आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ॥ १७
गोलक के कदम्ब के (१) निकटतर है। कुरुक्षेत्रपर्व में हम प्रथम दो का ही प-
रिचय देंगे। द्वितीय दो'कृष्ण लीला की ललिता और श्रीराधा, तृतीय दो का
परिचय ग्रंथ में होगा। यह देखो ! श्रीराधा का किरीट, राशिचक्र के एक धनु
के (२) शिरोभाग में उच्चासन पर बैठा है। वाम भाग में ललिता सखी, अ-
न्यान्य सखियों में चन्द्रावती (हस्ता) (३) राशिचक्र के दक्षिण में, चित्रे लेखा
(चित्रा नक्षत्र) राशिचक्र के मध्य में। ललिता (स्वाती) और श्रीराधा की
(विशाखा का) (४) अवस्थिति स्थान ऊपर कहा गया है। रङ्गदेवी राशिचक्र
के मध्यमें अवस्थित है। सुदेवी (५) चम्पक लता (६) राशिचक्र के दक्षिण में
अवस्थित तुङ्गदेवी हैं तुङ्ग में और इन्दूलेखा (७)-राशि चक्र में अवस्थित हैं।
अयन मण्डल के अपर धनु राशि के शिरो भाग में वृष राशि में, यशोदा
देवी (देवमातृका कृत्तिका) (८) और बलदेव की माता रोहिणी देवी के
वामभाग में कलावती कौमुदी चन्द्रिमा के अवस्थित का स्थान है।
यह देखो ! कलावती आश्विनी पूर्णिमा, अश्विनी नक्षत्र में अवस्थित
कर रास-दर्शन के उल्लास में द्रुत वेग से राशि चक्र में दौड़ रही हैं। श्रीकृष्ण
और श्रीराधा में परस्पर रासलीला निमित्त विचार हो रहा है। कलावती
अश्विनी से भरणी, कृत्तिका, रोहणी, मृगशिरा, आदि एक २ नक्षत्र अतिक्रम
कर रही हैं और क्रम से जामाता के निकटस्थ होती जाती हैं, मानो नील
अवगुण्ठन मुखकमल आच्छादन करती हैं (९) पुनर्वसु नक्षत्रमें (११) विष्णु तारक
के दर्शन से कलावती (१२) ने ८ कलाओं को आच्छादित कर लिया है (१३)
एवं क्रमशः श्रीराधा नक्षत्र में आकर जामाता के दर्शन में १६ कला आ-
(१)-ध्रुव और अभिजित नक्षत्र के प्रायः मध्यवर्त्ती बिन्दु ध्रुव से १७ अंश दूर पर कदम्ब अवस्थित है।
ध्रुवात् जिन लवान्तरे इति भास्कराचार्यः (२)--Amphitheatre. (३)-हस्ता के ५ नक्षत्र चन्द्रवत् शुक्ल
वर्णी है ॥ (४)-विशाखा के तीन पद तुलाराशि में और एक पद वृश्चिक राशि में और उत्तरस्थ तारका अयनमण्डल
के उत्तर में एवं अन्य तीन दक्षिण में, इसकारण द्विवचन का व्यवहार है। रामायण लंकाकाण्ड । विशाखा के किरीट
में १० नक्षत्र है। (५)-अनुराधा का तृतीय तारा नरक लोहित वर्ण कह कर अनुराधा का रङ्ग देवी नाम है-न-रक
अर्थ से-न-सूर्य ॥ रकः स्फटिक सूर्ययोः । इत्यमरः । (६)--ज्येष्ठा वक्राकृति कहकर सुदेवी नाम मृणालता कृतिहै ॥
(७)--Line of beauty. (८)-तुङ्गरथ कहने से पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र तुङ्ग देवी ने नाम पाया है। (९)-सूर्याकार
शुक्लवर्ण चतुष् तारवामय उत्तराषाढ़ इन्दु लेखा है ॥
(१०)-चतुर्थं मानुमण्डलम् - काशी खण्डे (११) - कृष्णपक्ष का कनाद्यय (१२) - पुनर्वसु शब्द में वसु का
$\frac{३}{४}$ अंश। वसु = ८ । सुतराम् $८ \times \frac{३}{४} = ६$ । अर्थात् पुनर्वसु नक्षत्रमें ६ तारे है। वर्तमान आर्य ज्योतिषशास्त्र
में ५ गृहीत होते हैं। किन्तु ४ तारक को साधारण रख बाकी २ तारकों में से एक २ लेकर दो धनुष दीखेंगे वसु
अर्थ से धनुष का ग्रहण है ॥ (१३) - कार्त्तिकी कृष्णाष्टमी या गोपाष्टमी ॥