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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 690 में से

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पृष्ठ 288

मरयादा की यह कही, क्या विरक्त परमान ।
आठ पहर साठौ घरी, जागै हरि के ध्यान ॥
जो कोइ विरही राम के, तिनकूं कैसी नींद ।
शस्तर लागा नेह का, गया हियेको बींध ॥
तिनसे जग सहजै छुटा, कहा रंक कह भूप ।
चलेगये घर छोड़िकै, धरि विरक्तका रूप ॥
जिनको मन विरकत सदा, रहो जहाँ चितहोय ।
घर बाहर दोउ एकसा, डारी दुबिधा खोय ॥
सोये हैं संसार सूं, जागे हरिकी ओर ।
तिनकूं इकरसही सदा, नहीं सांझ नहिं भोर ॥
उनकूं नींद न आवई, राम मिलनकी चीत ।
सोवै ना सुखसेज पै, तजिकै हरिसों मीत ॥
कै सोवै हरिसूं मिले, जिनके ऊंचे भाग ।
कै सोवैं हरि त्यागिकै, रहे जक्त सूं लाग ॥
सोवन जागन भेदकी, कोइक जानत बात ।
साधूजन जागत तहां, जहां सबनकी रात ॥
जो जागै हरि भक्ति में, सोई उतरे पार ।
जो जागै संसार में, भवसागर में ख्वार ॥
कै जागत हुका भरा, कै जागा वश काम ।
कै जागा जग टहल में, लाग रहा धनधाम ॥
ऐसे जन्म गँवाय दिय, महा मूढ़ अज्ञान ।
चौरासी में फिरि चले, मनका कहा जु मान ॥
संतगुरु शरणै आयकरि, कहा न मानै एक ।
ते नर बहु दुख पाइहैं, तिनकूँ सुखनहिं नेक ॥
सतगुरु शरणौ ना लगे, किया न हरिका खोज ।