भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें५० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
अस्थि यत् स्वाग्निना पक्वं तस्य सारो भवेद्धनः । यः स्वेदवत् पृथग्भूतः स मज्जेत्यभिधीयते ।।१६३।।
मज्जा के स्वरूप—जब अस्थि अपने अग्नि से परिपक्व हो जाता है तब उसका जो सार होता है वह घन हो
जाता है और वही सार जो अस्थि से स्वेद की भाँति अलग होकर अस्थि के मध्य में स्थित रहता है उसी अस्थि के सार
को मज्जा कहते हैं ।।१६३।।
अथ मज्जस्थानमाह-
स्थूलास्थिषु विशेषेण मज्जा त्वभ्यन्तरे स्थितः ।।१६४।।
मज्जा के स्थान—मोटी २ हड्डियों के भीतर ही मज्जा विशेषरूप से रहती है। अतः मज्जा का स्थान मोटी-
मोटी हड्डियों के भीतर का भाग समझना चाहिये ।।१६४।।
अथ शुक्रस्योत्पत्तिमाह-
रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते । मेदसोऽस्थि ततो मज्जा मज्ज्ञः शुक्रस्य सम्भवः ।।१६५।।
शुक्र की उत्पत्ति—रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्र
की उत्पत्ति होती है ।।१६५।।
❖ सुश्रुतस्येति¹ वचनेन शुक्रसम्भव उक्तः ।।१६५।।
ऊपर कहे हुए सुश्रुत के इसी वचन के द्वारा सिद्ध होता है कि मज्जा से शुक्र की उत्पत्ति होती है ।।
ननु 'मांसेन रसः शुक्नो भवति स्त्रीणाञ्चार्त्तवं भवती'ति सुश्रुतस्यैव वचने रसादेव शुक्रस्योत्पत्तिरुच्यते तदेतत्
कथं सङ्गच्छते ? इममेव सन्देहं दूरीकर्तुमाहारादेर्गतिं परिणामञ्चाह-यात्यामाशयमाहारः पूर्वं प्राणानिलेरितः ।
माधुर्यं फेनभावं च षड्सोऽपि लभेत सः ।।१६६।।
आहारादि की गति और परिणाम—प्राणवायु से प्रेरित होकर आहार (भोजन) सबसे पहले आमाशय में जाता
है और अम्लादि छः प्रकार के रसों में से चाहे जिस प्रकार के रस से युक्त हो, वहाँ पहुँच कर मधुरता तथा फेन भाव
को प्राप्त करता है अर्थात् मीठा और झाग से युक्त हो जाता है ।
❖ आहार इत्यत्र 'आह्रियते' इत्याहारः । 'अकर्त्तरि च कारके संज्ञायामि'ति सूत्रेण कर्मणि घञ् । स
च षड्विधः । तथा च—
आहार्यं षड्विधं भोज्यं भक्ष्यं चर्व्यन्तथैव च ।।२८।।
लेह्यं चूष्यं तथा पेयं तदुदाहरणानि तु । भोज्यमोदनसूपादि भक्ष्य मोदकमण्डकम् ।।२९।।
चर्व्यं चिपिटधान्यादि रसालादि तु लेह्यते । चूष्यमाम्रफलेक्ष्वादि पीयते पानकं पयः ।।३०।।
'आहार' भोजन की संज्ञा हैं । 'अकर्त्तरि च कारके संज्ञायाम्' इस पाणिनीय सूत्र से कर्म में 'आङ्' उपपद रहते,
'हृ' धातु से घञ् प्रत्यय तथा वृद्धि होने से आहार पद की सिद्धि होती है । वह आहार छः प्रकार का होता है—भोज्य,
भक्ष्य, चर्व्य, लेह्य, चूष्य और पेय । भोजन करने योग्य भात, दाल प्रभृति भोज्य, भक्षण करने के योग्य लड्डू, मण्डक
प्रभृति भक्ष्य, चबाने लायक चिउड़ा, चना प्रभृति, चर्व्य, चाटने लायक रसाला (रस-युक्त चटनी) आदि लेह्य, चूसने योग्य
आम, ईख आदि चूष्य और पीने योग्य शरबत, दूध आदि पेय कहाता है ।।२८-३०।।
१. 'शुक्रस्ये'ति पाठान्तरं चिन्त्यम् ।