भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
कृष्णप्रेम के व्यभिचारिभाव [ २११
कि श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में निर्विशेषता का कोई प्रश्न नहीं है। श्रीकृष्ण के
नाना सम्बन्धों में सभी प्रकार की सविशेष क्रियाएँ होती हैं।
उन्माद
श्री बिल्वमंगल ठाकुर स्वरचित ग्रन्थ में प्रार्थना करते हैं, "श्रीमती
राधारानी सम्पूर्ण जगत् को पवित्र करें क्योंकि उन्होंने श्रीकृष्ण के चरणों
में पूर्ण आत्मसमर्पण कर दिया है। कृष्ण प्रेम में वे कभी पागल के समान
खाली पात्र में दही मन्थन का प्रयास करती हैं। यह दृश्य देखकर श्रीकृष्ण
ऐसे मुग्ध हुए कि गाय के स्थान पर साँड को दोहने लगे।" राधाकृष्ण
के प्रेम विषयक ये उन्माद के कुछ उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवत में वर्णन
है कि श्रीकृष्ण के कालीदह में प्रवेश करने से यशोदा मैया को उन्माद हो
गया। विष की औषधि खोजने के स्थान पर वे वृक्षों से बोलने लगीं, मानों
वे मान्त्रिक हों। वृक्षों को हाथ जोड़ प्रणाम करते हुए बोलीं, "कृपया उस
ओषधि का पता बताइए जिससे कृष्ण विषमय जल के प्रभाव से बच
जायें।" यह आपदा के कारण उत्पन्न उन्माद है।
भक्त में प्रेम के उन्माद का वर्णन श्रीमद्भागवत (१०.३०.४) के उस
प्रसंग में है जब गोपियाँ वृन्दावन के निकुंजों में श्रीकृष्ण का अन्वेषण कर
रही थीं। एक वन से दूसरे वन में उन्हें खोजती हुई गोपिकाएँ उच्च स्वर
से उनकी कीर्ति का गान करती जाती थीं। उन्हें पता था कि श्रीकृष्ण
एकदेशीय नहीं हैं, वरन् विभु हैं। वे आकाश में हैं, वे जल में हैं, वे वायु
में हैं, वे प्राणीमात्र के हृदय में परमात्मा हैं। अतः नाना प्रकार के पेड़-
पौधों से वे उनका पता पूछने लगीं। भक्तों में होने वाला यह विरहजनित
उन्माद है।
इस उन्माद का अन्तर्भाव यद्यपि व्याधि के अन्तर्गत हो जाता है,
तथापि विप्रलम्भ आदि में उसमें विशिष्ट चमत्कार की उद्भावना होती
है। महाभाव का उदय होने पर मोहन को प्राप्त हो जाने पर यह उन्माद
विकसित होकर दिव्योन्माद बन जाता है।
अपस्मार
जब श्रीकृष्ण वृन्दावन में नहीं थे और मथुरा में रह रहे थे तो राधा-
रानी ने सन्देश प्रेषित किया कि मैया व्रजरानी को उनका ऐसा तीव्र विरह
सता रहा है कि समुद्र के समान मुख से फेन निकलता है। कभी-कभी
सागर की तरंगों के सदृश भुजा उत्तेजित करती हैं, विरहवश भूमि पर
२१२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
लोटती हैं, उच्च स्वर से चिल्लाती हैं और फिर शान्त समुद्र जैसे मूर्च्छित
हो जाती हैं। कृष्ण से विरह के ये लक्षण अपस्मार कहलाते हैं। प्रेम के
इन भावों का उदय होने पर भक्त को अपनी तनिक भी सुध-बुध नहीं
रहती ।
श्रीकृष्ण को एक यह सन्देश भी भेजा गया कि उनके द्वारा कंस के
मारे जाने से कंस का एक असुर मित्र घोर दशा को प्राप्त हो गया है।
उसके मुख से फेन निकलता है और भुजाओं को घुमाता हुआ वह भूमि
पर लोट रहा है। यह भयानकाभास श्रीकृष्ण से सम्बन्धित भयानकरस
में जन्म लेता है। भयानकरस कृष्ण विषयक रसों में एक गौण रस है।
प्रथम पाँच रस (शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य) मुख्य माने गए
हैं; अन्य सातों रस (भयानक, वीभत्स, रौद्र, करुण, हास्य, अद्भुत तथा
वीर) गौण हैं। जिस किसी रूप में उस दैत्य का कृष्ण से कोई सम्बन्ध
अवश्य रहा होगा, क्योंकि श्रीकृष्ण ने कंस को मार डाला—यह सुनते ही
उसमें उपरोक्त भाव प्रकट हो गए। श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि
इस प्रकार के लक्षण (आभास) में भी विशेष चमत्कार होता है ।
व्याधि
वृन्दावन से दूर मथुरा में रहते हुए श्रीकृष्ण को कुछ मित्रों ने सूचित
किया, “हे कृष्ण ! तुम्हारे असह्य विरह में व्रजवासी व्याधि से पीड़ित
प्रतीत होते हैं। उनके शरीर ज्वरित हो गए हैं और वे भलीभाँति चल भी
नहीं सकते । भूमि पर पड़े-पड़े केवल दीर्घ श्वास लेते रहते हैं।”
श्रीमद्भागवत (१०.१२.४४) में भगवान् अनन्त के सम्बन्ध में
महाराज परीक्षित की जिज्ञासा को सुनकर शुकदेव गोस्वामी में शिथिलता
के लक्षण प्रकट होने लगे। फिर भी उन्होंने उनको रोक दिया और मन्द
स्वर से परीक्षित का समाधान किया। यह शिथिलता दिव्य आनन्द
के कारण उत्पन्न होने वाली ज्वर की अवस्था है ।
श्रीमद्भागवत में ही वर्णन है कि अपनी शैशवकालीन लीलाओं में
अनेक वर्ष बाद जब व्रजांगनाओं और श्रीकृष्ण का कुरुक्षेत्र में मिलन हुआ
तो सारी गोपिकाएँ स्तब्ध हो गईं। उनका श्वास, पलकों का गिरना आदि
सम्पूर्ण व्यापार रुद्ध हो गए और वे कृष्ण के समाने पुतली सी खड़ी रह
गयीं । यह हर्षातिशय से उत्पन्न व्याधि है ।
अध्याय ३०
कृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव
मोह
'हंसदूत' में यह वाक्य है, "एक दिन जब कृष्ण से विरह की व्यथा
अधिक बढ़ गयी तो श्रीमती राधारानी अपनी कुछ सखियों के साथ यमुना
किनारे गयीं। वहाँ उन्होंने वह चिर-परिचित कुटि देखी जिसमें श्रीकृष्ण के
साथ वे नाना प्रकार से दिव्य रसास्वादन कर चुकी थीं। उस सब की
दिव्य स्मृति से वे तत्काल मोह से अभिभूत हो गयीं। यह मोह अतिशय
प्रौढ़ रूप में प्रकट हुआ।" यह विरह से उत्पन्न मोह है।
इसी प्रकार भय से हुए मोह के भी उदाहरण हैं। ये लक्षण कुरुक्षेत्र
के युद्धप्रांगण में श्रीकृष्ण का विराट् रूप देखने पर अर्जुन में प्रकट हुए
थे। उसे ऐसा मोह हुआ कि हाथ से गाण्डीव के स्खलन को भी न जान
पाया।"
मृत्यु
एक समय कंस का भेजा हुआ बकासुर वृन्दावन में आया और
श्रीकृष्ण तथा गोपबालकों को निगलने के लिए बगले के रूप में मुख खोल
कर बैठ गया। श्रीकृष्ण को बकासुर के मुख में प्रवेश करता देखकर
बलराम तथा अन्य सभी गोपबालक निष्प्राण और अचेतन प्रायः हो गए।
किसी भयानक दृश्य अथवा आकस्मिक घटना से मोहित होने पर भी भक्त-
जन श्रीकृष्ण को कभी नहीं भूलते। महान् से महान् विपत्ति में भी वे
श्रीकृष्ण का स्मरण कर सकते हैं। अतः कृष्णभावना का यह अनुपम लाभ
है कि मृत्यु-काल में भी, जब देह की सम्पूर्ण इन्द्रियाँ विकल और अस्त-
व्यस्त हो जाती हैं, भक्त अपनी अन्तर्चेतना में श्रीकृष्ण का चिन्तन कर
सकता है और इससे भवसागर में गिरने से बच जाता है। इस प्रकार
कृष्णभावना भक्त को तत्काल प्राकृत-जगत् से वैकुण्ठ-जगत् में पहुँचा
देती है।
२१४] भक्तिरसामृतसिन्धु
इस सन्दर्भ में मथुरा में मरने वाले व्यक्तियों के सम्बन्ध में उल्लेख
है, "मन्द श्वास के साथ, पूरी खुली हुई आँखों वाले और शरीर में नए
प्रकार की विवर्णता को धारण किए हुए इन सौभाग्यशाली पुरुषों ने कृष्ण-
नाम का उच्चारण करते हुए देह-त्याग किया।" ये लक्षण मृत्यु से पूर्व
के हैं।
आलस्य
तृप्ति अथवा परिश्रम में अरुचि के कारण जब शक्ति रहते भी
कर्तव्य-पालन नहीं किया जाता तो उसे आलस्य कहते हैं। यह आलस्य भी
कृष्णप्रेम में अभिव्यक्त होता है। उदाहरणार्थ, नन्द महाराज ने कतिपय
ब्राह्मणों से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने के लिए निवेदन किया। इस
पर उन्होंने उत्तर दिया कि उनकी रुचि आशीर्वाद देने में ही है। यह
आत्मतृप्ति के लिए प्रयुक्त आलस्य का उदाहरण है।
एक समय जब श्रीकृष्ण अपने ग्वाल सखाओं के साथ खेल-खेल में लड़
रहे थे तो सुबल ने थकावट व्यक्त की। श्रीकृष्ण तुरन्त अपने सखाओं से
कहने लगे, "सुबल मुझसे लड़कर बहुत थक गया है, इसलिए युद्ध के लिए
फिर बुलाकर उसे व्यथित मत करो।" यह श्रम की अरुचि से उत्पन्न
आलस्य है।
जड़ता
श्रीमद्भागवत (१०.२१.१३) में गोपिकाओं ने वृन्दावन की गौओं
की जड़ता को धन्य-धन्य कहा है। उन्होंने देखा कि गाएँ नीलमणि श्रीकृष्ण
के मुख से निस्यन्दित वेणु के गीतामृत का श्रवणपुटों से पान कर रही हैं।
गोवत्स भी दूध-पीने की सुध भूल कर आँखों में आँसू लिए उस वंशीध्वनि
के द्वारा हृदय में कृष्ण के स्पर्श-सुख का अनुभव करते स्तब्ध खड़े रह गए।
यह श्रीकृष्ण के दिव्य वंशीनाद के श्रवण से उत्पन्न जड़ता है।
श्रीकृष्ण के विरुद्ध वचन सुनकर लक्ष्मणा व्याकुल हो उठी और
निर्निमेष नयन से चुपचाप खड़ी रही।
श्रीमद्भागवत (१०.७१.३६) में वर्णन है कि जिस समय राजा
युधिष्ठिर ने अपने महल में भगवान् श्रीकृष्ण का परम आदर सहित
स्वागत किया, उस समय उन्हें इतना हर्ष हुआ कि शरीर की सुध भी नहीं
रही और पूजा करने की विधि का भी ध्यान नहीं रहा। यह श्रीकृष्ण के
दर्शनों के हर्ष से उत्पन्न जड़ता का उदाहरण है।
कृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव [ २१५
श्रीमद्भागवत (१०.३६.३६) में एक अन्य उल्लेख है। जब तक
मथुरा जाते हुए श्रीकृष्ण के रथ की ध्वजा तथा चारों ओर उड़ती हुई रेणु
दिखाई देती रही, जिनके हृदय श्रीकृष्ण का अनुगमन कर रहे थे, वे गोपियाँ
तब तक चित्रलिखित सी जड़ खड़ी रहीं।
श्रीकृष्ण से एक सखी ने कहा, "हे मुकुन्द ! तुम्हारी विरहव्यथा से
पीड़ित गोपबालक दुष्ट पुजारी के घर की देवमूर्तियों के समान लगते हैं।"
व्यवसायी ब्राह्मण मूर्तिपूजा को धनोपार्जन का साधन बना लेते हैं। उन्हें
श्रीमूर्र्ति से प्रेम नहीं होता, वे तो बस सन्त का वेष बना कर धन कमाने में
रुचि रखते हैं। इसलिए इन ब्राह्मणों द्वारा सेवित मूर्तियों का भलीभाँति
श्रृंगार नहीं होता। वे उनके वस्त्रों को नहीं बदलते और शरीर का मार्जन
भी नहीं करते। परिणाम में ऐसी मूर्तियाँ मलिन और नीरस दिखती हैं।
वास्तव में तो मूर्तिपूजा में अतिशय सावधानी की अपेक्षा है; नित्य नूतन
वस्त्र-श्रृंगार किया जाय तथा यथासम्भव आभूषण आदि भी रहने चाहियें।
सब कुछ इतना स्वच्छ हो कि मूर्ति से सारे आगन्तुक मुग्ध हो उठें। मूर्ति
सब का आकर्षण करे। यहाँ श्रीकृष्ण के सखाओं को व्यवसायी ब्राह्मणों के
घर की उपेक्षित मूर्तियों की उपमा दी गई है, क्योंकि वे बिलकुल भी
आकर्षक नहीं होतीं। श्रीकृष्ण के विरह में उनके सखा ऐसे ही लग रहे थे।
व्रीडा (लज्जा)
श्रीकृष्ण से प्रथम परिचय-मिलन में राधारानी को अतिशय लज्जा
लगी। सखी बोली, "हे राधे ! कृष्ण को तुमने स्वयं अपने सुन्दर तनु का
अर्पण कर दिया है। अब 'कृपणता' न करो। उनकी ओर प्रेम भरी दृष्टि
डालो। हाथों को बेच देने पर फिर अंकुश के लिए विषाद कैसा ?" कृष्ण-
प्रेम के अन्तर्गत यह व्रीडा नवीन संगम में होती है।
पारिजात के लिए श्रीकृष्ण से युद्ध में परास्त होने पर देवराज
इन्द्र अत्यन्त लज्जित हुआ। वह सिर झुकाए श्रीकृष्ण के आगे खड़ा
था, तब श्रीकृष्ण ने कहा, "अच्छा इन्द्र ! तुम इस पारिजात को ले
जाओ, नहीं तो अपनी स्त्री शची का मुख कैसे देख पाओगे ?" इन्द्र की
व्रीडा पराजय के कारण थी। एक दूसरे अवसर पर श्रीकृष्ण उद्धव के नाना
गुणों का स्तवन करने लगे। इससे उद्धव का सिर लज्जावश अवनत
हो गया।
'हरिवंश' में रुक्मिणी के उच्च पद से अपने को अपमानित समझ
कर सत्यभामा ने कहा, "तुम्हारी प्रिया होकर भी मैं अप्रिय बन गई हूँ,
२१६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
इसलिए वासन्तिक पुष्पों से परिपूर्ण रैवतक पर्वत को फिर कैसे देख
सकूँगी ?” यह अवज्ञाजनित व्रीडा का उदाहरण है।
अवहित्था (गोपन)
बाह्य रूप से किसी अन्य भाव को प्रकट करके अपने यथार्थ मनोभाव
का गोपन किए रहना प्रेम का ‘अवहित्था’ नामक लक्षण है। इसमें इधर-
उधर देखने, व्यर्थ चेष्टा करने और वाणी की भंगी से अपनी वास्तविक
मनोदशा को छिपाने का प्रयत्न होता है। मनोभाव के पारंगत आचार्यों
के अनुसार अपने यथार्थ स्नेह को छिपाने के ये प्रयास एक प्रकार के अनुभाव
ही हैं।
श्रीमद्भागवत (१.३२.१५) में शुकदेव गोस्वामी कहते हैं, “हे
राजन् ! गोपिकाएँ स्वभाव से ही सुन्दर और रहस्यमय हास एवं आकर्षक
आभूषणों से अलंकृत थीं। काम का उद्दीपन करने वाले अपने विहार में वे
कभी श्रीकृष्ण के करकमल को अंक में रख लेतीं तो कभी वक्षःस्थल पर
धारण करतीं। इसके बाद अपने भाव को छिपाते हुए वे श्रीकृष्ण से ऐसे
बोलतीं मानो अत्यन्त कुपित हों।”
प्रेम में इस गोपन का एक अन्य उदाहरण है। जब श्रीकृष्ण ने, जो
हास-परिहास में परम दक्ष हैं, पारिजात वृक्ष को सत्यभामा के प्रांगण में
आरोपित कर दिया तो विदर्भनन्दिनी राजराजेश्वरी रुक्मिणी देवी को
बड़ी ईर्ष्या हुई। परन्तु अपनी स्वाभाविक सुशीलता के कारण उन्होंने उसे
व्यक्त नहीं होने दिया। अतः रुक्मिणी के यथार्थ मनोभाव को कोई नहीं
जान सका। यह औदार्य के रूप में प्रकट अवहित्था का उदाहरण है।
श्रीमद्भागवत (१.११.३२) में एक अन्य दृष्टान्त है। श्रीकृष्ण के
द्वारका में प्रवेश करने पर यदुवंशियों ने उनका नाना प्रकार से यथायोग्य
अभिवादन किया। दूर से ही पति को आया देखकर स्त्रियाँ मन ही मन
उनका परिरम्भण करती हुई उन्हें मृदु कटाक्ष से निहारने लगीं। श्रीकृष्ण
कुछ निकट आए तो उन्होंने अपने पुत्रों को उनका आलिंगन करने के लिए
आगे कर दिया। दूसरी लज्जावश आँसुओं को गिरने से रोक रही थीं पर
सफल न हो सकीं। यह लज्जा जनित अवहित्था है।
किसी अन्य समय, श्रीकृष्ण को किसी अन्य स्त्री में अनुरक्त जानकर
राधारानी सखी से कहती हैं, “हे दूति ! कृष्ण का किसी अन्य स्त्री में
अनुराग है, यह स्मरण होते ही मेरा शरीर भयभीत और रोमांचित हो
कृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव [२१७
जाता है । परन्तु कहीं ऐसी दशा में वह मुझे देख न लें । सावधान रहूँगी ।
यह लज्जा और कुटिलता से उत्पन्न अवहित्था है ।
कहा गया है, "श्रीकृष्ण के लिए राधारानी में गाढ़ अनुराग था, पर
उन्होंने उसे अपने हृदय में गम्भीर रूप से छिपा रखा था, जिससे उनकी
यथार्थ स्थिति को कोई न जान सका ।" यह सौजन्य से उत्पन्न
अवहित्था है ।
एक समय जब श्रीकृष्ण और उनके गोप-सखा सख्यवार्ता का आनन्द
उठा रहे थे, श्रीकृष्ण का सेवक पत्री भी वहाँ आनन्द ले रहा था । पर फिर
अपने दास्यभाव को स्मरण करके स्वामी के आगे सिर झुका दिया और
श्रद्धावनत बड़ी कठिनाई से अपनी हँसी को रोका । यह हँसी का रोकना
गौरव जनित गोपन है ।
स्मृति
श्रीकृष्ण की स्मृति से होने वाले अनेक प्रेम-लक्षण हैं । जैसे, एक सखा
ने श्रीकृष्ण से कहा, "हे मुकुन्द ! आकाशचारी नीलमेघ को देखते ही
कमलनयनी राधारानी को तुम्हारा स्मरण हो आया और वह तुम्हारे संग
के लिए कामातुरा हो गयीं।" यह श्रीकृष्ण के सदृश वस्तु को देखने से प्रेमवश
कृष्ण-स्मरण होने का उदाहरण है । श्रीकृष्ण का विग्रह नीलमेघ वर्ण का
ही है, अतः उसे देखकर राधारानी को श्रीकृष्ण का स्मरण हो आया ।
एक भक्त कहता है कि ध्यान में प्रमाद करने पर भी कभी-कभी
श्रीकृष्ण के चारुचरण युगुलारविन्द हृदय में स्फुरित हो जाते हैं । यह स्मृति
निरन्तर अभ्यास का प्रभाव है । भाव यह है कि जो भक्त निरन्तर श्रीकृष्ण
के चरणकमलों का स्मरण करते हैं, वे क्षणिक रूप से ध्यान से विचलित
भी हो जायें तो भी श्रीकृष्ण के चरणकमलों को हृदय में प्रकट देखेंगे ।
वितर्क
ब्राह्मणवंशी मधुमंगल श्रीकृष्ण का परम अंतरंग सखा था । श्रीकृष्ण
के अधिकांश सखा वैश्यकुलों से थे; परन्तु कुछ ब्राह्मणवंशी भी थे ।
वृन्दावन में वैश्यों और ब्राह्मणों की प्रधानता है । यह मधुमंगल एक दिन
श्रीकृष्ण से कहने लगा, "हे सखे ! तुम्हारे सिर से मोरमुकुट बिलकुल गिर
पड़ा और तुम्हें पता भी नहीं । उस पुष्पमाला का भी तुम्हें ध्यान नहीं है
जो तुम्हें अर्पित की गई थी । तुम्हारे नेत्ररूपी भ्रमर श्रीमती राधारानी के
२१८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
नेत्ररूप कमलों पर मँडरा रहे हैं, उसी का यह परिणाम है।" यह प्रेम में
वितर्क का उदाहरण है।
श्रीकृष्ण को भ्रमण के लिए जाते हुए देखकर राधारानी की एक
सखी उनसे कहने लगी, "हे सखि ! क्या यह तमालवृक्ष है ? नहीं, क्योंकि
इसमें गति और सौन्दर्य प्रकट दीख रहा है। फिर क्या यह मेघ है ? नहीं,
क्योंकि इसमें (मुखरूप) अमल-धवल चन्द्रमा चमक रहा है और त्रिभुवन-
मोहिनी मधुर अतिमधुर वंशीध्वनि भी सुनाई दे रही है। अतः हे
चन्द्रवदना ! निश्चय ही गोवर्धन पर्वत पर मुकुन्द खड़े हैं।" यह भी प्रेम
में वितर्क का रूप है।
चिन्ता
श्रीमद्भागवत (१०.२६.२६) में श्रीकृष्ण का उन्हें घर लौट जाने को
कहना गोपिकाओं को अत्यन्त अप्रिय लगा। इससे मर्माहत होने के कारण
वे दीर्घ श्वास लेने लगीं और उनके सुन्दर मुख सूख से गए। इस अवस्था
में वे निस्पन्द खड़ी रहीं। वे पैरों से धरती को कुरेद रही थीं और उनकी
अश्रुधारा स्तनों पर उपलिप्त कुंकुम को धो चली थी। यह प्रेम के चिन्ता
नामक व्यभिचारी भाव का द्योतक है।
एक सखा श्रीकृष्ण से कहने लगा, "हे मुरारि ! तुम्हारी स्निग्ध
स्वभाव स्नेहमयी माँ यशोदा तुम्हारे घर न लौटने से अतिशय चिन्तित है।
घर के प्रांगण में तुम्हारी प्रतीक्षा में उसने बड़ी कठिनाई से सान्ध्य-काल
बिताया है। वह मलिनमुख, चिन्ता से व्याकुल और दुर्बल सी हो गयी है।
हे क्रीड़ारस के लोभी ! आश्चर्य है तुम अपने घर और मैया को भी भूल
गए।" यह प्रेम में होने वाली प्रगाढ चिन्ता का उदाहरण है।
मथुरा में श्रीकृष्ण के लौट आने के लिए आतुरता से प्रतीक्षा करती
हुई यशोदा मैया को नन्द महाराज ने इस प्रकार सांत्वना दी, "हे यशोदे !
गहन अन्तश्चिन्ता के कारण नेत्रों से झरती गरम अश्रुधारा से अपने
मुखकमल को प्लावित मत करो। मैं तुरन्त अक्रूर के साथ कंस के प्रासाद
में जाकर तुम्हारे पुत्र को लौटा लाऊँगा।" यह श्रीकृष्ण के कष्ट से उत्पन्न
चिन्ता है।
मति
पद्मपुराण के वैशाख माहात्म्य में एक भक्त कहता है कि यद्यपि
अट्ठारह पुराणों में से कुछ पुराणों में भगवान् विष्णु के कीर्तन की पद्धति का
कृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव [ २१६
उल्लेख नहीं है, और देवताओं के माहात्म्य का कल्प की अवधि तक
प्रतिपादन है। परन्तु पुराणों का ध्यानपूर्वक स्वाध्याय करने से सिद्ध हो
जाता है कि विष्णु आदिपुरुष भगवान् हैं। यह मति से विकसित प्रेमभाव
का उदाहरण है।
श्रीमद्भागवत (१०.६०.३६) में रुक्मिणी देवी के उस पत्र का उल्लेख
है जिसमें उन्होंने श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि किसी और से उन
(रुक्मिणी) का विवाह हो, इससे पहले ही श्रीकृष्ण उन्हें अवहरण कर ले
जायें। उस समय श्रीकृष्ण के लिए अपने अनुराग को रुक्मिणी देवी ने इस
प्रकार व्यक्त किया था, "हे प्राणनाथ ! प्राकृत बन्धन से मुक्त मुनिजन
आपकी दिव्य कीर्ति का गान करते हैं। इसके लिए आप उन भक्तों को
आत्मदान कर बैठते हैं। आपके कृपा-कटाक्ष से कल्याण होता है और
आपकी टेढ़ी भ्रुवों से प्रेरित सनातन काल के प्रभाव से सम्पूर्ण सुख नष्ट
भी हो जाता है। इसलिए मैंने ब्रह्मा, इन्द्र आदि को छोड़कर आपको ही
पतिरूप में वरण किया है। फिर अन्य देवताओं के लिए तो कहना ही क्या
है ?" श्रीकृष्ण का चिन्तन करने मात्र से रुक्मिणी ने अपने प्रेम का वर्धन
कर लिया। यह प्रेम में मति का दृष्टान्त है।
धृति
ज्ञान, दुःखों की निवृत्ति अथवा भक्ति रूपी जीवन के अभीष्ट लक्ष्य
की प्राप्ति से होने वाली पूर्ण तृप्ति को धृति कहते हैं। इस अवस्था में
मन पूर्ण रूप से स्थिर हो जाता है, बड़ी से बड़ी हानि से उद्विग्न नहीं होता
और न उसे कुछ भी अपूर्णता रहती है।
विद्वान् भर्तृहरि के अनुसार, धृति की अवस्था को प्राप्त पुरुष
सोचता है, "भिक्षा माँगकर खाने वाले, दिशारूप वस्त्र को ही धारण किए
हुए भूमि पर बिना गद्दे सोने वाले मुझे राजा की दासता से क्या काम ?"
भाव यह है कि जिसमें भगवत्प्रेम का उदय हो जाता है, वह देहात्मबुद्धि में
कठिनाई समझे जाने वाली किसी भी परिस्थिति को सहन कर सकता है।
श्रीकृष्ण के पिता नन्द महाराज विचार किया करते थे, "मेरी
गौशाला लक्ष्मी की क्रीड़ाभूमि हो रही है और हजारों गायें उसमें इधर-
उधर दौड़ती हुई भ्रमण कर रही हैं। इससे भी अधिक, घर में कृष्ण के
समान शक्तिशाली और अद्भुत कर्म बालक सुशोभित है। इसलिए गृहस्थ
में भी मेरी पूर्ण तृप्ति हो गई है।" यह दुःख के अभाव से उत्पन्न धृति है।
एक अन्य प्रसंग में कोई दूसरा भक्त कहता है, "श्रीकृष्ण के अनन्त-
२२० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
अनुपम अखिल रससार माधुरीगुण निलय लीलामृत सागर में विहरण
करता हुआ मेरा मन धर्म, अर्थ, काम और ब्रह्मलीनता नामक मोक्ष को
तृण के समान भी नहीं समझता है।" यह विश्व में सर्वोत्तम वस्तु की
प्राप्ति से उपलब्ध धृति का उदाहरण है। कृष्णभावनाभावित हो जाना ही
विश्व में सबसे उत्तम है।
हर्ष
'विष्णुपुराण' में वर्णन है कि जब अक्रूरजी कृष्ण-बलराम को मथुरा
ले जाने के लिए आए, तो उन दोनों को देखते ही उनका मुखकमल खिल
उठा और सारे शरीर में पुलक आदि प्रेम के भाव छा गए।
श्रीमद्भागवत (१०.३३.११) में उल्लेख है कि श्रीकृष्ण को अपनी
चन्दनालिप्त भुजा को अपने स्कन्ध पर रखे हुए देखकर रास करती हुई
वह गोपी अतिशय हर्षित हो उठी और उसने श्रीकृष्ण को चूम लिया। यह
अभीष्ट लाभ-जनित हर्ष है।
उत्सुकता
श्रीमद्भागवत (१०.७१.२३) में उल्लेख है, "श्रीकृष्ण द्वारका से
इन्द्रप्रस्थ पधारे हैं"-यह सुनकर वहाँ की युवतियाँ उनके दर्शन के लिए
इतनी उत्सुक हो उठीं कि रात्रि में अपने-अपने पतियों के साथ विश्राम
करते हुए भी वे अपनी उत्कण्ठा को रोक न सकीं। उनकी वेशभूषा अस्त-
व्यस्त हो रही थी, केश खुले थे और यद्यपि उन्हें बहुत से घर के काम थे,
फिर भी वे सब कुछ छोड़कर तुरन्त श्रीकृष्ण को देखने राजमार्ग पर दौड़
पड़ीं।" यह प्रेम का औत्सुक्य है।
अपने ग्रन्थ स्तावली में श्रील रूप गोस्वामी ने श्रीमती राधारानी से
कृपा की याचना की है, जो श्रीकृष्ण के वेणुरव से मुग्ध होकर वृन्दावन-
वासियों से उनका पता पूछने लगीं। श्रीकृष्ण का पहले-पहले दर्शन करते
ही वे प्रेम और आनन्द से कुछ ऐसी परिपूर्ण हो गयीं कि कान को खुजलाने
लगीं। व्रजांगनाएँ एवं राधारानी चतुर वार्ता करने में बड़ी कुशला हैं, अतः
श्रीकृष्ण को आते हुए देखते ही वे परस्पर वार्ता करने लगीं। श्रीकृष्ण भी
कम लीलारस-विदग्ध नहीं हैं; वे उनके लिए पुष्प-चयन के व्याज से तुरन्त
वहाँ से हट कर पर्वत की कन्दरा में चले गए। गोपिकाओं और श्रीकृष्ण
की औत्सुक्यमयी प्रेम-क्रीड़ा का यह अन्यतम उदाहरण है।
कृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव [ २२१
उग्रता
जिस समय श्रीकृष्ण कालिया नाग से संघर्ष कर रहे थे तो कालिया
ने उनके पदारविन्द पर काट लिया। इससे गरुड़ जी को बड़ा रोष हुआ
और वे धीरे से कहने लगे, "श्रीकृष्ण इतने अप्रतिमप्रभाव हैं कि उनके
गर्जनमात्र से इस तुच्छ कालिया नाग की स्त्रियों के गर्भपात हो जाता है।
फिर भी इसने मेरे स्वामी का अपराध करने का दुस्साहस किया है। चाहूँ
तो इसे क्षण भर में निगल कर जाऊँ, परन्तु अपने स्वामी के क्रोध से
डरता हूँ।" यह श्रीकृष्ण के अपमान के कारण प्रेम में कुछ करने की
उत्सुकता है।
महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में शिशुपाल को श्रीकृष्ण की
अग्रपूजा का विरोध करते देखकर अर्जुन का अनुज नकुल बोल उठा, "जो
श्रीकृष्ण का पूजन सहन नहीं कर सकता, वह असुर मेरा शत्रु है। इसलिए
इसके मदोन्मत्त सिर पर टूट पड़ने के लिए यमदण्ड से भी भयंकर मेरा
बायाँ पैर मचल रहा है।" फिर नकुल शोक करते हुए बोला, "भगवान्
श्रीकृष्ण का सब प्रकार से मंगल हो। आश्चर्य है कि कुरुवंश के राजसिंहासन
पर अनैतिक रूप से अधिकार करने वाले निर्लज्ज कौरव अब कूटनीतिक
षड्यन्त्र के द्वारा श्रीकृष्ण की आलोचना कर रहे हैं। ओह ! यह असह्य
है।" यह भी श्रीकृष्ण के अपमान से उत्पन्न उत्सुकता है।
अमर्ष-परिणाम में अपशब्द जनक
'विदग्धमाधव' में राधारानी की नन्द कुटिला कृष्ण की निन्दा
करती हुई कहने लगी, हे कृष्ण ! तुम यहाँ खड़े हो और मेरे भाई की
नवविवाहिता वधु राधा भी यहाँ है। मैं तुम्हें अच्छी प्रकार से जानती हूँ,
तो फिर तुम्हारे भ्रमायमान नेत्रों से अपनी वधु को बचाने की व्याकुलता
मुझे क्यों नहीं होगी"? यह श्रीकृष्ण पर आक्षेप करने के लिए प्रयुक्त
अपमानजनक शब्द हैं।
इसी भाँति कतिपय गोपिकाएँ श्रीकृष्ण का अपमान करती हुई बोलीं,
"हे कृष्ण ! तुम चोरशिरोमणि हो, इसलिए शीघ्र यहाँ से भाग जाओ।
हम जानती हैं कि तुम हमसे अधिक चन्द्रावली को प्रेम करते हो। अतः
हमारे सामने उसका गुणगान करना व्यर्थ है। कृपया इस स्थान पर राधा-
रानी का नाम दूषित मत करो।" यह भी प्रेम में श्रीकृष्ण के लिए अपमान-
सूचक शब्दों का प्रयोग है।
२२२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
श्रीमद्भागवत (१०.३१.१६) में अन्य उल्लेख है। जब सारी गोपियाँ
रात्रि में उनसे मिलने वृन्दावन में आ गयीं तो श्रीकृष्ण उन्हें स्वीकार
करने के स्थान पर घर लौटने के लिए नीति का उपदेश करने लगे। इस
पर गोपियाँ कहने लगीं, “हे कृष्ण ! तुम्हारे अदर्शन हमारे लिए दुःखमय
हैं और तुम्हें देखने मात्र से ही अपार सुख प्राप्त हो जाता है। इसलिए
हम सब अपने पतियों, बन्धु-बांधवों, को छोड़कर बस तुम्हारे पास आयी
हैं, क्योंकि तुम्हारी वंशीध्वनि ने हमें मोह लिया है। हे अच्युत ! हमारे
आने का कारण यही है। हे कपटी ! तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा ऐसा कौन
होगा जो रात्रि में हम जैसी रमणियों का परित्याग कर दे ?” यह प्रेम
में श्रीकृष्ण की वंचना है।
असूया
पद्यावली में एक सखी राधारानी से कहती है, “हे सखी ! यह गर्व न
करो कि श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने हाथ से तुम्हारे ललाट का श्रृंगार किया
है। सम्भव है कि वे किसी अन्य सुन्दरी पर भी आकृष्ट हो जायें। तुम्हारा
ललाट नवमंजरी से शोभित है। अवश्य ही, श्रीकृष्ण में इसका चित्रण
करते हुए सात्विक भावों का उद्वेलन नहीं हुआ होगा, अथवा वे ऐसा न
कर पाते।” यह राधाजी के सौभाग्य से उत्पन्न असूया है।
श्रीमद्भागवत (१०.३०.३०) में कहा है, “रास के बाद राधाकृष्ण
का अन्वेषण करते हुए गोपियाँ आपस में कहने लगीं, ' वृन्दावन की भूमि
पर दीख रहे राधाकृष्ण के चरणचिह्नों से हमें अतिशय व्यथा हो रही है,
क्योंकि श्रीकृष्ण ही हमारे सर्वस्व हैं। परन्तु वह बाला इतनी चतुरा है कि
गोपियों से छीन कर अकेले में श्रीकृष्ण के अधरसुधा का पान कर रही
है।” यह भी श्रीराधा के सौभाग्य से असूया का उदाहरण है।
कदाचित् ग्वालबालों के साथ वृन्दावन में क्रीड़ा करते हुए श्रीकृष्ण
एक ओर हो जाते और बलरामजी दूसरी ओर। दोनों दलों में स्पर्धा
और खेल-खेल में लड़ाई होती और जब श्रीकृष्ण का दल बलराम से परास्त
हो जाता तो गोपबालक कहते, “यदि बलराम का दल ही सदा जीता करे
तो संसार में हमारे समान दुर्बल कौन होगा ?” यह प्रेम में असूया है।
चपलता
श्रीमद्भागवत (१०.५२.४१) में अपने पत्र में रुक्मिणी देवी श्रीकृष्ण
से कहती हैं, “हे अजित (कृष्ण) ! कल होने वाले विवाह के समय विदर्भ में
कृष्णप्रेम के अन्यान्य भाव [ २२३
गुप्त रूप से प्रविष्ट होकर तथा मगधराज के सम्पूर्ण सैन्यबल को नष्ट
करके मुझ को अपहरण करके राक्षस-विधि से विवाह कीजिए।”
वैदिक पद्धति के अनुसार विवाह आठ प्रकार के होते हैं, जिनमें
राक्षस-विवाह भी आता है। इसमें किसी कन्या का बलपूर्वक अपहरण कर
उससे विवाह किया जाता है। रुक्मिणी का विवाह उसके भाई की इच्छा
से शिशुपाल से होने जा रहा था; तभी उसने यह पत्र लिखकर श्रीकृष्ण से
अपना अपहरण करने का अनुरोध किया ।
एक गोपी बोली, “जिससे गुरुजनों के सामने भी हमारी सारी शील-
लज्जा खो जाती है, कृष्ण की वह मधुर और चपल वंशी यमुना की तरंगा-
वली में बहकर सागर में गिर जाय।”
निद्रा
प्रतिदिन सन्ध्या समय श्रीकृष्ण वन से गोचारण करके लौटते थे ।
कभी-कभी उनके आने की सूचिका वंशीध्वनि को न सुनने के कारण
चिन्ता के आक्रान्त हृदया यशोदा मैया को जड़ता आ घेरती थी । अतः
कृष्णप्रेम में चिन्ताजनित निद्रा का भी अनुभव हो सकता है।
श्रीकृष्ण का बन्धन करके मैया सोचने लगी, “कृष्ण के अतिशय
मृदु एवं कोमल अंग को बाँधने का काम मुझसे कैसे बन पड़ा ?” बस,
यह सोचते ही बुद्धि में द्वन्द्व के कारण उसे निद्रा आ गयी ।
गोपियों को उनके बड़े-बूढ़ों ने रात्रि में द्वार बन्द करके सोने को
कहा था, पर अपनी निश्चिन्तता में उन्होंने इसका अच्छी प्रकार से पालन
नहीं किया । श्रीकृष्ण के स्मरण में तन्मयता के कारण निर्भय हुई गोपियाँ
रात्रि में अपने घरों के प्रांगण में ही सुखपूर्वक सो जातीं । यह श्रीकृष्ण के
प्रति स्वाभाविक स्नेह से उत्पन्न प्रेम की निद्रा है।
यह जिज्ञासा हो सकती हैं कि कृष्णभक्तों को निद्रा क्यों होती है;
निद्रा तो साधारणतः तमोगुण का लक्षण माना जाता है। इसके समाधान
में श्रील जीव गोस्वामी लिखते हैं कि कृष्णभक्त माया के सभी गुणों
से सदा मुक्त रहते हैं, उनकी निद्रा प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं
होती । उसे तो भक्ति में समाधि माना जाता है । ‘गरुडपुराण’ में साक्षात्
श्रीभगवान् के आश्रय में स्थित योगियों के सम्बन्ध में प्रामाणिक वाक्य
है—“जाग्रत, निद्रा औ सुप्ति—चेतना की तीनों अवस्थाओं में भक्तजन
भगवान् के स्मरण में लीन रहते हैं। अतः वास्तव में वे सोते नहीं ।”
२२४] भक्तिरसामृतसिन्धु
स्वप्न
एकबार बलरामजी स्वप्न में कहने लगे, "हे कमलनयन (कृष्ण)!
आपकी बाललीला आपकी स्वेच्छा से ही प्रकट होती है। इसलिए अब
शीघ्र इस कालिय नाग के गर्व को दूर कर दीजिए।" बलरामजी को यह
कहते सुनकर यदुवंशी आश्चर्य से हँसने लगे। फिर दीर्घ श्वासों से पेट
को हिलाते हुए भगवान् हलधर प्रगाढ़ निद्रा में लौट गए। यह प्रेम में
स्वप्न का उदाहरण है।
बोध
किसी भक्त का उद्गार है, "तमोगुण को जीत कर मैं ज्ञानरूपी
दीपिका को प्राप्त हो गया हूँ और अब केवल परमानन्दकन्द श्रीभगवान्
को खोज रहा हूँ।" यह प्रेम में होने वाला बोध है। अविद्या को पूर्ण रूप
से विजय कर लेने पर ही दिव्य प्रबोध हो सकता है। उस अवस्था में शब्द,
स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि का संग होने पर भक्त भगवान् की दिव्य
सत्ता का ही अनुभव करता है। ऐसे में आँखों का खेलना, रोमांच, अधर
फड़कना, निद्राभंग आदि लक्षण दीर्घकाल तक विद्यमान रहते हैं।
जब राधारानी ने श्रीकृष्ण को सर्वप्रथम देखा तो उन्हें तुरन्त सम्पूर्ण
दिव्य सुख की अनुभूति हुई और शरीर के नाना अंग स्तम्भित हो गए।
जब ललिता सखी ने उनके कान में कृष्णनाम की ध्वनि की तो उनकी
आंखें खुल गईं। यह कृष्णनाम के श्रवण से उत्पन्न बोध है।
एक दिन हास-परिहास में श्रीकृष्ण ने राधारानी से कहा, "हे
प्रिये ! मैं तुम्हारा संग छोड़ने जा रहा हूँ।" यह कहते ही वे कहीं छिप गए।
इससे राधारानी को ऐसा दुःख हुआ कि शरीर पर विवर्णता छा गई और
वे वृन्दावन की भूमि पर गिर पड़ीं। वे श्वास-व्यापार से शून्यप्रायः हो गईं
थीं; परन्तु श्रीकृष्ण की बनमाला की सुगन्ध के पहुँचने पर भावोन्मत्त
हो कर फिर उठ बैठीं। यह गन्ध से उद्भूत दिव्य बोध का उदाहरण है।
श्रीकृष्ण को अपने अंग का स्पर्श करते देखकर कोई गोपी कहने
लगी, "हे सखि ! मेरा अंग-स्पर्श करता हुआ यह किसका मृदुल करकमल
है जो यमुना वन को देखकर हुई मेरी मूर्च्छा को हटाकर पुनः सुखमयी
मूर्च्छा ला रहा है ?" यह स्पर्शजनित बोध है।
कोई गोपी श्रीकृष्ण से बोली, "हे कृष्ण ! तुम्हारे रासमण्डल से
छिप जाने पर अविलम्ब हमारी प्राणप्रिया राधारानी भूमि पर गिर कर
अचेत हो गईं। किन्तु तुम्हारे चर्वित पान को जब मैंने उनके मुखारविन्द
कृष्णप्रेम के अनन्यान्य भाव [ २२५
में रखा तो वे पुलकितांग एवं सचेत हो गईं।" यह रस से उत्पन्न
बोध है।
एक रात श्रीमती राधारानी स्वप्न में बोल रही थीं, "हे कृष्ण !
मुझसे और अधिक परिहास मत करो। बस, बहुत हुआ। मेरे वस्त्रों को
भी मत छुओ। अन्यथा गुरुजनों को तुम्हारी चंचला की सारी कथा सुना
दूँगी। इस प्रकार स्वप्न में कहती हुई राधारानी तुरन्त उठ बैठीं और
सामने गुरुजनों को देखकर उनका मुख लज्जा से बिलकुल नीचे झुक गया।
यह निद्रा-भंग से हुए बोध का उदाहरण है।
एक अन्य उदाहरण भी है। श्रीकृष्ण की दूती जैसे ही उनके पास
पहुँची कि श्रीमती राधारानी निद्रा से जाग उठीं। इसी प्रकार रात्रि में
श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि को सुनकर गोपसुन्दरियाँ स्वप्न से तुरन्त उठ
बैठीं। इस सन्दर्भ में अतिशय सुन्दर उपमा है। "कमल कभी श्वेत हंसों
से घिरा होता है तो कभी श्याम भ्रमरों से, जो मधुसंचय करते हैं। आकाश
की गर्जना से हंस तो चले जाते हैं, पर श्याम भ्रमर कमल का रस लेने के
लिए मँडराते रहते हैं।" गोपियों की निद्रा श्वेत हंस जैसी है और श्रीकृष्ण
की वंशीध्वनि मानो श्याम भ्रमर के समान है। जब श्रीकृष्ण की वंशी बज
उठी तो गोपियों के निद्रारूपी श्वेत हंस भाग गए और वेणुरव रूपी श्याम
भ्रमर गोपीसौन्दर्य को भोगने लगा।
अध्याय ३१
अन्य व्यभिचारिभाव
प्रेम के पूर्वोक्त ३३ भाव व्यभिचारि कहलाते हैं। इन सभी में प्रगाढ़
कृष्णप्रेम प्रकट रहता है। उत्तम, मध्यम और अधम—इस प्रकार इनका
तीन कोटियों में विभाग किया जा सकता है। प्रेम में दूसरे-दूसरे भी बहुत
से व्यभिचारि होते हैं, जैसे मात्सर्य, उद्वेग, दम्भ, ईर्ष्या, विवेक, निर्णय,
क्लीवता, क्षमा, धैर्यहीनता, उत्कण्ठा, शोक, संशय, विनय, आश्चर्य, धृष्टता
आदि। ये सब भाव ३३ व्यभिचारिभावों में आ जाते हैं। श्रील रूप
गोस्वामी ने नाना प्रकार के व्यभिचारिभावों का अतिशय सुन्दर विश्लेषण
किया है।
किसी दूसरे के उत्कर्ष को देखकर मन में उठने वाली असूया को
'मात्सर्य' कहते हैं। आकाश में बिजली चमकते देखकर प्राप्त त्रास से
'उद्वेग' उत्पन्न होता है। इसलिए त्रास में उद्वेग का अन्तर्भाव समझना
चाहिए। अपने यथार्थ मनोभाव को छिपाना 'अवहित्था' कहलाता है।
अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करता 'दम्भ' कहलाता है; अतः दम्भ को अवहित्था
के अन्तर्गत माना जा सकता है। किसी दूसरे द्वारा किए अपराध को न
सहना 'अमर्ष' है और दूसरे के ऐश्वर्य के प्रति असहिष्णुता 'ईर्ष्या' है।
अतः ईर्ष्या अमर्ष में अन्तर्भूत हो जाती है। किसी शब्द का यथार्थ अर्थ
स्थापित करना 'निर्णय' कहलाता है। इसके लिये 'विवेक' अपेक्षित है। अतः
मति में दोनों विवेक और निर्णय का अन्तर्भाव है। अपने को अज्ञ बताना
दैन्य है और उत्साह का अभाव 'क्लीवता' कहलाता है। इसलिए दैन्य में
क्लीवता आ जाती है। मन की स्थिरता धृति कही जाती है; इसमें 'क्षमा'
का अन्तर्भाव है। 'आश्चर्य' और 'उत्कण्ठा' औत्सुक्य के भीतर आ जाते
हैं। किसी अपराध के लिए ग्लानि होने पर लज्जा आती है। इस प्रकार
'विनय' लज्जा में आ जाती है। 'संशय' वितर्क का ही एक रूप है।
'धृष्टता' के बाद चपलता का प्रदर्शन होता है, अतः धृष्टता चपलता में
आ जाती है।
अन्य व्यभिचारिभाव [ २२७
जब प्रेम में ये सभी भाव प्रकट रहते हैं तो उन्हें 'संचारिभाव' कहते
हैं। ये सब भाव दिव्य हैं और नाना परिस्थितियों में परस्पर अनुभाव
और विभाव के रूप में प्रकट होते हैं। इनके द्वारा ही प्रेमी-प्रियतम में प्रेम
का विनिमय होता है।
ईर्ष्या अथवा निन्दा के कारण विवर्णता होती है। इससे भी विभाव
माना जा सकता है। कभी-कभी सम्मोह, मूर्च्छा तथा तीव्र उद्वेग भी
विभाव माने जाते हैं। प्रेम में प्रकट इन नाना भावों को विविध वर्गों में
गिना जा सकता है।
श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि त्रास, निद्रा, श्रम, आलस्य, मदिरा
से उत्पन्न मद को कभी-कभी संचारिभाव कहा जाता है। इसका कारण
गाढ़ रति है।
वितर्क, मति, निर्वेद, धृति, स्मृति, हर्ष, बोध, दैन्य, स्वप्न भी प्रेम
के विभाव हैं। संचारिभाव परतन्त्र और स्वतन्त्र—दो प्रकार के कहे गए
हैं। परतन्त्र भी उत्तम और अधम भेद से दो प्रकार के हैं। श्रील रूप
गोस्वामी ने इनके भेद का निर्णय किया है, जिसे यथास्थान प्रस्तुत किया
जायगा।
एक भक्त कह उठा, "ओह ! जिसके नाम को सुनने से ही मेरा
शरीर और रोम-रोम नाच उठता है, उस मथुरामण्डल को न देख सकने के
कारण हाय मेरे नेत्र व्यर्थ ही हैं।" इस वाक्य से मथुरा-दर्शन की तीव्र
उत्कण्ठा प्रकट होती है, जिसका उदय गाढ़ कृष्णरति से होता है। भीम के
वचन में श्रीकृष्ण के लिए यह प्रगाढ़ रति व्यक्त है—"मेरे वज्रतुल्य बाहुओं
को धिक्कार है, जो माधव पर आक्षेप करने वाले इस दुष्ट शिशुपाल को
पीस नहीं डालते हैं।" यहाँ भीम के क्रोध से उत्पन्न निर्वेद श्रीकृष्ण में दृढ़
रति का कारण बना है।
जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण के उस विश्वरूप को देखा, जिसके कराल
दाँत ब्रह्माण्ड के अस्तित्व को ही समाप्त-प्रायः कर कहे थे, तो उसका मुख
सूख गया। उसे अपनी सुधी नहीं रही और न यह स्मरण रहा कि वह
श्रीकृष्ण का सखा है, यद्यपि वह सदा श्रीकृष्ण की कृपा पर ही आश्रित
था। यह अधम (अवर) परतन्त्रता का उदाहरण है।
कभी-कभी घोर क्रियाएँ भी कृष्णप्रेम का वर्धन करती हैं। प्रेम
में अनुभव होने वाला यह भय मोह के कारण होता है। श्रीमद्-
भागवत (१०.२३.४०) में याज्ञिक ब्राह्मणों ने कहा है "हमें जन्म से
तीन सुविधायें मिली थीं। सबसे पहले हमारा जन्म ब्राह्मण-कुल में
२२८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
हुआ; फिर हमारा यज्ञोपवीत-संस्कार हुआ और सद्गुरु से विधिवत्
दीक्षा भी प्राप्त हुई। परन्तु हाय ! इस सब के होते हुए भी हमें
धिक्कार है। हमारे ब्रह्मचर्यव्रत को भी धिक्कार है।'' इस प्रकार ब्राह्मण
स्वयं अपनी क्रियाओं को धिक्कारने लगे। उन्हें अनुभूति हुई कि जन्म,
विद्वत्ता और संस्कृति में निपुण होने पर भी वे माया-शक्ति के वश में
हो रहे थे। उन्होंने यह भी माना कि बड़े-बड़े योगी भी भगवान् की भक्ति
के अभाव में माया की आधीनता में ही पड़े रहते हैं। कर्मकाण्डी ब्राह्मणों
का यह निर्वेदभाव कृष्णरति से शून्य है। इसके अतिरिक्त निर्वेद का एक
रत्यनुस्पर्शी व्याभिचारिभाव भी है, जिसमें श्रीकृष्णरति रहती है ।
अरिष्टासुर का आक्रमण होने पर गोपांगनाएँ पुकार उठीं—"हे कृष्ण !
बचाओ ! हमें बचाओ ।'' निर्वेद के इस भाव में कृष्णरति है।
श्रीकृष्ण के हाथों केशी दैत्य का वध हुआ जानकर कंस में निर्वेद
जाग उठा। वह कहने लगा—"रणविद्या को न जानने वाले इस·अशिक्षित
और असभ्य अभीर के बालक ने मेरे प्राणप्रिय केशी दैत्य को मार डाला
है। इसलिए अब राजा इन्द्र को भी जीत लेने वाले मुझ कंस का जीना
निरर्थक है।'' इस निर्वेद के भाव में कृष्ण-विषयक रति की गन्ध अभिव्यक्त
होती है, इसलिये यह रतिगन्धी व्यभिचारिभाव माना जाता है।
एक बार अक्रूर को डाँटते हुए कंस बोला—"अरे मूर्ख ! कालिय
जैसे निर्विष सर्प को हराना कौन बड़ी बात है जो तू उस गोप-बालक को
आदिदेव जगदीश बता रहा है। उसने गोवर्धन जैसे ढेले को उठा लिया
तो क्या ? इससे कहीं अधिक आश्चर्य तो इस बात का है कि तू उसे
भगवान् कहता है।" यह कृष्णप्रेम के निर्वेदभाव से होने वाली असूया
जनित विपथा-वृत्ति है ।
कदम्ब का कोई वृक्ष विलाप कर रहा था कि, "जिसकी छाया तक
को श्रीकृष्ण ने स्पर्श नहीं किया, ऐसे मेरे जन्म को धिक्कार है।" भक्त
उसे सान्त्वना देता हुआ कह रहा है—"हे कदम्ब ! तुम शोक न करो !
कालिय-मर्दन करते ही श्रीकृष्ण यहाँ आकर तुम्हारी अभिलाषा को पूरा
करेंगे।"
विष्णुवाहन गरुड़जी एक समय कह रहे थे—"मुझ जैसा परमपवित्र,
कुशल और निपुण दूसरा और कौन होगा ? वे मुझे प्रिय न समझें, मेरे
संग में न आना चाहें, पर फिर भी मेरे पंखों का उपयोग तो वे करेंगे
ही।'' यह प्रेम के शान्तभाव में निर्वेद का उदाहरण है।
अन्य व्यभिचारभाव [ २२६
भाव के लक्षणों के कभी-कभी उत्पत्ति, सन्धि, शबलता और शान्ति
रूप चार वर्ग किए जाते हैं।
एक दिन श्रीकृष्ण श्रीमती राधारानी से कहने लगे, "जब तुमने
प्रातः एकान्त में मुझसे मिलने की चेष्टा की तो तुम्हारी सखी मेखला
ईर्ष्यावश भूखी ही रही। उसे देखो तो।" श्रीकृष्ण के इस परिहास को
सुनकर राधारानी अपनी भौंहों को टेढ़ा घुमाने लगीं। रूप गोस्वामी की
प्रार्थना है कि राधारानी के इस भ्रू-नर्तन से सब का कल्याण हो। इस भाव
में असूया के उदय का उदाहरण है।
एक रात पूतना के मृत शरीर पर बालकृष्ण को खेलता देखकर माँ
यशोदा कुछ समय के लिये निश्चलदेह रह गई। यह दो भावों की सन्धि
का उदाहरण है। ऐसी सन्धि इष्ट-अनिष्ट—दोनों में से कोई भी हो सकती
है। पूतना का मरना इष्ट था; परन्तु आधी रात में अकेले बालकृष्ण का
उसके वक्ष पर खेलना अनिष्ट की आशंका को जन्म दे रहा था। इस
प्रकार यशोदा इष्ट और अनिष्ट के बीच पकड़ी गयीं।
जब कृष्ण ने चलना सिखा ही था कि वे बार-बार घर के बाहर
जाते और फिर अन्दर आते। इस पर यशोदा ने आश्चर्य से कहा; यह
बालक बहुत ही चंचल है और किसी से भी नहीं डरता। बार-बार
वृन्दावन के अड़ौस-पड़ोस में जाता है और फिर वापस घर में लौट आता
है। यह बिल्कुल निडर है, परन्तु फिर भी मुझे भय लगता है कि यह कहीं
किसी संकट में न पड़ जाये। यह एक ही कारण से उत्पन्न दो परस्पर
भिन्न व्यभिचारिभावों की सन्धि का उदाहरण है। बालक अत्यन्त निडर
था; परन्तु फिर भी यशोदा को संकट का भय लग रहा था। इसमें हर्ष
और शंका दो अलग-अलग हेतु हैं। भाव यह है कि बालक को बार-बार
अन्दर बाहर आता देखकर यशोदा को हर्ष भी हो रहा था और भय की
शंका भी हृदय में उठ रही थी।
जब देवकी ने अपने पुत्र कृष्ण के प्रसन्नवदन को कंस की रंगशाला
में पहलवानों के सम्मुख देखा, तो उसके नेत्रों से ठंडे और गरम दोनों प्रकार
के आँसू एक साथ विगलित होने लगे। यह दो अलग कारणों से उत्पन्न
हर्ष और शोक की सन्धि है।
एक समय जब श्रीमती राधारानी वृन्दावन में यमुना के तीर पर
खड़ी थीं तो श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने परिरंभम में पकड़ लिया। श्रीकृष्ण ने
ऐसा बलपूर्वक किया था। यद्यपि राधारानी ने इसके लिये बाहर अप्रसन्नता
व्यक्त की; परन्तु अपने अन्तर में वे मुस्करा रही थीं और उन्हें अतिशय
२३० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
तृप्ति का अनुभव हो रहा था। फिर भी उन्होंने बाहरी रूप से अपनी भौंहों
को टेढ़े करते हुये ऐसा दिखाया मानो श्रीकृष्ण को त्याग रही हों। ऐसी
मनोदशा में वृषभानुनन्दिनी राधारानी का सौन्दर्य खिल उठा और रूप-
गोस्वामी ने उसकी जय-जयकार की। इसमें भी नाना भावों की सन्धि है;
पर केवल एक कारण हैं--श्रीकृष्ण।
कभी-कभी नन्दमहाराज के आवास में बड़े-बड़े महोत्सवों का
आयोजन होता, जिनमें सारे वृन्दावनवासी सम्मिलित होते। ऐसे ही एक
अवसर पर राधारानी को वह स्वर्ग का हार पहने देखा गया जो उन्हें
श्रीकृष्ण ने उपहार में दिया था। माता यशोदा और राधारानी की माता
ने भी यह बात तुरन्त जान ली, क्योंकि वह हार राधारानी के कंठ के लिये
बहुत लम्बा था। इसके अतिरिक्त उस समय राधारानी को अपने समीप
श्रीकृष्ण दिख रहे थे और अपना पति अभिमन्यु भी दृष्टिगोचर था। एक
साथ इन सब कारणों से राधारानी को बड़ी लज्जा हुई और उनका
मुखमण्डल परिम्लान हो चला। ऐसी अवस्था में वे बड़ी सुन्दर लग रही
थीं। यहाँ लज्जा, अमर्ष, हर्ष और विषाद की सन्धि है। इस प्रकार यह
अनेक हेतुओं से उत्पन्न अनेक भावों की सन्धि का उदाहरण है।
कंस कह रहा था, 'अरे यह अभीर का लड़का मेरा क्या कर सकता
है?' दूसरे क्षण जब उसे सूचित किया गया कि उसके सारे असुर मित्र
उस बालक द्वारा मार दिये गये हैं, तो कंस चिंतित होकर विचारने लगा,
“तो फिर जाकर जल्दी से उसकी शरण स्वीकार कर लूं।" तभी उसे
विचार हुआ, "मैं उससे क्यों डरूँ। मेरी सहायता के लिये अभी बहुत
पहलवान बचे हुये हैं।" और फिर दूसरे क्षण वह सोचने लगा, "यह बालक
निश्चित रूप से सामान्य नही है, क्योंकि उसने गोवर्धन पर्वत को अपने
उल्टे हाथ से उठा लिया था। अतएव इस सम्बन्ध में मुझे क्या करना
चाहिये। अच्छा तो मैं स्वयं आज ही वृन्दावन में जाकर वहाँ के निवासियों
का नाश कर डालूँ। परन्तु मैं बाहर भी नहीं जा पाता, मेरा हृदय इस
बालक के भय से काँप रहा है।" कंस की इस मनोदशा में गर्व, विषाद,
दैन्य, मति, स्मृति, शंका, अमर्ष और त्रास-इन आठ भावों की सबलता
पाई जाती है। वास्तव में कंस की मनोदशा इन आठों भावों से तूर्ण थी।
एक गृहस्थ भक्त ने कहा है, "हे नाथ मैं इतना अधम हूँ, इतना
मन्दभाग्य हूँ कि यह दोनों आँखें कीर्तिमयी मथुरा नगरी को देखने की
इच्छा कभी नहीं करतीं। इसलिये मेरी इन आंखों को धिक्कार है। मैं
बहुत विद्वान् माना जाता हूँ, परन्तु मेरी सारी विद्वत्ता का उपयोग केवल