भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेल्सली और निज़ाम ४४७
कर्कपैट्रिक और मैलकम को भी उनकी सेवाओं के लिए इनाम और
तरक़्क़ियाँ दी गईं ।
इसके बाद निज़ाम की हालत इतनी असहाय हो गई कि
अज़ीमुलउमरा की मृत्यु के बाद निज़ाम की इच्छा के विरुद्ध
अंगरेज़ों ने अपने एक आदमी मीर आलम को उसकी जगह निज़ाम
का प्रधान मन्त्री नियुक्त करवा दिया ।
इस समस्त दग़ा के लिए एक बहाना यह लिया गया कि
अंगरेज़ों को उस समय फ्रांसीसियों से और टीपू सुलतान से
हमले का डर था, और इसलिए उन तमाम शक्तियों को पंगुल कर
देना अंगरेज़ों के लिए आवश्यक था जिनके फ्रांसीसियों या टीपू
से मिल जाने की सम्भावना हो । किन्तु एक तो उस समय की
समस्त स्थिति को देखने से मालूम होता है कि ये दोनों डर बिल्कुल
झूठे थे, दूसरे यदि इस तरह की कोई आशंकाएँ रही भी हों तो भी
गम्भीर सन्धियों को तोड़ कर और गुप्त षड्यन्त्र रच कर दूसरे
राज्यों की स्वाधीनता को हरने का यह कोई न्याय्य बहाना नहीं हो
सकता । इस सब का असली कारण था अंगरेज़ों की वह साम्राज्य
पिपासा जिसका पिछले अध्याय में ज़िक्र किया जा चुका है ।
ठीक जिस तरह के प्रयत्न हैदराबाद में किए जा रहे थे, उसी
[हाशिया: हैदराबाद और] तरह के प्रयत्न उसी समय पूना दरबार में भी
[हाशिया: पूना में अन्तर] चल रहे थे । ८ जुलाई को वेल्सली ने कप्तान
कर्कपैट्रिक के नाम पत्र लिखा, और ठीक उसी
दिन उसी विषय का एक पत्र पूना के रेज़िडेंट को लिखा । किन्तु