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सर्वकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 51 में से

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पृष्ठ 25

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असत् (मिथ्या) कैसे हो सकता है। संसार को मिथ्या मानने
पर प्रत्यक्ष प्रमाण से विरोध उपस्थित होगा। ऐसी आशंका
होने पर स्वप्न-दृष्टान्त से संसार को मिथ्या सिद्ध करते हैं-
संसारः स्वप्नतुल्यो हि रागद्वेषादिसंकुलः।
स्वकाले सत्यवद्भाति प्रबोधे सत्यसद्‌भवेत् ।।६।।
रागद्वेषादि से परिपूर्ण यह संसार अज्ञानदशा में सत्य के
समान भासित होता है। श्रवणादि से आत्मज्ञान होने पर यह असत्य
ही हो जाता है। जैसे निद्रा दोष के कारण मिथ्या स्वप्न सत्य के
समान भासता है और जागरण काल में मिथ्या सिद्ध होता है, तद्वद्
।।६।।
एक अन्य दृष्टान्त से जगत् के मिथ्यात्व को दृढ़ करते हैं-
तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा।
यावन्न ज्ञायते ब्रह्म सर्वाधिष्ठानमद्वयम् ।।७।।
जैसे शुक्तिगत नीलपृष्ठ, त्रिकोण आदि विषयक विशेष
ज्ञान जब तक नहीं होता तब तक शुक्ति में रजतज्ञान सत्य के
समान मालूम पड़ता है। ठीक उसी प्रकार सर्वाधिष्ठान, सच्चिदानन्द
स्वरूप, अद्वितीय ब्रह्म का ज्ञान जब तक नहीं होता तब तक जगद्रूप
से परिणत संसार भी भ्रान्ति से सत्य जैसा ही लगता है। ।।७।।
'ब्रह्म में ही सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च माया से कल्पित है'
इस तथ्य का प्रतिपादन करते हैं-
सच्चिदात्मन्यनुस्यूते नित्ये विष्णौ प्रकल्पिताः।
व्यक्तयो विविधाः सर्वा हाटके कटकादिवत् ।।८।।
सच्चिदानन्द, नित्य, सर्वत्र, अनुगत, व्यापक परमात्मा जो
कि सबका उपादान है, उसमें देव, तिर्यक्, मनुष्य, स्थावर तथा