आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ॥ ३
पारिजात और सुरभि उत्पन्न हुयी। लक्ष्मी, सोम, सुरा और उच्चैःश्रवा आदित्य
मार्ग में देवताओं के निकट गये इस के । अनन्तर धन्वन्तरि अमृत से भरे
श्वेतकमण्डलु हाथ में लिये ऊपर हुए । और दान्त में चारों वेद से विभूषित
'ऐरावत' हाथी निकला। देवराज ने ऐरावत को लिया। अन्त में कालकूट विष
उत्पन्न हुआ । हलाहल विष के गन्ध से तीनों लोक मोहित हुआ। ब्रह्मा की
आज्ञा से महादेव ने इस विषपान कर लिया । तब से महादेव जी का नाम
'नीलकंठ' हुआ । इधर अमृत पान के अभिलाषी देवता और असुरों में
युद्ध उपस्थित हुआ, परम देव नारायण ने मोहिनी रूप धर कर असुर के
निकट उपस्थित हुए। इस मोहिनी मूर्त्ति को देख कर विमूढ़चित्त असुर गण
परिवेषणार्थ अमृत के भाण्ड को मोहिनी के हाथ में समर्पण करने में सम्मत
हुए । अमृत को हर कर मोहिनी संग्राम से चल निकली । संग्राम सनय
देवगण मोहिनी के हाथ के अमृत को पान करने लगे। इसी अवसर में देवता
का रूप धारण कर छिपा हुआ 'राहु' अमृतपान करने में प्रवृत्त हुआ। किन्तु
चन्द्रमा और सूर्य ने इस की चुगली कर इस की कपटता को प्रकाशित कर
दिया और परम देव नारायण ने 'सुदर्शन' ( चक्र ) द्वारा राहु के शिर
को काट डाला ।
कटा हुआ राहु का मस्तक प्रकाश मण्डल में उड़ कर पृथिवी पर गिर
पड़ा । जो वैर निर्यातनार्थ ( बदला लेने के लिये ) अब तक बीच २ में राहु,
चन्द्रमा और सूर्य को ग्रस लेता है जिस का नाम ग्रहण है ॥
देवासुर समर में स्वयं नारायण ने प्रवेश कर सुदर्शन द्वारा असुर दल
को छिन्न भिन्न कर दिया और असुर मुण्ड भूमि पर शोभा देने लगे । मरने
से अवशिष्ट असुरों ने रण में हार कर पृथिवी और समुद्र जल में प्रवेश
किया । देवराज प्रमुख देवताओं ने अमृत भाण्ड अर्जुन को प्रदान किया ।
श्रीमद्भागवत के ८ म स्कन्ध में ५ म अध्याय से ११ वें अध्याय तक
समुद्र मथन का वर्णन है। भागवत के मत से जहां २ भेद दीख पड़ता है, उस
का सारांश नीचे लिखा जाता है । महाभारत में देवताओं को अमृत पीने
की इच्छा क्यों हुई ? इस का कारण नहीं लिखा है ; किन्तु श्रीमद्भागवत् में
लिखा है कि अत्रि के पुत्र शङ्करांश महर्षि दुर्वासा के अभिशाप से देवराज
इन्द्र श्रीभ्रष्ट हुए । असुर युद्ध में देव-सेना हार गयी । इन्द्रादि देवगण ने
स्वर्गराज्य से ताड़ित हो भूतल और पाताल पर आकर आश्रय लिया ।