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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 788 में से

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पृष्ठ 152

करने लगे, परन्तु गुरु राम सिंह वहीं अपना शान्त जीवन बिताते रहे। हाँ,
ईश्वर-भक्ति के कारण आप दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गये। प्रान्तभर से लोग दर्शनों
के लिए आते थे।
पहले तो आप केवल ईश्वर-भक्ति का ही उपदेश देते थे, परन्तु बाद में कुछ
समाज-सुधार सम्बन्धी उपदेश देने लगे। आपने कन्या क्रय-विक्रय, मदिरा-मांस
भक्षण आदि बहुत-सी कुरीतियों का बड़े ज़ोर से विरोध किया। आपके भक्तगण
भी सादा जीवन बिताते और ईश्वरोपासना में तल्लीन रहते। आपने अपने गाँव में एक
सार्वजनिक भण्डारा खोल रखा था, जहाँ पर कि सभी लोगों को बिना मूल्य भोजन
मिलता था। परन्तु शीघ्र ही एक परिवर्तन हुआ।
कहा जाता है, रामदास नामक किसी अज्ञात संन्यासी ने आकर उनसे कहा –
“इस समय देश का विदेशी शासन से छुटकारा दिलाना ही सर्वप्रथम कर्तव्य है।”
और उसी समय से आपने अपना कार्यक्रम राजनीतिक बना लिया। संन्यासी वाली
बात केवल सुनी-सुनायी है। सम्भव है ऐसी कोई घटना घटित ही न हुई हो, परन्तु
इतना तो मानना ही पड़ेगा कि इस समय गुरु राम सिंह जी को देश की पराधीनता
एकदम बुरी तरह अखरी। वे समझ गये थे कि बाह्य स्वतन्त्रता के साथ ही साथ
देशवासियों की आत्मा भी मरती जा रही है। लोग स्वाधीनता का विचार तक खो
बैठे हैं। अभी कल उन्होंने सिपाही विद्रोह तथा उसकी विफलता के बाद किये गये
अकथनीय अत्याचार देखे-सुने थे। उससे भी अवश्यमेव उन्हें कुछ ठेस लगी होगी।
जो भी हो, उन्होंने विदेशी शासन का खोखलापन खूब अच्छी तरह देखकर एक
कार्यक्रम बनाकर कार्य आरम्भ कर दिया। अब तक केवल उपदेश ही होता था,
अब 'दीक्षा' तथा संगठन भी आरम्भ हुआ।
उन्होंने उस समय ठीक उसी असहयोग का प्रचार प्रारम्भ कर दिया, जो 1920
में महात्मा गाँधीजी ने किया। उनका असहयोग महात्मा जी के असहयोग से भी कई
बातों में बढ़-चढ़कर था। अदालतों के बहिष्कार, अपनी पंचायतों के संस्थापन,
सरकारी शिक्षा के बहिष्कार, विदेशी सरकार के पूर्ण बहिष्कार के साथ ही साथ
रेल, तार तथा डाक के बहिष्कार का प्रचार भी हुआ। उस समय देश आज की
तरह निर्जीव होकर उन वस्तुओं पर इतना निर्भर नहीं हो गया था कि उनके बहिष्कार
की कल्पना भी न कर पाता। प्रत्युत उन्होंने डाक का अपना प्रबन्ध इतना अच्छा
कर लिया था कि 'उनकी डाक सरकारी डाक से भी जल्दी पहुँच जाती थी।'¹
इस सबके साथ सादा वेष तथा स्वदेशी वस्त्र पहनने का ज़ोर से उपदेश होता था।
प्रचार-कार्य बहुत दिनों तक न होने पाया था कि सरकार की तीव्र दृष्टि इस
आन्दोलन पर पड़ी। उन्हें इस प्रचण्ड आन्दोलन को दबा देने की चिन्ता हुई।

  1. भाई परमानन्द के एक लेख के आधार पर
    146 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़