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सर्वकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

४६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
❖ एकैकस्यानु पादाङ्गुल्यां तिस्रस्तिस्रस्ताः पञ्चदश १५ । पादाग्रे दश १० । पादोपरि कूर्चसन्निविष्टा
दश १० । गुल्फतलयोर्दश १० । गुल्फजानुनोरन्तरे विंशतिः २० । जानुनि पञ्च ५ । ऊरौ विंशतिः २० ।
वङ्क्षणे दश १०। एवमेकस्मिन् सक्थिनि शतं भवन्ति । एतेनेतरसक्थिबाहू च व्याख्यातौ। एतासां
समष्टिश्श्रुतुःशतम् ।
शाखागत मांसपेशियाँ-एक एक पैर की अङ्गुलियों में तीन तीन हैं इस प्रकार पाँचों अङ्गुलियों में कुल पन्द्रह,
पैर के अग्रभाग में दश और पैर के ऊपर कूर्चस्थान में दश, गुल्फ और तालुओं में दश, गुल्फ और जानु के बीच में
बीस और घुटने में पाँच, जाँघ में बीस और वङ्क्षण (ऊरु की सन्धि) में दश मांसपेशियाँ हैं, इस प्रकार सब मिलकर
एक सक्थि अर्थात् पाँव के पंजे से लेकर जाँघ की सन्धि तक एक सौ मांसपेशियां हैं, इसी प्रकार दूसरे पाँव तथा दोनों
बाहुओं में भी एक सौ मांसपेशियाँ होती हैं। इन सब का योगफल चार सौ होता है॥
अथ कोष्ठगताः प्राह-
❖ गुदे तिस्रः ३ । शेफस्यैका १ । सेवन्यामेका १ । वृषणयोद्वे २ । स्फिचोः पञ्च ५ पञ्च ५ ।
वस्तिमूर्धनि द्वे २ । उदरे पञ्च ५ । नाभ्यामेका १ । १पृष्ठोर्ध्वसन्निविष्टा उभयतः पञ्च ५ । पञ्च ५ दीर्घाः ।
पार्श्वयोः षट् ६ । वक्षसि दश १० । अक्षकांसौ प्रतिसमन्तात् सप्त ७ । अक्षकौ अषुआ इति लोके । अंसौ
स्कन्धौ । हृदि द्वे २ । यकृति द्वे २ । प्लीह्नि द्व २ उण्डुके२ द्वे २ । एतासां समष्टिः षट्षष्टिः ६६ ।।
कोष्ठगत मांसपेशियाँ-गुदा में तीन, लिङ्ग में एक, सेवनी अर्थात् सीवन में एक, दोनों अण्डकोषों में दो, दोनों
तरफ के स्फिचों (कूलों) में पाँच-पाँच, वस्ति के ऊपर भाग में दो, उदर में पाँच, नाभि में एक, पीठ के ऊपर मेरुदण्ड
के दोनों तरफ लगी हुई लम्बी लम्बी पाँच-पाँच (मिलकर दस), दोनों तरफ की पँसुलियों में तीन-तीन (मिलकर छ),
छाती में दस, हँसुली और कन्धे के चारों तरफ सात, (यहाँ 'अक्षक' से लोक में प्रसिद्ध 'अखुआ' तथा 'अंस' से 'स्कन्ध'
समझना चाहिये। हृदय में दो, यकृत् में दो, प्लीहा में दो और उण्डुक (मलाशय) में दो मांसपेशियाँ होती हैं। इन सब
का योगफल ६६ होता है।
अथ ग्रीवोर्ध्वगाः प्राह-
ग्रीवायाञ्चतस्रः ४ । हन्वोरष्टौ ८ । एका काकलके कण्ठमणौ ३घण्टिकायामिति यावत् । गले एका
१ । तालुनि द्वे २ । जिह्वायामेका १ । ओष्ठयोर्द्वे २ । नासायां द्वे २ । नेत्रयोर्द्वे २ । गण्डयोश्चतस्रः ४ ।
कर्णयोर्द्वे २ । ललाटे चतस्रः ४ । शिरस्येका १ । आसां समष्टिः चतुस्त्रिंशत् ३४ । एवं मांसपेश्यः पञ्च
शतानि ५०० भवन्ति ।।१४४-१४५।।
गर्दन के ऊपर भाग की मांसपेशियाँ-गर्दन में चार, दोनों हनुओं (कपोलों) के नीचे भागों में आठ, काकलक
(कण्ठमणि) में एक, (कण्डमणि को लोक में घण्टिका (टेंटुआ) कहते हैं) गले में एक, तालु में दो, जिह्वा में एक,
दोनों ओठों में दो, दोनों नाक में दो, दोनों नेत्रों में दो, दोनों गण्डस्थलों में चार, दोनों कानों में दो, ललाट में चार और
शिर में एक मांसपेशियाँ होती हैं। इन सबों का योगफल चौंतीस होता है। इस प्रकार सब मिलकर संपूर्ण शरीर में पाँच
सौ मांसपेशियाँ होती हैं ।।१४४-१४५।।
स्त्रीणामपि भवन््येताः किन्तु विंशतिरुत्तरा । गर्भाशये गर्भमार्गे योनौ च स्तनयोरपि ।।१४६।।
स्त्रियों के भी इतनी ही मांसपेशियाँ होती हैं किन्तु गर्भाशय, गर्भमार्ग, योनि तथा दोनों स्तनों में बीस मांसपेशियाँ
अधिक होती है ।।१४६।।
१. 'पृष्ठोर्ध्वमि'ति पाठान्तरम् । २. 'तुण्डके' इति पाठान्तरं प्रामादिकम् । ३. 'घुण्टिकायामि'ति पाठान्तरम् ।