भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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ओज के लक्षण—ओज सम्पूर्ण शरीर में रहने वाला, स्निग्ध, शीतल (ठण्डा), स्थिर, सफेद और सोमात्मक
होता है तथा शरीर में बल और पुष्टि का करनेवाला होता है ॥ १८० ॥
❖ बलं=चेष्टापाटवम् । तथा च-'चेष्टासु पाटवं यत्तु बलं तदभिधीयते । यत्तु सुश्रुते—
'रसादीनां शुक्रान्तानां धातूनां यत्परं तेजस्तत्खलु ओजस्तदेव बलम्' इति । तेजस्तेजोद्रवः । अत्रायमभिप्रायः-
यस्माद्रसाद्रोजो भवति स रसः सर्वधातुस्थानगतत्वात्तद्घातुवन्मन्यत इति । सर्वधातूनां स्नेहमोजः, क्षीरे घृतमिव
तदेव बलमिति । तत्कार्यकारणयोरभेदोपचारात् । अभेदकथनञ्च चिकित्सैक्यार्थम् ॥ १८१ ॥
यहाँ 'बल' पद से 'चेष्टा करने में सामर्थ्य' यह अर्थ समझा जाता है, क्योंकि अन्यत्र भी कहा है कि—'चेष्टा करने
में जो पाटव अर्थात् सामर्थ्य (फुर्तीलापन) होता है उसी को पण्डित लोग 'बल' कहते हैं और 'सुश्रुत' में जो यह कहा
है कि 'रस से लेकर शुक्र पर्यन्त सात धातुओं का जो प्रधान तेज है वह ओज कहलाता है तथा वही बल भी कहलाता
है' यहाँ पर 'तेज' पद से 'तेज सम्बन्धी द्रव' लिया जाता है । इस वाक्य में 'सुश्रुत' का यह अभिप्राय है कि—जिस
रस से ओज होता है वह रस सब धातुओं के स्थान में जाता है अत एव जब जिन जिन धातुओं के स्थान में जाता है
तब उन उन धातुओं के तरह से उन-उन स्थानों में वह समझा जाता है, अतएव सब धातुओं का स्नेह ओज है, अर्थात्
जिस प्रकार से दूध में घी होता है उसी प्रकार से ओज भी धातुओं में होता है और 'वही बल भी कहलाता है' ऐसा जो
कहा है वह कार्य और कारण का अभेद मानकर कहा है अर्थात् ओज और बल यद्यपि एक नहीं हैं क्योंकि ओज से बल
की उत्पत्ति होने से ओज कारण है तथा बल कार्य है, तथापि कार्य और कारण का अभेद होने से 'ओज ही बल कहलाता
है' यह कहना सङ्गत ही है और अभेद कथन का फल यह है कि कार्य और कारणरूप जो बल और ओज हैं इन दोनों
की चिकित्सा का ऐक्य हो ॥ १८१ ॥
अन्यच्च-
गुरु शीतं मृदुस्निग्धं सान्द्रं स्वादु स्थिरं तथा । प्रसन्नं पिच्छिलं सूक्ष्ममोजो दशगुणं स्मृतम् ॥ १८२ ॥
ओज—गुरु (भारी), शीतल, मृदु, स्निग्ध, सान्द्र (गाढ़ा), स्वादु (स्वादयुक्त), स्थिर, निर्मल, पिच्छिल और सूक्ष्म
(सूक्ष्मस्रोतोगामी) इन दश गुणों से युक्त कहा गया है ॥ १८२ ॥
चरके तु-
अष्टविन्दुप्रमाणं तदीषद्रक्तं सपीतकम् । १अग्नीषोमात्मकत्वेन द्विरूपं वर्णितन्तु तत् ॥ १८३ ॥
चरक में तो—ओज को आठ बिन्दु प्रमाण तथा थोड़ा लाल तथा पीला वर्ण लिये हुये कहा है तथा अग्निसोमात्मक
होने से दो तरह का कहा है अर्थात् ओज आग्नेय और सौम्य भेद से दो प्रकार का कहा है ॥ १८३ ॥
वाग्भटश्च-
ओजश्च तेजो धातूनां शुक्रान्तानां परं स्मृतम् । हृदयस्थम