आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
ॐ
समर्पणम्
श्रीयुत मान्यवर क्षत्रियवंशावतंस परमोदार सनातन
आर्य्यधर्म्मरक्षक श्रीमन्महाराजाधिराज सर नाहरं
सिंह बहादुर शाहपुराधीशेष्वित्-उदयनाथ-
यर्णसिंहस्य कोटिशोन्नतय स्स्फुरन्तुतराम्
भो !
आप ने सनातनार्य्यधर्म्म की उन्नति करके हम भारत वासियों
का परम उपकार किया है। ईश्वर श्रीमान् जैसे धर्म्मरक्षक, दानशील,
आदर्शपुरुष और आर्य्यग्रन्थों के उन्नायक महाराजों की प्रतिदिन
संख्या बढ़ावे।
श्रीमान् की रुचि स० आ० ध० की ओर देख कर मैंने वेद के छः
अङ्गों में से नेत्ररूपी वेदाङ्ग ज्योतिष के-उस अपूर्व ग्रन्थ का भाषानुवाद
किया है जिस में आज १४०१ वर्ष पूर्व ही से पृथिवी-भ्रमण-लिख रक्खा है।
यह आर्यभटीय वा आर्य्यसिद्धान्त ग्रन्थ संस्कृत टीका सहित जर्मन
देश में छपा था-आज तक भारत वर्ष में इस की ओर किसी का ध्यान
नहीं गया था मैं ने बड़े परिश्रम से इसे जर्मन् देशान्तर्गत लिपेजिक स्थान
से मंगवा कर सटीक सानुवाद एवं विस्तृत भूमिका सहित छपवाया है।
इस सटीक सानुवाद वेदाङ्ग ज्योतिष ग्रन्थ को मुद्रित करा श्रीमानों
के कर कमलों में विनयपूर्वक अर्पण कर आशा करता हूं कि श्रीमान्
इस को स्वीकार कर मुझ अन्यान्य आर्षग्रन्थों के सानुवाद प्रकाशित
करने में उत्साहित करेंगे।
शास्त्रप्रकाश-कार्यालय श्रीमतामाज्ञाकारी-
स्थान-मधुरापुर, बिद्दूपुर } क्षत्रिय कुमार-
जि० मुज़फ़्फ़रपुर उदयनारायणसिंह
ओ३म्
प्रस्तावना ।
वेद आर्यशास्त्रों का शिरोभूषण है । वेद सम्पूर्ण आर्यशास्त्रों की
अपेक्षा प्राचीन और सब शास्त्रों का एकमात्र आकर कह कर प्रसिद्ध है ।
विदेशीय-जर्मेन देश वासी पं० महमैल मूलर साहब कहते हैं कि-*वेद
सब विद्याओं का मूल है । अङ्ग सहित वेद ज्ञान विना-भारतवर्षीय किसी
आर्यग्रन्थ पर कुछ लेख लिखना बहुत कठिन है। आज ऐसे अमूल्य रत्न वेद
का-यथावत् प्रचार न होने के कारण हमारे देश में प्रति दिन मत मतान्तरों
तथा फूट की वृद्धि होती जाती है और लोगों को वैदिक धर्म से अश्रद्धा
होती जाती है । इस वेद के तात्पर्य समझने के लिये हमारे ऋषियों ने इस
के छः अङ्ग रचे हैं । इन शिक्षा आदि छः अङ्गों में से-वेदाङ्ग ज्योतिष के न
जानने से हम भारतवासिगण वेद, शास्त्र, पुराण प्रतिपादित गूढ़ार्थ के सम-
झने में असमर्थ होकर वेद, ब्राह्मण, पुराण, तन्त्र आदि प्रतिपादित ज्योतिष
मूलक आध्यात्मिक वर्णन का उलटा वो निन्दित आशय समझ कर हम अपने
ऋषियों को गुरुतल्पगामी, किन्हीं को चोर, ब्रह्मा को अपनी कन्या के पीछे
मैथुनार्थ दौड़ना, रासलीला, यमयमी सम्बाद ( भाई वहन का सम्बन्ध )
श्रीकृष्ण जी का व्रजाङ्गनाओं के साथ नाचना आदि अकर्त्तव्य कर्म करना,
गौतम अहल्या की कथा, चन्द्रमा की ३३ कन्या, समुद्र-मथन आदि का युक्ति-
युक्त तात्पर्य नहीं समझ समझा सकते । आज हम उन्हीं उपरोक्त आलंङ्का-
रिक लेखों में से-दो तीन लेखों का असली तात्पर्य पाठकों को सुनावेंगे-
जिस से हमारे पाठक यह समझ जायेंगे कि निस्सन्देह असली "सिद्धान्त-
ज्योतिषशास्त्र" के जानने ही से वेद, ब्राह्मण, पुराण, आदि प्रोक्त उपाख्यानों
की सङ्गति लगा सकेंगे। अब हम यहां पहिले 'समुद्रमथन,' 'रासलीला' और
'वस्त्र हरणलीला' का रहस्य कह कर-"आर्यभटीय" पुस्तक का अनुवाद करेंगे।
उदयनारायणसिंह-अनुवादक
Every one acquainted with indian literature must have observed
how impossible it is to open any book on Indian subjects without
being thrown back upon an earlier authority; which is generally
acknowledged by the Indians as the basis of all thier knowledge
whether sacred or profane. This earlier authority which we find
alluded to in theological and philosophical works as well as in
poetry in codes of law in astronomical, grammatical, matrical and
lexicographical compositions is called by one comprehensive name
the Veda. (P. Max Muller H of Ancient Sanskrit Literature, P. 2)
२ आर्य्यभटीयस्य-
समुद्र-मन्थन ।
“ऋषीणां भारतीभाति सरला-गहनान्तरा ।
धीरोस्तत्तत्व मृच्छन्ति मुह्यन्ति प्राकृता जनाः” ॥
॰ भा०:-अर्थात् प्राचीन ग्रन्थों की वाक्य-शैली ऊपर से तो बहुत सरल
मालूम होती है परन्तु उन के आशय बहुत कठिन हुआ करते जिन को
विद्वान् लोग तो समझ लेते पर प्राकृत पुरुष मुग्ध होकर अर्थ का अनर्थ
करने लगते हैं ॥
समुद्र-मन्थन उपाख्यान महाभारत के आदि पर्व में १५-से १९ अध्यायों
में इस प्रकार वर्णित है कि:-
एक समय महात्मा देवगण सुमेरु पर्वत के ऊपर एकत्र होकर अमृत
प्राप्ति के लिये परस्पर विचार करने लगे । इसी अवसर में परम देव नारा-
यण आकर बोले “हे पितामह ! देवगण और असुरगण मिलकर समुद्र मथन
में प्रवृत्त हों । इस के अनुसार देव और असुर गण मन्थन-दण्ड के योग्य
मन्दर पर्वत को उखाड़ने लगे, परन्तु वे कृत कार्य्य न हो सके । इस के बाद
परम देव नारायण की आज्ञानुसार अनन्त देव ने मन्दर पर्वत को जड़ से
उखाड़ा और देवगण मन्दर पर्वत को लेकर समुद्र के तीर पर आये । अमृत
पाने की आशा में समुद्र अपने मन्थन में सम्मत हुआ-और कूर्मर राज ने
मन्दर पर्वत को अपने ऊपर धारणा करना स्वीकार किया ॥
देव राज इन्द्र, कूर्म के पीठ पर ‘मन्दर’ रख कर मन्थन रज्जु (म-
हने की डोरी) वासुकी (सर्प) द्वारा मन्दर को बांधकर समुद्र मन्थन में
प्रवृत्त हुए । असुरों ने वासुकी के गले के ऊपरले भाग को पकड़ा। और
देवगण ने पूच्छ की ओर पकड़ा । विलोडन करते २ मन्दर पर्वत पर के
बड़े २ वृक्षों और औषधियों से निर्यास और रस समुद्र जल में निपतित
होने लगा और अमृत के तुल्य रस स्रोत में देवताओं का शरीर आमृत
होने लगा, देवगण अमर हुए । अपूर्व रस से मिश्रित हो समुद्र का जल दूध
हो गया और दूध से घृत उत्पन्न हुआ ।
समुद्र मन्थन में पहिले दूध से चन्द्रमा उत्पन्न हुए और घृत से लक्ष्मीदेवी
सुरादेवी, उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा और अत्यन्त उज्ज्वल कौस्तुभ मणि क्रमशः
उत्पन्न हुए। कौस्तुभ मणि परम देव नारायण ने अपने हृदय में धारण किया।
भूमिका ॥ ३
पारिजात और सुरभि उत्पन्न हुयी। लक्ष्मी, सोम, सुरा और उच्चैःश्रवा आदित्य
मार्ग में देवताओं के निकट गये इस के । अनन्तर धन्वन्तरि अमृत से भरे
श्वेतकमण्डलु हाथ में लिये ऊपर हुए । और दान्त में चारों वेद से विभूषित
'ऐरावत' हाथी निकला। देवराज ने ऐरावत को लिया। अन्त में कालकूट विष
उत्पन्न हुआ । हलाहल विष के गन्ध से तीनों लोक मोहित हुआ। ब्रह्मा की
आज्ञा से महादेव ने इस विषपान कर लिया । तब से महादेव जी का नाम
'नीलकंठ' हुआ । इधर अमृत पान के अभिलाषी देवता और असुरों में
युद्ध उपस्थित हुआ, परम देव नारायण ने मोहिनी रूप धर कर असुर के
निकट उपस्थित हुए। इस मोहिनी मूर्त्ति को देख कर विमूढ़चित्त असुर गण
परिवेषणार्थ अमृत के भाण्ड को मोहिनी के हाथ में समर्पण करने में सम्मत
हुए । अमृत को हर कर मोहिनी संग्राम से चल निकली । संग्राम सनय
देवगण मोहिनी के हाथ के अमृत को पान करने लगे। इसी अवसर में देवता
का रूप धारण कर छिपा हुआ 'राहु' अमृतपान करने में प्रवृत्त हुआ। किन्तु
चन्द्रमा और सूर्य ने इस की चुगली कर इस की कपटता को प्रकाशित कर
दिया और परम देव नारायण ने 'सुदर्शन' ( चक्र ) द्वारा राहु के शिर
को काट डाला ।
कटा हुआ राहु का मस्तक प्रकाश मण्डल में उड़ कर पृथिवी पर गिर
पड़ा । जो वैर निर्यातनार्थ ( बदला लेने के लिये ) अब तक बीच २ में राहु,
चन्द्रमा और सूर्य को ग्रस लेता है जिस का नाम ग्रहण है ॥
देवासुर समर में स्वयं नारायण ने प्रवेश कर सुदर्शन द्वारा असुर दल
को छिन्न भिन्न कर दिया और असुर मुण्ड भूमि पर शोभा देने लगे । मरने
से अवशिष्ट असुरों ने रण में हार कर पृथिवी और समुद्र जल में प्रवेश
किया । देवराज प्रमुख देवताओं ने अमृत भाण्ड अर्जुन को प्रदान किया ।
श्रीमद्भागवत के ८ म स्कन्ध में ५ म अध्याय से ११ वें अध्याय तक
समुद्र मथन का वर्णन है। भागवत के मत से जहां २ भेद दीख पड़ता है, उस
का सारांश नीचे लिखा जाता है । महाभारत में देवताओं को अमृत पीने
की इच्छा क्यों हुई ? इस का कारण नहीं लिखा है ; किन्तु श्रीमद्भागवत् में
लिखा है कि अत्रि के पुत्र शङ्करांश महर्षि दुर्वासा के अभिशाप से देवराज
इन्द्र श्रीभ्रष्ट हुए । असुर युद्ध में देव-सेना हार गयी । इन्द्रादि देवगण ने
स्वर्गराज्य से ताड़ित हो भूतल और पाताल पर आकर आश्रय लिया ।
४ आर्य्यभटीयस्य-
असुर गण ने स्वर्ग राज्य पर अपना अधिकार जमाया । यज्ञ आदि एक मात्र
बन्द हो गया । भूख से पीड़ित इन्द्र आदि कों ने निरुपाय हो सुमेरु पर्वत की
चोटी पर जाय ब्रह्मा की शरण लियी । और ब्रह्मा, प्रमुख देवगण की स्तुति
से सन्तुष्ट होने परमदेव नारायण ने देवराज इन्द्र को उपदेश दिया कि अमृत-
पान हे बलवान् न हो कर तुम असुरों गण को रण में जीत नहीं सकते ।
और देवता एवं असुरों के मिले बिना समुद्र मन्थन से अमृत मिलने का
अन्य दूसरा उपाय नहीं । इसलिये असुरगण के साथ कपट सन्धि कर दोनों
दल मिलाकर समुद्र मन्थन करो । समुद्र मन्थन से उत्पन्न अमृत परिवेश्न के
समय मैं असुरों को ठग कर देवताओं को अमृत पान कराऊंगा । नारायण
के आदेश से ईन्द्र ने असुर पति रैवत मनु-पुत्र बलि राजा के साथ सन्धि
स्थापन कर समुद्र मन्थनार्थ उद्योग किया । इस के बाद देवता और असुर
गण ने मन्दर पर्वत को उखाड़ा और गरुड़ के पीठ पर मन्दर को रख कर
समुद्र के किनारे ले आये । समुद्र मन्थन के पहिले हलाहल विष और क्रम
से सुरभि, उच्चैःश्रवा, ऐरावत, ८ दिग्गज, और अभ्रमु प्रभृति ८ हस्तिनी,
पारिजात पुष्प, अप्सरा, कमला देवी, वारुणी, कलस हस्त धन्वन्तरि ऊपर
हुए । राहुबध उपाख्यान इस पुराण में भी है ।
विष्णुपुराण के १ म अंश, ९ म० अध्याय में समुद्र मन्थन का वर्णन है ॥०
विष्णुपुराण के मत से समुद्र मन्थन में पहिले सुरभि, क्रम से वारुणी, पारि-
जात, शीतांग्शु चन्द्रमा, हलाहल विष, कमण्डलु हस्त धन्वन्तरि, और श्रीदेवी
उत्पन्न हुईं । किन्तु विष्णुपुराण में राहुवध का वर्णन नहीं है । ब्रह्म
वैवर्त्त पुराण के प्रकृति खण्ड के ३८ वें अध्याय में समुद्र मन्थन का वर्णन है ।
ब्रह्माण्ड पुराण के मत से समुद्र मन्थन में सब से पहिले धन्वन्तरि और क्रम
से अमृत, उच्चैःश्रवा, नाना रत्न, ऐरावत, लक्ष्मीदेवी, सुदर्शन चक्र निकले
हुए । इन के अतिरिक्त अन्यान्य पुराणों में भी समुद्रमन्थन का वर्णन है ।
पुराणों में समुद्र मन्थन का वर्णन है कहने से अशिक्षित लोगों में इस
व्यापार को रूपक कह कर ग्रहण करना नहीं चाहते । किन्तु उपाख्यान के
सम्भव या असम्भव होने की समालोचना करने पर इस की रचना अर्थवाद
से भरा है यह सहज ही में सिद्ध होता है ।
पहिले तो मन्दर पर्वत का उखाड़ना कैसे सम्भव होगा ? दूसरे मथने की
रस्सी वासुकी (सर्प) मथते समय जब उसी वासुकी शेष ने मन्दर पर्वत को
भूमिका ॥ ५
धारण किया तो उस समय पृथिवी किस पर थी ? (क्योंकि पुराण में लिखे
अनुसार लोग समझते हैं कि शेष नाग पर पृथिवी ठहरी है) तीसरे, पृथिवी
पृष्ठ २० करोड़ वर्ग माइल है, उस में १५ करोड़ माइल में समुद्र विस्तृत है ।
इस सुविस्तीर्ण समुद्र का मन्थन कैसे सम्भव हो सकता ? चौथे, विष्णुपुराण
के मत से महर्षि दुर्वासा प्रदत्त पारिजात माला देवराज इन्द्र ने ऐरावत के
शिर पर पहिना दिया, ऐरावत कर्त्तृक महर्षि प्रसादभूत यह पारिजात माला
भूमि के ऊपर फेंकी गई इस से महर्षि दुर्वासा के क्रोध की उत्पत्ति हुई ।
और उसी क्रोध के कारण महर्षि का शाप हुआ। उस के पश्चात् समुद्र मन्थन
में ऐरावत की उत्पत्ति हुई यह क्योंकर सम्भव होगा ? पञ्चम, महाभारत में
लिखा है कि समुद्र मन्थन से निकले हुये रत्न आदित्यमार्ग से (अयन मार्ग से)
देवताओं के समीप गये । यदि देवगण ने पृथिवी पर आकर पृथिवी पर के
मन्दर पर्वत को उखाड़ कर पृथिवी पर के समुद्र के तीर में रहकर समुद्र
मन्थन किया, तो मथने से उत्पन्न रत्न आदि आकाशस्थ अयन मार्ग में किस
प्रकार देवताओं के निकट जासकते ? सुतरां यह अवश्य ही मानना पड़ेगा
कि इस उपाख्यान में अवश्य ही कोई अति गूढ़ अभिप्राय है ।
वेद पढ़ने से हमे इस बात का ज्ञान हुआ है कि 'समुद्र,' 'सागर,'
शब्दों से अधिकतर स्थानों में जल का वर्णन किया गया है ।
और वेदाङ्ग + निरुक्त शास्त्र में (१४।१५) “अन्तरिक्ष नामानि सगर
समुद्र” ऐसा उल्लिखित है । “समुद्रात् अन्तरिक्षात् इति सायनः” ।
और पुराण में जल शब्द कारण वारि अर्थ में व्यवहृत दृष्ट होता है *सुतरां
महर्षियों ने पुराणों में समुद्र मन्थन समय में समुद्र और सगर शब्द को आ-
काश अर्थ में व्यवहार किया है ऐसा बोध होता है। और समुद्र मन्थन अर्थ से
आकाशस्थ पदार्थ का मन्थन समझना उपाख्यान को सङ्गत और संलग्न होना-
बोध होता है। और मन्थन से निकले हुए रत्न आदि देवता के निकट अयन
मार्ग से जा सकते । समुद्र मन्थन उपाख्यान का प्रकृत अर्थ यह है कि समुद्र
नाम अन्तरिक्ष और मन्थन नाम-खगोलस्थ दिव्य ग्रह, नक्षत्र आदिक के रूप,
गति स्थिति आदि का पता लगाना (Astronomical deep enquiry) से
- सुदासे दंस्रा वसु बिभ्रता रथे वृक्षो वहतमश्विनी । रयिं समुद्रा दुत
दिवस्पृशंस्मे धत्तं पुरुस्पृहम् । ऋग्वेदे ।०१ । ४७ । ६ ।
*उत्ससर्ज च कोपेन ब्रह्माण्डं गोलके जले। ब्रह्म वै० पु० प्रकृतखण्डे २।५०
६ -आर्य्यभटीयस्य-
(ज्योतिष शास्त्र का अनुशीलन)। वेद विहित याग, यज्ञादि के समयादि नि-
र्णय के लिये ज्योतिष शास्त्रामृत की प्राप्ति के लिये देव (प्रकाश) और असुर
(अन्धकार) में मेल हुआ। दोनों पक्ष ने मिलकर आकाश मन्थन किया मन्दर
पर्वत स्वरूप. 'क्रान्तिपात विन्दु' में सर्प की आकार वाली रेखा संयोजित
हुयी, और क्रम से गोलार्द्ध रूपी दिन रात आविर्भूत और तिरोभूत हो,
गोलक विलोडित और मथित हुआ क्रम से ज्योत्स्ना रूपिणी (चान्दनी)
"लक्ष्मी" के साथ चन्द्रमा की स्थिति स्थान, राशि चक्र में निर्णीत हुई ।
और खगोल के बीच "सुरभि" (गौ) रूपिणी पृथिवी की अवस्थिति स्थान
निराकृत हुई । "कौस्तुभ" रूप "ध्रुव" तारा विराट मूर्ति के हृदय में स्था-
पित हुई । और ग्रह, नक्षत्रगण राशि चक्र के यथा स्थान में सन्निविष्ट हुये ।
और "सावन" काल यथोचित रूप से निर्णीत होने लगा । याग, यज्ञादि
(तिथि आदि विचार पूर्वक) अनुष्ठित होने लगे। "धन्वन्तरि" रूप से कुम्भ राशि
धनु राशि के ३० अंश अन्तर पर स्थापित हुआ । महर्षि पराशर ने विष्णु-
पुराण के समुद्र मन्थन के उपसंहार में यों लिखा है कि:-
"ततः प्रसन्नाभाः सूर्य्यः प्रययौ स्वेनवत्र्मना ।
ज्योतींषिंच यथामार्गं प्रययुर्मुनि्सत्तम ! ॥" १।६।११२॥
उपसंहार में वक्तव्य यह है कि, प्राचीन समय में सब जातियों में सूर्य्य
स्वामी और चन्द्रमा पत्नी रूप से परिगणित होते थे और वेद में भी यह
स्पष्टतया लिखा है:-
"समिथुनंउत्पादयते रयीञ्चप्राणञ्च ।
एते मे वहुधा प्रजाः पश्यितः ॥" इतिप्र० उपनिषदि ॥४॥
अर्थ:-प्रजा सृष्टि कामना से ब्रह्मा ने चन्द्र, सूर्य्य को स्त्री पुरुष रूप से
सृष्टि किये और सूर्य्य चन्द्र से मनु और मनु से मानव जाति सृष्टि हुई ।
फलित ज्योतिष के मत से यद्यपि चन्द्रमा स्त्री-ग्रह कह कर परिगणित
है किन्तु चान्द्रमास गणनार्थ चन्द्र, नक्षत्र वा तारापति कह कर परिगणित
होता चन्द्रमा का इसप्रकार स्त्री एवं पुरुष दोनों प्रकृति की रक्षा के लिये
पौराणिक गण 'चन्द्रविम्ब' और चन्द्रमा की ज्योति को स्वतन्त्र करने में
वाध्य हुए । समुद्र मन्थन से चन्द्रविम्ब का लक्ष्मी सहज नाम हुआ, जैसे:---
"दाक्षायणीपतिर्लक्ष्मी-सहजश्च सुधाकरः" । शब्दरत्नावली।
भूमिका ॥ ९
'चन्द्रविम्ब तारापति हुए। और लक्ष्मधारिणी ज्योत्स्नारूपिणी चन्द्रिमा
(चान्दनी) लक्ष्मी देवी, विष्णुप्रिया या सूर्य-पत्नी हुयी। वैदिक प्राचीन प-
द्धति और पौराणिक नवीन-पद्धति, दोनों ही की समानता हुयी।
अब भी "ग्रीनलैण्ड" वासी इस्किमो जाति में यह विश्वास है कि सूर्य
अपनी पत्नी चन्द्रिमा के पीछे २ युगयुगान्तर से दौड़ रहे हैं। किन्तु कभी च-
न्द्रिमा को स्पर्श नहीं कर सके। और इन दोनों की यह क्रीड़ा उपलक्ष ही
में पृथिवी पर दिन रात होते हैं।
सूर्यसिद्धान्त आदि ज्योतिष शास्त्र में जो 'ग्रहण' के कारण दिखला ये
गये हैं उस का स्थूल तात्पर्य यह है कि 'अयनवृत्त' परस्पर तिर्यक्भाव से अ-
वस्थित है। चन्द्रमा के कक्षा वृत्त का एक अर्द्धांश अयन वृत्त के उत्तर में
और अपर अर्द्धांश 'अयन वृत्त' के दक्षिण में अवस्थित और 'अयन मण्डल'
और चन्द्रकक्षा के 'छेद विन्दुद्वय' को “पात” कहते हैं। इस पात के दोनों
विन्दु की योग रेखा पर अमावास्या के अन्त में चन्द्र और सूर्य के अवस्थित
होने से सूर्यग्रहण होता है। इस पातविन्दु-द्वय की योग रेखा के मध्यभाग
में सूर्यविम्ब अवस्थित रहते हैं। इस 'योगरेखा' को "राहु" कल्पना करने
से सूर्य विम्बरूप “सुदर्शन” (चक्र) द्वारा “राहु” दो खण्डित होता है।
और पात के दो विन्दुओं में से एक को “राहु” और दूसरे विन्दु को “केतु”
कहते हैं। या इन दोनों विन्दुओं को “राहु” और सांप की देह की नाईं
पृथिवी छाया मध्ये चन्द्र प्रवेश करने से 'चन्द्रग्रहण' होता है ऐसा कहने में
पृथिवी छाया को 'केतु' कहना अनुचित नहीं। ऐसा अर्थ करने पर समुद्र
मन्थन में राहु का अमर होना और 'सुदर्शन' द्वारा राहु का शिर कटना,
दोनों ही व्यापार सङ्गत और वेदाङ्गीभूत ज्योतिष शास्त्रानुमोदित होते हैं।
समुद्रमथन-उपाख्यान में मेरु पर्वत, नारायणदेव, देव, असुर, अनन्तदेव,
समुद्र, अमृत, कूर्म, इन्द्र, वासुकी, दूध, घृत, सुरभि, पारिजात-पुष्प, ऐरावत
हाथी, उच्चैःश्रवा घोड़ा, वारुणी, सोम, लक्ष्मी, हलाहल-विष, नीलकण्ठ,
अमृतभाण्ड, अर्जुन, दिति अदिति और धन्वन्तरि आदि, शब्दों की व्याख्या
कियी गयी है, परन्तु वेद, निघण्टु, ब्राह्मणग्रन्थ, १८ पुराण तथा वाल्मी-
कीय आदि उल्लिखित-समुद्रमथन पर-विचार अलग पुस्तकाकार छपेगा-
यहां विस्तार भय से-संक्षिप्त लिखा गया।
८ आर्य्यभटीयम्-
श्रीकृष्णलीला·की आधिदैविक व्याख्या की अवतरणिका ॥
चन्द्रमा पौराणिक देवता हैं। ३३ नक्षत्र पुराणों में चन्द्रमा की ३३ स्त्री अ-
श्विनी, भरणी, प्रभृति, (नक्षत्र) चन्द्रमा का घर या गृहिणी हैं। इस स्थल में रूपक
अति जाज्वल्यमान है किसी को समझने में कष्ट नही होता किन्तु पुराणों में
ऐसे अनेक (हमारे शास्त्रों में प्रायः तीन प्रकार के वर्णन हैं एक आध्यात्मिक दू-
सरा आधिदैविक और तीसरा आधिभौतिक) रूपक हैं, जिनका रूपकत्व भाव
सहसा उपलव्धि नहीं किया जाता। श्रीकृष्ण नामक कोई व्यक्ति थे नहीं ऐसा
कोई प्रमाण अब तक नहीं मिला है, प्रत्युत ऐसे प्रमाण तो भले ही पाये जाते
हैं कि श्रीकृष्ण नामक एक अच्छे आदर्श पुरुष या पुरुषोत्तम सच्चरित्र व्यक्ति
हुए हैं जिनका इतिहास महाभारत में है। एवं श्रीकृष्ण सम्बन्धी इस इतिहास
के अतिरिक्त भागवत आदि पुराणोक्त ऐसे निन्दनीय उपाख्यान हैं जिन को
लेकर विधर्मी लोग हमारे वेदोक्त स०आ० धर्म तथा हमारे महात्माओं पर
कलङ्क दिखलाते हैं जिनका यथोचित समाधान हमारे भाई लोग न जानने
के कारण नहीं कर सकते । वेद तथा वेदाङ्ग आदि वैदिक ग्रन्थों के देखने
से पुराणोक्त उपाख्यानों का तात्पर्य समझ में आता है । जैसा कि पाठकों
को वक्ष्यमाण उपाख्यान से ज्ञात होगाः-वैदिक काल से सूर्य, उपास्य देव
होते आये हैं, आब्राह्मण चाण्डाल पर्यन्त सब ही आर्य्य इस समय भी शय्या
से गात्रोत्थान कर, पूर्व मुंह हो सूर्यदेव को प्रणाम किया करते हैं; सूर्यदेव
ही गायत्री के उपास्य देवता हैं। शालग्राम शिला आदि उपलक्ष्य कर जिस
प्रकार ईश्वर की उपासना की व्यवस्था मानी जाती है, उसी प्रकार सूर्य को
भी उपलक्ष्य कर ईश्वरोपासना की व्यवस्था की गई है। श्रीकृष्ण और अन्यान्य
१० अवतार, सब ही विष्णु के अवतार कहे जाते हैं। श्रीकृष्ण नाम से कोई व्यक्ति
अवतीर्ण हुए, जब यह स्वीकार कर लिया गया, और वे अवतार कहकर माने
भी गये तब उन के जीवन के साथ विष्णु या सूर्य (कारण वेद में विष्णु और
सूर्य एक) की लीला मिश्रित कर देना असम्भव नहीं है। श्रीकृष्ण की बाल्य-
लीला के साथ जो सूर्य की लीला मिश्रित हुई है। इस के बहुत प्रमाण पाये
जाते हैं । बाल्य-लीला यदि इस प्रकार रूपक के ऊपर न्यस्त न किया
जाता, तो परम पवित्र गीता शास्त्र के प्रवर्त्तक के चरित्र में “परदाराभिम-
र्शन” दोष अवश्य ही लगता । परीक्षित राजा ने श्रीकृष्ण जी की बाल्य-
लीला सुनकर शुकदेव जी से इस प्रकार प्रश्न किया था किः-
भूमिका ९
"संस्थापनाय धर्मस्य प्रशमायेतरस्यंच ।
अवतीर्णो हि भगवानंशेन जगदीश्वरः ॥
सं कथं धर्मसेतूनां वक्ता कर्त्ताभिरक्षिता ।
प्रतीपमाचरद् ब्रह्मन् परदाराभिमर्शनम् ॥
आप्तकामो यदुपतिः कृतवान् वैजुगुप्सितम् ।
किमभिप्राय एतं नः संशयं छिन्धि सुव्रत ! ॥”
जिस संशय ने राजा परीक्षित के मन को डवाडोल वा सन्दिग्ध
कर दिया था वही संशय आज अनेक लोगों के मन में उठता है। स्वतः ही
लोगों के मन में यह प्रश्न होता है कि धर्मसंस्थापनार्थ और अधर्म के नाश
के लिये जिन का जन्म हुआ है वे परस्त्रीगमन रूप अकार्य वा कुत्सित कर्म में
क्यों कर प्रवृत्त होंगे ? । या तो यह कोई आध्यात्मिक व्यापार है या कि-
सी ज्योतिष शास्त्रोक्त विषय का रूपक है। राधा को ह्लादिनी शक्ति (अ-
ध्यात्म) मानना पड़ेगा या राधा को “राधा” नक्षत्र मानना पड़ेगा । नहीं तो
अवतार की मर्यादा की रक्षा नहीं होती । शुकदेव जी के मुख से जो राजा
परीक्षित के प्रश्न का उत्तर दिया गया है उसे कोई भी सन्तोष-जनक (उत्तर)
नहीं मान सकता ।
“ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् ।
तेषां यत् स्ववचो युक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत्” ॥
यह बात सुनने से किसी के मन की शङ्का नहीं जाती तो परीक्षित का
भी सन्देह दूर हुआ हो या नहीं इस में सन्देह ही है । “मैं हजारों दुष्कर्म करूं-
गा, उस पर कोई ख्याल न करना मैं जो कहूंगा वही करना,, । ऐसी बात
किसी धर्म प्रवर्त्तक व्यक्ति के में शोभा नहीं देती। अवतार का प्रयोजन क्या ?
इस पर अवतारवादी लोग कहते हैं कि मनुष्यों को शिक्षा मिलना ही अव-
तार का प्रयोजन है। जिस कार्य्य से मनुष्यों को सुशिक्षा न हो कर कुशिक्षा
होती ऐसे कार्य्यों को अवतार में आरोपण करना नितान्त असङ्गत है । चाहे
जिस भाव से ही देखा जावे श्रीकृष्ण जी की बाल्यलीला को ऐतिहासिक
घटना कह कर मानना बहुत कठिन है। बाल्य लीला में नानाप्रकार का आ-
ध्यात्मिक वर्णन भी है। हम ने जो वेदाङ्ग—ज्योतिष के अनुसार रूपकवर्णन
२
१० आर्य्यभटीयस्य-
किया है। इसमे हमारा प्रयोजन यह है कि मनुष्य को सब विषयो में सत्य का
अनुसन्धान करना चाहिये। यदि हमारे इस रूपक वर्णन में कोई भ्रान्ति सिद्ध हो
तो उसे हम सादर स्वीकार करेंगे। श्रीकृष्ण वा श्रीरामचन्द्र आदि महापुरुषों के
किसौ २ चरित में कोई २ अंश रूपकालङ्कार से वर्णन किये गये हैं ऐसा कहने
से उन महात्माओं की सत्ता नष्ट नहीं होती अर्थात् ऐसा कोई न समझे कि
इन महात्माओं ने जन्म ही नहीं ग्रहण किया केवल रूपक मात्र है। और
उस में उन २ अवतारों के उपासकों के क्षोभ का कोई कारण नहीं। सर्वजन
आराध्य आदिक के चरित में जो कई एक अर्थविहीन उपन्यास या कलङ्क
आरोप किया जाया करता, वह निर्दोष, सार्थक, रूपक मात्र, और उस में
अवतार आदि के चरित्र में कलङ्क स्पर्श न हो यही हमारे इस रूपकवर्णन
का उद्देश्य है। अब हम आगे श्रीकृष्णलीला-का वर्णन करेंगे।
श्रीकृष्ण-लीला।
श्रीकृष्ण जी महाराज श्रीविष्णु भगवान् के अवतार कहे जाते हैं।
वसुदेव और देवकी श्रीकृष्ण जी के पिता, माता, श्रीराधिका श्रीकृष्ण जी की
प्रधाना भक्ति,-वृन्दावन, मथुरा, द्वारका और कुरुक्षेत्र, श्रीकृष्ण के लीलास्थल
कहे जाते हैं असुरविनाश के लिये श्रीकृष्णजी का पृथिवी पर अवतार का
उद्देश्य माना जाता है। श्री मद्भागवतपु० विष्णु पु० और ब्रह्म वैवर्त्त पुराणों
में श्रीकृष्ण लीला वर्णित है।
वैदिक आर्य्यों का परमदेव (१) सूर्य्य देव और वेदोक्त प्रमाण से सूर्य का
दूसरा नाम विष्णु (२) है और विष्णु सूर्य्य का अधिष्ठात्री देवता (३) है। प्राचीन
आर्य्यलोग प्रकृत वेदोक्त देव भिन्नअन्य देवी-उपासक थे ऐसा कदापि सम्भव नहीं।
गोलकस्थ राशिचक्र में सूर्य्य देव का एक वर्ष परिभ्रमण, व्यापार
उपलक्ष करके आर्य्य जाति के मनोरञ्जन के लिये पूर्व समय में श्रीकृष्ण लीला
का अङ्कुर आरोपित हुआ किन्तु क्रमशः पुराणों में इस लीला रूपी वृक्ष की शा-
खा प्रशाखा, पल्लव, होकर अब इस (लीलारूपी) वृक्ष में विषमय फल हो गये।
(कुदरती प्राकृत राशि लीला का मर्म भूल कर श्रीकृष्ण महाराज जैसे आ-
दर्श पुरुष वा पुरुषोत्तम के चरित्र में कलङ्क लगा) नहीं तो अधःपतन शील
भारत भूमि में कुरुचि की धारा बहती हुई आदर्श पुरुष श्री कृष्ण जी की अतल
स्पर्श कलङ्करूपी समुद्र में निमज्जित हो, उछलना डूबना क्यों पड़ता !!!
(१)-गायत्र्युक्त सविता देव। (२)-ऋ० ८ । ७७ । १० ॥ऋग् १ । २२ । १६ ॥ (३)-गायत्री ॥
भूमिका ११
'तनकाल की विचित्र महिमा है! अनन्तकाल, अनादि-देव को ग्रास करने
के लिये उद्यत है। अनादि, देव आज भारत में कलुषित भाव से पूजित होते
हैं। अङ्गराग न होने से शीघ्र पूजा लोप होगी। भारत के विप्र कुल सदा-
शय साधुचित्त यह रूपक कल्पना करके भी आज सनातन आर्यसमाज के
निकट दायी हैं। हम जातीय ऋण विमोचनार्थ आज उस श्रीकृष्ण लीला के
रहस्य भेद करने में कृत संकल्प हुए हैं।
फाल्गुन की अमावास्या को सायङ्काल में पूर्व बार गोलक (आकाश की
ओर) सन्दर्शन करो। तब देखोगे कि यह आज श्रीकृष्ण लीला गोलक में
अनश्वर अक्षरों में अङ्कित हो रही है। उस समय अपने मस्तक की ओर
(आकाश में) तारक मय धनुराकृति जो तारा देखते हो उसका नाम
"पुनर्वसु" है। इस धनु नक्षत्र वा वसुदेव की गोद में * यह देवकी विरा-
जमान है। इस वसु नक्षत्र के तृतीय मण्डल में जो विन्दु देखते हो उस बिन्दु
का नाम 'कर्कट क्रान्ति' है। यह विन्दु उत्तरायण की चरम सीमा पर अ-
वस्थित है। इस बिन्दु के स्पर्श करने पर सूर्य्यदेव की अयन गति शेष होती
है। और इस पर नये वर्ष के "बालार्क" का उदय (जन्म) होता है। यह
बिन्दु बाल (नये साल का सूर्य्य) बाल कृष्ण के जन्म (उदय) स्थान है। क-
ल्पना नहीं समझो नव दुर्वादलश्याम (१) तुम्हारे सामने प्रत्यक्ष दर्शन हो रहा
है। श्रीकृष्ण रेखा से विषमण्डल छायावत (२) ज्योतिश्चक्रवृत्त में वाल डिंडी-के
सम्मुख में कर्कट सिंह कन्या तुला वृश्चिक और धनु राशि हैं। श्रीकृष्ण यमुना
(३) अतिक्रमण कर प्रथमतः अग्रसर हुए। सम्मुख में कर्कट राज्यस्थ तीन ता-
रात्मक वाण के आकार का पुष्य नक्षत्र पश्चिमोन्मुख विराजमान है।
श्रीकृष्ण पुष्य संक्रमण से पीछे कर्कट राशिस्थ इदं सर्प कालिय (४) कालीय
सर्प का मस्तक षट्तारकमय चक्राकृति और इसको आश्लेषा नक्षत्र कहते हैं।
इस की अधिष्ठात्री देवता 'फणी' हैं।
श्रीकृष्ण ने आश्लेषा में पर रखकर कालीय सर्प को दमन किया। सम्मुख
- पुनर्वसु नक्षत्र का अधिष्ठाता देवता देवमाता अदिति हैं उस कालिय, कालीदह। कन्हैया वसुदेवश्च ब्रह्मवै०पु०
श्रीकृष्ण जन्मखण्डे । 'अदितिर्देवका ह्यभूत्, इति हरिवंशे। रेवती नक्षत्र से चित्रा नक्षत्र पर्यन्त कृष्ण रेखाका
का नाम अदिति या देवकी मौमण्डल।
(१) Castor star अर्थात् विष्णु नामक पुनर्वसु नक्षत्र के छः तारों में से सबसे ऊर्ध्ववर्ती तारा। जैसे, - "धर्मोध्रुवश्च,
सोमश्च विष्णुरनिलोनलः प्रत्यूषश्च प्रभासश्च ।। अष्टौवसव इति क्रमात् स्मृता,," इति स्मृतः (२) Lynx Con-
tellation or Canis minor (३) गरुड०पु० १० । १७ । १।(४) Hydra Constillation
१२ आर्य्यभटीयस्य-
में सिंह राशिस्य पञ्च तारकामय मघा नक्षत्र है और इस की अधिष्ठात्री
देवता 'यम' हैं सुतरां मघा की ज्योतिः नव प्रसूत बालक का जीवन संहा-
रक "ग्रहि" पूतना नामक बाल रोग का उत्पादक यही मघा (१) पूतना है।
मघा की योगतारा (२) देवकी के (अयन रेखाद्धृ) उपरिस्थ कहने से पूतना
को मातृ पद में अभिषिक्त कर श्रीकृष्ण को स्तन्य देने में व्यापृत कियी गयी
है। सूर्य्य देव के मघा में अवस्थिति काल में मघा आच्छादित होता है।
श्रीकृष्ण ने मघा संहार कर पूतना को विनाश किया। सामने सिंहराशिस्य
पूर्व्वएवं उत्तर दोनों फल्गुनी वा अर्जुनी नक्षत्र (३) इन दो नक्षत्रों को अतिक्रम
कर श्रीकृष्ण ने "यमलार्जुन वृत्त" भञ्जन लीला दिखलाया है। सम्मुख में
कन्या राशिस्य हस्त, चित्रा, तुला राशिस्य स्वाती, विशाखा, वृश्चिक राशिस्य
अनुराधा, ज्येष्ठा, और धनु राशिस्य मूल, पूर्वाषाढ़, और उत्तराषाढ़ ये नव नक्षत्र
हैं। ये ही आधुनिक पौराणिक नव नारी हैं (४) आठ सखी और आद्यशक्ति
विशाखा या राधा (५) विशाखा की आकृति पुष्पमाला या तोरण की नाईं
या हिस्रन कीसी है। और विशाखा की अधिष्ठात्री देवता 'शक्राग्नी, या 'वि-
द्युत्' है। इस विद्युताग्नि का नाम यही 'र' (६) अग्नि का आधार कह कर वि-
शाखा 'राधा' नाम से विख्यात (७) है। श्रीकृष्ण, चन्द्रावलि, चित्रलेखा, ललिता
(८) इन तीन सखियों के साथ सम्भाषण कर श्री राधा के घर में आकर देखा कि
अयन रेखा को (९) श्रीराधा ने अधिकार किया है। श्रीकृष्ण और श्रीराधा का
मिलन हुआ। यह श्री राधा कौन हैं? वृषराशिस्य सूर्य्य देव "वृषभानु" राजा।
'कलावती, चन्द्रिमा उन की पत्नी हैं। कलावती अपने पति वृष (राशिस्य सूर्य्य)
भानु (राजा) से मिलने की आशा में उन्मत्ता होकर पूर्णाकृति लाभ के
(१) Regulus (२) मघा को पूतना कहने का और भी कारण है मघा की आकृति हूल की सी है, और देखने
में ध्वजा Flag की नाईं मालूम पडता है इस कारण मघा को "ध्वजिनी,, कहना सार्थक है। और "ध्वजिनो
वाहिनी सेना,, पूतनाऽनीकिनी चमूः,, इत्यमरः। इस अमरकोश प्रमाण से पाया जाता है कि पूतना शब्द ध्व
जिनी के अर्थ में व्यवहार करने योग्य है और मघा पूतना दोनों ही ध्वजिनी, कहने से मघा पूतना और
पूतना को श्रीकृष्ण जी के मातृस्थान में विठालाने के अनेक कारण हैं। जैसे तृतीये दिवसे मासे (वर्षे वा गृह्णाति)
"पूतना नाम मातृका,, इति चक्रपाणिदत्त । श्रीकृष्ण जी को पूतना के स्तन्य देने का और भी कारण है जैसे
भावप्रकाश (वैद्यक) में यह पूतना "बाल रोग चिकित्सायम् तत्र संशोधने पूर्व धात्री स्तन्यं विशोधयेत् ,,॥
(३) ऋक् १० । ८५ । १३ ॥
(४) चन्द्रावलि, चित्रलेखा ललिता विशाखा तुङ्ग विद्या रंग देवी चम्पकलता सुदेवी और इन्दु लेखा ये ८ हैं।
(५) "राधा विशाखा पुष्येतु,, इत्यमरः (६) "स्मृते रः, पावके तीक्ष्णे,, इति मेदिनी (७) "वैशाखे माधवोराधः
इत्यमरः (८) स्वाती नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवता 'पवन, और स्वाती तुला राशि में अवस्थित होने से इस का नाम
'ललिता, है। और हस्ता का पांच तारा चन्द्र तुल्य शुक वर्ण है (९) अयन घोष या रासण घोष॥
भूमिका ॥ १३
लिये ज्येष्ठा नक्षत्राभिमुख यात्रा काल में कमलाकृति विशाखा के बीच वि-
द्युत रूप राधा को प्राप्ति हुई । इस स्थान में राधा का पौराणिक जन्म और
लालन पालन आदि पाठक स्मरण करें ।
श्रीकृष्ण का, तुलाराशि में राधा नक्षत्र भोगकाल में आकाशाग्नि (सूर्य)
अन्तरिक्ष अग्नि में (विजुली में) मिलन हुआ । (१) सांख्य शास्त्रोक्त प्रकृति
पुरुष का मिलन हुआ । क्रमशः कार्त्तिकी पौर्णमासी आयी विद्यतमयी षट्
कृत्तिका की शोभा में पौर्णमासी की रौपमय' ज्योत्स्ना घर्षित हुयी । का-
र्त्तिकी पौर्णमासी की कौमुदी ज्योत्स्ना में जगत् भासित और हासित होने
लगा । पशु, पक्षी आदि सब जीवगण और जगत् जन प्रह्लाद मे पुलकित
हुए । जगत् जन इस विमुग्ध कर रजनी को नृत्य, गीत, द्वारा सुख से व्यतीत
करने लगे । यह विचित्र नहीं । इसी जगत् मय नृत्य, गीत, का नाम 'रास-
लीला' (२) है । श्रीकृष्णदेव श्रीराधा और आल सखी मिल कर रासलीला में
स्थान वृन्दावन में प्रमत्त हुए । आज पौर्णमासी कलावती और मातृका-
गण (३) (षटकृत्तिका) अपनी कन्या राधा के शुभगृह में उन्मत्ता हुयी ।
विमान पर पुरन्ध्रीगण, आज अट्टहास करती हैं । प्रकृति की इस अनुपम
शोभा में संसार मुग्ध हो रहा है ।
यह 'वृन्दावन' कहां ? यह देखो 'गोलोक' में लाखोलाख गोप । (४)
गोपी अर्थात् तारक तारका परिवेष्टित हो धाता, इन्द्र, सविता इत्यादि
द्वादश आदित्य (५) रूप में श्रीदामनु, सुदामन, प्रभृति' द्वादश गोप मण्डल
के साथ श्रीसूर्यदेव, श्रीकृष्ण' नाम से वृन्दावन में रासलीला में विराज-
मान (६) हैं। यदि इस प्राकृतिक रासलीला सुदर्शन से आप के हृदय में
गम्भीर विमल ईश्वर के प्रेम का उदय हो कर मन, प्राण, पुलकित न हो
और कलुषित भौतिक प्रेमभाव यदि किसी के क्षुद्र कुसंस्कार तिमिराच्छन्न
हृदय में प्रवेश करता हो तब हम और क्या कहेंगे, हां इतना तो अवश्य
कहेंगे कि भाइयो !, श्रीकृष्णभगवान् में चाहे ईश्वरभाव से अपनी रुचि अनुसार
पूजा करो परन्तु ऐसे पुरुषोत्तम आदर्श पुरुष के सचुरित्र में पापमय लीला
चित्रित आपे को कलङ्कित न करो और नारकी न बनो ! ! !
हमने पुनर्वसु नक्षत्र से राधा नक्षत्र तक आदित्यदेव' (श्रीकृष्ण) का
(१)—ऋक् १ । ६५ । १० ॥ (२)—गुणेरागेन्द्रव रसः । इत्यमरः । (३)—षट् कृत्तिका । (४)—गो—का अर्थ
किरण ऋक् १ । ६२ । ५ प-पालने (५)—वैशाख से चैत्र पर्यन्त सूर्य के नाम १ धाता, २ इन्द्र, ३ सविता,
४ विवस्वान्, ५ भग, ६ अर्यमन्, ७ भास्कर, ८ मित्र, ९ विष्णु, १० वरुण, ११ पूषा और १२ अंश है।
महाभारत आदि पर्व ॥ (६) ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खण्ड के ४ थे अध्याय ।
१४ आर्य्यभटीयस्य -
अनुसरण कर रासलीला का बोध कराया परन्तु इस से लीला का सम्यक्
बोध न हुआ है। क्योंकि बलदेव, नन्दगोप, यशोदा देवी और रोहिणी देवी
इन के न होने से रासलीला का आरम्भ नहीं हो सकता। अन्य ग्रह की
तरह आदित्य देव की क्रूरगति (१) नहीं होती, सुतरां नन्दराज के भवन में
श्रीकृष्ण को ले कर जाने के लिये उपाय रहित (२) इस कारण इस समय
बलदेव आदि को नन्दालय से रामलीला में निमन्त्रण कर, लाना पड़ा।
बहुत पर्यटन से प्रयोजन नहीं।
यह देखो एकवार, राशिचक्र में दृष्टि डालकर देखो कलावती चन्द्रमा
के पश्चात् भाग में वृषवीथि में। (३) वृषराशि में यशोदादेवी (४) और रोहिणी
देवी (Aldebaran in Hyades) विराजती हैं। वृषराशिश्च सूर्य्य इन्द्र
देव (५) देवराज सखा नन्दराज जहां? "यात्यमित्र नाहि तस्य दूरम्" सुतरां
हम ने आपलत नन्दराज को वृषराशि में व्यापन किया। विचार पीछे होगा।
यथा स्थान में विष्णुपुराण के ५म अंश में बलदेव जी का जन्मवृत्तान्त
वर्णित नहीं है। यथा स्थान में श्रीमद्भागवत के दशमस्कन्ध में ऋषिवाक्य
में बलदेव जी का जन्मवृत्तान्त का विवरण प्रकाशित नहीं। यथा स्थान में
ब्रह्मवैवर्त्त पु० के जन्मखण्ड में संघर्षण देव (६) का जन्मवृत्तान्त विस्तृत है।
किन्तु एकवार इसी के साथ बुध-जन्म वृत्तान्त स्मरण करो (७) चतुर्थ
वसुदेव पुत्र संघर्षण रोहिणी गर्भजात कह कर 'रौहिणेय हैं' किन्तु 'देवकी-
नन्दन' या 'वसुदेवनन्दन' नाम क्यों नहीं पाया? तृतीय वसुदेव (८) पुत्र
बुध ने सौम्य' नाम पाया किन्तु 'तारकानन्दन' या तारासुत' नाम क्यों
नहीं पाया? दोनों ही का जन्म वृत्तान्त रूपक मूलक है। हम लोग ज्योतिष-
शास्त्र में बुध की आधिप्रक्रिया घटना में पाते हैं कि, बुध "रौहिणेय हे।"।
पुराण में रूपक बिगड़ने के भय से इस का इतिहास नहीं लिखा गया कि
किस कारण से बुध का 'रौहिणेय' नाम पड़ा।
(१)-Retrograde motion (२)-राशि चक्र में आदित्य देव मेष राशि से क्रमशः पूर्वदिशा में
वृष आदि द्वादश राशि एक वर्ष में परिभ्रमण करते हैं। वृष राशि में नन्दालय मिथुन राशिरथ पुनर्वसु नक्षत्र
के पश्चिम में वृष राशि अवस्थित सुतरां राशि चक्र पर्यटन न करने से श्रीकृष्ण वृष राशि में किस प्रकार जायगे ॥
(३)-वृष राशि के पूर्व और पश्चिम सीमान्त में स्थित दो ध्रुवक रेखा के मध्यवर्त्ता गोलकांश को वृषवीथि
कहते हैं। (४)-वृष राशिरथ पाटलवर्ण देवमातृका षोडश मातृका में देव सेना या षष्ठी नाम से ख्यात एव ताम्
वदन्ति महा षष्ठी पण्डिताः शिशुपालिकाम्। देवमातृका ने श्रीकृष्णलीला में यशोदा नाम पाया है ज्योतिष्मन्तां
कहने से यशोभि धवलता ॥ (५)-त्रयैष्टमन्वे भवेदिन्द्रः इतिकौर्मे १८ अध्यायः ॥
(६)-देवक्याः सप्तमे गर्भे कंसो रचो दधौ भिया। रोहिणी जठरे माया तमा कृत्य ररक्ष च ॥
तस्माद् बभूव भगवान् नाम्ना संघर्षणः प्रभुः।
(७)-तारका गर्भे सम्भूत स एव च बुधः स्वयम्। ब्रह्मवै०पु०ब्र०खण्डे६६अ० ॥ (८)-धरो ध्रुवश्च सोमश्च
विष्णुरनिलोऽनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ क्रमात् स्मृताः ॥ गदा वरद खड्गिण इते ग्रह-योग तत्त्वे।
भूमिका ॥ १५
इस समय देखा जाता है जो, बलदेव का नाम रौहिणेय है। और बुध
का भी नाम रौहिणेय है। गदाधारी (१) यह रौहिणेय श्रीकृष्ण के चिरसङ्गी
हैं। गदाधारी अन्य रौहिणेय आदित्यदेव के चिरसङ्गी हैं। गदाधारी अन्य
रौहिणेय आदित्यदेव के चिर सङ्गी हैं (२)। आदित्यदेव श्रीकृष्ण हुए, बलदेव
को न्यायानुसार बुध ग्रह कहा जावे । घर का घर ही में मिला "गृहं चेत्स-
मुविन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत्" इस समय हम रासलीला वर्णन में प्रवृत्त हुए।
रास-पूर्णिमा ॥
[चक्र-चित्र के अन्तर्गत शब्द:]
- केन्द्र व ग्रह: सूर्य, पृथिवी, चन्द्र, बुध
- राशियाँ व नक्षत्र (चक्र के अनुसार):
- हिन्दू मण्डल
- वृश्चिक: ज्येष्ठा, अनुराधा
- तुला: विशाखा, स्वाति
- कन्या: जल विषुव संक्रान्ति, चित्रा, हस्ता, उत्तर फाल्गुनी
- सिंह: पूर्व फाल्गुनी, मघा
- कर्कट: अश्लेषा, पुष्य, कर्कसङ्क्रान्ति
- मिथुन: पुनर्वसु, आर्द्रा, मृगशिरा
- वृष: रोहिणी, कृत्तिका
- मेष: भरणी, अश्विनी, महाविषुव संक्रान्ति
- मीन: रेवती, उत्तरभाद्रपद, पूर्वभाद्रपद
- कुम्भ: शतभिषा, धनिष्ठा, श्रवण
- मकर: उत्तराषाढ़, मकर संक्रान्ति
- धनु: पूर्वाषाढ़, मूल
(१) मुषली मुषला युधात् । (२) बुध ग्रह सूर्य के २८ अंश के बीच में रहता है अतएव यह प्रायः सूर्य किरण
में छिपा रहता है।
१६ आर्य्यभटीयम्-
और एक बार राशि-चक्र पर दृष्टि डालो तो देखोगे कि १२ राशिस्थ (१)
२७ नक्षत्रों में केवल पूर्वफाल्गुनी, उत्तरफाल्गुनी, स्वाती, विशाख के उत्तरस्थ
एक तारका और श्रवण, धनिष्ठा ये ही छः नक्षत्र अयनमण्डल के ऊपर,
राशि नक्षत्र तारा- आकृति अधिष्ठात्री अङ्गरेजी
संख्या देवता
अश्विनी ३ घोटकमुख अश्विन Aries
मेष भरणी ३ त्रिकोण यम Musca
कृत्तिका ६ अग्निशिखा दहन Pleiades
वृष रोहिणी ५ शकट कमठज Hyades
मृगशिरा ३ विडाल पद शशि ()
मिथुन आर्द्रा १ पदम शम्भुत Betelgeuse
पुनर्वसु ४ धनु अदिति Castor etc
कर्कट पुष्य ३ बाण जीव Asellus
अश्लेषा ६ चक्र फणि Hydra
मघा ५ लाङ्गल पितृगण या यम Regulus
सिंह पूर्वफाल्गुनी २ मञ्च योनि Zosma & Subra
उत्तरफाल्गुनी २ खट्टा अर्यमा Denebola & another
कन्या हस्ता ५ हस्त दिनकृत् Curvus
चित्रा १ मुक्ता त्वष्टृ Spica.
तुला स्वाती १ कुभकुभवर्ण पवन Arcturus.
विशाखा ४ तोरण शक्राग्नि Akrob, Dschubba.
and others.
वृश्चिक अनुराधा ७ सर्प मित्र Antares etc.
ज्येष्ठा ३ शूकरदन्त या कुण्डल शक्र ()
मूल ६ शङ्ख निर्ऋति Lesath etc.
धनु पूर्वाषाढ ४ शय्या तोय Kaus
उत्तराषाढ (त्यूक्ता) ४ सूर्य विश्वविरिञ्चि ()
मकर श्रवणा ३ शर हरि Aquila
धनिष्ठा ५ मर्दल वसु Delphinus
कुम्भ शतभिषा १०० मण्डल वरुण ()
पूर्वभाद्रपद २ खड्ग अजएकपाते Enif & Homan.
मीन उत्तरभाद्रपद ४ पर्यङ्क अहिर्ब्रध्न Square of Pegasus
रेवती ३२ मत्स्य पूषा Piscis.
(न्युक्त) अभिजित् ३ शृङ्गाटक विरिधि Vega Etc.
भूमिका ॥ १७
गोलक के कदम्ब के (१) निकटतर है। कुरुक्षेत्रपर्व में हम प्रथम दो का ही प-
रिचय देंगे। द्वितीय दो'कृष्ण लीला की ललिता और श्रीराधा, तृतीय दो का
परिचय ग्रंथ में होगा। यह देखो ! श्रीराधा का किरीट, राशिचक्र के एक धनु
के (२) शिरोभाग में उच्चासन पर बैठा है। वाम भाग में ललिता सखी, अ-
न्यान्य सखियों में चन्द्रावती (हस्ता) (३) राशिचक्र के दक्षिण में, चित्रे लेखा
(चित्रा नक्षत्र) राशिचक्र के मध्य में। ललिता (स्वाती) और श्रीराधा की
(विशाखा का) (४) अवस्थिति स्थान ऊपर कहा गया है। रङ्गदेवी राशिचक्र
के मध्यमें अवस्थित है। सुदेवी (५) चम्पक लता (६) राशिचक्र के दक्षिण में
अवस्थित तुङ्गदेवी हैं तुङ्ग में और इन्दूलेखा (७)-राशि चक्र में अवस्थित हैं।
अयन मण्डल के अपर धनु राशि के शिरो भाग में वृष राशि में, यशोदा
देवी (देवमातृका कृत्तिका) (८) और बलदेव की माता रोहिणी देवी के
वामभाग में कलावती कौमुदी चन्द्रिमा के अवस्थित का स्थान है।
यह देखो ! कलावती आश्विनी पूर्णिमा, अश्विनी नक्षत्र में अवस्थित
कर रास-दर्शन के उल्लास में द्रुत वेग से राशि चक्र में दौड़ रही हैं। श्रीकृष्ण
और श्रीराधा में परस्पर रासलीला निमित्त विचार हो रहा है। कलावती
अश्विनी से भरणी, कृत्तिका, रोहणी, मृगशिरा, आदि एक २ नक्षत्र अतिक्रम
कर रही हैं और क्रम से जामाता के निकटस्थ होती जाती हैं, मानो नील
अवगुण्ठन मुखकमल आच्छादन करती हैं (९) पुनर्वसु नक्षत्रमें (११) विष्णु तारक
के दर्शन से कलावती (१२) ने ८ कलाओं को आच्छादित कर लिया है (१३)
एवं क्रमशः श्रीराधा नक्षत्र में आकर जामाता के दर्शन में १६ कला आ-
(१)-ध्रुव और अभिजित नक्षत्र के प्रायः मध्यवर्त्ती बिन्दु ध्रुव से १७ अंश दूर पर कदम्ब अवस्थित है।
ध्रुवात् जिन लवान्तरे इति भास्कराचार्यः (२)--Amphitheatre. (३)-हस्ता के ५ नक्षत्र चन्द्रवत् शुक्ल
वर्णी है ॥ (४)-विशाखा के तीन पद तुलाराशि में और एक पद वृश्चिक राशि में और उत्तरस्थ तारका अयनमण्डल
के उत्तर में एवं अन्य तीन दक्षिण में, इसकारण द्विवचन का व्यवहार है। रामायण लंकाकाण्ड । विशाखा के किरीट
में १० नक्षत्र है। (५)-अनुराधा का तृतीय तारा नरक लोहित वर्ण कह कर अनुराधा का रङ्ग देवी नाम है-न-रक
अर्थ से-न-सूर्य ॥ रकः स्फटिक सूर्ययोः । इत्यमरः । (६)--ज्येष्ठा वक्राकृति कहकर सुदेवी नाम मृणालता कृतिहै ॥
(७)--Line of beauty. (८)-तुङ्गरथ कहने से पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र तुङ्ग देवी ने नाम पाया है। (९)-सूर्याकार
शुक्लवर्ण चतुष् तारवामय उत्तराषाढ़ इन्दु लेखा है ॥
(१०)-चतुर्थं मानुमण्डलम् - काशी खण्डे (११) - कृष्णपक्ष का कनाद्यय (१२) - पुनर्वसु शब्द में वसु का
$\frac{३}{४}$ अंश। वसु = ८ । सुतराम् $८ \times \frac{३}{४} = ६$ । अर्थात् पुनर्वसु नक्षत्रमें ६ तारे है। वर्तमान आर्य ज्योतिषशास्त्र
में ५ गृहीत होते हैं। किन्तु ४ तारक को साधारण रख बाकी २ तारकों में से एक २ लेकर दो धनुष दीखेंगे वसु
अर्थ से धनुष का ग्रहण है ॥ (१३) - कार्त्तिकी कृष्णाष्टमी या गोपाष्टमी ॥
१८ आश्चर्यभटीयस्य-
च्छादन किये ( १ ) और अनुराधा में उपनीत हो कलावती अवगुण्ठन
विमोचनार्थ उद्योग करने पर देखती हैं कि श्रवणावस्थित त्रिविक्रम सम्मुख
में श्वशुर के दर्शन से बड़े पुलकित हैं । कलावती अर्द्धावगुण्ठित भाव से
श्रवणा अतिक्रम कर धनिष्ठा आदि एक २ नक्षत्र को प्रतिक्रम करती २
मुख कमल के नील अवगुण्ठन क्रम से मोचन करते २ चलने ( २ ) लगीं ।
अन्त में वृषराशि में उपनीत हो कृत्तिका और रोहिणी के वामभाग
में आकर आश्वस्त्य भाव से आनन्द में नील अवगुण्ठन एक मात्र विमोचन
कर सादर ऊंचे आसन पर बैठ गयीं । यों कार्त्तिकी पूर्णिमा की कौमुदी
पौर्णमासी का उदय हो कर ज्योत्स्ना में जगत् आलोकमय हुआ । कोमुदी
की ज्योत्स्ना-अङ्गना में आवृत्ता हो कर यशोदा देवी (कृत्तिका) छिपकर
नीलमणि की रासलीला देखने लगीं । और बलदेव की माता भी अर्द्धाव-गु
ण्ठित मुख से रासलीला देखने लगीं । किन्तु पौर्णमासी कलावती श्वश्रूजन
सुलभ अकुण्ठित भाव अवलम्बन से सम्पूर्ण जगत् के सामने पृथिवी के पृष्ठदेश
से वासर (दिवस) घर में रासलीला देखने की कामना से किनारे हो कर
लुकछुक करती हैं । पुनर्वार जगत् की ओर चाह कर श्रीराधा की सम्पद् में
गर्वित हो ठट्ठा कर हंसती हैं । उषा काल में कौमुदी चन्दमा वांके नजर से
उभय पार्श्वस्थ वैवाहिक द्वय (३) की ओर दृष्टिपात कर अस्फुट स्वर से कहती
हैं कि देखो देखो बहिन ! हमारी राधा आज स्वामी समागम से सखीकुलमध्ये
(तारानिचय) कहां छिप गयीं ? कभी तो कार्त्तिक की चन्द्रिमा के आह्लाद
से नाचती २ उन्मत्ता प्रायः हो कर पश्चात् वर्त्ती वैवाहिक सच्चिदानन्द गोपको
कहते हैं कि वाह ! आज हमारा क्या शुभ दिन है ! आनन्दपुत्र आनन्दमय
श्रीकृष्णकी कृपा से हमारी राधा पवित्रा हुयीं । नन्दराज आह्लाद से गदगदभाव
में कहते हैं कि श्रीमती अहह ! तुम्हारी सुता राधा ही आद्या (४) शक्ति हैं ।
यह देखो ! श्रीकृष्ण का रश्मि चूड़ा (उर्द्ध मुख मयूख को) तुम्हारे राधा के
पदतल को मार्जन और धौत करता है ।
यह देखो ! कौमुदी चन्द्रमा के ऊर्द्ध भाग में प्रजापति ब्रह्मा 'औरिक'
मण्डल (५) विराजमान हैं । आज प्रजापति ब्रह्मा पूर्ण चन्द्ररूपी हंस पर
(१) - अमावास्या ॥ (२) - शुक्लपक्ष की कलावृद्धि ॥ (३) - यशोदा और रोहिणी । (४) - कार्त्तिकी वर्ष
विशाखासे गणित करने पर और राकाग्नि या विद्युत् = मूर्ति अग्नि का आदि विकाश है ॥
(५) Auriga constellation प्रजापति ब्रह्मा के शिरोदेश में प्रजापति नक्षत्र .Delta auriga
हत् पदम से बहाहूत (Star capella) तारा दक्षिण कुक्षि में अग्निवारक (Star nath) ब्रह्म-हृत्
तारक के पूर्व दक्षिण अंश मे त्रिभुजाकार छोटे २ तीन तारे (The kids) क्या त्रिवेद चिह्न (Emblem)
१. गीतिका पाद (खगोलीय मान व अक्षराङ्क पद्धति)
भूमिका ॥ १९
सानन्द आसीन हैं । रासलीला देखने के आनन्द में ३३ कोटि देवता के साथ
विद्याधर, अप्सरागण, यक्ष, रक्ष, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, गुह्यक, सिद्धाचरण,
दैव, दानव, असुर, आदि परिवृत्त होकर रासमण्डल के ऊर्द्ध देश (१) में आसीन
हैं। इसी उपलक्ष्य से श्रीराधा 'ब्रजेश्वरी', 'रासेश्वरी', आदि पुराणों में कही
गयीं हैं । और महर्षि वाल्मीकि ने विशाखा को सूर्य्यवंश का कुल नक्षत्र
कह कर वर्णन किया है । और बङ्गाल के कवियों ने "रायो राजा,"
“रायी किशोरी” नाम से श्रीराधा का नाम कीर्त्तन किया है और उसी
से पाश्चात्य ज्योतिषी लोगों ने श्रीराधा नक्षत्र पर राजमुकुट वाला लिखा
(Corona) (२) है। आज राशिचक्र के केन्द्र स्थान में श्रीकृष्ण (सूर्य्यदेव) और उन
के दक्षिण भाग में बलदेव (वृषचक्र) अवस्थित हैं । और राशिचक्र में गोपी-
गण (तारकागण) श्रीराधा और ८ सखियों के सन्निकटतानुसार में चक्र व्यूह में
नाच कर कृष्ण बलराम को प्रफुल्लित करती हैं। बलदेव जी भी प्रमोदित हो
चक्र नृत्य में साथ दिया। राधेश्वर वासुदेव चक्र व्यूह की गति परीक्षा करते हैं।
कार्त्तिकी चन्द्रिका ज्योत्स्ना बाहु-विस्तार पूर्व्वत कम्बल, गन्ध, वातान आलिङ्गन
कर स्नेह में डूब रही हैं । कार्त्तिकी परिशोभा के रतिमय ज्योत्स्ना सागर में
तीनों जगत् बह चले। आनन्द मय सुखाम्बु सागर में जीव मात्र के हृदय
निमग्न और अभिषिक्त हुए । अकथनीय विमल ज्योत्स्ना जल में विश्व ने अव-
गाहन किया । बाहुली (कार्त्तिकी) ज्योत्स्ना ने सुफलता को विस्तार कर
ब्रह्मर्षि देवर्षि और राजर्षिगण को आलिङ्गन कर विमुग्ध किया। इस मोह में
विमुग्ध होकर हमारे ऋषियों ने सूर्य्य भूतरूप सर्व्वव्यापी परम पुरुष को
सूक्ष्मभाव से ज्ञानकृत रूप से सवितृमण्डल मध्यवर्त्ती नारायण का ही वर्णन
किया है। और सवितृमण्डल ही इस प्राकृतिक शोभा की (३) मूल कारण है
कहने से सवितृमण्डल को ही विष्णुभाव से पूजा किया करते थे। और श्रीकृष्ण
लीला की रूपक रचना कियी हैं। आदितिनन्दन आदित्य देव में और देवकी
नन्दन श्रीकृष्ण में भेद कहां ? क्या ऋषियों ने सतर्क नहीं कर दिया है कि
“अदितिर्देवकीह्यभूत् (हरिवंशे) (अदिति) और “देवमाता च देवकी”
(ब्रह्मवैवर्त्ते जन्मखण्डे) क्या ऋषियों ने इङ्गित नहीं कर दिया है कि आ-
दित्यदेव ही देवकीनन्दन हैं ?
(१) - गोलक में ५००० वर्ष पहिले यह दृश्य था इस समय अब उतना सुदृश्य नहीं रहा ।। (२) - श्रीराधा के शिर
पर किरीटमण्डल (Corona)
(३) सूर्य्यकिरण चन्द्रमण्डल में प्रतिफलित होने से ज्योत्स्ना की उत्पत्ति होती है ।