भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
प्रारंभिक ऐतिहासिक शोध: भगत सिंह का वैचारिक विकास एवं नौजवान भारत सभा
भगतसिंह
और उनके साथियों के
सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
अपने देश और पूरी दुनिया के क्रान्तिकारी साहित्य की
ऐतिहासिक विरासत को प्रस्तुत करने के क्रम में भगतसिंह और उनके
साथियों के महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों को हमने बड़े पैमाने पर जागरूक
नागरिकों और प्रगतिगामी युवाओं तक पहुँचाया है और इसी सोच के
तहत, अब भगतसिंह और उनके साथियों के अब तक उपलब्ध सभी
दस्तावेज़ों को पहली बार एक साथ प्रकाशित कर रहे हैं।
इक्कीसवीं शताब्दी में भगतसिंह को याद करना और उनके
विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का उपक्रम एक विस्मृत
क्रान्तिकारी परम्परा का पुनःस्मरण मात्र ही नहीं है। भगतसिंह का
चिन्तन परम्परा और परिवर्तन के द्वन्द्व का जीवन्त रूप है और आज,
जब नयी क्रान्तिकारी शक्तियों को एक बार फिर संगठित होकर
साम्राज्यवाद और देशी पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष की दिशा और मार्ग
का सन्धान करना है, जब एक बार फिर नयी समाजवादी क्रान्ति की
रणनीति और आम रणकौशल विकसित करने का कार्यभार हमारे
सामने है तो भगतसिंह की विचार-प्रक्रिया और उसके निष्कर्षों से हमें
कुछ बहुमूल्य चीजें सीखने को मिलेंगी।
परम्परा कभी भी उँगली पकड़कर भविष्य तक नहीं पहुँचाती।
वह एक दिशा देती है, बशर्ते कि हम आलोचनात्मक विवेक के साथ
इतिहास का अध्ययन करें और अपनी परम्परा की पहचान करें। हम
यह नहीं कहते कि भगतसिंह द्वारा सुझाया गया क्रान्ति का रास्ता
आज हमारे लिए पूरी तरह से प्रासंगिक है। तब से अब तक देश के
उत्पादन-सम्बन्धों, सामाजिक-आर्थिक संरचना, राज्यसत्ता के चरित्र
एवं कार्यप्रणाली तथा साम्राज्यवाद के चरित्र एवं कार्यप्रणाली में
महत्वपूर्ण बदलाव आये हैं, लेकिन आज की क्रान्ति के युवा हरावलों
के लिए भी भगतसिंह के चिन्तन के कुछ पक्ष नितान्त प्रासंगिक हैं।
इन्हें यदि सूत्रवत् बताना हो तो इस रूप में गिनाया जा सकता है :
(1) भगतसिंह और उनके साथियों की निरन्तर विकासमान
भौतिकवादी जीवनदृष्टि और द्वन्द्वात्मक विश्लेषण पद्धति
(2) साम्राज्यवाद के विरुद्ध जारी विश्व-ऐतिहासिक युद्ध के प्रति
उनका नज़रिया (3) राष्ट्रीय मुक्ति युद्ध को साम्राज्यवादी
विश्व-व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष का अंग मानने तथा समाजवादी
क्रान्ति की पूर्ववर्ती मंज़िल मानने का उनका नज़रिया (4) कांग्रेस
और गाँधी के वर्ग चरित्र का द्वन्द्वात्मक मूल्यांकन और कांग्रेसी नेतृत्व
वाली राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्य धारा की तार्किक परिणति का
प्रतिभाशाली पूर्वानुमान (5) क्रान्तिकारी आतंकवाद के विश्लेषण के
बाद उससे आगे बढ़कर क्रान्तिकारी जनदिशा पर बल देना,
मज़दूरों-किसानों को क्रान्ति की मुख्य शक्ति मानते हुए उन्हें संगठित
करने पर बल देना तथा सर्वहारा क्रान्ति को अपरिहार्य बताना (6)
एक क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी की लेनिनवादी अवधारणा को
स्वीकारना और उसके निर्माण को ज़रूरी बताना (7)
धार्मिक-जातिगत-भाषाई कट्टरता का विरोध करना, आदि।
इन विचारों से देश की व्यापक जनता को, विशेषकर उन करोड़ों
जागरूक, विद्रोही, सम्भावनासम्पन्न युवाओं को परिचित कराना
आवश्यक है जिनके कन्धों पर भविष्य-निर्माण का कठिन ऐतिहासिक
दायित्व है। इसी उद्देश्य से भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण
उपलब्ध दस्तावेज़ों का यह संकलन प्रस्तुत है।
आयरिश क्रान्तिकारी डान ब्रीन की पुस्तक के भगतसिंह द्वारा किये
गये अनुवाद और उनकी जेल नोटबुक के साथ ही, भगतसिंह और उनके
साथियों के सभी उपलब्ध दस्तावेज़ों को हम पहली बार एक साथ
प्रकाशित कर रहे हैं। पुस्तक के पहले खण्ड में भगतसिंह और उनके
साथियों के सभी उपलब्ध पत्रों-दस्तावेज़ों को विषयानुसार और
कालक्रमानुसार दस उपखण्डों में बाँटकर प्रस्तुत किया गया है। इस
खण्ड के अन्त में ग्यारह परिशिष्टों में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन
एसोसिएशन के वैचारिक विकास को सही पृष्ठभूमि में समझने के लिए
उसके पूर्ववर्ती संगठन हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के दो
दस्तावेज़ और उसके शीर्ष नेताओं के कुछ पत्रों को भी शामिल किया
है। इनके अतिरिक्त इन परिशिष्टों में गदर पार्टी के क्रान्तिकारी नेता व
सिद्धान्तकार लाला हरदयाल का लेख 'वर्ग रुचि का आन्दोलनों पर
असर' भी शामिल किया गया है जो सितम्बर 1928 में 'किरती' में 'एक
निर्वासित, एम.ए.' के नाम से प्रकाशित हुआ था।
अभी भी यह नहीं कहा जा सकता कि भगतसिंह और उनके
साथियों का सम्पूर्ण कृतित्व प्रकाश में आ चुका है। घर से भागकर
कानपुर आने और पत्रकार के रूप में 'प्रताप' में काम करने के समय से
लेकर जेल जाने के समय तक 'प्रताप' (कानपुर), 'महारथी' (दिल्ली),
'चाँद' (इलाहाबाद), 'अर्जुन' (दिल्ली) और 'मतवाला' आदि कई हिन्दी
पत्रिकाओं में भगतसिंह कई छद्म नामों से लिखा करते थे। 'किरती' में
वह 'विद्रोही' उपनाम से पंजाबी में लिखते थे और कई सम्पादकीय भी
मुख्यतः उन्होंने ही लिखे थे। उर्दू में भी वह अच्छा लिखते थे। इनमें से
जो कुछ भी अब तक ढूँढ़ा जा सका है, उसके अतिरिक्त भी काफी कुछ
बचे होने की सम्भावना है क्योंकि हिन्दी, उर्दू, पंजाबी पत्रिकाओं का
इतिहास-लेखन के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने की दिशा में अभी भी
न के बराबर काम हुआ है, राष्ट्रीय अभिलेखागार के प्रतिबन्धित साहित्य
के प्रभाग और सरकारी दस्तावेज़ों को भी व्यवस्थित ढंग से खंगालने का
काम अभी पूरा नहीं हो सका है। ब्रिटिश अभिलेखागार और इण्डिया
ऑफिस लाइब्रेरी तथा पाकिस्तान के अभिलेखागार को भी अभी पूरी
तरह से छाना नहीं गया है।
'मैं नास्तिक क्यों' जैसे कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों और जेल नोटबुक
का जिस तरह आठवें-नवें दशक में पता चला, उसे देखते हुए, अभी भी
कुछ सामग्री यहाँ-वहाँ पड़ी होगी, यह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं।
इसीलिए इस संकलन को हमने 'सम्पूर्ण दस्तावेज़' के बजाय 'सम्पूर्ण
उपलब्ध दस्तावेज़' नाम दिया है।
भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन की
ये अनमोल धरोहर आप तक इन
तीन उपक्रमों के सहयोग से पहुँचाई गई है
- राहुल फाउण्डेशन (प्रकाशक)
- नौजवान भारत सभा
(सभी दस्तावेजों का ऑनलाइन कनवर्जन व वेबस्पेस)
3 - https://www.facebook.com/unitingworkingclass/
(ऑनलाइन वितरण व प्रचार-प्रसार)
पहले तीन पन्नों
में इन तीनों
उपक्रमों का एक
संक्षिप्त परिचय
दिया गया है
भगतसिंह
और उनके साथियों के
सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
बेहतर ज़िन्दगी का रास्ता
बेहतर किताबों से होकर जाता है
राहुल फाउण्डेशन ने भगतसिंह के सम्पूर्ण
उपलब्ध दस्तावेज प्रकाशित किये हैं। इसके
साथ-साथ बेहद कम दामों पर अन्य
क्रान्तिकारी साहित्य भी राहुल फाउण्डेशन ने
प्रकाशित किया है। जनचेतना प्रतिष्ठान राहुल
फाउण्डेशन की पुस्तकों के वितरक हैं।
क्रान्तिकारी साहित्य पाने के लिए सम्पर्क :
वेबसाइट http://janchetnabooks.org
फेसबुक पेज www.fb.com/janchetnabooks
अमेजन लिंक https://goo.gl/7kFYux
जनचेतना
एक सांस्कृतिक मुहिम
एक वैचारिक प्रोजेक्ट
वैकल्पिक मीडिया का एक मॉडल
नौजवान
भारत
सभा
नौजवान भारत सभा का नाम अपने आप में एक महान क्रान्तिकारी
विरासत को पुनर्जागृत करने और आगे बढ़ाने के संकल्प का प्रतीक है। महान
युवा विचारक क्रान्तिकारी भगतसिंह ने औपनिवेशिक गुलामी के विरुद्ध भारत
के क्रान्तिकारी आन्दोलन को नया वैचारिक आधार देने और नये सिरे से संगठित
करने के लिए अपने साथियों के साथ मिलकर 1926 में नौजवान भारत सभा
के झण्डे तले नवयुवकों को संगठित करना शुरू किया था। भगतसिंह और
उनके साथियों की महान क्रान्तिकारी विरासत से प्रेरणा और शिक्षा लेते हुए हम
एक बार फिर नौजवान भारत सभा के ही परचम तले सभी प्रगतिशील और
बहादुर युवा स्त्रियों और पुरुषों को संगठित करते हुए एक नयी शुरुआत का
संकल्प लेते हैं। इस नौजवान संगठन को एक नयी क्रान्ति के युवा सिपाहियों
की भरती और शिक्षण-प्रशिक्षण का केन्द्र बनाना हमारा सर्वोपरि उद्देश्य है।
अगर आप भी भगतसिंह के सपनों को साकार करना चाहते हैं तो नौजवान
भारत सभा के सदस्य बनें और भगतसिंह की विरासत के सच्चे वारिस बनें।
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[समाचार पत्र शीर्षक]: मजदूर बिगुल
भगतसिंह और उनके साथियों के
सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
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भगतसिंह और
उनके साथियों के
सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सम्पादक
सत्यम
राहुल फ़ाउण्डेशन
लखनऊ
ISBN 978-81-87728-95-5
मूल्य : रु. 350.00
पहला संस्करण : जनवरी, 2006
दूसरा संस्करण (परिवर्द्धित एवं संशोधित) : जनवरी, 2008
पहला पुनर्मुद्रण : जनवरी, 2010
दूसरा पुनर्मुद्रण : जनवरी, 2014
तीसरा पुनर्मुद्रण : दिसम्बर, 2017
प्रकाशक : राहुल फ़ाउण्डेशन
69, बाबा का पुरवा, पेपरमिल रोड, निशातगंज,
लखनऊ-226 006 द्वारा प्रकाशित
आवरण : रामबाबू
टाइपसेटिंग : कम्प्यूटर प्रभाग, राहुल फ़ाउण्डेशन
मुद्रक : परमात्मा ऑटो प्रिंटिंग प्रेस, लखनऊ
मुख्य वितरक : जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ 226020
फ़ोन : 0522-4108495 ईमेल : [email protected]
वेबसाइट : janchetnabooks.org
Bhagat Singh aur Unke Sathiyon ke Sampoorna Uplabdha
Dastavez
अनुक्रम
दूसरे संस्करण की भूमिका 11
पहले संस्करण की भूमिका / भगतसिंह की वैचारिक विरासत
और हमारा समय 13
प्रस्तावना / क्रान्तिकारी आन्दोलन का वैचारिक विकास – शिव वर्मा 33
खण्ड एक / दस्तावेज़ और पत्र
यह जीवन देश को समर्पित : भगतसिंह के छह शुरुआती पत्र
दादा जी के नाम एक पत्र / 22 जुलाई, 1918 73
दादा जी के नाम एक और पत्र / 27 जुलाई, 1919 74
दादा जी के नाम एक और पत्र / 14 नवम्बर, 1921 75
गुरुमुखी में लिखा पहला पत्र : चाची के नाम / 15 नवम्बर, 1921 76
चाची के नाम एक और पत्र / 24 अक्टूबर, 1921 77
घर को अलविदा : पिता जी के नाम पत्र / 1923 78
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव
पंजाब की भाषा और लिपि की समस्या / 1924 81
विश्वप्रेम / 1924 90
युवक! / 1925 95
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन
होली के दिन रक्त के छींटे / 15 मार्च, 1926 101
काकोरी के वीरों से परिचय / मई, 1927 107
काकोरी के शहीदों की फाँसी के हालात / जनवरी, 1928 113
काकोरी के शहीदों के लिए प्रेम के आँसू / जनवरी, 1928 119
शहीदों के जीवन-चरित्र
सूफ़ी अम्बा प्रसाद / फ़रवरी, 1928 123
श्री बलवन्त सिंह / फ़रवरी, 1928 127
डॉक्टर मथुरा सिंह / फ़रवरी, 1928 134
शहीद कर्तार सिंह सराभा / फ़रवरी, 1928 138
कूका विद्रोह : एक / फ़रवरी, 1928 144
कूका विद्रोह : दो / अक्टूबर, 1928 156
सम्पादक 'महारथी' के नाम पत्र / 27 फ़रवरी, 1928 162
चित्र-परिचय / मार्च, 1928 163
श्री मदनलाल ढींगरा / मार्च, 1928 164
दस मई का शुभ दिन / अप्रैल, 1928 171
भाई बालमुकुन्द / 1928 176
दिल्ली केस के शहीद
मास्टर अमीरचन्द / सितम्बर, 1928 180
मि. अवधबिहारी / सितम्बर, 1928 182
श्री बसन्तकुमार बिस्वास / सितम्बर, 1928 183
शहीद खुशीराम! / अक्टूबर, 1928 185
स्वाधीनता के आन्दोलन में पंजाब का पहला उभार / 1930 187
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन
अराजकतावाद : एक / मई, 1928 199
अराजकतावाद : दो / जून, 1928 204
अराजकतावाद : तीन / जुलाई, 1928 208
रूस के युगान्तकारी नाशवादी (निहिलिस्ट) / अगस्त, 1928 213
रूस की जेलें भी स्वर्ग हैं / सितम्बर, 1928 220
मेरी रूस यात्रा / अक्टूबर, 1928 224
आयरिश स्वतन्त्रता युद्ध / अक्टूबर, 1928 225
विविध सामाजिक-राजनीतिक प्रश्न : कुशाग्र विश्लेषक दृष्टि
ट्रेड यूनियन बिल / मई, 1927 229
ग़दर आन्दोलन की कुछ व्यथा / सितम्बर, 1927 232
तख़्तापलट गुप्त षड्यन्त्र / जनवरी, 1928 236
हर सम्भव तरीक़े से पूर्ण स्वतन्त्रता / मई, 1928 240
आतंक के असली अर्थ / मई, 1928 243
धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम / मई, 1928 249
सत्याग्रह और हड़तालें / जून, 1928 253
साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज / जून, 1928 257
पुलिस की कमीनी चालें / जून, 1928 261
‘अछूत का सवाल’ / जून, 1928 266
विद्यार्थी और राजनीति / जुलाई, 1928 271
श्री इन्द्रचन्द्र नारंग का मुक़दमा / सितम्बर, 1928 274
युगान्तकारी माँ / सितम्बर, 1928 276
षड्यन्त्र क्यों होते हैं और कैसे रुक सकते हैं? / सितम्बर, 1928 279
श्रमिक आन्दोलन को दबाने की चालें / सितम्बर, 1928 285
एक और दमनकारी क़ानून / सितम्बर, 1928 287
बारदोली सत्याग्रह / सितम्बर, 1928 288
नेहरू समिति की रिपोर्ट / सितम्बर, 1928 289
दिलचस्प और लाभदायक पुस्तकें / सितम्बर, 1928 291
आर्म्स एक्ट ख़त्म कराओ / अक्टूबर, 1928 292
नौजवान भारत सभा और राष्ट्रीय नेतृत्व का मूल्यांकन
नौजवान भारत सभा, लाहौर का घोषणापत्र / अप्रैल, 1928 299
लाला लाजपत राय के नाम खुला ख़त / नवम्बर, 1927 306
लाला लाजपत राय और एग्निस स्मेडली / जनवरी, 1928 311
लाला लाजपत राय और नौजवान / अगस्त, 1928 315
नये नेताओं के अलग-अलग विचार / जुलाई, 1928 319
साण्डर्स की हत्या के बाद : दो नोटिस / दिसम्बर, 1928 325
बहरों को सुनाने के लिए बम का धमाका
असेम्बली हॉल में फेंका गया परचा / अप्रैल, 1929 331
बमकाण्ड पर सेशन कोर्ट में बयान / 6 जून, 1929 333
बमकाण्ड पर हाईकोर्ट में बयान / जनवरी, 1930 340
जेल की सलाख़ों के पीछे से
इंस्पेक्टर जनरल के नाम पत्र / 17 जून, 1929 347
भूख हड़ताल का नोटिस (भगतसिंह) / 17 जून, 1929 349
भूख हड़ताल का नोटिस (बी.के. दत्त) / 17 जून, 1929 350
यतीन्द्रनाथ दास का पत्र / 3 जुलाई, 1929 352
होम मेम्बर के नाम पत्र / 24 जुलाई, 1929 354
पंजाब जेल जाँच समिति के अध्यक्ष को पत्र / 6 सितम्बर, 1929 356
विद्यार्थियों के नाम पत्र / अक्टूबर, 1929 359
इन्क़लाब ज़िन्दाबाद क्या है?
(सम्पादक, मॉडर्न रिव्यू के नाम पत्र) / 1930 360
गृह मन्त्री, भारत सरकार को तार / 20 जनवरी, 1930 363
तीसरे इण्टरनेशनल, मास्को के अध्यक्ष को तार / 24 जनवरी, 1930 364
गृह मन्त्रालय, भारत सरकार को स्मरणपत्र / जनवरी, 1930 365
स्पेशल मजिस्ट्रेट, लाहौर के नाम / 11 फ़रवरी, 1930 371
हिन्दुस्तानी एसोसिएशन, बर्लिन के नाम तार / 5 अप्रैल, 1930 374
काकोरी केस के बन्दियों के नाम तार / 5 अप्रैल, 1930 375
गवाहियों की अपेक्षा रसगुल्ले ज़्यादा ज़रूरी / 9 अप्रैल, 1930 376
विशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना पर / 2 मई, 1930 377
अदालत एक ढकोसला है / 5 मई, 1930 380
विशेष ट्रिब्यूनल के पुनर्गठन पर / 25 मई, 1930 383
राजनीतिक मामलों की पैरवी पर / 1930 386
गाँधीजी के नाम सुखदेव की खुली चिट्ठी / मार्च, 1931 390
<u>क्रान्तिकारी जीवन की तस्वीर : पत्रों के आईने में</u>
मित्र अमरचन्द को लिखा भगतसिंह का पत्र / 1927 395
सुखदेव के नाम भगतसिंह का पत्र / मार्च, 1929 397
पिता के नाम भगतसिंह का पत्र / 26 अप्रैल, 1929 400
सुखदेव को भूख हड़ताल के दौरान भगतसिंह का एक और पत्र / 1929 401
क्रान्तिकारी साथी जयदेव के नाम पत्र / 24 फ़रवरी, 1930 408
जयदेव के नाम एक और पत्र / 28 मई, 1930 409
बचपन के दोस्त जयदेव गुप्ता को भगतसिंह का पत्र / 3 जून, 1930 410
जयदेव को एक और पत्र / 24 जून, 1930 412
बटुकेश्वर दत्त की बहन प्रोमिला को
भगतसिंह का पत्र / 17 जुलाई, 1930 414
छोटे भाई कुलबीर को भगतसिंह का पत्र / 16 सितम्बर, 1930 415
कुलबीर को एक और पत्र / 25 सितम्बर, 1930 416
पिता जी के नाम भगतसिंह का पत्र / 4 अक्टूबर, 1930 417
बटुकेश्वर दत्त को भगतसिंह का पत्र / अक्टूबर, 1930 420
सुखदेव का तायाजी के नाम पत्र / 1930 421
सुखदेव का अधूरा पत्र / 7 अक्टूबर, 1930 423
आवाज़ दबाना दुखदायी है! / फ़रवरी, 1931 427
क्रान्तिकारी दोस्तों के नाम सुखदेव का पत्र 429
कुलबीर के नाम भगतसिंह का अन्तिम पत्र / 3 मार्च, 1931 431
कुलतार के नाम भगतसिंह का अन्तिम पत्र / 3 मार्च, 1931 432
फाँसी से पहले साथियों को भगतसिंह का अन्तिम पत्र / 22 मार्च, 1931 433
शहीद महावीर सिंह का पिता के नाम पत्र / 23 जनवरी, 1933 434
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का घोषणापत्र / 1929 439
बम का दर्शन / 26 जनवरी, 1930 443
भारतीय क्रान्ति का आदर्श 453
मैं नास्तिक क्यों हूँ? / अक्टूबर, 1930 455
‘ड्रीमलैण्ड’ की भूमिका / 15 जनवरी, 1931 470
क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा / 2 फ़रवरी, 1931 478
युद्ध अभी जारी है... / 10 मार्च, 1931 496
परिशिष्ट : एक / दि रिवोल्यूशनरी / दिसम्बर, 1924 499
परिशिष्ट : दो / हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का संविधान / 1924 505
परिशिष्ट : तीन / गाँधीजी के नाम शचीन्द्रनाथ सान्याल का खुला पत्र /
फ़रवरी, 1925 510
परिशिष्ट : चार / शहीद राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी का पत्र / 1927 517
परिशिष्ट : पाँच / शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का अन्तिम सन्देश /
दिसम्बर, 1927 519
परिशिष्ट : छह / शहीद अशफ़ाक़उल्ला का फाँसीघर से सन्देश /
दिसम्बर, 1927 524
परिशिष्ट : सात / वर्ग-रुचि का आन्दोलनों पर असर
— लाला हरदयाल / सितम्बर, 1928 526
परिशिष्ट : आठ / एक और दुर्लभ दस्तावेज़ 537
परिशिष्ट : नौ / भगतसिंह का उर्दू हस्तलेख 538
परिशिष्ट : दस / भगतसिंह का अंग्रेज़ी हस्तलेख 539
परिशिष्ट : ग्यारह / भगतसिंह को सज़ा-ए-मौत की तामीली का
ट्रिब्यूनल द्वारा जारी वारण्ट 540
परिशिष्ट : बारह / भगतसिंह को फाँसी के बाद
जेल सुपरिटेण्डेण्ट का प्रमाणपत्र 542
खण्ड दो / शहीदेआज़म की जेल नोटबुक
भूमिका 547
प्रस्तावना / भगतसिंह की जेल नोटबुक जो शहादत के
तिरसठ वर्षों बाद छप सकी – आलोक रंजन 549
शहीदे-आज़म की जेल नोटबुक 557
परिशिष्ट / भगतसिंह की जेल नोटबुक : एक महान विचारयात्रा
का दुर्लभ साक्ष्य – एल.बी. मित्रोखिन 683
खण्ड तीन / आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम
आयरलैण्ड के प्रसिद्ध क्रान्तिकारी डॉन ब्रीन की आत्मकथा
‘माई फ़ाइट फ़ॉर आयरिश फ़्रीडम’ का हिन्दी अनुवाद
अनुवादक : भगतसिंह 701
दूसरे संस्करण की भूमिका
‘भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’ का दूसरा (परिवर्द्धित
एवं संशोधित) संस्करण हम काफ़ी देर से, क़रीब दो वर्ष बाद प्रस्तुत कर रहे हैं,
हालाँकि इसकी माँग लगातार बनी हुई थी। दरअसल, पहले संस्करण के प्रकाशन
के समय, भगतसिंह और उनके साथियों के ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अब तक के
इस समग्रतम संकलन को जल्द से जल्द पाठकों तक पहुँचाने की उद्विग्नता के
चलते इसमें सम्पादन और प्रूफ़ की बहुतेरी ग़लतियाँ रह गयी थीं। दूसरे संस्करण
में इन्हें सुधार दिया गया है।
इस बीच भगतसिंह द्वारा लिखे चार पत्र और उनकी ओर से लिखा गया एक
अन्य दस्तावेज़ प्रकाश में आया है; हमने इन पाँच दस्तावेज़ों को भी इस संकलन
में शामिल कर लिया है।
संकलन में शामिल ‘शहीदेआज़म की जेल नोटबुक’ की टिप्पणियों में भी
हमने नयी जानकारियाँ जोड़ी हैं। भगतसिंह द्वारा उद्धृत लेखकों और रचनाओं में से
कुछ को छोड़कर अधिकांश का विवरण अब टिप्पणियों में उपलब्ध है।
जैसाकि पहले संस्करण की भूमिका में हमने कहा था, यह मानने के पर्याप्त
कारण हैं कि भगतसिंह और उनके साथियों से जुड़े अनेक दस्तावेज़ और
ऐतिहासिक सामग्री अब भी खोजी जानी बाक़ी है। शोध और अनुसन्धान का यह
काम एक निरन्तर जारी रहने वाली प्रक्रिया है। इस दौरान जो भी नयी जानकारियाँ
और दस्तावेज़ हमें उपलब्ध होंगे, उनसे इस संकलन को और समृद्ध बनाने का
हमारा प्रयास जारी रहेगा।
— सत्यम
1.1.08
दूसरे संस्करण की भूमिका / 11
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पहले संस्करण की भूमिका
भगतसिंह की वैचारिक विरासत
और हमारा समय
“भगतसिंह पर ही इतना ज़ोर क्यों?” – इतिहास के एक प्रतिष्ठित विद्वान ने पिछले
दिनों पूछा। उनका कहना था कि देश के हालात आज इतने बदल चुके हैं कि
भगतसिंह ने जो कुछ भी लिखा-सोचा और बयान दिया, वे आज हमारे लिए
मार्गदर्शक नहीं हो सकते। फिर क्या यह महज़ भावनाओं, भावुकता या उत्तेजना के
सहारे इतिहास-निर्माण का प्रयास नहीं है, क्या यह भी नायक-पूजा का एक
उपक्रम नहीं है?
प्रश्न को सिरे से ख़ारिज नहीं किया जा सकता था। अन्य प्रकाशनों और
क्रान्तिकारी राजनीतिक संगठनों को जाने दें, विगत एक दशक के दौरान भगतसिंह
और उनके साथियों के महत्त्वपूर्ण लेखों-वक्तव्यों-पत्रों को अलग-अलग, और
संकलनों के रूप में, हम लोग लगातार छापते रहे हैं और भगतसिंह की दुर्लभ जेल
नोटबुक को पहली बार हिन्दी में छापने और अब तक उसके कई संस्करण
निकालने का काम भी हम लोगों ने ही किया। और अब यह पुस्तक – ‘भगतसिंह
और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़’। कहीं उक्त प्रोफ़ेसर साहब
का प्रश्न सही तो नहीं था? हम समझते हैं, उसी प्रश्न के उत्तर में इस पुस्तक के
प्रकाशन का औचित्य-प्रतिपादन – इसके ऐतिहासिक महत्त्व और अनन्य उपयोगिता
का तर्क निहित है।
यह सही है कि भगतसिंह और उनके साथियों के (और निस्सन्देह उनमें
अग्रणी विचारक क्रान्तिकारी भगतसिंह ही थे) विचार-पक्ष के बारे में, देश के
शिक्षित लोगों और युवा पीढ़ी के बीच अपरिचय-अज्ञान की एकदम वैसी स्थिति
नहीं है जैसी आज से पच्चीस-तीस वर्षों पहले थी। भगतसिंह एक बेहद
प्रतिभाशाली और अध्ययनशील क्रान्तिकारी थे, यह जानकारी तो उन्हें भी थी जिन
लोगों ने ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ में भगतसिंह के साथ
काम कर चुके क्रान्तिकारी जितेन्द्रनाथ सान्याल की पुस्तक ‘भगतसिंह’ और शिव
भगतसिंह की वैचारिक विरासत और हमारा समय / 13
वर्मा, अजय घोष, भगवानदास माहौर, सदाशिव मलकापुरकर, यशपाल आदि
साथियों के तथा सोहन सिंह जोश, राजाराम शास्त्री आदि समकालीनों के भगतसिंह
विषयक संस्मरण पढ़े थे। गोपाल ठाकुर की एक छोटी-सी पुस्तिका भी पचास के
दशक में ही प्रकाशित हो चुकी थी, जिसमें एच.एस.आर.ए. और नौजवान भारत सभा
के घोषणापत्र तथा अदालत में दिये गये बयानों के आधार पर भगतसिंह के गहन
वैचारिक पक्ष और वैज्ञानिक समाजवाद की ओर उनके झुकाव के बारे में लिखा
गया था। लेकिन उस समय भी नीचे से लेकर ऊपरी कक्षाओं तक की पाठ्यपुस्तकों
और स्वतन्त्रता संग्राम के इतिहास की सबसे स्थापित पुस्तकों में एच.एस.आर.ए. और
भगतसिंह व उनकी पीढ़ी के क्रान्तिकारियों का उल्लेख अति संक्षेप में, मात्र
राष्ट्रवादी सशस्त्र क्रान्तिकारी धारा की एक कड़ी के रूप में ही होता था। एच.एस.
आर.ए. के क्रान्तिकारी और विशेषकर भगतसिंह किस प्रकार समाजवाद को आदर्श
मानने के बाद वैज्ञानिक समाजवाद का गहन अध्ययन कर रहे थे और
किसानों-मज़दूरों के व्यापक जन-संगठन खड़े करने के बारे में सोच रहे थे, इसका
अकादमिक इतिहासकारों की पुस्तकों में उल्लेख तक नहीं होता था और चन्द-एक
शोध-पत्रों और शोध-प्रबन्धों के अपवादों को छोड़ दें तो यही स्थिति कमोबेश आज
भी बनी हुई है।
पहली बार, शताब्दी के आठवें दशक के प्रारम्भ में भगतसिंह की भतीजी
वीरेन्द्र सिन्धु द्वारा सम्पादित भगतसिंह के पत्रों और दस्तावेज़ों का एक संकलन
प्रकाशित हुआ, जिसने मात्र तेईस वर्ष की उम्र में शहीद हो जाने वाले उस वीर
युवा के अपार सम्भावनासम्पन्न विचारक-पक्ष की एक झलक प्रस्तुत की। इसी के
आसपास वीरेन्द्र सिन्धु द्वारा लिखी गयी भगतसिंह की एक महत्त्वपूर्ण जीवनी
‘युगद्रष्टा भगतसिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे’ नाम से प्रकाशित हुई। आठवें दशक
के पूर्वार्द्ध में ही दिल्ली के कुछ युवा क्रान्तिकारी वामपन्थियों ने भगतसिंह के
लेखों, बयानों, उद्धरणों का एक छोटा-सा संकलन निकालकर उनके द्वारा
मार्क्सवाद को स्वीकार करने और उसका गहन अध्ययन करने का तथ्य रेखांकित
किया। अब धीरे-धीरे मात्र “एक वीर क्रान्तिकारी” से अलग भगतसिंह की छवि
एक मेधावी, युवा क्रान्तिकारी विचारक के रूप में बनने लगी थी। जब इतिहासकार
बिपनचन्द्र ने आठवें दशक के उत्तरार्द्ध में भगतसिंह का तब तक अनुपलब्ध निबन्ध
‘मैं नास्तिक क्यों हूँ?’ अपनी भूमिका के साथ प्रकाशित किया तो उनके गहन और
अकुण्ठ भौतिकवादी चिन्तन के नये आयाम और नयी गहराई की पहली बार लोगों
को जानकारी मिली। भगतसिंह का एक और लेख ‘ड्रीमलैण्ड की भूमिका’ पहले
वीरेन्द्र सिन्धु सम्पादित दस्तावेज़ों के संकलन में प्रकाशित हो चुका था, लेकिन ‘मैं
नास्तिक क्यों हूँ?’ के साथ यह निबन्ध दुबारा बिपनचन्द्र की परिचयात्मक टिप्पणी
के साथ प्रकाशित हुआ, तो विशेषतौर पर इतिहास और साहित्य के अध्येताओं का
14 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़