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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पादेचैवास्यरोमाणि द्विपादेश्मश्रु केवलम् ।

यमस्मृतिः ॥ ९

पादेचैवास्यरोमाणि द्विपादेश्मश्रु केवलम् ।
त्रिपादेतुशिखावर्जं मूलेसर्वंसमाचरेत्॥ ५३ ॥
सर्वांन्केशान्समुद्धृत्य छेदयेदंगुलद्वयम् ।
एवमेवतुनारीणां मुंडमुंडायनंस्मृतम् ॥५४॥
नस्त्रियावपनंकार्यन्नचवीरासनंस्मृतम् ।
नचगोष्ठेनिवासास्ति नगच्छंतीमनुव्रजेत् ॥५५॥
राजावाराजपुत्रोवा ब्राह्मणोवाबहुश्रुतः ।
अकृत्वावपनंतेषां प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥५६॥
केशानांरक्षणार्थंच द्विगुणं व्रतमादिशेत् ।
द्विगुणेतुव्रतेचीर्णे द्विगुणैवतुदक्षिणा॥ ५७॥
द्विगुणं चेन्नदत्तं हि केशांश्चपरिरक्षयन् ।
पापं नक्षीयतेहंतुर्दाताचनरकंव्रजेत् ॥५८ ॥
अश्रौतस्मार्तविहितं प्रायश्चित्तंवदंतिये ।
तान्धर्मविघ्नकर्तॄंश्च राजादंडेिनपीडयेत् ॥५९॥


चौथाई कृच्छ्र करने में केवल रोमों का, और अर्द्धकृच्छ्र में केवल डाढी का और पौन कृच्छ्र में चोटी के विना सब तथा पूरा कृच्छ्र करने में चोटी सहित सब केशों का मुंडन पुरुष करावे ॥ ५३॥ स्त्रियां का मुंडन और मुंडवाना यह कहा है कि सब केशों को ऊपरको उभार कर दो २ अंगुल काट दे ॥५४ क्योंकि स्त्रियों का मुंडन और वीरासन से बैठना--और गोशालामें वास नहीं है और चलती गौके पीछे भी स्त्री न चलै ॥ ५५॥ राजा का पुत्र अथवा बहुश्रुत ब्राह्मण इन का मुंडन नहीं करा कर प्रायश्चित्त बता देवे ॥५६॥ केशों को न मुंडाने की दशा में दूना व्रत करावे और दूना व्रत पूरा करने पर दूनी ही दक्षिणा देवे ॥५७॥ दूनी दक्षिणा दिये बिना यदि केशों की रक्षा करे तो मारने वाले का पाप नष्ट नहीं होता और प्रायश्चित्त देने वाला नरकमें जाता है ५८॥ वेद और धर्मशास्त्र में जो प्रायश्चित्त नहीं कहा है उस को जो पुरुष बतावें धर्म में विघ्न करने वाले उन पुरुषों को राजा दंड देवे ॥ ५९ ॥

९०

भाषार्थसहिता ॥

नचेत्तान्पीडयेद्राजा कथंचित्काममोहितः ।
तत्पापंशतधाभूत्वा तमेवपरिसर्पति॥६०॥
प्रायश्चित्तेततश्चीर्णे कुर्याद्ब्राह्मणभोजनम्।
विंशतिंगांवृषंचैकं दद्यात्तेषांचदक्षिणाम् ॥६१॥
कृमिभिर्व्रणसंभूतैर्मक्षिकाभिश्चपातितैः ।
कृच्छ्राद्धंसंप्रकुर्वीत शक्त्यादद्याच्चदक्षिणाम् ॥६२॥
प्रायश्चित्तंचकृत्वावै भोजयित्वाद्विजोत्तमान् ।
सुवर्णमाषकंदद्यात्ततःशुद्धिर्विधीयते ॥६३॥
चंडालश्वपचैःस्पृष्टे निशिस्नानंविधीयते ।
नवसेत्तत्ररात्रौतु सद्यःस्नानेनशुद्ध्यति ॥ ६४ ॥
अथवसेद्यदारात्रौ अज्ञानाद्विचक्षणः ।
तदातस्यतुतत्पापं शतधापरिवर्त्तते ॥ ६५ ॥
उद्गच्छंतिहिनक्षत्राण्युपरिष्टाच्चयेग्रहाः ।
संस्पृष्टेरश्मिभिस्तेषामुदकेस्नानमाचरेत् ॥ ६६ ॥


यदि राजा अपने मोहवश होकर उनको दण्ड न दे तो वह पाप सौगुना होकर उस राजा को लगता है ॥६०॥

फिर प्रायश्चित्त पूरा होने पर ब्राह्मणों को जिमावे और बीशगौ और एक बैल उन ब्राह्मणों को दक्षिणा दे ॥६१॥

यदि किसी मनुष्य के शरीर में मक्खी बैठने से घाव में कीड़े पड़जायं तो अर्द्धकृच्छ्र प्रायश्चित्तकरे और यथाशक्ति दक्षिणा भी दे ॥ ६२ ॥

प्रायश्चित्त करके और ब्राह्मणों को जिमा कर एकमासा सोना देने से शुद्धि होती है ॥६३॥

चांडाल अथवा श्वपच रात में यदि छूले तो स्नान करना चाहिये । वहां रात में न बसे और शीघ्र स्नानकरनेसे शुद्ध होता है जो॥६४॥

मूर्खरात्रि को अज्ञान से बसे तो उस समय वह पाप सौ गुना उसको लगता है ॥ ६५ ॥

जो तारे वा ग्रह टूटते हुए ऊपर को जाते हैं उन तारों अथवा ग्रहों की किरणों से स्पर्श हो जाय तो जल में स्नान करे ॥ ६६ ॥

६

यमस्मृतिः ॥ १९

कुड्यांतर्जलवल्मीक मूषिकोत्करवत्मसु
श्मशानेशौचशेषेषु नग्राह्याःसप्तमृत्तिकाः ॥६७॥
इष्टापूर्त्तन्कर्त्तव्यं ब्राह्मणेनप्रयत्नतः ।
इष्टेनलभतेस्वर्गं पूर्त्तेमोक्षंसमश्नुते ॥६८॥
वित्तापेक्षंभवेदिष्टं तडागंपूर्त्तमुच्यते ।
आरामञ्चविशेषेण देवद्रोण्यस्तथैवच ॥ ६९ ॥
वापीकूपतडागानि देवतायतनानिच
पतितान्युद्धरेद्यस्तु सपूर्त्तफलमश्नुते ॥ ७० ॥
शुक्लायामूत्रंगृह्णीया-त्कृष्णायागोःशकृत्तथा ।
ताम्रायाश्चपयोग्राह्यं श्वेतायादधिचोच्यते ॥ ७१ ॥
कपिलायाघृतंग्राह्यं महापातकनाशनम् ।
सर्वतीर्थेनदीतोये कुशैर्र्व्यंपृथक्पृथक् ॥ ७२ ॥
आहृत्यप्रणवेनैव उत्थाप्यप्रणवेनच ।
प्रणवेनसमालोड्य प्रणवेनतुसंपिबेत् ॥ ७३ ॥


दीवाल के भीतर की-जल के मध्यकी-वामीकी-मूसों की खोदी-मार्ग की-श्मशान की और शौच की बची हुई इन सात स्थानों की मट्टी शुद्धि के लिये ग्रहण नहीं करनी चाहिये ॥६७॥ इष्ट (यज्ञ आदि) और पूर्त्त (कूप आदि) ब्राह्मण को बड़े प्रयत्न से करने चाहिये। इष्ट से स्वर्ग और पूर्त्त से मोक्ष प्राप्त होता है ॥६८॥ जैसा धन होवैगा ही यज्ञ होसकता है। और तालाब और विशेष कर बाग तथा देव द्रोणी (तीर्थ वा प्याव) इन्हें पूर्त कहते हैं ॥ ६९ ॥ बावड़ी-कुआ-तालाब और देवमंदिर-इतने यदि पतित (टूटे फूटे) हों तो इनका जो उद्धार (मरम्मत) कराने वाला है वह भी पूर्त के फल (मोक्ष) को भोगता है ॥ ७० ॥ सफेद गौका मूत्र-कालीका गोबर-लालका दूध-श्वेतका दही ॥७१॥ और कपिला का घी ले तो यह पंचगव्य महापातकों को नष्ट करता है-सब तीर्थों में वा नदीके जलमें इन गोमूत्र आदि द्रव्योंको पृथक् २ कुशाओं से ॥ ७२ ॥ प्रणव का जपकर इकट्ठा करै प्रणव पढ़ पढ़के उठाये और प्रणव का उच्चारण कर के ही पीवै ॥ ७३ ॥