भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयगर्भप्रकरणम् ४५
❖ वीर्ये रक्ते मले च शरीरारम्भके वाग्भटोक्तपरिमाणमिते शुद्ध.जीवोवसति न तु दुष्टे प्रवृद्धे च
रक्तस्रावणोपदेशस्य वैयर्थ्यप्रसङ्गात् ।।२६।।
‘जीव, रक्त और मल में रहता है' इसका अभिप्राय यह है कि वाग्भट में कहे हुए रक्तादि के जो परिमाण हैं उन
परिमाणों में स्थित अतएव शरीरारम्भक (शरीर को ठीक रखनेवाले) विशुद्ध रक्तादि में ही विशेषरूप से जीव रहता है,
क्योंकि यदि ऐसा नहीं माना जाय तो दोष युक्त तथा बढ़े हुए रक्त के निकालने का जो उपदेश ऋषियों ने दिया है वह
अनुचित समझा जायगा ।।२६।।
अथ रक्तस्य स्थानमाह-
यकृत् प्लीहा च रक्तस्य मुख्यस्थानन्तयोः स्थितम् । अन्यत्र संस्थितवतां रक्तानां पोषकं भवेत् ।।१४१।।
रक्त के स्थान—यकृत् (कलेजा) और प्लीहा (तिल्ली) ये दोनों रक्त के मुक्त स्थान हैं, इन दोनों स्थानों में स्थित
जो रक्त है वही दूसरे स्थानों में स्थित रक्तों को परिपुष्ट करनेवाला होता है ।।१४१।।
अथ मांसस्य स्वरूपमाह-
शोणितं स्वाग्निना पक्वं वायुना च घनीकृतम् । तदेव मांसं जानीयात्तस्य भेदानपि ब्रुवे ।।१४२।।
मांस के स्वरूप—रक्त जब अपने अग्नि (ऊष्मा) द्वारा परिपक्व हो जाने पर वायु के द्वारा घन (जमकर कड़ा)
हो जाता है तब 'मांस' इस नाम से कहा जाता है। उस मांस के जितने भेद होते हैं उन सबों को कहते हैं ।।१४२।।
❖ शोणितमिति। शोणितस्थानगतत्वाद्रस एव शोणितसंज्ञां लभते। एवमग्रे रसस्यैव
मांसादिव्यपदेशः ।।१४२।।
उपर्युक्त श्लोक का तात्पर्य यह है कि रस ही जब रक्तस्थान में पहुँचता है तब रक्त नाम से और जब उसके आगे
मांसादि के स्थानों में पहुँचता है तब मांसादि नाम से कहा जाता है अर्थात् रक्त-मांसादि सम्पूर्ण धातु एक रस का ही
परिणाम है ।।१४२।।
अथ मांसस्य पेशीमाह-
यथाऽर्थमूष्मणा युक्तो वायुः स्रोतांसि दारयेत् । अनुप्रविश्य पिशितं पेशीर्विभजते तथा ।।१४३।।
मांस पेशी—वायु जैसा प्रयोजन है उसके अनुसार ऊष्मा से युक्त होकर स्रोतों (शिराओं) को विदीर्ण करता हुआ
मांस के भीतर प्रवेश कर उसे पेशी के रूप में विभक्त करता है अर्थात् सूत्र के गुच्छे के रूप में परिणत कर देता है ।।१४३।।
❖ यथाऽर्थ=यथाप्रयोजनम् ।।१४३।।
'यथाऽर्थ' पद में 'अर्थ' पद का 'प्रयोजन' अर्थ होने से 'यथाऽर्थ' का 'जैसे प्रयोजन है उसके अनुसार' यह अर्थ
होता है ।।१४३।।
अथ मांसपेशीनां संख्यामाह-
मांसपेश्यः समाख्याता नृणां पञ्च शतानि हि ।।१४४।।
तासां शतानि चत्वारि शाखासु कथितान्यथ ।
कोष्ठे षडुत्तरा षष्टिः कथिता मुनिपुङ्गवैः । ग्रीवाया ऊर्ध्वगास्तास्तु चतुस्त्रिंशत् प्रकीर्त्तिताः ।।१४५।।
मांसपेशियों की संख्या—मनुष्यों के शरीर में कुल ५०० मांसपेशियां हैं, उनमें ४०० चारों शाखाओं में अर्थात्
दोनों हाथों और दोनों पैरों में और उसके बाद कोष्ठ में अर्थात् गर्दन के नीचे से लेकर कमर तक ६६ और गर्दन के ऊपर
भाग में ३४ मांसपेशियाँ होती हैं ।।१४४-१४५।।