आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १६१
सामग्रीसाजात्यमन्तरेणाकस्मिकमापद्येत । अन्यथा तत्परम्प-
रालम्बनमपि विडम्बनमेव । भिन्नैस्तैस्तैरभेदव्यवहारसिद्धौ
व्यक्तिभिरेव तथाभूताभिरभिमतसिद्धेस्तदनुसरणप्रयासवैफ-
ल्क्यात् । तस्मादारोपव्यवहारस्याप्यनारोपितजात्यनादरेऽस-
म्भव एवेति ।
अस्तु तर्हि जात्यादौ बाधकादपोहसिद्धिरिति चेत्, व्यव-
हारस्यानन्यथासिद्धौ क्व बाधकम् ? अन्यथा विपक्षे बलवद्-
बाधकमुपनीयानन्यथासिद्धिविश्रान्तोऽपि स्वभावहेतुर्बाधक-
सकेगा ? क्योंकि भ्रान्तिरूप कार्योंका भ्रान्तित्वरूप साजात्य भी सामग्री-
साजात्यके बिना आकस्मिक होने लगेगा । अर्थात् कोई ज्ञान भ्रमात्मक
होता है और कोई ज्ञान अभ्रमात्मक, यह व्यवस्था कारणगत साजात्य
और वैजात्यके निमित्तसे ही है । अन्यथा सभी ज्ञान भ्रान्त ही होते
या अभ्रान्त ही होते ।
एवं, यदि कारणगत साजात्य न मानो तो बीज, धान्य और शालि-
कलम (बिचडा) आदिमे अङ्कुरादिप्रयोजकके रूपमे कुर्वद्रूपत्वपर-
म्पराकी कल्पना भी आपकी व्यर्थ ही होगी । क्योंकि जैसे भिन्न भिन्न
पिण्डोंसे ही अभेद (एकाकार) व्यवहार होना मानते हो, वैसे ही भिन्न
भिन्न बीजादिव्यक्तियोंसे ही अनुगत अङ्कुरादि कार्योंकी उत्पत्तिमें कोई
अनुपपत्ति नहीं होगी । फिर अङ्कुरसाजात्यके अनुरोधसे बीजादि-
व्यक्ति और उसको कारणपरम्परामे कुर्वद्रूपत्वपरम्परानुसरणका प्रयास
करना व्यर्थ है ।
इसीलिये भ्रमव्यवहार भी कहीं वास्तविक जातिकी प्रसिद्धिके बिना
असंभव ही है । अर्थात् वास्तविक सर्पत्वादिजाति यदि कहीं प्रसिद्ध न
हो तो रज्जुमे उसका आरोप भी नहीं हो सकता है ।
जातिबाधकनिरास
यदि कहें कि-अनेकव्यक्तिवृत्ति जाति, अनेकव्यक्तिवृत्ति संयोग या
अवयवी आदिके होनेमे बाधकप्रमाणके होनेसे अनायास अपोहकी
सिद्धि हो जायगी-तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि शङ्कित या
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