आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ आर्य्यभटीयस्य-
असुर गण ने स्वर्ग राज्य पर अपना अधिकार जमाया । यज्ञ आदि एक मात्र
बन्द हो गया । भूख से पीड़ित इन्द्र आदि कों ने निरुपाय हो सुमेरु पर्वत की
चोटी पर जाय ब्रह्मा की शरण लियी । और ब्रह्मा, प्रमुख देवगण की स्तुति
से सन्तुष्ट होने परमदेव नारायण ने देवराज इन्द्र को उपदेश दिया कि अमृत-
पान हे बलवान् न हो कर तुम असुरों गण को रण में जीत नहीं सकते ।
और देवता एवं असुरों के मिले बिना समुद्र मन्थन से अमृत मिलने का
अन्य दूसरा उपाय नहीं । इसलिये असुरगण के साथ कपट सन्धि कर दोनों
दल मिलाकर समुद्र मन्थन करो । समुद्र मन्थन से उत्पन्न अमृत परिवेश्न के
समय मैं असुरों को ठग कर देवताओं को अमृत पान कराऊंगा । नारायण
के आदेश से ईन्द्र ने असुर पति रैवत मनु-पुत्र बलि राजा के साथ सन्धि
स्थापन कर समुद्र मन्थनार्थ उद्योग किया । इस के बाद देवता और असुर
गण ने मन्दर पर्वत को उखाड़ा और गरुड़ के पीठ पर मन्दर को रख कर
समुद्र के किनारे ले आये । समुद्र मन्थन के पहिले हलाहल विष और क्रम
से सुरभि, उच्चैःश्रवा, ऐरावत, ८ दिग्गज, और अभ्रमु प्रभृति ८ हस्तिनी,
पारिजात पुष्प, अप्सरा, कमला देवी, वारुणी, कलस हस्त धन्वन्तरि ऊपर
हुए । राहुबध उपाख्यान इस पुराण में भी है ।
विष्णुपुराण के १ म अंश, ९ म० अध्याय में समुद्र मन्थन का वर्णन है ॥०
विष्णुपुराण के मत से समुद्र मन्थन में पहिले सुरभि, क्रम से वारुणी, पारि-
जात, शीतांग्शु चन्द्रमा, हलाहल विष, कमण्डलु हस्त धन्वन्तरि, और श्रीदेवी
उत्पन्न हुईं । किन्तु विष्णुपुराण में राहुवध का वर्णन नहीं है । ब्रह्म
वैवर्त्त पुराण के प्रकृति खण्ड के ३८ वें अध्याय में समुद्र मन्थन का वर्णन है ।
ब्रह्माण्ड पुराण के मत से समुद्र मन्थन में सब से पहिले धन्वन्तरि और क्रम
से अमृत, उच्चैःश्रवा, नाना रत्न, ऐरावत, लक्ष्मीदेवी, सुदर्शन चक्र निकले
हुए । इन के अतिरिक्त अन्यान्य पुराणों में भी समुद्रमन्थन का वर्णन है ।
पुराणों में समुद्र मन्थन का वर्णन है कहने से अशिक्षित लोगों में इस
व्यापार को रूपक कह कर ग्रहण करना नहीं चाहते । किन्तु उपाख्यान के
सम्भव या असम्भव होने की समालोचना करने पर इस की रचना अर्थवाद
से भरा है यह सहज ही में सिद्ध होता है ।
पहिले तो मन्दर पर्वत का उखाड़ना कैसे सम्भव होगा ? दूसरे मथने की
रस्सी वासुकी (सर्प) मथते समय जब उसी वासुकी शेष ने मन्दर पर्वत को