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सर्वकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 380 में से

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पृष्ठ 249

२२२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
श्रीमद्भागवत (१०.३१.१६) में अन्य उल्लेख है। जब सारी गोपियाँ
रात्रि में उनसे मिलने वृन्दावन में आ गयीं तो श्रीकृष्ण उन्हें स्वीकार
करने के स्थान पर घर लौटने के लिए नीति का उपदेश करने लगे। इस
पर गोपियाँ कहने लगीं, “हे कृष्ण ! तुम्हारे अदर्शन हमारे लिए दुःखमय
हैं और तुम्हें देखने मात्र से ही अपार सुख प्राप्त हो जाता है। इसलिए
हम सब अपने पतियों, बन्धु-बांधवों, को छोड़कर बस तुम्हारे पास आयी
हैं, क्योंकि तुम्हारी वंशीध्वनि ने हमें मोह लिया है। हे अच्युत ! हमारे
आने का कारण यही है। हे कपटी ! तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा ऐसा कौन
होगा जो रात्रि में हम जैसी रमणियों का परित्याग कर दे ?” यह प्रेम
में श्रीकृष्ण की वंचना है।
असूया
पद्यावली में एक सखी राधारानी से कहती है, “हे सखी ! यह गर्व न
करो कि श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने हाथ से तुम्हारे ललाट का श्रृंगार किया
है। सम्भव है कि वे किसी अन्य सुन्दरी पर भी आकृष्ट हो जायें। तुम्हारा
ललाट नवमंजरी से शोभित है। अवश्य ही, श्रीकृष्ण में इसका चित्रण
करते हुए सात्विक भावों का उद्वेलन नहीं हुआ होगा, अथवा वे ऐसा न
कर पाते।” यह राधाजी के सौभाग्य से उत्पन्न असूया है।
श्रीमद्भागवत (१०.३०.३०) में कहा है, “रास के बाद राधाकृष्ण
का अन्वेषण करते हुए गोपियाँ आपस में कहने लगीं, ' वृन्दावन की भूमि
पर दीख रहे राधाकृष्ण के चरणचिह्नों से हमें अतिशय व्यथा हो रही है,
क्योंकि श्रीकृष्ण ही हमारे सर्वस्व हैं। परन्तु वह बाला इतनी चतुरा है कि
गोपियों से छीन कर अकेले में श्रीकृष्ण के अधरसुधा का पान कर रही
है।” यह भी श्रीराधा के सौभाग्य से असूया का उदाहरण है।
कदाचित् ग्वालबालों के साथ वृन्दावन में क्रीड़ा करते हुए श्रीकृष्ण
एक ओर हो जाते और बलरामजी दूसरी ओर। दोनों दलों में स्पर्धा
और खेल-खेल में लड़ाई होती और जब श्रीकृष्ण का दल बलराम से परास्त
हो जाता तो गोपबालक कहते, “यदि बलराम का दल ही सदा जीता करे
तो संसार में हमारे समान दुर्बल कौन होगा ?” यह प्रेम में असूया है।
चपलता
श्रीमद्भागवत (१०.५२.४१) में अपने पत्र में रुक्मिणी देवी श्रीकृष्ण
से कहती हैं, “हे अजित (कृष्ण) ! कल होने वाले विवाह के समय विदर्भ में