भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
४४४ भारत में अंगरेज़ी राज
यह तजवीज़ भारत में अंगरेज़ी राज का अस्तित्व क़ायम रखने के लिए कितनी
ज़रूरी है।"
इस पत्र में भी तजवीज़ को गुप्त रखने पर फिर खूब ज़ोर दिया
गया।
मार्किस वेल्सली के एक पत्र से मालूम होता है कि इतने पर
भी अज़ीमुलउमरा अन्त तक कुछ झिझकता रहा।
[मार्जिन: अज़ीमुलउमरा] सम्भव है उसकी आत्मा भीतर से उसे दिक़
[मार्जिन: की घबराहट] करती हो, या सम्भव है कोई और सबब रहा
हो। जो हो, उसने निज़ाम की सेना को बरख़ास्त करने में देर की।
अंगरेज़ों के लिए इस तरह के मामले में देर ख़तरनाक हो सकती
थी। इसलिए मैलकम और कर्कपैट्रिक ने दूसरी ओर से भी अपना
इन्तज़ाम कर लिया था। उन्होंने निज़ाम की सेना के अन्दर भी
अपने षड्यन्त्र का जाल पूर रक्खा था। कम्पनी की सेना बिना
निज़ाम की सेना के बरख़ास्त होने का इन्तज़ार किए मद्रास से
हैदराबाद के लिए चल पड़ी। कप्तान मैलकम की जीवनी का
रचयिता सर जॉन के लिखता है कि—"हमारे सौभाग्य से ऐन
मौक़े पर निज़ाम की पल्टनें अपने अफ़सरों के विरुद्ध बलवा कर
बैठीं। क्योंकि उनकी तनख़ाहें चढ़ गई थीं। उन्होंने अपने फ़्रांसीसी
सेनापति को क़ैद कर लिया।"* इत्यादि। जॉन के यह नहीं
बतलाता कि किन तरीक़ों से रेजिडेण्ट और उसके असिस्टेण्ट ने
निज़ाम की फ़ौजों को "ऐन मौक़े पर" बलवा करने के लिए तैयार
- Kaye's Life of Malcolm.
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किया। इसी मौक़े पर कम्पनी की पलटनों ने भी अचानक हैदराबाद
को जा घेरा। वज़ीर अज़ीमुलउमरा से कहा गया कि आप फ़ौरन
निज़ाम की पलटनों को बरखास्त करके कम्पनी की पलटनों को
उनकी जगह दे दें। लिखा है कि कम्पनी की सेना को इतनी जल्दी
हैदराबाद में देख कर अज़ीमुलउमरा चकित रह गया और एक बार
उसने रियासत की सेना को बरखास्त करने से इनकार कर दिया।
जिस सेना और उसके अफ़सरों ने सदा इतनी वफ़ादारी के साथ
राज की सेवा की थी उसे बेक़सूर बरखास्त कर देना अज़ीमुलउमरा
के लिए भी इतना आसान न था। असहाय निज़ाम को चन्द घण्टे
पहले तक इस तमाम कार्रवाई का गुमान भी न था। किन्तु न
निज़ाम में इतनी हिम्मत थी और न उसके आदमियों में इतनी
वफ़ादारी। अन्त में चारों ओर से कम्पनी की पलटनों से घिर कर,
स्वयं अपने दरबार को विश्वासघातकों से छलनी छलनी देख कर
और अपनी ही सेना को अपने ख़िलाफ़ विद्रोही देखकर निज़ाम को
अंगरेज़ रेज़िडेंट की इच्छा पूरी करनी पड़ी।
१ सितम्बर सन् १७९८ को निज़ाम ने कम्पनी के साथ उस
कम्पनी और नए सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए जिससे
निज़ाम में सबसी हैदराबाद दरबार की स्वाधीनता का सदा के
डीयरी सन्धि लिए ख़ात्मा हो गया। इस सन्धि पत्र का पहला
ही वाक्य सरासर झूठ है। उसमें लिखा है—
"चूंकि नवाब निज़ामुलमुल्क आसफ़जाह बहादुर ने मौजूदा दोस्ती के
महत्व को देखते हुए यह इच्छा प्रकट की है कि माननीय कम्पनी की जो
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सेना इस समय निज़ाम की नौकरी में है उसकी संख्या बढ़ा दी जावे, इत्यादि
इसलिए × × × ।”
निज़ाम का इस तरह की कभी कोई इच्छा प्रकट करना तो दूर
रहा, उसे इस तमाम साज़िश का पहले से गुमान तक न था।
केवल दग़ा और लाचारी ने उसे सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर करने के
लिए मजबूर किया।
इस सबसीडीयरी सन्धि के अनुसार छै हज़ार हिन्दोस्तानी
सिपाहियों की एक नई सेना मय तोपखाने के अंगरेज़ अफ़सरों के
अधीन निज़ाम के ख़र्च पर निज़ाम के राज के अन्दर सदा के लिए
क़ायम कर दी गई और यह तय हुआ कि आइन्दा बिना कम्पनी
की इजाज़त के निज़ाम किसी यूरोपियन को अपने यहाँ नौकर न
रक्खे। इस प्रकार निज़ाम पहला भारतीय नरेश था जिसे मार्किस
वेल्सली ने 'सबसीडीयरी एलायन्स' के जाल में फाँस कर उसे
उसके अपने राज के अन्दर एक तरह का क़ैदी बना दिया, और
जिसे अपने ख़ज़ाने से उस सेना का ख़र्च बरदाश्त करना पड़ा
जिस सेना ने उसे क़ैद करके रक्खा।
इंगलिस्तान के मन्त्रिमण्डल ने हैदराबाद की इस सन्धि पर
[हाशिया: वेल्सली और उसके साथियों को कम्पनी की ओर से इनाम] विशेष पत्र द्वारा हार्दिक सन्तोष प्रकट किया,
और कम्पनी के डाइरेक्टरों ने इनाम के तौर पर
वेल्सली को बीस साल तक के लिए ५,०००
पाउण्ड सालाना की पेन्शन प्रदान की। यह
पेन्शन सन्धि की तारीख़ १ सितम्बर सन् १७९८ से शुरू की गई।
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कर्कपैट्रिक और मैलकम को भी उनकी सेवाओं के लिए इनाम और
तरक़्क़ियाँ दी गईं ।
इसके बाद निज़ाम की हालत इतनी असहाय हो गई कि
अज़ीमुलउमरा की मृत्यु के बाद निज़ाम की इच्छा के विरुद्ध
अंगरेज़ों ने अपने एक आदमी मीर आलम को उसकी जगह निज़ाम
का प्रधान मन्त्री नियुक्त करवा दिया ।
इस समस्त दग़ा के लिए एक बहाना यह लिया गया कि
अंगरेज़ों को उस समय फ्रांसीसियों से और टीपू सुलतान से
हमले का डर था, और इसलिए उन तमाम शक्तियों को पंगुल कर
देना अंगरेज़ों के लिए आवश्यक था जिनके फ्रांसीसियों या टीपू
से मिल जाने की सम्भावना हो । किन्तु एक तो उस समय की
समस्त स्थिति को देखने से मालूम होता है कि ये दोनों डर बिल्कुल
झूठे थे, दूसरे यदि इस तरह की कोई आशंकाएँ रही भी हों तो भी
गम्भीर सन्धियों को तोड़ कर और गुप्त षड्यन्त्र रच कर दूसरे
राज्यों की स्वाधीनता को हरने का यह कोई न्याय्य बहाना नहीं हो
सकता । इस सब का असली कारण था अंगरेज़ों की वह साम्राज्य
पिपासा जिसका पिछले अध्याय में ज़िक्र किया जा चुका है ।
ठीक जिस तरह के प्रयत्न हैदराबाद में किए जा रहे थे, उसी
[हाशिया: हैदराबाद और] तरह के प्रयत्न उसी समय पूना दरबार में भी
[हाशिया: पूना में अन्तर] चल रहे थे । ८ जुलाई को वेल्सली ने कप्तान
कर्कपैट्रिक के नाम पत्र लिखा, और ठीक उसी
दिन उसी विषय का एक पत्र पूना के रेज़िडेंट को लिखा । किन्तु
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पूना में वेल्सली को सफलता न हो सकी। गो कि नाना फड़नवीस
उस समय क़ैद में था फिर भी पूना दरबार अभी तक हैदराबाद
दरबार की तरह राजनीति शून्य या चरित्र शून्य न हो पाया था।
पूना दरबार में अभी तक ऐसे जागरूक और दूरदर्शी नीतिज्ञ
मौजूद थे जो अंगरेज़ों की चालों में इतनी आसानी से न आ
सकते थे।