ५ पञ्चास्थिशलाकास्त-दाधारभूतमेकमस्थि
१ एवं षट ६। कूर्च्चे द्वे २। गुल्फे द्वे २। पाष्णाविकम् १। जङ्घायां द्वे २। जानुन्येकम् १। ऊरावेकम् १।
एवं त्रिंशदेकस्मिन् सक्थिनि भवन्ति। एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ ।।
शाखागत हड्डियाँ पैर की प्रत्येक अङ्गुलियों में तीन-तीन, सब मिलकर पन्द्रह, पैर के तलुये में पाँच अस्थिशलाकाएँ
(सलाई की भाँति हड्डी) और उन्हीं के आधारभूत एक हड्डी इस प्रकार सब मिलकर छ, कूर्च में दो, गुल्फ (पैर के गाँठ)
में दो, पार्ष्णि (एड़ी) में एक, जङ्घा में (एड़ी से जानु पर्यन्त भाग में) दो, जानु (घुटना) में एक और ऊरु (जानु से ऊपर
कटि के नीचे भाग तक) में एक हड्डियाँ हैं। इस प्रकार सब मिलकर तीस हड्डियाँ एक पैर में होती हैं, इसी प्रकार से
दूसरे पैर तथा दोनों हाथों में भी तीस २ हड्डियाँ होती हैं ।।
अथ पाश्वादिगतान्याह-
❖ पार्श्वयो षट्त्रिंशद् ३६ एवमेकस्मिन् द्वितीयेऽप्येवम्। शिश्ने भगे वा एकम्। गुदे एकम् १।
नितम्बयोरेकैकम् २। त्रिके एकम् १। वक्षस्यष्टौ ८। पृष्ठे त्रिंशत् ३०। अक्षसंज्ञे द्वे २।
पाश्र्वादि स्थानों की हड्डियाँ—दोनों पँसुलियों के प्रथम में छत्तीस और दूसरे में भी छत्तीस इस प्रकार बहत्तर, लिङ्ग

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ४९
अथवा भग में एक, गुदा में एक, दोनों ओर के नितम्बों (कटि के पीछे के दोनों भागों) में एक-एक (दो), त्रिकस्थान
में एक, वक्षःस्थल में आठ, पीठ में तीस और अक्षक (हँसुली) नामक दो हड्डियाँ हैं ॥
अथ ग्रीवोर्ध्वगतान्याह-
❖ ग्रीवायां नव ९ । कण्ठनाड्यां चत्वारि ४ । हन्वोरेकैकम् २ । दन्ता द्वात्रिंशत् ३२ । नासायां त्रीणि
३ । तालुन्येकम् १ । गण्डयोरेकैकम् २ । कर्णयोरकैकम् २ । भ्रुवोरेकैकम् २ । शिरसि षट् ६ ।।१५४-
१५६।।
ग्रीवा की हड्डियाँ-ग्रीवा में नौ, कण्ठ की नली में चार, दोनों हनुओं (दोनों कपोल के नीचे भागों) में एक-एक
(दो), दाँतों में बत्तीस, नाक में तीन, तालु में एक, दोनों गण्डस्थलों में एक-एक (दो), दोनों भौहों में एक-एक (दो)
और शिर में छः हड्डियाँ होती हैं ।।१५१-१५६।।
एतान्यस्थीनि पञ्चविधानि भवन्ति तानि यथा-
तरुणाणि कपालानि रुचकानि भवन्ति हि । वलयानीति तानि स्युर्नलकानि च कानि चित् ।।१५७।।
हड्डियों की संज्ञा-जितनी हड्डियाँ होती हैं, उनमें से कोई तरुण, कोई कपाल, कोई रोचक, कोई वलय और
कोई नलकसंज्ञक होती हैं ।।१५७।।
अक्षिकोष श्रुतिघ्राणग्रीवासु तरुणानि च ।।१५८।।
शिरःशङ्खकपोलेषु ताल्वं सप्रोथजानुषु । कपालानि भवन्त्येषु दन्तेषु रुचकानि च ।।१५९।।
अक्षिकोष (जहाँ पर नेत्र रहता है), कान, नासिका और गर्दन इन स्थानों में जो हड्डियाँ होती हैं उन्हें
तरुणसंज्ञक और शिर (मस्तक), कपोल, तालु, कन्धा, प्रोथ (कटि भाग में स्थित मांसपिण्ड शङ्ख अर्थात् कूले), जानु
(घुटने) इन स्थानों में जो हड्डियाँ होती हैं, उन्हें कपाल संज्ञक तथा दाँतों में जो होती हैं उन्हें रोचक संज्ञक जानना
चाहिये ।।१५८-१५९।।
❖ जानुनितम्बांसगण्डतालुशङ्खशिरःसु कपालानि । दशनास्तु रुचकाः ।।१५८-१५९।।
जानु, नितम्ब, कन्धा, गण्डस्थल, तालु, शङ्ख और शिर में कपाल संज्ञक हड्डियाँ हैं और दाँत रोचक संज्ञक हड्डियाँ
हैं ।।१५८-१५९।।
पाष्ण्र्योः पार्श्वयुगे पृष्ठे वक्षोजठरपायुषु । पादयोर्वलयानि स्युर्नलकानि ब्रुवेऽधुना ।।१६०।।
हस्ते पादाङ्गुलितले कूर्च्चे च मणिबन्धके । बाहुजङ्घाद्वये चापि जानीयान्नलकानि तु ।।१६१।।
दोनों हाथ, दोनों पँसुली, पीठ, वक्षःस्थल, उदर, गुदा और दोनों पैरों में वलयसंज्ञक हड्डियाँ होती हैं। हाथ तथा
पैर की अंगुलियों के तल-भाग, कूर्च, मणिबन्ध (कलाई), बाहु और दोनों जङ्घा (जानु से नीचे और एड़ी के ऊपर वाला
भाग) इन स्थानों में जो हड्डियाँ हैं उन्हें नलकसंज्ञक जानना चाहिये ।।१६०-१६१।।
अथास्थां प्रयोजनमाह-
मांसान्यन्त्राणि१ बद्धानि शिराभिः स्नायुभिस्तथा । अस्थीन्यालम्बनं कृत्वा न दीर्यन्ते पतन्ति च ।।१६२।।
हड्डियों के प्रयोजन—शिरा (नस) और स्नायुओं (दृढ़ ठोस नसों) से बँधी हुई मांस और अंतड़ियां हड्डियों का
सहारा लेकर स्थित हैं। अतएव वे न विदीर्ण होती हैं, न गिरती है अर्थात् हड्डी न होती तो वे नहीं रुक सकती थीं, अतएव
इन सब को गिरने से रोकना ही हड्डियों का प्रयोजन समझना चाहिये ।।१६२।।
१. 'मांसान्यत्र निबद्धानी'ति पाठान्तरम्।
७ भाव.I
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५० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
अस्थि यत् स्वाग्निना पक्वं तस्य सारो भवेद्धनः । यः स्वेदवत् पृथग्भूतः स मज्जेत्यभिधीयते ।।१६३।।
मज्जा के स्वरूप—जब अस्थि अपने अग्नि से परिपक्व हो जाता है तब उसका जो सार होता है वह घन हो
जाता है और वही सार जो अस्थि से स्वेद की भाँति अलग होकर अस्थि के मध्य में स्थित रहता है उसी अस्थि के सार
को मज्जा कहते हैं ।।१६३।।
अथ मज्जस्थानमाह-
स्थूलास्थिषु विशेषेण मज्जा त्वभ्यन्तरे स्थितः ।।१६४।।
मज्जा के स्थान—मोटी २ हड्डियों के भीतर ही मज्जा विशेषरूप से रहती है। अतः मज्जा का स्थान मोटी-
मोटी हड्डियों के भीतर का भाग समझना चाहिये ।।१६४।।
अथ शुक्रस्योत्पत्तिमाह-
रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते । मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्ज्ञः शुक्रस्य सम्भवः ।।१६५।।
शुक्र की उत्पत्ति—रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्र
की उत्पत्ति होती है ।।१६५।।
❖ सुश्रुतस्येति¹ वचनेन शुक्रसम्भव उक्तः ।।१६५।।
ऊपर कहे हुए सुश्रुत के इसी वचन के द्वारा सिद्ध होता है कि मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है ।।
ननु 'मांसेन रसः शुक्नो भवति स्त्रीणाञ्चार्त्तवं भवती'ति सुश्रुतस्यैव वचने रसादेव शुक्रस्योत्पत्तिरुच्यते तदेतत्
कथं सङ्गच्छते ? इममेव सन्देहं दूरीकर्तुमाहारादेर्गतिं परिणामञ्चाह-यात्यामाशयमाहारः पूर्वं प्राणानिलेरितः ।
माधुर्यं फेनभावं च षड्सोऽपि लभेत सः ।।१६६।।
आहारादि की गति और परिणाम—प्राणवायु से प्रेरित होकर आहार (भोजन) सबसे पहले आमाशय में जाता
है और अम्लादि छः प्रकार के रसों में से चाहे जिस प्रकार के रस से युक्त हो, वहाँ पहुँच कर मधुरता तथा फेन भाव
को प्राप्त करता है अर्थात् मीठा और झाग से युक्त हो जाता है ।
❖ आहार इत्यत्र 'आह्रियते' इत्याहारः । 'अकर्त्तरि च कारके संज्ञायामि'ति सूत्रेण कर्मणि घञ् । स
च षड्विधः । तथा च—
आहार्यं षड्विधं भोज्यं भक्ष्यं चर्व्यन्तथैव च ।।२८।।
लेह्यं चूष्यं तथा पेयं तदुदाहरणानि तु । भोज्यमोदनसूपादि भक्ष्य मोदकमण्डकम् ।।२९।।
चर्व्यं चिपिटधान्यादि रसालादि तु लेह्यते । चूष्यमाम्रफलेक्ष्वादि पीयते पानकं पयः ।।३०।।
'आहार' भोजन की संज्ञा हैं । 'अकर्त्तरि च कारके संज्ञायाम्' इस पाणिनीय सूत्र से कर्म में 'आङ्' उपपद रहते,
'हृ' धातु से घञ् प्रत्यय तथा वृद्धि होने से आहार पद की सिद्धि होती है । वह आहार छः प्रकार का होता है—भोज्य,
भक्ष्य, चर्व्य, लेह्य, चूष्य और पेय । भोजन करने योग्य भात, दाल प्रभृति भोज्य, भक्षण करने के योग्य लड्डू, मण्डक
प्रभृति भक्ष्य, चबाने लायक चिउड़ा, चना प्रभृति, चर्व्य, चाटने लायक रसाला (रस-युक्त चटनी) आदि लेह्य, चूसने योग्य
आम, ईख आदि चूष्य और पीने योग्य शरबत, दूध आदि पेय कहाता है ।।२८-३०।।
१. 'शुक्रस्ये'ति पाठान्तरं चिन्त्यम् ।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ५१
❖ आमाशयमाह चरकः-
'नाभिस्तनान्तरे जन्तोराहुरामाशयं बुधाः' ।। ३१ ।।
आमाशय का स्थान—'प्राणियों के नाभि और स्तन के मध्य में आमाशय रहता है ॥ ३१॥
❖ अत्र विशेषमाह-
'नाभेर्वितस्तिमात्रं च कण्ठदेशात् षडङ्गुलम् । उरसस्तद्विजानीयात् शेषे तु हृदयं मतम् ।। ३२ ।।
उरो रक्ताशयस्तस्मादधः श्लेष्माशयः स्मृतः । आमाशयस्तु तदधस्तदधो दहनाशयः' ।। ३३ ।। इति
'नाभि से एक बालिश्त (बीता) ऊपर से लेकर और कण्ठस्थल से छः अङ्गुल नीचे तक उरःस्थल (छाती) और
उसके नीचे का भाग हृदय कहलाता है । उरःस्थल में रक्ताशय रहता है, उसके नीचे श्लेष्माशय, उसके नीचे आमाशय
और उसके नीचे अग्न्याशय का भाग समझना चाहिये ॥३२-३३॥
प्राणानिलेरित इति । हृदयाधिष्ठानेन प्राणनाम्ना वायुना मुखं गतेनान्तः प्रवेशितः ।
तथा च सुश्रुतः-
यो वायुः प्राणनामाऽसौ मुखं गच्छति देहधृक् । सोऽन्नं प्रवेशयत्यन्तः प्राणांश्चाप्यवलम्बते ।। ३४ ।।
'प्राणानिलेरितः' का भाव यह है कि—हृदय में रहने वाला प्राणनामक वायु मुख तक जाकर वहाँ पर स्थित अन्न-
ग्रास को आमाशय में प्रवेश करता है । इसी विषय में सुश्रुत भी कहते हैं कि—देह को धारण करनेवाला प्राणनामक
वायु जो मुख की ओर जाता रहता है वह अन्न को उदर में प्रवेश करता है और प्राणियों का अवलम्बन करता रहता है
अर्थात् रक्षा किया करता है ॥३४॥
❖ क्लेदननामा कफः क्लेदयति क्लेदनात्संहतं भिनत्ति च ।
उक्तं च सुश्रुते-
क्लेदनः क्लेदयत्यन्नं संहतं च भिनत्त्यतः' इति ।। ३५ ।।
प्राण वायु द्वारा आमाशय में पहुँचाये गये उसी अन्न को क्लेदन नामक कफ क्लिन्न (गीला) करता है और क्लिन्न
करने से इकट्ठे हुए अन्न को अलग-अलग करता है । यही विषय सुश्रुत में भी कहा है कि—'क्लेदन कफ अन्न को क्लिन्न
करता है और इसी से संहत (इकट्ठे हुए) अन्न को भिन्न भिन्न कर देता है ॥३५॥
❖ स आहारः षड्सोऽप्यामाशये माधुर्य लभते, आमाशयस्थस्य मधुरस्य कफस्य योगात् ।
वह आहार पहले चाहे मीठा खट्टा आदि ६ रसों से किसी भी रस से युक्त क्यों न हो किन्तु आमाशय में पहुँचने
पर आमाशय में स्थित मधुर रस से युक्त कफ के साथ योग हो जाने में मीठी ही हो जाता है ।
❖ उक्तञ्च श्लेष्मस्वरूपम्-
श्लेष्मा श्वेतो गुरुः स्निग्धः पिच्छिलः शीतलस्तथा । तमोगुणाधिक स्वादुर्विदग्धो लवणो भवेत् ।।
फेनभावञ्च लभते जठरानलतेजसा। इति ।। ३६ ।।
कफ का स्वरूप—कफ श्वेत, गुरु (वजनदार), स्निग्ध (चिकना), पिच्छिल (फिसलने वाला), शीतल, अधिक
तमोगुण वाला, स्वादु (मधुर) और विदग्ध होने से लवण (नमकीन) होता है और जठराग्नि के तेज से आमाशय में स्थित
माधुर्य को प्राप्त हुआ वह फेन युक्त हो जाता है ॥३६॥

५२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
यत आह वाग्भटः-
‘सन्युक्षितः समानेन पचत्यामाशयस्थितम्। औदर्योऽग्निर्यथाबाह्यः स्थालीस्थं तोयतण्डुलम्' इति ।। ३७।।
वाग्भट ने भी कहा है कि—बाहर (रसोई की अग्नि जैसे बटुलोई में रखे हुये जल से युक्त चावल को पकाता
है उसी भाँति उदर की अग्नि (जठराग्नि) भी समान वायु से फूँक पाने पर तेज हो कर आमाशय में स्थित अन्न को पकाता
है ।।३७।।
❖ अथ स एवाहारः प्राणवायुना प्रेरितस्ततः किञ्चित् स्खलितः पाचकाख्यपित्तोष्मणेषद्विपक्वोडम्लरसो
भवति।
इसके बाद वही आहार प्राणवायु से प्रेरित होकर वहाँ से (आमाशय से) कुछ खसक कर पाचक नामक पित्त की
ऊष्मा (गर्मी) से कुछ पक जाने पर खट्टा हो जाता है ।।
❖ उक्तं च—अथ पाचकपित्तेन विदग्धं चाम्लतां व्रजेत् ।। ३८ ।।
कहा भी है कि—माधुर्य को प्राप्त करके प्राण वायु से प्रेरित होने के बाद, पाचक पित्त से आहार विदग्ध (कुछ
पक्का कुछ कच्चा) हो कर खट्टा हो जाता है ।। ३८ ।।
❖ पाचकपित्तेन पाचकपित्तस्योष्मणा ।। ३८ ।।
‘पाचकपित्तेन' का अर्थ है पाचक पित्त की गर्मी से ।। ३८।।
❖ ततः स एवाहारो नाभिमण्डलाधिष्ठानेन समाननाम्ना वायुना प्रेरितो ग्रहणीमभि नीयते ।। १६६ ।।
उसके बाद वही आहार नाभिमण्डल में रहनेवाले समान वायु से प्रेरित होकर ग्रहणों की ओर जाता है ।। १६६ ।।
ग्रहणीलक्षणमाह-
❖ षष्ठी पित्तधरा नाम या कला परिकीर्त्तिता । आमपक्वाशयान्तःस्था ग्रहणी साऽभिधीयते ।। १६७ ।।
ग्रहणी का लक्षण—आमाशय और पक्वाशय के मध्य में स्थित, पित्तधरा नाम की जो छठी कला मुनियों ने कही
है, वह ग्रहणी कहलाती है ।। १६७ ।।
❖ पित्तधरा=पाचकाख्यं पित्तं यदग्न्यधिष्ठानं तद्धारयति ।। १६७ ।।
‘पित्तधरा' का अर्थ है अग्नि का अधिष्ठान (वासस्थान), जो पाचक नामक पित्त है उस को धारण करने वाली
है ।। १६७।।
तत्र ग्रहण्यामामाशयपक्वाशयमध्यवर्त्तिपाचकाख्यपित्ताधिष्ठानेनाग्निनाऽऽहारः पच्यते स कटुश्च भवतीत्याह¹-
‘ग्रहण्यां पच्यते कोष्ठे वह्निना जायते कटुः' इति ।। १६८ ।।
'ग्रहणी में कोष्ठस्थित अग्नि से आहार पकता है तथा कटु हो जाता है' ।। १६८।।
❖ अयमर्थः । आहारो ग्रहण्यां कोष्ठवह्निना ग्रहणीस्थितपाचकपित्तेन वह्निना पच्यते पच्यमानः स
ग्रहणीस्थितस्य कटुरसस्य योगात् कटुर्भवति ।। १६८ ।।
तात्पर्य यह है कि—आहार ग्रहणी में जाने पर कोष्ठस्थित अग्नि से पचता है और पचता हुआ वह आहार ग्रहणी
में स्थित कटुरस युक्त पित्त के संयोग से कटु हो जाता है ।। १६८।।
१. 'भवति तथाचे'ति पाठान्तरम्।

एतदाहारपाके विशेषमाह । शरीरं पाञ्चभौतिकम् । तत्र पञ्चसु भूतेषु पञ्चाग्नयस्तिष्ठन्ति।
उक्तं च चरकेण¹-
भौमाप्याग्नेयवायव्याः पञ्चोष्माणः सनाभसाः । पञ्चाहारगुणान् स्वान् स्वान्यार्थिवादीन् पचन्त्यनु ।।१६९।।
पञ्च महाभूतों में चरकोक्त पञ्चाग्नि का निर्देश-भौम (भूमिसम्बन्धी), आप्य (जल सम्बन्धी), आग्नेय (अग्नि
सम्बन्धी), वायव्य (वायु सम्बन्धी) और नाभस (आकाश सम्बन्धी) पाँच अग्नि हैं, ये सब अपने-अपने पृथिवी आदि
(पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश) के सम्बन्धी पाँच प्रकार के आहार के गुणों को पकाते हैं ।।१६९।।
❖ अत्रोष्मपदेनाग्निरुच्यते ।।१६९।।
यहाँ 'ऊष्मा' से 'अग्नि' का ग्रहण होता है ।।१६९।।
आहारोऽपि पाञ्चभौतिकः तत्र पाचकपित्तस्थेनाग्निनोत्तेजितेन शरीरवर्तिना भूभागाग्निना आहारवर्त्तिभूभागः
पच्यते । पक्तो भूभागः स्वकीयान् गुणानभिवर्द्धयति । एवं जलादिभागा अपि पच्यन्ते ।
तथा च सुश्रुते-
'पञ्च भूतात्मके देहे आहारः पाञ्चभौतिकः ।
विपक्तः पञ्चधा सम्यग्गुणान् स्वानभिवर्द्धयेद्' ।।१७०।। इति ।
पञ्च महाभूतों से बने हुये शरीर में पञ्च महाभूत सम्बन्धी आहार पाँच प्रकार से अच्छी तरह परिपक्व होकर अपने
गुणों को बढ़ाता है ।।१७०।।
❖ गुणशब्देनात्र गुणिनः पृथिव्यादय उच्यन्ते । तेन गुणान शरीरवर्त्तिन; पार्थिवादीन् भागान-
भिवर्द्धयेदित्यर्थः ।।१७०।।
यहाँ 'गुण' पद से गुणी पृथिवी आदि का ग्रहण किया जाता है, इससे 'गुणों को अर्थात् शरीरवर्त्ती पृथिवी आदि
सम्बन्धी भागों को बढ़ाता है' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ।।१७०।।
एवमहोरात्रेण पक्व आहारो मिष्टः पटुश्च मधुरो भवति । अम्लस्त्वम्लो भवति । कटुतिक्तः कषायश्च
कटुर्भवति । उक्तञ्च-
मिष्टः पटुश्च मधुरम्लोऽम्लं पच्यते रसः । कटुतिक्तकषायाणां विपाको जायते कटुः' इति ।।१७१।।
कटु, तिक्त, कसैला आहार रस का स्वाद—'मीठा और नमकीन रस युक्त आहार पकने पर मधुर और खट्टा
पकने पर खट्टा ही होता है तथा कटु, तिक्त और कसैला का परिपाक कटु होता है ।।१७१।।
एवं विपक्वस्याहारस्य सारो निगदितो रसः, शेषो ग्रहणीस्थो मलद्रवः मलद्रवस्य जलभागः शिराभिर्वस्तिं
नीतो मूत्रं भवति । उक्तञ्च-
आहारस्य रसः सारः सार हीनो मलद्रवः । शिराभिस्तज्जलं नीतं बस्तिं मूत्रत्वमाप्नुयात् ।।१७२।।
शेषं किट्टञ्च यत्तस्य तत्पुरीषं निगद्यते । समानवायुना नीतन्तत्तिष्ठति मलाशये ।।१७३।।
आहार से रसादि का निर्माण—'आहार का सार भाग रस और सारहीन भाग मलद्रव कहलाता है और मलद्रव
का जो जलभाग होता है वह शिराओं द्वारा बस्ति में पहुँच कर मूत्र कहलाने लगता है तथा उस मलद्रव का द्रव से हीन


१. 'इत्याह चरक' इति पाठान्तरम् ।

५४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
जो शेष भाग होता है वह पुरीष (विष्ठा) कहलाता है और वही पुरीष समान वायु के द्वारा पहुँचाये जाने पर मलाशय में
जाकर ठहरता है ॥१७२-१७३॥
तत्र १मलाशयस्थेनापानवायुना प्रेरितं मूत्रं मेढ्रभगमार्गेण पुरीषं गुदमार्गेण शरीराद् बहिर्याति । उक्तञ्च-
मूत्रञ्चोपस्थमार्गेण पुरीषं गुदमार्गतः । अपानवायुना क्षिप्तं बहिर्याति शरीरतः ॥१७४॥
मूत्र और पुरीषोत्सर्ग में कारण- 'अपान वायु से प्रेरित होने पर उपस्थमार्ग से मूत्र और गुदा मार्ग से पुरीष
शरीर के बाहर निकलता है ॥१७४॥
❖ उपस्थः = शिश्नो भगञ्च ॥१७४॥
'उपस्थ' का अर्थ 'लिङ्ग और योनि' समझना चाहिये ॥१७४॥
रसस्तु समानवायुना प्रेरितो धमनीमार्गेण शरीरारम्भकस्य रसस्य स्थानं हृदयं गत्वा तेन सह मिश्रितोभवति ।
उक्तञ्च-
रसस्तु हृदयं याति समानमरुतेरितः । स तु व्यानेन विक्षिप्तः सर्वान् धातून् विवर्द्धयेत् ॥१७५॥
केदारेषु यथा कुल्याः पुष्णन्ति विविधौषधीः । तथा कलेवरे धातून् सर्वान् वर्द्धयते रस ॥१७६॥
आहार रस का कार्य-समान वायु से प्रेरित होकर रस हृदय में जाता है और वहाँ से व्यान वायु के द्वारा फेके
जाने पर रस सम्पूर्ण धातुओं को बढ़ाता है। जिस प्रकार खेतों में स्थित अनेक प्रकार के धान्यादि ओषधियों को कुल्या
(नहरें) पुष्ट किया करती हैं, उसी भाँति रस भी शरीर में सब धातुओं को बढ़ाता रहता है ॥१७५-१७६॥
रसस्तु तत्र तत्र त्रिधा विभज्यते । उक्तञ्च चरके-
स्थूलःसूक्ष्मस्तन्मलश्च तत्र तत्र त्रिधारसः । स्वं स्थूलोऽशः परं सूक्ष्मस्तन्मलो याति तन्मलम् ।।
आहार से उत्पन्न हुआ रस क्रम से शरीरारम्भ रसरक्तादि प्रत्येक धातुओं में जाकर प्रत्येक धातुओं के स्थानों में स्थूल,
सूक्ष्म और तन्मल (रस का मल) इस प्रकार से तीन अंशों में विभक्त हो जाता है और इनमें से स्थूलांश अपने स्थान
में रहता है, सूक्ष्मांश दूसरे धातु में जाता है तथा रस का मलांश धातुओं के मल में जाता है ॥१७७॥
❖ अयमर्थः । स्थूलोऽशः स्वं याति यथास्थितस्तिष्ठति, सूक्ष्मस्त्वंशः परं द्वितीयं धातुं याति,
तन्मलो=रसादिमलः, तन्मलं=शरीरारम्भकं तत्तद्धातुमलं यातीत्यर्थः ॥१७७॥
स्पष्टार्थ यह है कि रस का स्थूल भाग अपने स्थान में रहता है अर्थात् रस जिस धातु में जाता है स्थूल भाग उसी
धातु में रह जाता है और सूक्ष्म भाग दूसरे रक्तादि धातुओं में जाता है और उसका मल भाग अर्थात् रसादिकों का मल
भाग उसके मल को अर्थात् शरीराम्भक तत्तद्घातुओं के मल को जाता है ॥१७७॥
यथा लौकिकाग्निनेक्षुरसः पच्यते तथा शरीरारम्भकस्य रसस्याग्निनाऽऽहाररसः पच्यते । पच्यमानः स
पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डमेकञ्च यावत् प्राक्तनरसधातावेव तिष्ठति । उक्तं च सुश्रुते-'स खलु रसस्त्रीणि त्रीणि
कलासहस्राणि पञ्चदश कला एकैकस्मिन् धातावुपतिष्ठते' ।
अत्र कलानां विंशतिर्मुहूर्तः, स च दण्डद्वयात्मकः ('इत्यभिप्रेत्याह)-तथा च भोजः-
धातौ रसादौ मज्जान्ते प्रत्येकं क्रमतो रसः । अहोरात्रात्स्वयं पञ्च सार्द्धदण्डं च तिष्ठति ॥१७८॥
जिस प्रकार लोक की अग्नि से ईख का रस पकता है उसी प्रकार शरीर के आरम्भक रस के अग्नि से आहार का
१. 'मलाशयेने'ति पाठान्तरं प्रामादिकम्।
२. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ५५
रस पकता है और पकता हुआ वह रस पाँच अहोरात्र (रातदिन) १॥ डेढ़ दण्ड तक प्रथम जो रस धातु अर्थात् शरीरारम्भक
रस धातु है उसी में रहता है, इसी बात को सुश्रुत में भी कहा है कि-वही रस (आहार से उत्पन्न रस) एक-एक धातु
में (शरीरारम्भक प्रत्येक रसादि धातु में) तीन हजार पन्द्रह (३०१५) कला परिमित काल तक रहता है । २० कला का
एक मुहूर्त्त होता है तथा एक मुहूर्त्त दो दण्ड का होता है अतः उसमें अर्थात् ३०१५ कला में पाँच अहोरात्र डेढ़ दण्ड
होता है । इन्हीं सब अभिप्रायों को लेकर भोज ने भी कहा है कि— 'शरीरारम्भक रस धातु से लेकर मज्जाधातु तक प्रत्येक
धातु में क्रम क्रम से जाकर रस प्रत्येक धातु में पाँच अहोरात्र डेढ़ दण्ड तक रहता है ।।१७८।।
❖ प्रत्येकमेकैकस्मिन्नित्यर्थः ।।१७८।।
'प्रत्येकम्' का अर्थ 'एक-एक धातु में' समझना चाहिये ।।१७८।।
ततो यथा पच्यमानादिक्षुरसान्मलो निर्गच्छति तथा पच्यमानादाहाररसान्मलो निर्गच्छति स कफः ।
उक्तं च सुश्रुते-
कफः पित्तं मलः खेषु प्रस्वेदो नखरोम च । नेत्रविट् त्वक्षु च स्नेहो धातूनां क्रमशो मलाः ।।३९।।
धातुओं के मल—'कफ, पित्त, कर्णादि स्रोतों का मल, पसीना, नख, लोम, नेत्रमल और त्वचाओं के स्नेह, ये
क्रम से धातुओं के मल हैं' ।।३९।।
खेषु मलः=कर्णादि स्रोतोमलः ।।३९।।
'खेषु मलः' का अर्थ 'कर्णादि स्रोतों का मल' समझना चाहिये ।।३९।।
स च कफःप्राणानिलप्रेरितो धमनीमार्गेण शरीरारम्भकंकलेदनाख्यं कफं गत्वा पुष्णाति, ततः
सारभूतस्याहाररसस्य द्वौ भागौ भवतःस्थूलः सूक्ष्मश्च तत्र स्थूलो¹ भागः शरीरारम्भकं रसं पोषयति
सकलशरीराधिष्ठानेन व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः सञ्चरन् पोषणस्नेहनजठरानलोष्मकृतसन्तापनिवारणादिभिर्गुणैः
सकलशरीरं पुष्णाति । ततः सूक्ष्मो² भागः प्राणवायुना प्रेरितो धमनीमार्गेण शरीरारम्भकस्य रक्तस्य स्थानं
यकृत्प्लीहरूपं गत्वा तेन सह मिलितो भवति । ततः प्राक्तनस्य रक्तस्याग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात्सार्द्धदण्डञ्च
यावत् प्राक्तनरक्तधातावेव तिष्ठति । ततो यथा अग्निना पुनः पुनः पच्यमानादिक्षुविकाराद्वारं वारं मलं
निर्गच्छति तथा पुनः पुनः पच्यमानादाहाररसात् प्रतिबारं मलं निर्गच्छति । तत्र रक्ताग्निना पच्यमानामलं पित्तं
निर्गच्छति । तच्च पित्तं समानवायुना प्रेरितं धमनीमार्गेण शरीरारम्भकं पाचकाख्यं पित्तं गत्वा पुष्णाति ।
वह कफ प्राण वायु से प्रेरित होकर धमनी मार्ग से शरीरारम्भक क्लेदन नामक कफ को जाकर पुष्ट करता है, उसके
बाद सारभूत आहारजात रस के दो भाग होते हैं एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें स्थूल भाग शरीरारम्भक रस को पुष्ट
करता है तथा सम्पूर्ण शरीर में रहनेवाले व्यान नामक वायु से प्रेरित होकर धमनियों के द्वारा सञ्चार करता हुआ अर्थात्
बह करके पोषण, स्नेहन तथा जठरानल की गर्मी से उत्पन्न हुये सन्ताप के निवारण आदि गुणों से सम्पूर्ण शरीर को
पुष्ट करता है । उसके बाद सूक्ष्मभाग प्राणवायु से प्रेरित होकर धमनियों द्वारा शरीरारम्भक (शरीर को बनाने वाले) रक्त के
स्थान पर अर्थात् यकृत् और प्लीहारूप रक्त के स्थान पर जाकर रक्त के साथ मिल जाता है । उसके बाद प्राचीन रक्त
के अग्नि से पुनः पकता हुआ पाँच अहोरात्र (दिन-रात) और डेढ़ दण्ड तक उसी प्राचीन रक्तसंज्ञक धातु में स्थित रहता
है । उसके बाद जैसे लोक में अग्नि से पुनः-पुनःपकाये जाते हुये ईख के रस से बारबार मल निकलता है, वैसे ही पुनः
पुनः पकाये जाते हुये आहार के रस से भी प्रति बार मल निकलता है । उसमें रक्त की अग्नि से पकाये जाते हुये आहार
१. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरं प्रामादिकम् ।
२. 'स्थूल' इति पाठान्तरं प्रामादिकम् ।

५६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
रस से जो मल निकलता है वह पित्त कहलाता और वह पित्त समान नामक वायु से प्रेरित होकर धमनी-मार्ग से जाकर
शरीराम्भक पाचक नामक पित्त को पुष्ट करता है ।
ततः सारभूतस्याहाररसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च, स्थूलो१ भागोरञ्जकाख्येन२ पित्तेन३
रक्तीकृतः शरीरारम्भकं रक्तं (पोषयन्४) व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः सञ्चरन् सकलशरीरगतानि रुधिराणि
पुष्णाति । ततः सूक्ष्मो५ भागो व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः शिराभिश्च शरीरारम्भकाणि मांसानि याति । ततो
मांसाग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डञ्च यावन्मांसेष्वेव तिष्ठति । ततः पच्यमानात्तस्मान्मलं
निर्गच्छति । तद्व्यानवायुना क्षिप्तं कर्णावागत्य कर्णविट् भवति ।
उसके बाद सारभूत उसी आहार-रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें स्थूलभाग रञ्जकनामक
पित्त के द्वारा रँगा जाने पर रक्तरूप होकर शरीरारम्भक रक्त को पुष्ट करता हुआ व्यान-वायु से प्रेरित होकर धमनियों के
द्वारा संचार करता हुआ सम्पूर्ण शरीरस्थित रुधिर को पुष्ट करता है, उसके बाद सूक्ष्म भाग व्यान वायु से प्रेरित होकर
धमनी और शिराओं के द्वारा शरीरारम्भक मांस में जाता है, उसके बाद मांस में स्थित अग्नि के द्वारा पुनः-पुनः पकाया
जाता हुआ पाँच अहोरात्र और १॥ डेढ़ दण्ड तक मांस ही में स्थित रहता है, उसके बाद मांसाग्नि से पकाये जाते हुये
उससे जो मल निकलता है, वह व्यान वायु से प्रेरित होने पर दोनों कानों में आकर कान का मैल होता है ।
ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः । स्थूलः सूक्ष्मश्च । ततः स्थूलो६ भागो मांसानि पुष्णाति । ततः
सूक्ष्मो७ भागो व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः शरीरारम्भकस्य भेदसः स्थानमुदरं याति ततो मेदसोऽग्निना पुनः
पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डं च यावन्मेदस्येव तिष्ठति । ततः पच्यमानात् तस्मान्मलो निर्गच्छति प्रस्वेदरूपः ।
स चः शीतः स्रोतस्येव तिष्ठति शरीरोष्मणा तप्तश्चेत्तदा व्यानवायुना प्रेरितः शिरामार्गेर्लोमकूपेभ्यो बहिर्याति
'जिह्वादन्तक्षामेढ्रादिमलञ्च मेदोमलमि' त्येके ।
उसके बाद सारभूत उसी आहार-रसके दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें से स्थूल भाग मांस
को पुष्ट करता है और सूक्ष्म भाग व्यान-वायु से प्रेरित होकर धमनियों के द्वारा शरीरारम्भक मेद के स्थान उदर में जाता
है, उसके बाद मेद की अग्नि से फिर पकाया जाता हुआ वह पञ्च अहोरात्र और डेढ़ दण्ड तक उसी मेद में ठहरता है,
उसके बाद मेद की अग्नि से पकाये जाते हुये उससे प्रस्वेद रूप (पसीना-रूपी) मल निकलता है और वह शीत (ठण्डा)
रहने पर तो स्रोतों ही में रहता है और शरीर की गर्मी से तप्त होने पर पिघल जाने से व्यान वायु से प्रेरित होकर शिराओं
के मार्ग से रोमकूपों (रोएँ के छिद्रों) से बाहर निकलता है 'जीभ, दाँत, काँख और मूत्रेन्द्रिय के मल को भी कोई २ मेद
का मल कहते हैं' किन्तु यह सभी लोगों का मत नहीं है ।
ततः सारभूतरसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च, तत्र स्थूलो८ भागो मेदः पुष्णाति, उदरे तिष्ठन्
(९व्यानवायुना प्रेरितः स्रोतोमार्गैः सूक्ष्मास्थिस्थितान्यपि मेदांसि पुष्णाति । सूक्ष्मो भागो) व्यानवायुना प्रेरितो
धमनीभिः शिराभिश्च शरीरारम्भकाण्यस्थीनि याति । ततोऽस्थ्यग्निना पुनः पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात्सार्द्धदण्डञ्च
यावदस्थिष्वेव तिष्ठति । ततः पच्यमानात् तस्मान्मलो निर्गच्छति । स च व्यानवायुना प्रेरितः १०शिरामार्गेर्गत्वाऽङ्गुलिषु
नखास्तनौ लोमानि भवन्ति ।
१. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् ।
२. 'रञ्जकाग्निने'ति पाठान्तरम् ।
३. 'पित्तेन स' इति पाठान्तरम् ।
४. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।
५. 'स्थूल' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् ।
६. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरमसङ्गतम् ।
७. 'स्थूल' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् ।
८. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् ।
९. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।
१०. 'शिराभिर्मार्गेणागत्यागत्ये'ति पाठान्तरम् ।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ५७
उसके बाद सारभूत रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें से स्थूल भाग उदर में रहता हुआ
मेद को पुष्ट करता है तथा वहाँ से व्यान वायु से प्रेरित होकर स्रोतों के मार्ग से जाकर सूक्ष्म (पतली) हड्डियों में भी स्थित
मेद को पुष्ट करता है और सूक्ष्म भाग व्यानवायु से प्रेरित होकर धमनी और शिराओं के द्वारा शरीरारम्भक हड्डी को जाता
है, उसके बाद हड्डी की अग्नि से पुनः पकाया जाता हुआ पाँच अहोरात्र और डेढ़ दण्ड तक हड्डियों ही में ठहरता है,
उसके बाद पकाये जाते हुये उस सारभूत से जो मल निकलता है वही व्यान वायु से प्रेरित होकर शिराओं के मार्ग से
आकर अङ्गुलियों में नख और शरीर में रोम हो जाता है।
ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च। तत्र स्थूलो¹ भागोऽस्थीनि पुष्णाति ततः
सूक्ष्मो² भागो व्यानवायुना प्रेरितः स्रोतोमार्गैरमज्जस्थानानि स्थूलास्थ्यभ्यन्तराणि याति। ततो मज्जाग्निना पुनः
पच्यमानः पञ्चाहोरात्रात् सार्द्धदण्डञ्च यावन्मज्जन्येत्र तिष्ठति, ततः पच्यमानात्तस्मान्मलं निर्गच्छति। तच्च
व्यानवायुना प्रेरितं शिरामार्गैनयनयोरागत्य नेत्रविट् त्वक्षु स्नेहश्च भवति।
उसके बाद सारभूत रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म उसमें से स्थूल भाग हड्डियों को पुष्ट करता
है, उसके बाद भाग व्यानवायु से प्रेरित होकर स्रोतों के मार्ग से मज्जा के स्थान मोटी हड्डियों के भीतरी भाग को जाता
है, उसके बाद मज्जा की अग्नि से फिर पकाया जाता हुआ पाँच अहोरात्र और डेढ़ दण्ड तक मज्जा ही में ठहरता है,
उसके बाद पकाये जाते हुये उससे जो मल निकलता है, वह व्यानवायु से प्रेरित होकर शिराओं के मार्ग से आकर नेत्रों
में नेत्र का मल (कीचड़) और त्वचाओं में स्नेह (चिकनाहट) हो जाता है।
ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च, तत्र स्थूलो भागो मज्जानं पुष्णाति ततः सूक्ष्मो
व्यानवायुना प्रेरितो धमनीभिः शिराभिश्च शुक्रस्य स्थानं सकलं शरीरं गत्वा शरीरारम्भकेण शुक्रेण सह
मिश्रितो भवति। ततः शुक्रस्याग्निना पुनः पच्यते पच्यमाने तस्मिन्मलं नास्ति। सहि सहस्रधाध्मातसुवर्णवत्।
इत्युत्तरोपदिश्यते-
उसके बाद सारभूत रस के दो भाग होते हैं, एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म, उसमें से स्थूल भाग मज्जा को पुष्ट
करता है और सूक्ष्म भाग व्यानवायु से प्रेरित होकर धमनी और शिराओं के द्वारा शुक्र के स्थान सम्पूर्ण शरीर में जाकर
शरीरारम्भक शुक्र के साथ मिल जाता है। उसके बाद शुक्र के अग्नि से पुनः पकाया जाता है और पकते हुये उसमें फिर
मल नहीं रहता है, क्योंकि वह हजार बार के तपाये हुये सोने के समान निर्मल हो जाता है, इसी बात को आगे के श्लोकों
में कहते हैं।
स्वाग्निभिः पच्यमानेषु मज्जान्तेषु रसादिषु। षट्सु धातुषु जायन्ते मलानि मुनयो जगुः ।।१७९।।
यथा सहस्रधा ध्माते न मलं किल काञ्चने। तथा रसे मुहुः पक्वे न मलं शुक्रताङ्गते ।।१८०।।
‘अपने-अपने अग्नियों से पकते हुये रस से लेकर मज्जा तक छः धातुओं में मल निकलता है’ ऐसा मुनियों ने कहा
है। जिस प्रकार हजार बार तपाये हुए सुवर्ण में मल नहीं रहता, उसी प्रकार बारंबार परिपक्व होने से जब आहाररस शुक्रत्व
को प्राप्त हो जाता है तब उसमें भी मल नहीं रहता है ।।१७९-१८०।।
ततः सारभूतस्य रसस्य द्वौ भागौ भवतः स्थूलः सूक्ष्मश्च। तत्र स्थूलो भागः शरीरारम्भकं शुक्रं याति,
सूक्ष्मः स्नेहभागं ओजस्तस्य लक्षणमाह-
ओजः सर्वशरीरस्थं स्निग्धं शीतं स्थिरं सितम्। सोमात्मकं शरीरस्य बलपुष्टिकं मतम् ।।१८१।।
१. 'सूक्ष्म' इति पाठान्तरम् सङ्गतम्।
२. 'स्थूल' इति पाठान्तरमसङ्गतम्।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

५८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
ओज के लक्षण—ओज सम्पूर्ण शरीर में रहने वाला, स्निग्ध, शीतल (ठण्डा), स्थिर, सफेद और सोमात्मक
होता है तथा शरीर में बल और पुष्टि का करनेवाला होता है ॥ १८० ॥
❖ बलं=चेष्टापाटवम् । तथा च-'चेष्टासु पाटवं यत्तु बलं तदभिधीयते । यत्तु सुश्रुते—
'रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत्परं तेजस्तत्खलु ओजस्तदेव बलम्' इति । तेजस्तेजोद्रवः । अत्रायमभिप्रायः-
यस्माद्रसाद्रोजो भवति स रसः सर्वधातुस्थानगतत्वात्तद्घातुवन्मन्यत इति । सर्वधातूनां स्नेहमोजः, क्षीरे घृतमिव
तदेव बलमिति । तत्कार्यकारणयोरभेदोपचारात् । अभेदकथनञ्च चिकित्सैक्यार्थम् ॥ १८१ ॥
यहाँ 'बल' पद से 'चेष्टा करने में सामर्थ्य' यह अर्थ समझा जाता है, क्योंकि अन्यत्र भी कहा है कि—'चेष्टा करने
में जो पाटव अर्थात् सामर्थ्य (फुर्तीलापन) होता है उसी को पण्डित लोग 'बल' कहते हैं और 'सुश्रुत' में जो यह कहा
है कि 'रस से लेकर शुक्र पर्यन्त सात धातुओं का जो प्रधान तेज है वह ओज कहलाता है तथा वही बल भी कहलाता
है' यहाँ पर 'तेज' पद से 'तेज सम्बन्धी द्रव' लिया जाता है । इस वाक्य में 'सुश्रुत' का यह अभिप्राय है कि—जिस
रस से ओज होता है वह रस सब धातुओं के स्थान में जाता है अत एव जब जिन जिन धातुओं के स्थान में जाता है
तब उन उन धातुओं के तरह से उन-उन स्थानों में वह समझा जाता है, अतएव सब धातुओं का स्नेह ओज है, अर्थात्
जिस प्रकार से दूध में घी होता है उसी प्रकार से ओज भी धातुओं में होता है और 'वही बल भी कहलाता है' ऐसा जो
कहा है वह कार्य और कारण का अभेद मानकर कहा है अर्थात् ओज और बल यद्यपि एक नहीं हैं क्योंकि ओज से बल
की उत्पत्ति होने से ओज कारण है तथा बल कार्य है, तथापि कार्य और कारण का अभेद होने से 'ओज ही बल कहलाता
है' यह कहना सङ्गत ही है और अभेद कथन का फल यह है कि कार्य और कारणरूप जो बल और ओज हैं इन दोनों
की चिकित्सा का ऐक्य हो ॥ १८१ ॥
अन्यच्च-
गुरु शीतं मृदुस्निग्धं सान्द्रं स्वादु स्थिरं तथा । प्रसन्नं पिच्छिलं सूक्ष्ममोजो दशगुणं स्मृतम् ॥ १८२ ॥
ओज—गुरु (भारी), शीतल, मृदु, स्निग्ध, सान्द्र (गाढ़ा), स्वादु (स्वादयुक्त), स्थिर, निर्मल, पिच्छिल और सूक्ष्म
(सूक्ष्मस्रोतोगामी) इन दश गुणों से युक्त कहा गया है ॥ १८२ ॥
चरके तु-
अष्टविन्दुप्रमाणं तदीषद्रक्तं सपीतकम् । १अग्नीषोमात्मकत्वेन द्विरूपं वर्णितन्तु तत् ॥ १८३ ॥
चरक में तो—ओज को आठ बिन्दु प्रमाण तथा थोड़ा लाल तथा पीला वर्ण लिये हुये कहा है तथा अग्निसोमात्मक
होने से दो तरह का कहा है अर्थात् ओज आग्नेय और सौम्य भेद से दो प्रकार का कहा है ॥ १८३ ॥
वाग्भटश्च-
ओजश्च तेजो धातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम् । हृदयस्थम

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ५९
रहता है तथा ओज से ही उत्साह, प्रतिभा, धैर्य्य, लावण्य और सुकुमारता इत्यादि देह के आश्रित रहने वाले अनेक प्रकार
के भाव उत्पन्न होते हैं ।।१८४-१८६।।
ततः स्थूलो भागो रसो मासेन पुंसां शुक्रं स्त्रीणान्त्वार्त्तवं शुक्रञ्च भवति। उक्तञ्च सुश्रुते-'एवं मासेन
रसः शुक्लो भवति । ३स्त्रीणामात्तर्वञ्चे'ति । चकारात् स्त्रीणामपि शुक्रं भवति ।
अत एवोक्तं सुश्रुते-
योषितोऽपि स्रवत्येव शुक्रं पुंसः समागमे । तत्र गर्भस्य किञ्चित् न करोतीति न चिन्त्यते ।।१८७।।
उसके बाद पूर्वोक्त प्रकार से आहार रस का स्थूल भाग एक मास में पुरुषों का शुक्र और स्त्रियों का आर्तव तथा
शुक्र हो जाता है और 'सुश्रुत' में भी कहा है कि इस प्रकार से एक मास में रस पुरुषों का शुक्र हो जाता है तथा स्त्रियों
का आर्तव भी हो जाता है, यहाँ पर मूल में 'च' का पाठ है अतएव उसका 'भी' अर्थ होने

६० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
मांसान्मेदः प्रजायत इति । मांसादनन्तरं मेदः प्रजायते रसादेवेत्यर्थः । मेदसोऽस्थि जायते, रसादेवेत्यर्थः । एवं
ततो मज्जा (जायते१, रसादेवेत्यर्थः ।) ततः२ शुद्धं शुक्रं (रसादेव३) सम्भवतीत्यर्थः ।। १८९ ।।
इस प्रकार से आहार रस ही 'केदारकुल्या' न्याय से अर्थात् कुल्या (थोड़े जलवाली मनुष्यों द्वारा बनाई हुई नदी
(नहर) जिस प्रकार केदार (खेत) स्थित धान्यादिकों का पोषण करती है, उसी प्रकार रस भी सम्पूर्ण धातुओं का पोषण
करता हुआ एक मास और नौ दण्ड में शुक्र और आर्तव होता है, ऐसा सर्वसम्मत सिद्धान्त होने पर 'रस से रक्त' इत्यादि
जो अभी ऊपर श्लोक में कह आये हैं वह सङ्गत ही है, अब उसी श्लोक की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि— 'रक्त
से मांस' अर्थात् रक्तोत्पत्ति होने के बाद मांस उत्पन्न होता है वह भी वस्तुतः रस से ही उत्पन्न होता है तथा 'मांस से
मेद उत्पन्न होता है' अर्थात् मांस के बाद रस से ही मेद उत्पन्न होता है, एवम् 'मेद से अस्थि उत्पन्न होता है' अर्थात्
मेद के बाद रस से ही अस्थि उत्पन्न होती है। इसी प्रकार से 'अस्थि से मज्जा' अर्थात् अस्थि के बाद रस से ही मज्जा
उत्पन्न होता है तथा 'मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है' अर्थात् मज्जा के बाद रस से ही शुद्ध शुक्र की उत्पत्ति होती
है ।।१८९।।
रसः शरीर त्रिधा सञ्चरतीत्याह-
रसः शरीरे शब्दार्च्चिर्ज्वलसन्तानवत् त्रिधा । सञ्चरत्यनुरूपोऽयं नित्यमेव हि देहिनाम् ।। १९० ।।
शरीर में आहार-रस का सञ्चार—प्राणियों के शरीर के अनुरूप रस शब्द, अर्चि (ज्योति) और जल के सन्तान
(प्रवाह) की तरह तीन प्रकार से नित्य ही संचार करता रहता है ।।१९०।।
❖ अस्यायसभिप्रायः । पुरुषास्तीक्ष्णाग्नयो मध्यमाग्नयो मन्दाग्नयश्च भवन्ति, तत्र तीक्ष्णाग्नीनां स रसः
शब्दसन्तानवच्छीघ्रं सञ्चरति, मध्यमाग्नीनामर्चिःसन्तानवन्मध्यवेगेन चरति, मन्दाग्नीनां जलसन्तानवन्मन्दं चरति ।
तेन मासेन रसाच्छुक्रं भवतीति, यदुक्तं तन्मध्यमाग्नीनधिकृत्योक्तम्, दीप्ताग्नीनान्तु रसः किञ्चिन्न्यूनेन मासेन
शुक्रं भवति, मन्दाग्नेः किञ्चिदधिकेन मासेनेति सिद्धान्तः ।।१९०।।
इसका अभिप्राय यह है कि पुरुष तीन प्रकार के होते हैं—(१) तीक्ष्णाग्निपुरुष, (२) मध्यमाग्निपुरुष और
(३) मन्दाग्निपुरुष । उनमें तीक्ष्ण अग्निवाले पुरुषों के शरीर में वह रस शब्द प्रवाह की भाँति शीघ्रता से सञ्चार करता
है, मध्यम अग्निवाले पुरुषों के शरीर में अर्चिः प्रवाह (ज्योतिः प्रवाह) की भाँति मध्यवेग से सञ्चार करता है और मन्द
अग्नि वाले पुरुषों के शरीर में जल-प्रवाह की भाँति मन्दवेग से सञ्चार करता है, इससे 'एक मास में रस से शुक्र होता
है' ऐसा जो कहा गया है वह मध्यम अग्निवाले पुरुषों के ही विषय में कहा गया है, दीप्त (तीक्ष्ण) अग्नि वाले पुरुषों
का तो रस कुछ कम एक मास में ही वीर्य हो जाता है तथा मन्द अग्नि वाले पुरुषों का रस कुछ अधिक एक मास में
वीर्य हो जाता है यह सिद्धान्त है ।।१९०।।
तर्हि बाजीकरिणीनामोषधीनां किं प्रयोजनमित्याह-
बाजीकरण ओषध्यः स्वप्रभावगुणोच्छ्रयात् । विरेचयन्ति ताः शुक्लं विरेकिद्रव्यवन्नृणाम् ।। १९१ ।।
बाजीकरण ओषधियों का प्रयोजन—वाजीकरण ओषधियाँ अपने प्रभाव की अधिकता से अथवा गुण की
अधिकता से अथवा प्रभाव और गुण दोनों की अधिकता से विरेचन (दस्त कराने वाली) ओषधियों की भाँति शुक्र का
विरेचन करती हैं ।।१९१।।
❖ वाजीकरिण्यः = याभिरोषधीभिः पुरुषः शुक्राधिक्यात् स्त्रीषु वाजिवत् सामर्थ्यं प्राप्नोति ता
वाजीकरिण्यः, स्वप्रभावगुणोच्छ्रयात् = तत्र काश्चिदोषध्यः स्वभावाधिक्यात्, काश्चित् स्वगुणाधिक्यात्, काश्चित्
१. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः । २. 'अग्रे' इति पाठ । ३. कोष्ठस्थः पाठः क्वचित्कः ।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६१
स्वप्रभावगुणाधिक्यात्। तत्रसङ्कल्पपादलेपविशिष्टकान्तास्पर्शादयः स्वप्रभावाधिक्यात् शुक्रं विरेचयन्ति।
घृतक्षीरादयः स्वगुणाधिक्यात्=स्निग्धत्वाधिक्यात्, माषादयः स्वप्रभावस्निग्धत्वादिगुणाधिक्यात्। वाजीकरिण्य
इति बहुवचनमाद्यर्थानुवर्त्तनम्। बल्यबृंहणजीवनीयगणादयः, तद्वद्बोद्धव्याः। विरेचयन्ति=स्वप्रभावगुणा-
धिक्याच्छीघ्रमेव रसाद्युत्पादनपूर्वकं शुक्रं जनयित्वा प्रवर्त्तयन्ति ।।१९१।।
'वाजीकरण ओषधियाँ' अर्थात् जिन ओषधियों से पुरुष शुक्र की अधिकता होने से स्त्रियों के साथ रमण करने में
घोड़े की भाँति सामर्थ्य प्राप्त करता है वे वाजीकरण ओषधियाँ कहलाती हैं। 'वाजीकरण ओषधियाँ अपने प्रभाव और
गुण की अधिकता से शुक्र का विरेचन करती हैं' इसका अर्थ यह है कि वाजीकरण ओषधियों में से कोई अपने प्रभाव
की अधिकता से, कोई अपने गुण की अधिकता से तथा कोई अपने प्रभाव और गुण दोनों की अधिकता से शुक्र का
विरेचन करती हैं। उनमें से सङ्कल्प (किसी स्त्री के विषय में चिन्ता आदि करना), पैर में विशेष औषध का लेप करना
और विशिष्ट (सुन्दरी) स्त्रियों का स्पर्श करना आदि जितने हैं वे सब केवल अपने प्रभाव की अधिकता से ही शुक्र का
विरेचन करती हैं। घी, दूध आदि अपने स्निग्धत्व रूप गुण की अधिकता से तथा माष (उड़द) आदि अपने प्रभाव और
अपने स्निग्धत्व गुण आदि की अधिकता से शुक्र का विरेचन करती हैं। यहाँ 'वाजीकरिण्यः' इस बहुवचनान्त पद के
प्रयोग करने से यह समझना चाहिये कि- 'आदि' इस अर्थ का अनुवर्त्तन हो, अर्थात्-केवल वाजीकरण ओषधियों का
ही बोध न हो किन्तु 'वाजीकरण आदि' अर्थात् वाजीकरण से भिन्न चरकोक्त बल्य, बृंहण तथा जीवनीय गुणादि ओषधियों
का भी वाजीकरण ओषधियों की भाँति ही बोध हो। 'वाजीकरण आदि ओषधियाँ अपने प्रभाव तथा गुण की अधिकता
से शीघ्र हैं विरेचन करती है' ऐसा कहने से यह समझना चाहिये कि अपने प्रभाव और गुण की अधिकता से शीघ्र ही
रस रक्तादि धातुओं को उत्पन्न करने के अनन्तर शुक्र को भी उत्पन्न करके प्रवर्त्तन (विरेचन) करती हैं ।।१९१।।
यत आह१-
दुग्धं माषाश्च भल्लात२ फलमज्जाऽऽमलानि च। जनकानि निगद्यन्ते रेचनानि च रेतसः ।।१९२।।
शुक्रवर्धक पदार्थ-दूध, उड़द, भिलावा का फल मींगी और आँवला ये सब ओषधियाँ शुक्र को उत्पन्न करनेवाली
तथा विरेचन करनेवाली हैं ।।१९२।।
ननु बालानां कथं शुक्रं न दृश्यत इत्याह-
बालानां शुक्रमस्त्येव किन्तु सौक्ष्म्यान्न दृश्यते। पुष्पाणां मुकुले गन्धो यथा सन्नपि नाप्यते ।।१९३।।
तेषां तदेव तारुण्ये पुष्टत्वाद्यक्तिमेति हि। कुसुमानां प्रफुल्लानां गन्धः प्रादुर्भवेद्यथा ।।१९४।।
बालकों के अदृश्य शुक्र में कारण-बालकों के भी शुक्र होता है किन्तु सूक्ष्म होने से नहीं दिखाई पड़ता जैसे
कि पुष्पों की कच्ची कलियों में गन्ध होते हुए भी उसका घ्राणेन्द्रिय से कुछ भी प्रत्यक्ष नहीं होता है। बालकों की तरुण
अवस्था होने पर वही शुक्र पुष्ट हो जाने से दिखाई पड़ने लगता है, जैसे कि कलियों के खिलने पर पुष्पों की गन्ध मालूम
पड़ने लगती है ।।१९३-१९४।।
रोमराज्यादयः पुंसां नारीणामपि यौवने। जायतेऽत्र च यो भेदो ज्ञेयो व्याख्यानतः स च ।।१९५।।
युवा अवस्था में पुरुषों के जैसे स्त्रियों के भी रोमावली आदि उत्पन्न होती हैं; किन्तु स्त्री और पुरुषों के रोमराजी
आदि में भेद है, उसे निम्नलिखित व्याख्यान से जानना चाहिये ।।१९५।।
❖ व्याख्यानं यथा-पुंसां रोमराजीश्मश्रुप्रभृतयः। नारीणान्तु रोमराजीस्तनस्तन्यार्त्तवप्रभृतयः ।।
१. अतः परं क्वचित् 'उत्तरत्रे'त्यधिकः पाठोऽपि दृश्यते।
२. 'भल्लातः'इति पाठान्तरमसमीचीनम्।

६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
व्याख्यान यह है कि पुरुषों के रोमराजी-दाढ़ी, मूँछ आदि-हैं और स्त्रियों के रोमराजी-स्तन, दुग्ध, आर्तव (रज)
आदि-हैं ॥१९५॥
ननु अन्नरसो वृद्धस्य धातुवृद्धिं कथं न करोतीत्याह-
वार्द्धके वर्द्धमानेन वायुना रसशोषणात् । न तथा धातुवृद्धिः स्यात्ततस्तत्रानिलं जयेत् ।।१९६।।
वृद्धावस्था में शुक्रवृद्धि का ह्रास—वृद्धा अवस्था में वृद्धि को प्राप्त हुये वायु के द्वारा रस के सूख जाने से
युवावस्था की भाँति धातु की वृद्धि नहीं होती इसलिये उस अवस्था में वायु को जीतना चाहिये अर्थात्—जिस प्रकार के
आहार-विहार करने से वायु वृद्धि को न प्राप्त होकर शान्त रहे वही करें ।।१९६।।
शुक्लं सौम्यं सितं स्निग्धं बलपुष्टिकंर स्मृतम् । गर्भबीजं वपुःसारो जीवस्याश्रय उत्तमः ।।१९७।।
शुक्र के स्वरूप—शुक्र सौम्य (सोमात्मक), श्वेतवर्ण, स्निग्ध, बल और पुष्टि करनेवाला, गर्भ का बीज, शरीर
का सार पदार्थ और जीवात्मा का उत्तम आश्रय है ।।१९७।।
जीवस्याश्रय उत्तम इत्यत१ आह-
जीवो वसति सर्वस्मिन्देहे तत्र विशेषतः । वीर्ये रक्ते मले यस्मिन् क्षीणे याति क्षयं क्षणात् ।।१९८।।
जीव का आश्रय—यद्यपि जीव सम्पूर्ण शरीर में रहता है तथापि सम्पूर्ण शरीर की अपेक्षा विशेष रूप से वीर्य
रक्त तथा मल में ही रहता है । क्योंकि इनमें से चाहे जिस किसी के नाश हो जाने पर तत्काल ही जीव का भी नाश
हो जाता है ।।१९८।।
अथ गर्भसञ्जननशुक्रस्य लक्षणमाह-
स्फटिकाभं द्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धि च । शुक्रमिच्छन्ति केचित्तु तैलक्षौद्रनिभञ्च तत् ।।१९९।।
गर्भ उत्पन्न करने वाले शुक्र के लक्षण—गर्भ को उत्पन्न करनेवाला शुक्र-स्फटिक मणि के तुल्य निर्मल, द्रव,
स्निग्ध, मधुर और शहद के समान गन्धवाला होता है, कोई-कोई गर्भोत्पादक शुक्र को तैल तथा शहद के सदृश वर्ण
का मानते हैं ।।१९९।।
अथ शुक्रस्य स्थानमाह-
यथा पयसि सर्पिस्तु गूढश्चेक्षौ२ रसो यथा । एवं हि सकले काये शुक्लं तिष्ठति देहिनाम् ।।२००।।
शुक्र के स्थान—जिस प्रकार से दूध में घी, इक्षु (ऊख) में रस छिपा रहता है उसी भाँति प्राणियों के सम्पूर्ण
शरीर के अन्दर शुक्र भी छिपा रहता है ।।२००।।
❖ अत्र सर्पिर्दृष्टान्तो बहुशुक्रेऽल्पमथनेन सर्पिःशुक्रयोर्लाभात् । इक्षुरसदृष्टान्तस्तु स्वल्पशुक्रे पुंसि
अतिपीडनेनेक्षुरसशुक्रयोर्लाभात् ।।२००।।
यहाँ पर घृत का दृष्टान्त जिसके शरीर में अधिक शुक्र है उसके विषय में समझना चाहिये, क्योंकि जैसे थोड़ा मथने
से ही दुग्ध से घृत निकल आता है वैसे ही थोड़े मैथुन करने से अधिक शुक्रवाले पुरुष का भी शुक्र शरीर से बाहर निकल
जाता है और जो इक्षु-रस का दृष्टान्त है उसे अल्प शुक्रवाले पुरुष के विषय में समझना चाहिये, क्योंकि जिस प्रकार
ईख को अत्यन्त पेरने से उससे रस निकलता है; उसी प्रकार अधिक मैथुन करने से अल्प शुक्रवाले पुरुष का शुक्र
निकलता है ।।२००।।
१. 'इत्याहे'ति पाठान्तरम् । २. 'चेक्षो'रिति पाठान्तरम् ।

अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ६३
अथ शुक्रस्य क्षरणमार्गमाह-
द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधः । मूत्रस्रोतःपथाच्छुक्रं¹ पुरुषस्य प्रवर्त्तते ।।२०१।।
शुक्र के निकलने के मार्ग—बस्ति द्वार के नीचे भाग में दो अङ्गुल दक्षिण पार्श्व की तरफ मूत्रवाही शिरा के मार्ग
से पुरुष का शुक्र प्रवृत्त होता है अर्थात् निकलता है ।।२०१।।
❖ वृद्धवाग्भटोऽप्याह-‘सप्तमी शुक्रधरा द्व्यङ्गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यधो मूत्रमार्गमाश्रिता
सकलशरीरव्यापिनी शुक्रं प्रवर्त्तयती'ति सप्तमी कला ।।२०१।।
इसी विषय में 'वृद्ध वाग्भट' भी कहते हैं कि—बस्तिद्वार के नीचे के भाग में दो अङ्गुल दक्षिण पार्श्व की ओर
सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर रहनेवाली, शुक्रधरा (शुक्र को धारण करनेवाली) जो सातवीं कला मूत्र के मार्ग का आश्रय
लेकर स्थित है, वही शुक्र को प्रवृत्त कराती है अर्थात् उसी से शुक्र का क्षरण होता है ।।२०१।।
अथ शुक्रक्षरणकारणमाह-
कृत्स्नदेहस्थितं शुक्रं प्रसन्नमनसस्तथा । स्त्रीषु व्यायच्छतश्चापि हर्षात्तत् सम्प्रवर्त्तते ।।२०२।।
शुक्र के क्षरण होने में कारण—प्रसन्न मन होकर स्त्री के साथ मैथुन रूप व्यायाम करते हुए पुरुष के हर्ष के
वश होने से; सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त शुक्र का क्षरण होता है; अर्थात् मैथुन के समय चित्त की प्रसन्नता तथा हर्ष होना
यही शुक्रक्षरण के कारण हैं ।।२०२।।
❖ स्त्रीषु व्यायच्छतः=स्त्रीसुरतरूपं व्यायामं कुर्वतः ।।२०२।।
'स्त्रीषु व्यायच्छतः' इसका स्त्रीके साथ मैथुनरूप व्यायाम को करते हुए पुरुष के यह अर्थ हैं ।।२०२।।
अन्यञ्च-
शुक्रं कामेन कामिन्या दर्शनात् स्पर्शनादपि । शब्दसंश्रवणाद् ध्यानात् संयोगाश्च प्रवर्त्तते ।।२०३।।
कामभाव से स्त्रियों के देखने, स्पर्श करने, शब्द सुनने, ध्यान करने तथा संयोग से शुक्र प्रवृत्त (स्खलित) होतां
है ।।२०३।।
अथार्त्तवस्य स्वरूपमाह-
स्त्रीणां रस एव मासेनार्त्तवं भवतीत्युक्त्वा पुनराह सुश्रुत² एव-
रसादेव रजः स्त्रीणां मासि मासि त्र्यहं स्रवेत् । तद्वर्षाद् द्वादशादूर्ध्वं याति पञ्चाशतः क्षयम् ।।२०४।।
मासेनोपचितं काले धमनीभ्यस्तदार्त्तवम् । ईषद्विवर्णं कृष्णाञ्च वायुर्योनिमुखं³ नयेत् ।।२०५।।
आर्तव के स्वरूप—रस से ही स्त्रियों के रज उत्पन्न होकर प्रतिमास में तीन दिन तक निकलता रहता है और
वह रज बारह वर्ष की अवस्था के बाद निकलता है और पचास वर्ष की अवस्था के बाद बन्द हो जाता है तथा प्रतिदिन
एक मास तक थोड़ा-थोड़ा करके सञ्चित होता रहता है बाद एक मास के स्राव का समय होने पर वायु उसे धमनियों
के द्वारा योनि के मुख की तरफ ले आता है और उस समय वह देखने में कुछ विवर्ण तथा काले रङ्ग का मालूम पड़ता
है ।।२०४-२०५।।
गर्भग्रहणयोग्यस्यार्त्तवस्य लक्षणमाह-
शशासृक्प्रतिमं यच्च यद्वा लाक्षारसोपमम् । तदार्त्तवं प्रशंसन्ति यद्वासो न विरञ्जयेत् ।।२०६।।
१. 'पथे' इति पाठान्तरम् । २. 'शुक्रत' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ३. 'योनेरि'ति पाठान्तरम् ।

६४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
गर्भ ग्रहण के योग्य आर्त्तव—जिस आर्तव का वर्ण खरगोश के रक्त के सदृश अथवा लाख के रस के सदृश
हो तथा लगने पर जिससे कपड़े में दाग न पड़ सके ऐसे आर्तव की पण्डित लोग प्रशंसा करते हैं अर्थात् गर्भ ग्रहण
के योग्य बतलाते हैं ॥२०६॥
❖ आर्त्तवस्य वर्णद्वयाभिधानम् । वातादिप्रकृतिभेदेन वर्णभेदात् । 'यद्वासो विरञ्जयेत्' । यद्वासोलग्नं
प्रक्षालितं तद्द्वासस्त्यजति न तु विकृतरक्तं कुर्यात् । ऋतुः=स्त्रीणां रजोदर्शनात् षोडशनिशाः, तत्र भव-
मार्त्तवम्, गृहीतगर्भाणां स्त्रीणामात्तर्ववहानां स्रोतसां गर्भेणावरोधादार्त्तवं न स्रवति । किन्तु
तदेवाधःप्रतिहतमूर्ध्वमागतमुपचीयमानमपरा भवति । अपरा तु श्रीवर१ इति लोके । शेषं चोर्ध्वतरमागतं
पयोधरौ याति, तस्माद्गर्भिण्यः पीवरपयोधरा भवन्ति ।। २०६ ।।
आर्तव का वर्ण जो दो प्रकार का कहा है वह वातादि प्रकृति भेद से वर्ण का भेद होने से, क्योंकि वातादि द्वारा
वर्ण होता है । मूल में जो 'यद्वासो न विरञ्जयेत्' यह वाक्य है इसका अर्थ यह है कि जो आर्तव कपड़े में लगने पर धोने
के बाद उस कपड़े को छोड़ देता है न कि विकृत रङ्ग का दाग से युक्त कर देता है । स्त्रियों के रजोदर्शन के दिन से
लेकर सोलह रात्रि पर्यन्त जो काल है उसे ऋतुकाल कहते हैं, उस ऋतुकाल में जो रज और रक्त निकलता है उसी को
'आर्त्तव' कहते हैं । गर्भवती स्त्रियों के आर्तव वहन करने वाली नाड़ियों का गर्भ के द्वारा अवरोध (रुकावट) होने से आर्तव
बाहर नहीं निकलता किन्तु वही आर्तव नीचे से (गर्भ के द्वारा) रोके जाने पर ऊपर आकर इकट्ठा होता हुआ कुछ अंशों
से अपरा अर्थात् जेर बन जाता है । इसी को लोक में 'श्रीवर' भी कहते हैं । और बाकी कुछ अंशों से जेर बनने के बाद
वहाँ से ऊपर आकर दोनों स्तनों में जाता है, इसी से गर्भिणी स्त्रियाँ मोटे स्तनों वाली हो जाती हैं ॥२०६॥
अथ धातुवतिरिक्तान् गुणानाह-
अतिरिक्ता गुणा रक्ते वह्नेर्मांसे तु पार्थिवाः । मेदस्र्यापां २भुवश्चास्थ्नि पृथिव्यनिलतेजसाम् ।। २०७।।
मज्ज्ञि शुक्रे च सोमस्य मूत्रे च शिखिनो गुणाः । भुवस्तथाऽऽर्त्तवे त्वग्ने रसे क्षीरे तथाऽम्भसः ।।२०८।।
धातुगुण-वर्णन-रक्त में अग्नि के, मांस में पृथ्वी के, मेद में पृथ्वी और जल के, अस्थि में पृथ्वी, वायु और
अग्नि के, मज्जा और शुक्र में चन्द्र के, मूत्र में अग्नि के, आर्तव में पृथ्वी तथा अग्नि के और रस तथा दूध में जल के
गुण अधिक हैं ।।२०७-२०८।।
कफः पित्तं मलः खेषु प्रस्वेदो नखलोम च । नेत्रविट्त्वक्षु३ च स्नेहो धातूनां क्रमश्रो मलाः ।।२०९।।
धातुओं के मल-कफ, पित्त, ख अर्थात् कर्णादिक स्रोतों के मल, पसीना, नख, लोम तथा नेत्र का मल तथा
त्वचाओं के ऊपर के स्नेह, ये सब क्रम से रसादिक छः धातुओं के मल हैं ।।२०९।।
❖ 'नेत्रजिह्वाकपोलानां जलञ्च रसजं मलम्' इत्येके। खेषु मलः =कर्णादिस्रोतःसु मलः,
'रसनादन्तकक्षामेढ्रादिमलपि मेदोमलम्' इत्येके । नेत्रविट्त्वचां स्नेहश्च मज्जमलः, शुक्रस्य मलमेव नास्ति
सहस्रधा ध्मातसुवर्णस्येव ।। २०९।।
यहाँ कोई 'नेत्र, जिह्वा और कपोल के जल को रस का मल' बतलाते हैं । और 'खेषु मलः' इसका अर्थ 'कर्णादिक
स्रोतों में स्थित मल' तथा कोई 'जिह्वा, दाँत, कक्षा (बगल) तथा लिङ्ग आदि के मल को भी मेद का मल' मानते हैं
एवं नेत्रों के मल तथा त्वचाओं के ऊपर के स्नेह को मज्जा का मल तथा हजार बार तपाये हुये सुवर्ण में जैसे मल नहीं
होता वैसे ही शुक्र में भी मल नहीं होता, ऐसा समझना चाहिये ।।२०९।।
१. 'आवरणा जरायु'रिति पाठान्तरम् । २. 'रसे' इति पाठान्तरं चिन्त्यम् । ३. 'च त्वचः' इति पाठान्तरम् ।