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सर्वकोश
आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 51 में से

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प्रत्येक शरीर में भिन्न-भिन्न आत्मा उपलब्ध होता है, फिर
आत्मा में कैवल्य (अद्वितीयत्व) कैसे है, ऐसी शङ्का होने पर
उत्तर देते हैं-
अविच्छिन्न इवाज्ञानात्तन्नाशे सति केवलः।
स्वयं प्रकाशते ह्यात्मा मेघापायेऽंशुमानिव ।।४।।
परिपूर्ण, अद्वितीय आत्मा में अज्ञान से परिकल्पित उत्तम-अधम
शरीरों के तादात्म्याध्यास से परिच्छिन्नता भासती है। अत-
अविवेक से ही भेद का भान हो रहा है, तात्त्विकदृष्टि से नहीं।
आत्मानात्मविवेक से अज्ञान नष्ट होने पर अद्वितीय आत्मा
प्रकाशमान होता है, जैसे मेघमण्डल के हटने पर आदित्य ।।४।।
शङ्का- आत्मा में अभेदबुद्धि युक्तिसंगत नहीं हैं,
वृत्त्यात्मक ज्ञान (अखण्डाकार वृत्ति) से भी आत्मा में भेद
सिद्ध होता है, इस पर कहते हैं-
अज्ञानकलुषं जीवं ज्ञानाभ्यासाद्धि निर्मलम्।
कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येज्जलं कतकरेणुवत् ।।५।।
चिरकाल के अभ्यास से दृढ़ीभूत ज्ञान, अज्ञान नाश के
द्वारा अज्ञान के कार्य अन्तःकरणादि का पूर्णरूपेण नाश करके
कर्तृत्वादि आध्यासिक धर्मों का नाश करके जीव को निर्मल बनाकर
अन्त में स्वयं भी नष्ट हो जाता है। वृत्ति अज्ञान का कार्य होने से,
वृत्ति में प्रतिबिम्बित ज्ञान आत्माभासरूप होने से आत्मा में ही लीन
हो जाता है। तब आत्मा प्रकाशित होता है। जैसे निर्मली बीज का
चूर्ण (कतकरज) सम्पूर्ण जल को निर्मल बनाकर स्वयं भी नष्ट हो
जाता है। ।।५।।
अपरोक्ष रूप से अनुभव में आ रहा संसार अत्यन्त