आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)
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विधिमुखेन 'आत्मबोध' का प्रतिपादन किया जाता है ।।१।।
शङ्का- जब तप, मन्त्र, कर्मयोग आदि अनेक
साधन वर्तमान है तो मोक्ष के लिये प्रधान रूप से बोध को
ही क्यों कहा जाता है। इस विषय में कहते हैं-
बोधोऽन्यसाधनेभ्यो हि साक्षान्मोक्षैकसाधनम्।
पाकस्य वह्निवज्ज्ञानं बिना मोक्षो न सिद्ध्यति।।२।।
तप, मन्त्र, कर्मयोगादि साधन ज्ञान के माध्यम से परंपरया
मोक्ष की सिद्धि करते हैं। जबकि ज्ञान मोक्ष का साक्षात् साधन है।
ज्ञान तो उत्पत्ति मात्र से ही सम्पूर्ण अज्ञान को नाश करके मुमुक्षुओं
को स्वाराज्य में अभिषिक्त कर देता है। इसलिए अन्य साधनों की
अपेक्षा ज्ञान की प्रधानता कही गयी है। इस बात को दृष्टान्त द्वारा
दृढ़ करते हैं कि जैसे काष्ठ, जल, पात्र आदि साधन होने पर भी
वह्नि के बिना पाकक्रिया नहीं होती। ठीक उसी प्रकार ज्ञान के बिना
मोक्ष की सिद्धि नहीं होती। ।।२।।
विलक्षण शक्ति से युक्त होने से कोई कर्म ही अज्ञान
को नष्ट कर देगा, अतः आत्मज्ञान से क्या लाभ? ऐसी
आशङ्का का निराकरण करते हुए कहते हैं-
अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत्।
विद्याऽविद्यां निहन्त्येव तेजस्तिमिरसङ्घवत्।।३।।
कर्म और अज्ञान में विरोध न होने से अज्ञानात्मक कर्म, अन्तः-
करणमलिनता रूपी काम क्रोध के कारण अज्ञान का नाश करने में
समर्थ नहीं है। किन्तु ज्ञान प्रकाशस्वरूप होने से अज्ञान का नाश
करने में समर्थ हैं। जैसे तेजःपुञ्ज अन्धकार का नाश करता है,
ठीक वैसे ही ।।३।।