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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

द्वितीयेनास्तिदोषस्तु प्रथमेनैवशुद्ध्यति ॥ ७५ ॥

१२ माधवार्यसंहिता ॥

पलाशमध्यमेपर्णे भांडैताम्रमयेतथा ।
पिबेन्पुष्करपर्णेवा ताम्रेवामृन्मये शुभे ॥ ७४ ॥
सूतकेतुसमुत्पन्ने द्वितीयेसमुपस्थिते ।
द्वितीयेनास्तिदोषस्तु प्रथमेनैवशुद्ध्यति ॥ ७५ ॥
जातेनशुद्ध्यतेजातं मृतेनमृतकतथा ।
गर्भसंस्रवणेमासे त्रीण्यहानिविनिर्दिशेत् ॥ ७६ ॥
रात्रिभिर्मासतुल्याभि-र्गर्भस्रावेविशुद्ध्यति ।
रजस्युपरतेसाध्वी स्नानेनस्त्रीरजस्वला ॥ ७७ ॥
स्वगोत्राद्भ्रश्यतेनारी विवाहात्सप्तमेपदे ।
स्वामिगोत्रेणकर्त्तव्या-स्तस्याःपिंडोदकक्रियाः ॥ ७८ ॥
द्वेपितुःपिंडदानंस्या--त्पिंडंपिंडद्विनाम ता ।
षण्णांदेयास्त्रयःपिंडा एवं दातानमुह्यति ॥ ७९ ॥
स्वेनभर्त्रासहश्राद्धं माताभुङ्क्त्वासदैवतम् ।


ढाक के बीचके पत्ते में वा तांबे के पात्र में वा कमल के पत्ते में अथवा लाल मिट्टी के पात्र में उस पंचगव्य को पीवे ॥७४॥ सूतक के होनेपर यदि दूसरा सूतक हो जाय तो दूसरे सूतक का दोष नहीं होता प्रथम के साथ उन की भी शुद्धि हो जाती है ॥७५॥ जन्म अशौच के संग जन्म अशौच की और सूतक अशौच के संग सूतक अशौच की शुद्धि हो सकती है । एक महीने के गर्भपात में तीन दिन की अशुद्धि होती है ॥७६॥ जितने मास का गर्भपात हो उतनी ही रात्रियों में शुद्धि होती है-और रज की निवृत्ति हुये पर सुपवित्रा रजस्वला स्त्री स्नान से शुद्ध होती है ॥७७॥ स्त्री विवाह के अनन्तर सप्तपदी होने पर अपने मा बाप के गोत्र से पृथक हो जाती है उस के बाद वह मर जावे तो पतिके गोत्र में ही उस का पिंड और जलदान आदि कर्म करना चाहिये ॥७८॥ पिता को दो पिण्ड दे और प्रत्येक पिण्ड में दो नाम (अपरलोक) आते हैं छः को तीन पिण्ड देने चाहिये ऐसे करने से पिण्डों का दाता मोहित नहीं होता ॥ ७९ ॥ माता और पितामही (दादी) और प्रपितामही (पड़दादी) ये तीनों अपने पतियों के संग देवता (विश्वेदेवा) समेत

यमस्मृतिः ॥ १३

पितामह्यापिस्वेनैव स्वेनैवप्रपितामही ॥ ८० ॥
वर्षेवर्षेतु कुर्वीत मातापित्रोस्तुसत्कृतिम् ।
अदैवंभोजयेच्छ्राद्धं पिंडमेकंतुनिर्वपेत् ॥ ८१ ॥
नित्यंनैमित्तिककाम्यं वृद्धिश्राद्धमथापरम् ।
पार्वणंचेतिविज्ञेयं श्राद्धंपंचविधंबुधैः ॥ ८२ ॥
ग्रहोपरागेसंक्रांतौ पर्वोत्सवेमहालये ।
निर्वपेत्त्रीन्नरःपिण्डा-नेकमेवमृतेहनि ॥ ८३ ॥
अनूढानपृथक्कन्या पिंडेगोत्रेचसूतके ।
पाणिग्रहणमन्त्राभ्यां स्वगोत्राद्भ्रश्यतेततः ॥ ८४ ॥
येनयेनतुवर्णेन याकन्यापरिणीयते ।
तत्समंसूतकंत्यत्ति तथापिंडोदकेपिच ॥ ८५ ॥
विवाहेचैवसंप्राप्ते चतुर्थेहनिरात्रिषु ।
एकत्वंसाभवेद्भर्तुः पिंडेगोत्रेचसूतके ॥ ८६ ॥
प्रथमेन्हिद्वितीयेवा तृतीयेवाचतुर्थके ।
अस्थिसंचयनंकार्यं बंधुभिर्हितबुद्धिभिः ॥८७ ॥


श्राद्ध को भोगती हैं ॥८०॥ (प्रतिवर्ष) माता और पिता का सत्कार (श्राद्ध) करे देवता (विश्वेदेवा) के बिना श्राद्ध जिमावे और एक पिण्ड दे ॥८१॥ नित्य नैमित्तिक काम्य वृद्धिश्राद्ध और पार्वण यह पांच प्रकार का श्राद्ध बुद्धिमान् जाने। ग्रहण-संक्रांति-पर्व-उत्सव-और महालय (कनागत) इनमें मनुष्यतीन पिण्ड दे और जिस दिन माता पिता आदि मरे हों उस दिन एक ही पिण्ड देवे ८३। बिना विवाही कन्या पिण्ड गोत्र और सूतकमें पृथक् नहीं है फिर विवाह के मन्त्रों से अपने गोत्र से पृथक् हो जाती है ॥८४॥ जिस २ वर्ण के पुरुषके संग जिस कन्या का विवाह हो उसी वर्णके समान सूतक और पिण्ड वा जलदान को प्राप्त होती है ८५ विवाह हुये पश्चात् वह कन्या चौथे दिन रात्रि में पिण्ड-गोत्र, और सूतक में पति की एकता को प्राप्त होती (अर्थात् चतुर्थी कर्म का होम होने पर कन्या पति के गोत्र में मिल जाती है) ॥ ८६ ॥ पहले दूसरे तीसरे अथवा चौथे दिन हितकारी बन्धु अस्थिसंचयन करें ॥८७॥