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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 788 में से

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पृष्ठ 151

हम समझते हैं कि हमारे लिए, देश के लिए निष्काम भाव से मरने वाले लोगों
को भुला देना बड़ी भारी कृतघ्नता होगी। हम उनकी स्मृति में कोई बड़ा स्तूप नहीं
खड़ा कर सकते तो क्या अपने हृदय में भी थोड़ा स्थान देने से झेंपें? इसी विचार से
प्रेरित होकर आज उन 'मूर्ख' तथा 'उतावले' आशावादियों का संक्षिप्त इतिहास लिखने
की यह चेष्टा है। इससे यदि लोगों को उनके सम्बन्ध में ठीक-ठीक बातों का ज्ञान
हो जाये और अधिक जानने की इच्छा उत्पन्न हो जाये तो यह प्रयास सफल समझूँगा।
उनके इस छोटे-से इतिहास को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं –

  1. गुरु जी का व्यक्तिगत चरित्र,
  2. कूका विद्रोह,
  3. विद्रोह के बाद।
    गुरु राम सिंह जी का जीवन
    श्री राम सिंह जी का जन्म सन् 1824 ई. में भैणी नामक गाँव, ज़िला लुधियाना
    (पंजाब) में एक बढ़ई के घर हुआ था। कहते हैं, गुरु गोविन्द सिंह जी ने कभी
    कहा था कि “मैं बारहवें वर्ष में राम सिंह नाम से प्रसिद्ध अथवा प्रकट होऊँगा।”
    इसलिए इनके अनुयायी उन्हें उन्हीं दश गुरुओं का अवतार मानते हैं। परन्तु शेष
    सिक्ख समाज का विश्वास है कि गुरु गोविन्द सिंह जी ने गुरु के सब अधिकार
    गुरु ग्रन्थ साहिब पर ही डाल दिये और गुरु-प्रथा बन्द कर दी थी। अतः गुरु राम
    सिंह गुरु नहीं हो सकते।
    हमें इन झगड़ों से कुछ काम नहीं। गुरु राम सिंह युवावस्था में पंजाब केसरी
    महाराजा रणजीत सिंह की सेना में भरती हो गये। वे पहले से ही ईश्वर-भक्त थे
    और अधिक समय ईश्वरोपासना में ही बिताते थे। इसी कारण वे शीघ्र ही सेना में
    सर्वप्रिय हो गये। वो बहुधा ईश्वर-भक्ति में लीन रहने के कारण सैनिक-कर्त्तव्यों
    की पूर्ति में असमर्थ रहते, परन्तु उन्हें सब कर्त्तव्यों से छुट्टी दे देने पर भी सेना
    में ही रखा गया। एक दिन, कहा जाता है, उन्हें स्वप्न में श्री गुरु गोविन्द सिंह जी
    के दर्शन हुए, जिन्होंने उनसे हज़ारा (सीमान्त प्रान्त) निवासी बाबा बालकनाथ से
    गुरु-गद्दी के अधिकार लेने को कहा। दूसरे ही दिन उन्होंने अन्य बीस-पच्चीस
    भक्तगण के साथ उधर प्रस्थान कर दिया। बाबा बालकनाथ जी ने उनका खूब
    स्वागत किया और दीक्षा दी। वहाँ से लौटकर आपने नौकरी छोड़ दी और गाँव में
    जाकर शान्त जीवन बिताने लगे।
    वर्षों बीत गये। अनेक परिवर्तन हो गये। महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के
    बाद गद्दी के लिए झगड़ा हुआ। अंग्रेजों ने पंजाब जीत लिया और इसे भी शेष भारत
    की तरह पराधीनता की बेड़ियों से जकड़ दिया। यह सबकुछ हो गया और साथ
    ही 1857 का सिपाही विद्रोह भी हो गया और अंग्रेज़ शान्तिपूर्वक भारत पर शासन
    विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 145