बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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की ही भाँति लोकप्रिय थे। श्री चन्द्रशेखर आजाद के इलाहाबाद में पुलिस की
गोलियों से मारे जाने के बाद जनता ने जिस प्रकार उस वृक्ष की पूजा की, जिसके
नीचे श्री आजाद शहीद हुए थे तथा इससे बहुत पहले कन्हाईलाल दत्त के जुलूस
में विशाल जन समूह का सम्मिलित होना इस बात का प्रतीक है कि विप्लवियों
के प्रति राष्ट्रीय विचारों की जनता में सदैव प्रबल आकर्षण रहा और वह इनको
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का सच्चा 'वीर' समझती रही।
जहाँ तक कांग्रेस के नेताओं का सम्बन्ध है, अधिकांश से विप्लवी नेताओं की
कभी अच्छी तरह पट नही सकी। वास्तव में कांग्रेस के अधिकांश नेता विप्लवियों
के आतंकवादी मार्ग को राष्ट्रीय आन्दोलन की बाधा समझते थे। वे इस बारे में
बहुत सचेत रहते थे कि कहीं सरकार उनका सम्बन्ध आतंकवादी आन्दोलन से सिद्ध
न कर दे। कांग्रेस जो बड़ी कठिनाई से आवेदन-पत्रों और प्रार्थना-प्रस्तावों की
परिधि से निकलकर सविनय अवज्ञा के मार्ग पर आई थी, सरकार को भीषण
आत्म दमन का कोई भी अवसर नही देना चाहती थी। फिर भी शनैः-शनैः
कांग्रेस के कुछ नेताओं के मत में हम परिवर्तन होता हुआ देखते हैं। श्री शचीन्द्र
को शिकायत है कि वे जब कालापानी से लौटे तो मोतीलालजी, देशबन्धु दास,
मालवीयजी, जवाहरलाल नेहरू ने उनकी बातों पर, यहाँ तक कि राजनीतिक
बन्दियों की रिहाई के लिए आन्दोलन करने की प्रार्थना पर भी उचित ध्यान
नहीं दिया। इनमें से श्री मोतीलालजी के सम्बन्ध में हम एक अन्य क्रान्तिकारी
मनमोहन गुप्त के संस्मरणों में पढ़ते हैं कि वे एक हस्तलिखित क्रान्तिकारी बुले-
टिन के मूल्य-स्वरूप मोतीलालजी से पांच सौ रुपये लाए थे और वे प्रायः उनको
कुछ न कुछ देते रहते थे। श्री चन्द्रशेखर आजाद, यशपाल आदि को भारत से
बाहर जाने के लिए जवाहरलालजी द्वारा धन प्राप्त हुआ था, यह स्वयं यशपालजी
ने अपनी पुस्तक में लिखा है। देशबन्धु चित्तरंजनदास के सम्बन्ध में श्री त्रैलोक्य-
नाथ चक्रवर्ती ने लिखा है कि जब वे क्रान्तिकारी कार्यों के अपराध में जेल की
सजा काट रहे थे, उन दिनों ही देशबन्धु भी असहयोग आन्दोलन में जेल आए।
इस जेल प्रवास के समय एक कांग्रेसी ने देशबन्धु से यह शिकायत की कि विप्लवी
क़ैदी असहयोगी बन्दियों को कांग्रेस के विरुद्ध भड़काते हैं, तो देशबन्धु ने उत्तर
दिया था, “इनकी बातें अब मुझे याद आती हैं, तो मेरा सारा घमंड चूर हो
जाता है।” इससे प्रकट होता है कि दास बाबू भी इनको पर्याप्त आदर की दृष्टि
से देखते थे।
विप्लवी आन्दोलन ने कांग्रेस आन्दोलन के मार्ग में बाधा खड़ी नहीं की,
शक्ति ही दी, ऐसा प्रायः सभी राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं का अनुभव है। 'जब यह लोग
फाँसी पर चढ़ सकते हैं, कालापानी जा सकते हैं, तो क्या हम वर्ष-छह महीने
की सजा भी नहीं काट सकते,' यह भावना बहुत-से युवकों को कांग्रेस आन्दोलन
में खींच लाई, इसमें सन्देह नहीं है। भारत की अंग्रेज सरकार ने विप्लवियों पर
जो अत्याचार किए, उसके कारण भी जनमत अंग्रेज सरकार का विरोधी बनता
गया, इसमें भी सन्देह नहीं है। कभी-कभी किसी विशेष जोशीले सरकार-भक्त
अधिकारी ने जब कांग्रेसी आन्दोलनकारियों पर भीषण अत्याचार करके कांग्रेस
वालों को बहुत आतंकित कर दिया, तब किसी क्रान्तिकारी की एक धमकी-भरी
चिट्ठी से ही उक्त अधिकारी सही रास्ते पर आ गया, इसके उदाहरण भी मौजूद
हैं। अन्त मे सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन का अहिंसा की परिधि से
निकलकर हिंसात्मक रूप ग्रहण कर लेना यह सिद्ध करता है कि विप्लवियों का
न तो 'आतंकवाद' व्यर्थ हुआ और न हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन ने 'हिंसा-अहिंसा'
के तत्त्वचिन्तन का ही चिन्ता की। अंग्रेजों को भारत से हटाने का मुख्य श्रेय यदि
आजाद हिन्द फौज के संगठन को नही, तो आजाद हिन्द फ़ौज के बन्दियों की
रिहाई के आन्दोलन को तो है ही, जिसने फ़ौजों को भी ब्रिटिश विरोधी बना
दिया था। गांधीजी की अहिंसात्मक रणनीति के कारण भारत का ब्रिटिश विरोधी
जन-आन्दोलन प्रत्यक्ष और संगठित रूप से चलता रहा और उसी के बल
पर आजाद-हिन्द फ़ौज की रिहाई का आन्दोलन इस रूप में किया जा सका,
यह तथ्य भी हमारी आंखो से ओझल नही होना चाहिए। भारत की स्वाधीनता
का श्रेय इन दोनों ही प्रकार के आन्दोलनो को है; किन्तु त्याग, कष्ट-सहन का
पलड़ा विप्लवियों का ही भारी है, यह निर्विवाद सत्य है।
श्री शचीन्द्र की शेष कहानी
श्री शचीन्द्र ने 'बन्दी जीवन' की कहानी सन् 1920 में कालेपानी से मुक्ति
के बाद घर आने, विवाह करके क्रान्तिकारी कार्यों के लिए पत्नी-पुत्री सहित चट-
गांव जाने और फिर लौटकर उत्तर प्रदेश में आ जाने की चर्चा के माथ ही समाप्त
कर दी है। इसी बीच उन्होंने शेष क्रान्तिकारी राजबन्दियों की रिहाई के लिए जो
उद्योग किया, उसकी चर्चा तो पूर्ण रूप से की है किन्तु क्रान्तिकारी दल को पुन-
र्गठित करने के लिए क्या कुछ किया, इसका केवल आभास मात्र ही दिया है।
'बन्दी जीवन' के तृतीय भाग में यह सब ब्योरा है, जो श्री शचीन्द्र ने सन् 1937-
38 में कांग्रेस मंत्रिमण्डलों द्वारा रिहा किए जाने के पश्चात् कानपुर के 'प्रताप'
पत्र मे धारावाहिक रूप से लिखा था। उस समय भी देश में अंग्रेज सरकार थी,
इसलिए श्री शचीन्द्र यथातथ्य विवरण दे भी नही सकते थे। इसीलिए उन्होंने
'काकोरी षड्यन्त्र' का विवरण भी नही दिया, जिसमें उनके चार साथियों को
फांसी हुई और श्री शचीन्द्र को आजीवन कालेपानी का दंड मिला था।
श्री शचीन्द्र ने सन् 1920 में कालेपानी से लौटकर जिस दिन भारत भूमि पर
पैर रक्खा, ठीक उसी दिन से वे क्रान्तिकारी दल के पुनर्गठन में प्रवृत्त हो गए थे।
इस समय तक उत्तर प्रदेश का क्रान्तिकारी संगठन विच्छिन्न हो चुका था। बंगाल
का प्रमुख क्रान्तिकारी दल 'ढाका अनुशीलन समिति' उसके बहुत से सदस्यों के
जेल जाने से निर्बल था। श्री बारीन्द्र का 'युगान्तर दल', जो प्रथम महायुद्ध के
पूर्व ही 'चन्दननगर दल' के रूप में परिवर्तित हो गया था, और जिसके एक नेता
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रासबिहारी बोस थे, लगभग किंकर्तव्यविमूढ़ था। पंजाब में 'गदर पार्टी' के नेता
या तो जेल में थे और या विदेशों में खिसक गए थे। कांग्रेस गांधीजी के प्रभाव में
आ चुकी थी और जलियांवाला बाग हत्याकांड से उत्पन्न रोष का गांधीजी असह-
योग आन्दोलन में उपयोग करने की तैयारी कर चुके थे। मुस्लिम क्रान्तिकारी
दल गोपनीय आतंकवाद की व्यर्थता अनुभव करके प्रकट जन-आन्दोलन के मार्ग
पर चल चुका था और 'खिलाफत' की रक्षा के नाम पर देश की मुस्लिम जनता का
अंग्रेजों से संघर्ष कराने की भूमिका तैयार कर रहा था। भारत की जनता को
नया राजनीतिक दर्शन, नये नेता और नई रणनीति प्राप्त हो रही थी।
बंगाल के क्रान्तिकारी असहयोग आन्दोलन का विरोध कर रहे थे किन्तु श्री
शचीन्द्र ने इसमें योग नहीं दिया। गांधीजी के इस आन्दोलन से उनको स्वतन्त्रता
प्राप्ति की आशा तो नहीं थी किन्तु इस आन्दोलन के माध्यम से जन-जागरण के
महत्त्व को वे हृदयंगम कर सके थे। सम्भवतः वे समझ गए थे कि आन्दोलन अस-
फल होगा। इसीलिए असहयोग आन्दोलन से वे तटस्थ रहे। 'न निन्दा, न प्रशंसा'
की नीति ग्रहण कर वे यहाँ-वहाँ घूमकर क्रान्तिकारी दल का संगठन करने लगे।
बंगाल के सभी क्रान्तिकारी दलों का पारस्परिक सहयोग हो या एक संगठन बन
जाय, इसके लिए उन्होंने विशेष उद्योग किया। क्रान्तिकारी संगठन के प्रति देश
के युवकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ही उन्होंने इस समय बंगाली भाषा
की एक पत्रिका में लेखमाला प्रारम्भ की, जिसमें सन् 1914-15 के कार्यों का विव-
रण था। यही लेखमाला बाद में 'बन्दी जीवन' के प्रथम-द्वितीय भाग के रूप में
पुस्तकाकार प्रकाशित हुई और क्रान्तिकारी संगठन के नये रंगरूटों की पाठ्य-
पुस्तक बन गई। न जाने कितने युवक अकेली इस पुस्तक के पारायण से ही अनु-
प्राणित होकर क्रान्तिकारी दल में प्रविष्ट हुए। इस प्रकार श्री शचीन्द्र असहयोग
काल में अपने शरीर और बुद्धि का सम्पूर्ण उपयोग क्रान्तिकारी संगठन के लिए
करते रहे;
कुछ दिनों बाद असहयोग आन्दोलन असफल होकर समाप्त हो गया। इसकी
प्रतिक्रियास्वरूप देश में साम्प्रदायिक विद्वेष और बलवों की हवा बह चली।
बड़े-बड़े तथाकथित राष्ट्रीय नेता इस हवा में बहकर हिन्दू-मुस्लिम द्वेष के प्रचारक
बन गए। स्वदेश की स्वाधीनता की बात पीछे पड़ गई। कुछ लोग चरखा और
सूत में उलझ गए, कुछ को धारासभाओं की कुर्सियाँ पुकारने लगीं। राष्ट्रीय
आन्दोलन के लिए यह बड़े संकट का समय था।
श्री शचीन्द्र इस ससय पंजाब से बंगाल तक राष्ट्रीय विचारों के युवकों को
खोज-खोजकर उनको एक संगठन में पिरोने लगे। इसी समय क्रान्तिकारी दल
का ध्यान मजदूर संगठन की ओर गया। जमशेदपुर में मजदूर यूनियन बनी और
उसके सभापति बनाये गए श्री देशबन्धुदास की पत्नी के भाई और कलकत्ता के
प्रसिद्ध बैरिस्टर श्री एस० एन० हलदार। श्री शचीन्द्र भी वहाँ जाकर काम करने
लगे। किन्तु कुछ ही दिन बाद श्री शचीन्द्र ने जमशेदपुर का कार्य छोड़ दिया और
फिर सन् 1924 मे कलकत्ते मे, प्रतुलचन्द्र गागुली और त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती के
साथ मिलकर 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन पार्टी' की स्थापना की। इस संस्था की
स्थापना का मुख्य उद्देश्य यह था कि उत्तर भारत मे केवल एक क्रान्तिकारी
सगठन कार्य करे, जिसके नेता श्री शचीन्द्र बनाये गए। इससे पहले ढाका अनु-
शीलन समिति के श्री योगेश चटर्जी भी उत्तर भारत मे सगठन कार्य कर रहे थे
और उन्होने श्री रामप्रसाद विस्मिल आदि को पुनः क्रान्तिकारी कार्यों मे प्रवृत्त
कर दिया था। श्री राजेन्द्र लाहिड़ी, जिनको काकोरी केस मे फाँसी हुई, श्री
शचीन्द्र के सहयोगी थे इन दिनो ही 'रिवोल्यूशनरी' नामक एक पर्चा रंगून से
पेशावर तक बाटा गया, जिसमे भारतीय जनता के सम्मुख सशस्त्र क्रान्ति की
आवश्यकता और उपयोगिता प्रकट की गई थी। एक ही दिन सम्पूर्ण देश मे पर्चा
वितरित करके क्रान्तिकारी देशवासियो को यह विश्वास दिलाना चाहते थे कि
उनका एक वृहत् सगठन स्थापित हो चुका है। भारत सरकार भी पर्चे बॉटने की
इस सगठन-व्यवस्था से बहुत आतंकित हुई थी और इस पर्चे की सबसे बड़ी उप-
योगिता यह थी कि साम्प्रदायिकता के उठते हुए तूफान मे इस प्रकार के कार्य जन-
साधारण को राष्ट्रीयता की ओर उन्मुख करते थे। काकोरी षड्यन्त्र के मुकदमे
मे सरकारी वकील ने श्री शचीन्द्र को ही 'रिवोल्यूशनरी' पर्चे का लेखक बताया
था। बाद मे इस पर्चे को डाक द्वारा भेजने के अपराध मे फरवरी, 1925 मे
शचीन्द्र पकडे गए और दो वर्ष की कैद का दड मिला। बगाल ऐसैम्बली मे क्रान्ति-
कारी आन्दोलन का दमन करने के लिए सरकार ने इन दिनो ही एक 'आर्डिनेन्स
एक्ट' प्रस्तुत किया। बगाल के तत्कालीन गृह सदस्य श्री स्ट्रीफेन्सन ने इस एक्ट
की आवश्यकता बताते हुए, अपने भाषण मे श्री शचीन्द्र और 'रिवोल्यूशनरी' पर्चे
की विशेष रूप से चर्चा की थी।
श्री शचीन्द्र जेल जाने से पूर्व ही उत्तर प्रदेश मे एक दृढ़ क्रान्तिकारी दल का
सगठन कर चुके थे। श्री भगतसिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद आदि इसी समय क्रान्ति-
कारी दल मे प्रविष्ट हुए। इन दिनो दल की आर्थिक स्थिति अत्यन्त दुर्बल थी।
काकोरी काण्ड के शहीद श्री रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने फाँसी की कोठरी मे जो
अपनी आत्मकथा लिखी है, उसमे दिये गए विवरण के अनुसार, "इस समय समिति
के सदस्यो की बड़ी दुर्दशा थी। चने मिलना भी कठिन था। सब पर कुछ न कुछ
कर्ज हो गया। किसी के पास साबुन कपडे तक न थे। कुछ विद्यार्थी बनकर धर्म
क्षेत्रो तक मे भोजन कर आते थे।" ऐसी स्थिति से विवश होकर दल ने डकैती
डालने का निश्चय किया। इन दिनो ही विदेशो से अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने का भी
कोई अच्छा सूत्र प्राप्त हो गया था। उसके लिए भी धन की आवश्यकता थी। इस
सब कारणो से लखनऊ के पास काकोरी स्टेशन पर रेल का खजाना लूटा गया। कुछ
लोग डकैती डालना गर्हित कार्य समझ सकते हैं। क्रान्तिकारी भी इसे अच्छा
नही समझते थे, लेकिन देश के कार्य के लिए भी धन की आवश्यकता तो होती ही
है। इससे पूर्व दान, चन्दा आदि से धन सग्रह करने का प्रयोग किया जा चुका था,
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जो सर्वथा असफल रहा था । अर्थ-समस्या सुलझाने के लिए सन् 1924 में ही,
अर्थात् श्री शचीन्द्र की गिरफ्तारी से कुछ पहले ही जाली नोट बनाने का भी
प्रयास क्रान्तिकारी कर चुके थे। श्री शचीन्द्र ने 'बन्दी जीवन' के तृतीय भाग में
एक स्थान पर जाली नोट बनाने के सम्बन्ध में थोड़ा आभास दिया है किन्तु यह
नोट कहाँ, कौन बनाता था, यह विवरण रहस्योद्घाटन के भय से नहीं दिया ।
जाली नोट बनाने का काम ढाका अनुशीलन समिति की ओर से पहले ढाका और
मैमनसिंह शहर में प्रारम्भ किया गया। दस रुपये और सौ रुपये के नोट के ब्लाक
किसी प्रकार क्रान्तिकारियों ने बनवा लिए थे। श्री दिनेशचन्द्र लाहिड़ी, त्रैलोक्य-
नाथ चक्रवर्ती आदि यह कार्य करते थे । इसके बाद बंगाल के सोनारंग गाँव में
प्रबोधदास गुप्त और शचीन्द्र चक्रवर्ती यह कार्य करते रहे। इन दोनों को इस
अपराध में पांच-पांच वर्ष का कारावास दंड भी मिला। यह जाली नोट इतने त्रुटि-
पूर्ण बनते थे कि तुरन्त पकड़ाई में आ जाते थे। इसीलिए अन्ततः डकैती द्वारा
धन संचित करने के लिए विवश होना पड़ा। काकोरी में ट्रेन लूटने से धन तो
मिला, किन्तु सरकार तुरन्त समझ गई कि यह डकैती राजनीतिक उद्देश्य से डाली
गई है। पहले दो-एक संदेहास्पद व्यक्ति गिरफ्तार किये गए । वे दुर्भाग्य से इतने
कमजोर निकले कि जो कुछ मालूम था, सब पुलिस के सामने उगल दिया । फिर
तो देशभर में गिरफ्तारियां हुईं। श्री शचीन्द्र जो पर्चा बाँटने के जुर्म में सजा भुगत
रहे थे, वह भी इस केस में घसीट लिये गए। सरकार ने लगभग दस लाख रुपया
व्यय करके इस मुकदमे को साबित कर दिया। श्री शचीन्द्र फिर एक बार काला-
पानी जा पहुँचे ।
सन् 1937-38 में शचीन्द्रबाबू काकोरी के अन्य राजबन्दियों के साथ कांग्रेस
मंत्रिमंडल द्वारा रिहा किये गए । उन्होंने फिर पूर्वानुंसार इलाहाबाद के एक पत्र
में अपने क्रान्तिकारी कार्यों का विवरण लिखना प्रारम्भ किया। इसके अतिरिक्त
भी कुछ लेखादि लिखे जो पुस्तकाकार प्रकाशित हुए। इसके पश्चात् द्वितीय महा-
युद्ध प्रारम्भ हो गया, तो सरकार ने उनको नजरबन्द कर दिया। इन दिनों उनका
स्वास्थ्य बहुत जर्जर हो गया था। इसी अस्वस्थता के आधार पर नजरबन्दी से
उनकी मुक्ति हुई। घर पर रहकर शचीन्द्रबाबू चिकित्सा कराने लगे । इसी समय
श्री त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती उनसे बनारस जाकर मिले और श्री सुभाष बोस के
नेतृत्व में विद्रोह करने की योजना बताकर श्री शचीन्द्र से उसमें भाग लेने को
कहा। शचीन्द्र ने इसे स्वीकार कर लिया और परिवार की व्यवस्था करने के लिए
थोड़ा समय मांगा। वे यह व्यवस्था कर ही रहे थे कि क्षय रोग का आक्रमण उन
पर हो गया और सन् 1942 में भारत का यह महान् क्रान्तिकारी, अपनी आँखों
में स्वदेश की स्वाधीनता के सपने बसाए सदैव के लिए चिरनिद्रा में निमग्न हो
गया। अब उनके शौर्य पूर्ण जीवन की केवल स्मृति-भर शेष रह गई है।
RAJA RAMMOHUN ROY
LIBRARY FOUNDATION
उपहार स्वरूप
Gifted by
राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान द्वारा
RAJA RAMMOHUN ROY
LIBRARY FOUNDATION
BLOCK DD-34 SECTOR 1 SALT LAKE
CALCUTTA-700 064
शहीद ग्रंथ-माला
संपादक : बनारसीदास चतुर्वेदी
इस माला का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को उन अमर शहीदों की बलिदान-
गाथाओं से परिचित कराना है जिन्होंने हँसते-हँसते स्वाधीनता की बलिवेदी पर
अपने प्राणों की आहुति दे दी, जिनकी कीर्ति देश के भावी सपूतों को सदा प्रेरणा
देती रहेगी। इस माला की पुस्तकों की मुख्य विशेषता इनकी प्रामाणिकता है।
भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास : मन्मथनाथ गुप्त
ब्रिटिश सरकार ने छपते ही यह पुस्तक जब्त कर ली थी। जब्ती के पश्चात्
इसके तीन संस्करण और हुए तथा इस विषय पर यह सारे भारतीय साहित्य में
सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रंथ माना गया। यह इसका नवीन संस्करण है।
यश की धरोहर : (भगवानदास माहोर, सदाशिवराव मलकापुर, शिव वर्मा)
भारतीय क्रान्ति के यज्ञ मे अपने प्राणों की बलि देने वाले युवकों सरदार
भगतसिंह, राजगुरु, चन्द्रशेखर आजाद, नारायणदास खरे तथा सुखदेव के चिर-
स्मरणीय मार्मिक संस्मरण।
आत्मकथा : रामप्रसाद बिस्मिल
जेल में फाँसी से दो दिन पूर्व लिखी गई यह आत्मकथा हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ
आत्मकथा है। यह आत्मकथा हाथ मे लेते ही हृदय मे एक सिहरन-सी होने लगती
है। भारत के सभी सार्वजनिक तथा व्यक्तिगत पुस्तकालयों में इस आत्मकथा का
होना अत्यंत आवश्यक है।
गणेश शंकर विद्यार्थी : (देवव्रत शास्त्री, भूमिका : जवाहरलाल नेहरू)
अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी की सजीव बलिदान गाथा, जो हमें
स्वतंत्रता और न्याय के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने को प्रेरित करती है।
बन्दी जीवन : शचीन्द्रनाथ सान्याल
गदर पार्टी का इतिहास : (प्रीतमसिंह पंछी)
इसमें बड़ी खोज के साथ यह दिखाया गया है कि अमेरिका में भारतीयों ने
गदर पार्टी का संगठन कैसे किया । उनके त्याग और बलिदान की कथा बड़े
रोमांचकारी शब्दों में लिखी गई है। यह ग्रंथ भारतीय स्वाधीनता-संग्राम के
इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
आत्माराम एण्ड संस
कश्मीरीगेट, दिल्ली-110006