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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 257, कुल 380 में से

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पृष्ठ 257

२३० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
तृप्ति का अनुभव हो रहा था। फिर भी उन्होंने बाहरी रूप से अपनी भौंहों
को टेढ़े करते हुये ऐसा दिखाया मानो श्रीकृष्ण को त्याग रही हों। ऐसी
मनोदशा में वृषभानुनन्दिनी राधारानी का सौन्दर्य खिल उठा और रूप-
गोस्वामी ने उसकी जय-जयकार की। इसमें भी नाना भावों की सन्धि है;
पर केवल एक कारण हैं--श्रीकृष्ण।
कभी-कभी नन्दमहाराज के आवास में बड़े-बड़े महोत्सवों का
आयोजन होता, जिनमें सारे वृन्दावनवासी सम्मिलित होते। ऐसे ही एक
अवसर पर राधारानी को वह स्वर्ग का हार पहने देखा गया जो उन्हें
श्रीकृष्ण ने उपहार में दिया था। माता यशोदा और राधारानी की माता
ने भी यह बात तुरन्त जान ली, क्योंकि वह हार राधारानी के कंठ के लिये
बहुत लम्बा था। इसके अतिरिक्त उस समय राधारानी को अपने समीप
श्रीकृष्ण दिख रहे थे और अपना पति अभिमन्यु भी दृष्टिगोचर था। एक
साथ इन सब कारणों से राधारानी को बड़ी लज्जा हुई और उनका
मुखमण्डल परिम्लान हो चला। ऐसी अवस्था में वे बड़ी सुन्दर लग रही
थीं। यहाँ लज्जा, अमर्ष, हर्ष और विषाद की सन्धि है। इस प्रकार यह
अनेक हेतुओं से उत्पन्न अनेक भावों की सन्धि का उदाहरण है।
कंस कह रहा था, 'अरे यह अभीर का लड़का मेरा क्या कर सकता
है?' दूसरे क्षण जब उसे सूचित किया गया कि उसके सारे असुर मित्र
उस बालक द्वारा मार दिये गये हैं, तो कंस चिंतित होकर विचारने लगा,
“तो फिर जाकर जल्दी से उसकी शरण स्वीकार कर लूं।" तभी उसे
विचार हुआ, "मैं उससे क्यों डरूँ। मेरी सहायता के लिये अभी बहुत
पहलवान बचे हुये हैं।" और फिर दूसरे क्षण वह सोचने लगा, "यह बालक
निश्चित रूप से सामान्य नही है, क्योंकि उसने गोवर्धन पर्वत को अपने
उल्टे हाथ से उठा लिया था। अतएव इस सम्बन्ध में मुझे क्या करना
चाहिये। अच्छा तो मैं स्वयं आज ही वृन्दावन में जाकर वहाँ के निवासियों
का नाश कर डालूँ। परन्तु मैं बाहर भी नहीं जा पाता, मेरा हृदय इस
बालक के भय से काँप रहा है।" कंस की इस मनोदशा में गर्व, विषाद,
दैन्य, मति, स्मृति, शंका, अमर्ष और त्रास-इन आठ भावों की सबलता
पाई जाती है। वास्तव में कंस की मनोदशा इन आठों भावों से तूर्ण थी।
एक गृहस्थ भक्त ने कहा है, "हे नाथ मैं इतना अधम हूँ, इतना
मन्दभाग्य हूँ कि यह दोनों आँखें कीर्तिमयी मथुरा नगरी को देखने की
इच्छा कभी नहीं करतीं। इसलिये मेरी इन आंखों को धिक्कार है। मैं
बहुत विद्वान् माना जाता हूँ, परन्तु मेरी सारी विद्वत्ता का उपयोग केवल