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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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४४६ भारत में अंगरेज़ी राज
सेना इस समय निज़ाम की नौकरी में है उसकी संख्या बढ़ा दी जावे, इत्यादि
इसलिए × × × ।”
निज़ाम का इस तरह की कभी कोई इच्छा प्रकट करना तो दूर
रहा, उसे इस तमाम साज़िश का पहले से गुमान तक न था।
केवल दग़ा और लाचारी ने उसे सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर करने के
लिए मजबूर किया।
इस सबसीडीयरी सन्धि के अनुसार छै हज़ार हिन्दोस्तानी
सिपाहियों की एक नई सेना मय तोपखाने के अंगरेज़ अफ़सरों के
अधीन निज़ाम के ख़र्च पर निज़ाम के राज के अन्दर सदा के लिए
क़ायम कर दी गई और यह तय हुआ कि आइन्दा बिना कम्पनी
की इजाज़त के निज़ाम किसी यूरोपियन को अपने यहाँ नौकर न
रक्खे। इस प्रकार निज़ाम पहला भारतीय नरेश था जिसे मार्किस
वेल्सली ने 'सबसीडीयरी एलायन्स' के जाल में फाँस कर उसे
उसके अपने राज के अन्दर एक तरह का क़ैदी बना दिया, और
जिसे अपने ख़ज़ाने से उस सेना का ख़र्च बरदाश्त करना पड़ा
जिस सेना ने उसे क़ैद करके रक्खा।
इंगलिस्तान के मन्त्रिमण्डल ने हैदराबाद की इस सन्धि पर
[हाशिया: वेल्सली और उसके साथियों को कम्पनी की ओर से इनाम] विशेष पत्र द्वारा हार्दिक सन्तोष प्रकट किया,
और कम्पनी के डाइरेक्टरों ने इनाम के तौर पर
वेल्सली को बीस साल तक के लिए ५,०००
पाउण्ड सालाना की पेन्शन प्रदान की। यह
पेन्शन सन्धि की तारीख़ १ सितम्बर सन् १७९८ से शुरू की गई।