आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलब्धवादः ३६१
ज्ञास्यामीति त्रैकाल्योल्लेखस्य भेदनिश्चयमन्तरेणानुपपत्तेः ।
कथञ्चिदुपपत्तौ तदर्थस्यैव प्रतिसन्धिरुचितो न प्रवृत्तिविज्ञानार्था-
नामपि, न च तेभ्योऽपि भेदाग्रह इति चोक्तमेव ।
नापि विषयतः, स हि आकारो वा ? वस्त्वन्तरं वा ?
या प्रवृत्तिविज्ञानोंसे भी ? इसमे प्रथम विकल्प नहीं हो सकता । क्योंकि
"मैंने यह जाना था, मैं यह जानता हूँ, मैं यह जानूँगा" इस प्रकारका
त्रिकालका उल्लेख पूर्वापरज्ञानोंमें भेदनिश्चयके बिना हो नहीं सकता ।
अर्थात् अतीतत्व, वर्तमानत्व और भविष्यत्त्व आदि विरुद्ध धर्मोंका ग्रह
ही तो भेदग्रह है । अतः उनका ग्रह होनेपर कभी भी अभेदका ग्रह नहीं
हो सकता है । एवं क्रिया और कर्ताके स्वरूपसे भी भेदग्रह है ।
पूर्वोक्त तीनों प्रतीतियाँ अहमास्पद हैं, इसलिए अहमास्पदत्वेन
रूपेण अभेदग्रह यदि हो भी जाय तो भी उस अहमर्थका ही स्मरण होना
चाहिये न कि प्रवृत्तिविज्ञानके अर्थों ( विषयों ) का भी । यद्यपि यहाँ
प्रवृत्तिविज्ञानके विषय-घटपटादिके प्रतिसन्धानकी बात नहीं उठी है,
किन्तु विभिन्न ज्ञानोंके एककर्तृकत्वप्रतिसन्धानकी ही बात पूर्वमे उठी
है । अत पूर्वकथनके साथ "न प्रवृत्तिविज्ञानार्थानामपि" इस वचनका
विरोध प्रतीत होता है—तथापि यहाँ प्रवृत्तिविज्ञानसे अभिप्रेत है उसका
अन्त पाती आलयविज्ञान । और उसका विषय स्वयं वही है, क्योंकि
आलयविज्ञान स्वप्रकाश होनेसे अपने आपको ही विषय बनाता है ।
अतः यहाँ सिद्धान्तीके कथनका यह अभिप्राय है कि जिसमे भेदका
अग्रह होगा उसीका प्रतिसन्धान होना चाहिये । इसलिए "अहमज्ञा-
सिपम्" इत्यादि विभिन्न प्रतीतियोंमें अहमर्थमें ही भेदका अग्रह होनेसे
अहमर्थका ही प्रतिसन्धान होना चाहिये न कि पूर्वापर-विभिन्न आलय-
विज्ञानोंमें एककर्तृकत्वका प्रतिसन्धान होगा ।
यहाँ यह नहीं कह सकते कि—विज्ञानोंमे भी भेदका अग्रह है—
क्योंकि भेदनिश्चयके बिना त्रैकाल्यका उल्लेख नहीं हो सकता है, यह
बात कह ही दी गई है ।
विषयकी दृष्टिसे भी भेदाग्रह तथा उसके द्वारा प्रतिसन्धानका उप-
पादन नहीं होगा । क्योंकि यह विषय उक्त आलयविज्ञानका आकार