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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 380 में से

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पृष्ठ 241

२१४] भक्तिरसामृतसिन्धु
इस सन्दर्भ में मथुरा में मरने वाले व्यक्तियों के सम्बन्ध में उल्लेख
है, "मन्द श्वास के साथ, पूरी खुली हुई आँखों वाले और शरीर में नए
प्रकार की विवर्णता को धारण किए हुए इन सौभाग्यशाली पुरुषों ने कृष्ण-
नाम का उच्चारण करते हुए देह-त्याग किया।" ये लक्षण मृत्यु से पूर्व
के हैं।
आलस्य
तृप्ति अथवा परिश्रम में अरुचि के कारण जब शक्ति रहते भी
कर्तव्य-पालन नहीं किया जाता तो उसे आलस्य कहते हैं। यह आलस्य भी
कृष्णप्रेम में अभिव्यक्त होता है। उदाहरणार्थ, नन्द महाराज ने कतिपय
ब्राह्मणों से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने के लिए निवेदन किया। इस
पर उन्होंने उत्तर दिया कि उनकी रुचि आशीर्वाद देने में ही है। यह
आत्मतृप्ति के लिए प्रयुक्त आलस्य का उदाहरण है।
एक समय जब श्रीकृष्ण अपने ग्वाल सखाओं के साथ खेल-खेल में लड़
रहे थे तो सुबल ने थकावट व्यक्त की। श्रीकृष्ण तुरन्त अपने सखाओं से
कहने लगे, "सुबल मुझसे लड़कर बहुत थक गया है, इसलिए युद्ध के लिए
फिर बुलाकर उसे व्यथित मत करो।" यह श्रम की अरुचि से उत्पन्न
आलस्य है।
जड़ता
श्रीमद्भागवत (१०.२१.१३) में गोपिकाओं ने वृन्दावन की गौओं
की जड़ता को धन्य-धन्य कहा है। उन्होंने देखा कि गाएँ नीलमणि श्रीकृष्ण
के मुख से निस्यन्दित वेणु के गीतामृत का श्रवणपुटों से पान कर रही हैं।
गोवत्स भी दूध-पीने की सुध भूल कर आँखों में आँसू लिए उस वंशीध्वनि
के द्वारा हृदय में कृष्ण के स्पर्श-सुख का अनुभव करते स्तब्ध खड़े रह गए।
यह श्रीकृष्ण के दिव्य वंशीनाद के श्रवण से उत्पन्न जड़ता है।
श्रीकृष्ण के विरुद्ध वचन सुनकर लक्ष्मणा व्याकुल हो उठी और
निर्निमेष नयन से चुपचाप खड़ी रही।
श्रीमद्भागवत (१०.७१.३६) में वर्णन है कि जिस समय राजा
युधिष्ठिर ने अपने महल में भगवान् श्रीकृष्ण का परम आदर सहित
स्वागत किया, उस समय उन्हें इतना हर्ष हुआ कि शरीर की सुध भी नहीं
रही और पूजा करने की विधि का भी ध्यान नहीं रहा। यह श्रीकृष्ण के
दर्शनों के हर्ष से उत्पन्न जड़ता का उदाहरण है।