भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंT.D. Forsith, जोकि सन् 1863 ई. में पंजाब सरकार के चीफ़ सेक्रेटरी थे और
बाद में 1872 में कूका विद्रोह के समय अम्बाला डिवीज़न के कमिश्नर पद पर
काम करते थे, अपनी Autobiography में लिखते हैं –
“1863 में ही मैं इस आन्दोलन की तह तक पहुँच गया था और समझ गया
था कि यह क्या भीषण परिणाम ला सकता है। अतः मैंने उनके प्रचार पर बहुत-से
बन्धन लगा दिये, जिससे उनके प्रचार-कार्य की गति कुछ हद तक रुक गयी।”
जब सरकार ने लोगों का बड़ी संख्या में भैणी आना-जाना तथा उनका वहाँ
अधिक देर तक ठहरना तक भी बन्द कर दिया तब गुरु राम सिंह जी ने अपना
कार्य जारी रखने के लिए एक तदबीर सोची। समस्त देश को 22 हिस्सों में विभक्त
कर 22 योग्य मनुष्य उनका संगठन करने के लिए नियुक्त कर दिये। वे सभी ‘सूबे’
कहलाते थे। कार्य बहुत कुशलता से चलता रहा। सभी नामधारी सिक्ख अपनी आय
का दशांश गुरु जी को भेंट किया करते। वे सब भैणी भेज दिया जाता था। यह
सब होता ही था और साथ ही साथ गुप्त रूप से विद्रोह का प्रचार भी होता रहा।
बाहरी जोश बहुत कम कर दिया गया। यहाँ तक कि सरकार का सन्देह बहुत हद
तक दूर हो गया और सब बन्धन स्वतः 1869 में हटा लिये गये।
बन्धन-मुक्त होते ही लोगों का जोश बढ़ा। इतना बढ़ा कि सँभालना कठिन हो
गया। इसी से 1872 में अपरिपक्व विद्रोह उठ खड़ा हुआ, जिसके कारण सारा
विराट आन्दोलन पिस गया। परन्तु उस मुख्य घटना पर कुछ लिखने से पहले श्री
गुरु जी के व्यक्तिगत चरित्र सम्बन्धी कुछ मनोरंजक बातों का उल्लेख करना
अनुचित न होगा।
गुरु राम सिंह बड़े तेजस्वी तथा प्रभावशाली व्यक्ति थे। उनके असाधारण
आत्मबल सम्बन्धी बहुत-सी बातें प्रसिद्ध हैं। कहते हैं कि वे जिसके कान में दीक्षा
का मन्त्र फूँक देते थे वही उनका परम भक्त तथा शिष्य हो जाता था। जब यह
बात ज़रा प्रसिद्ध हुई तो दो बदमाश अंग्रेज़ उनके पास उनकी शक्ति की परीक्षा लेने
गये। उन्होंने कहा था, “देखेंगे, गुरु जी का हम पर क्या प्रभाव पड़ता है?” परन्तु
दीक्षा के बाद से वे उनके कट्टर भक्त बन गये और तब से उनके व्यक्तिगत दोष
भी मिट गये। इसी तरह डॉक्टर गोकलचन्द पी-एच.डी. एक लेख में लिखते हैं कि
उनकी दादी का भाई एक बड़ा चरित्रहीन व्यक्ति था, और उसे हुक्के का व्यसन
था। केवल एक बार ही गुरु राम सिंह जी के दर्शनों ने उनका जीवन एकदम
परिवर्तित कर दिया। उनका हुक्का तो एकदम छूट गया और शेष सारा जीवन
ईश्वरोपासना में ही बीता। इसी तरह एक और मनुष्य जिसने कि कभी कोई हत्या
कर दी थी, वह भी गुरु जी से दीक्षित हुआ। फिर उसने अपनेआप को कोर्ट में
पेश कर दिया और अपना अपराध स्वीकार कर लिया। जब जज ने अत्यन्त आश्चर्य
के साथ पूछा, “तुम्हें तो कोई जानता भी न था और हत्या सम्बन्धी बात का तुम
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 147