आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
भूमिका ॥ १७
गोलक के कदम्ब के (१) निकटतर है। कुरुक्षेत्रपर्व में हम प्रथम दो का ही प-
रिचय देंगे। द्वितीय दो'कृष्ण लीला की ललिता और श्रीराधा, तृतीय दो का
परिचय ग्रंथ में होगा। यह देखो ! श्रीराधा का किरीट, राशिचक्र के एक धनु
के (२) शिरोभाग में उच्चासन पर बैठा है। वाम भाग में ललिता सखी, अ-
न्यान्य सखियों में चन्द्रावती (हस्ता) (३) राशिचक्र के दक्षिण में, चित्रे लेखा
(चित्रा नक्षत्र) राशिचक्र के मध्य में। ललिता (स्वाती) और श्रीराधा की
(विशाखा का) (४) अवस्थिति स्थान ऊपर कहा गया है। रङ्गदेवी राशिचक्र
के मध्यमें अवस्थित है। सुदेवी (५) चम्पक लता (६) राशिचक्र के दक्षिण में
अवस्थित तुङ्गदेवी हैं तुङ्ग में और इन्दूलेखा (७)-राशि चक्र में अवस्थित हैं।
अयन मण्डल के अपर धनु राशि के शिरो भाग में वृष राशि में, यशोदा
देवी (देवमातृका कृत्तिका) (८) और बलदेव की माता रोहिणी देवी के
वामभाग में कलावती कौमुदी चन्द्रिमा के अवस्थित का स्थान है।
यह देखो ! कलावती आश्विनी पूर्णिमा, अश्विनी नक्षत्र में अवस्थित
कर रास-दर्शन के उल्लास में द्रुत वेग से राशि चक्र में दौड़ रही हैं। श्रीकृष्ण
और श्रीराधा में परस्पर रासलीला निमित्त विचार हो रहा है। कलावती
अश्विनी से भरणी, कृत्तिका, रोहणी, मृगशिरा, आदि एक २ नक्षत्र अतिक्रम
कर रही हैं और क्रम से जामाता के निकटस्थ होती जाती हैं, मानो नील
अवगुण्ठन मुखकमल आच्छादन करती हैं (९) पुनर्वसु नक्षत्रमें (११) विष्णु तारक
के दर्शन से कलावती (१२) ने ८ कलाओं को आच्छादित कर लिया है (१३)
एवं क्रमशः श्रीराधा नक्षत्र में आकर जामाता के दर्शन में १६ कला आ-
(१)-ध्रुव और अभिजित नक्षत्र के प्रायः मध्यवर्त्ती बिन्दु ध्रुव से १७ अंश दूर पर कदम्ब अवस्थित है।
ध्रुवात् जिन लवान्तरे इति भास्कराचार्यः (२)--Amphitheatre. (३)-हस्ता के ५ नक्षत्र चन्द्रवत् शुक्ल
वर्णी है ॥ (४)-विशाखा के तीन पद तुलाराशि में और एक पद वृश्चिक राशि में और उत्तरस्थ तारका अयनमण्डल
के उत्तर में एवं अन्य तीन दक्षिण में, इसकारण द्विवचन का व्यवहार है। रामायण लंकाकाण्ड । विशाखा के किरीट
में १० नक्षत्र है। (५)-अनुराधा का तृतीय तारा नरक लोहित वर्ण कह कर अनुराधा का रङ्ग देवी नाम है-न-रक
अर्थ से-न-सूर्य ॥ रकः स्फटिक सूर्ययोः । इत्यमरः । (६)--ज्येष्ठा वक्राकृति कहकर सुदेवी नाम मृणालता कृतिहै ॥
(७)--Line of beauty. (८)-तुङ्गरथ कहने से पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र तुङ्ग देवी ने नाम पाया है। (९)-सूर्याकार
शुक्लवर्ण चतुष् तारवामय उत्तराषाढ़ इन्दु लेखा है ॥
(१०)-चतुर्थं मानुमण्डलम् - काशी खण्डे (११) - कृष्णपक्ष का कनाद्यय (१२) - पुनर्वसु शब्द में वसु का
$\frac{३}{४}$ अंश। वसु = ८ । सुतराम् $८ \times \frac{३}{४} = ६$ । अर्थात् पुनर्वसु नक्षत्रमें ६ तारे है। वर्तमान आर्य ज्योतिषशास्त्र
में ५ गृहीत होते हैं। किन्तु ४ तारक को साधारण रख बाकी २ तारकों में से एक २ लेकर दो धनुष दीखेंगे वसु
अर्थ से धनुष का ग्रहण है ॥ (१३) - कार्त्तिकी कृष्णाष्टमी या गोपाष्टमी ॥
१८ आश्चर्यभटीयस्य-
च्छादन किये ( १ ) और अनुराधा में उपनीत हो कलावती अवगुण्ठन
विमोचनार्थ उद्योग करने पर देखती हैं कि श्रवणावस्थित त्रिविक्रम सम्मुख
में श्वशुर के दर्शन से बड़े पुलकित हैं । कलावती अर्द्धावगुण्ठित भाव से
श्रवणा अतिक्रम कर धनिष्ठा आदि एक २ नक्षत्र को प्रतिक्रम करती २
मुख कमल के नील अवगुण्ठन क्रम से मोचन करते २ चलने ( २ ) लगीं ।
अन्त में वृषराशि में उपनीत हो कृत्तिका और रोहिणी के वामभाग
में आकर आश्वस्त्य भाव से आनन्द में नील अवगुण्ठन एक मात्र विमोचन
कर सादर ऊंचे आसन पर बैठ गयीं । यों कार्त्तिकी पूर्णिमा की कौमुदी
पौर्णमासी का उदय हो कर ज्योत्स्ना में जगत् आलोकमय हुआ । कोमुदी
की ज्योत्स्ना-अङ्गना में आवृत्ता हो कर यशोदा देवी (कृत्तिका) छिपकर
नीलमणि की रासलीला देखने लगीं । और बलदेव की माता भी अर्द्धाव-गु
ण्ठित मुख से रासलीला देखने लगीं । किन्तु पौर्णमासी कलावती श्वश्रूजन
सुलभ अकुण्ठित भाव अवलम्बन से सम्पूर्ण जगत् के सामने पृथिवी के पृष्ठदेश
से वासर (दिवस) घर में रासलीला देखने की कामना से किनारे हो कर
लुकछुक करती हैं । पुनर्वार जगत् की ओर चाह कर श्रीराधा की सम्पद् में
गर्वित हो ठट्ठा कर हंसती हैं । उषा काल में कौमुदी चन्दमा वांके नजर से
उभय पार्श्वस्थ वैवाहिक द्वय (३) की ओर दृष्टिपात कर अस्फुट स्वर से कहती
हैं कि देखो देखो बहिन ! हमारी राधा आज स्वामी समागम से सखीकुलमध्ये
(तारानिचय) कहां छिप गयीं ? कभी तो कार्त्तिक की चन्द्रिमा के आह्लाद
से नाचती २ उन्मत्ता प्रायः हो कर पश्चात् वर्त्ती वैवाहिक सच्चिदानन्द गोपको
कहते हैं कि वाह ! आज हमारा क्या शुभ दिन है ! आनन्दपुत्र आनन्दमय
श्रीकृष्णकी कृपा से हमारी राधा पवित्रा हुयीं । नन्दराज आह्लाद से गदगदभाव
में कहते हैं कि श्रीमती अहह ! तुम्हारी सुता राधा ही आद्या (४) शक्ति हैं ।
यह देखो ! श्रीकृष्ण का रश्मि चूड़ा (उर्द्ध मुख मयूख को) तुम्हारे राधा के
पदतल को मार्जन और धौत करता है ।
यह देखो ! कौमुदी चन्द्रमा के ऊर्द्ध भाग में प्रजापति ब्रह्मा 'औरिक'
मण्डल (५) विराजमान हैं । आज प्रजापति ब्रह्मा पूर्ण चन्द्ररूपी हंस पर
(१) - अमावास्या ॥ (२) - शुक्लपक्ष की कलावृद्धि ॥ (३) - यशोदा और रोहिणी । (४) - कार्त्तिकी वर्ष
विशाखासे गणित करने पर और राकाग्नि या विद्युत् = मूर्ति अग्नि का आदि विकाश है ॥
(५) Auriga constellation प्रजापति ब्रह्मा के शिरोदेश में प्रजापति नक्षत्र .Delta auriga
हत् पदम से बहाहूत (Star capella) तारा दक्षिण कुक्षि में अग्निवारक (Star nath) ब्रह्म-हृत्
तारक के पूर्व दक्षिण अंश मे त्रिभुजाकार छोटे २ तीन तारे (The kids) क्या त्रिवेद चिह्न (Emblem)
१. गीतिका पाद (खगोलीय मान व अक्षराङ्क पद्धति)
भूमिका ॥ १९
सानन्द आसीन हैं । रासलीला देखने के आनन्द में ३३ कोटि देवता के साथ
विद्याधर, अप्सरागण, यक्ष, रक्ष, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, गुह्यक, सिद्धाचरण,
दैव, दानव, असुर, आदि परिवृत्त होकर रासमण्डल के ऊर्द्ध देश (१) में आसीन
हैं। इसी उपलक्ष्य से श्रीराधा 'ब्रजेश्वरी', 'रासेश्वरी', आदि पुराणों में कही
गयीं हैं । और महर्षि वाल्मीकि ने विशाखा को सूर्य्यवंश का कुल नक्षत्र
कह कर वर्णन किया है । और बङ्गाल के कवियों ने "रायो राजा,"
“रायी किशोरी” नाम से श्रीराधा का नाम कीर्त्तन किया है और उसी
से पाश्चात्य ज्योतिषी लोगों ने श्रीराधा नक्षत्र पर राजमुकुट वाला लिखा
(Corona) (२) है। आज राशिचक्र के केन्द्र स्थान में श्रीकृष्ण (सूर्य्यदेव) और उन
के दक्षिण भाग में बलदेव (वृषचक्र) अवस्थित हैं । और राशिचक्र में गोपी-
गण (तारकागण) श्रीराधा और ८ सखियों के सन्निकटतानुसार में चक्र व्यूह में
नाच कर कृष्ण बलराम को प्रफुल्लित करती हैं। बलदेव जी भी प्रमोदित हो
चक्र नृत्य में साथ दिया। राधेश्वर वासुदेव चक्र व्यूह की गति परीक्षा करते हैं।
कार्त्तिकी चन्द्रिका ज्योत्स्ना बाहु-विस्तार पूर्व्वत कम्बल, गन्ध, वातान आलिङ्गन
कर स्नेह में डूब रही हैं । कार्त्तिकी परिशोभा के रतिमय ज्योत्स्ना सागर में
तीनों जगत् बह चले। आनन्द मय सुखाम्बु सागर में जीव मात्र के हृदय
निमग्न और अभिषिक्त हुए । अकथनीय विमल ज्योत्स्ना जल में विश्व ने अव-
गाहन किया । बाहुली (कार्त्तिकी) ज्योत्स्ना ने सुफलता को विस्तार कर
ब्रह्मर्षि देवर्षि और राजर्षिगण को आलिङ्गन कर विमुग्ध किया। इस मोह में
विमुग्ध होकर हमारे ऋषियों ने सूर्य्य भूतरूप सर्व्वव्यापी परम पुरुष को
सूक्ष्मभाव से ज्ञानकृत रूप से सवितृमण्डल मध्यवर्त्ती नारायण का ही वर्णन
किया है। और सवितृमण्डल ही इस प्राकृतिक शोभा की (३) मूल कारण है
कहने से सवितृमण्डल को ही विष्णुभाव से पूजा किया करते थे। और श्रीकृष्ण
लीला की रूपक रचना कियी हैं। आदितिनन्दन आदित्य देव में और देवकी
नन्दन श्रीकृष्ण में भेद कहां ? क्या ऋषियों ने सतर्क नहीं कर दिया है कि
“अदितिर्देवकीह्यभूत् (हरिवंशे) (अदिति) और “देवमाता च देवकी”
(ब्रह्मवैवर्त्ते जन्मखण्डे) क्या ऋषियों ने इङ्गित नहीं कर दिया है कि आ-
दित्यदेव ही देवकीनन्दन हैं ?
(१) - गोलक में ५००० वर्ष पहिले यह दृश्य था इस समय अब उतना सुदृश्य नहीं रहा ।। (२) - श्रीराधा के शिर
पर किरीटमण्डल (Corona)
(३) सूर्य्यकिरण चन्द्रमण्डल में प्रतिफलित होने से ज्योत्स्ना की उत्पत्ति होती है ।
२० -आर्य्यभटीयम्-
"ततोऽखिल जगत्पद्मवोधायाच्युत भानुना ॥
देवकी पूर्व सन्ध्याया माविर्भूतं महात्मना ।" विष्णुपुराणे ५ अ० ३ श्लो०
इतना भ्रान्त क्यों ? क्या वेदाङ्ग भूत ज्योतिषशास्त्र यह नहीं कहता है
कि यशोदा (कृत्तिका का) की अधिष्ठात्री देवता दहन (अग्नि) और रोहिणी
का कमलज (ब्रह्मा); अग्नि एवं ब्रह्मा एक ही हैं। इन ब्रह्मा के नाभि पद्म में
( राशि चक्र के केन्द्र में ) विष्णु या आदित्य देव अवस्थित हैं। यह देखो
रोहिणी के शिरोभाग में प्रजापति ब्रह्मा हैं। यह ब्रह्मा ही नन्दराज हैं।
रासलीला—वस्त्रहरण ॥
राशि चक्र से परिचय रहने पर रासलीला समझ में आ सकता है किन्तु
"वस्त्रहरण" (लीला) समझने के लिये "गोलक" ज्ञान प्रयोजनीय है।
पृथिवीस्थ ज्योतिर्विद्गण ने पृथिवी के मेरु दण्ड (axis) उत्तर में प्रसारित
कर गोलक में जो विन्दु प्राप्त होते हैं, उस का नाम 'ध्रुवविन्दुरेखा' रक्खा
है और पृथिवी से दृश्य गोलक, वि-षु-वत् मण्डल द्वारा द्विधा किया है।
राशि चक्र के केन्द्रस्थ ज्योतिर्विद् (?) राशि चक्र के मेरु दण्ड को (axis)
उत्तर में प्रसारित कर गोलक में जो बिन्दु प्राप्त होता उस का नाम
कदम्ब रक्खा है। और इस केन्द्र से दृश्य गोलक अयनमण्डल द्वारा द्विधा
किया है। मान लो कि 'कदम्ब' पर सूर्य को रखने से अयनमण्डल के
दक्षिण भागस्थ दृश्यगोलकार्द्ध अन्धकारमय होगा।
इस समय वस्त्रहरण देखो ! असील गोलक के बीच आदित्य देव अव-
स्थित हैं। आदित्य देव का केन्द्र (centre) और गोलक का केन्द्र एक ही है ऐसा
कहने में दोष नहीं। आदित्यमण्डल को वेष्टन कर राशि चक्र अवस्थित है; इस
ससूर्य राशि चक्र का नाम 'सुदर्शनचक्र' है। इससे नाम की भी सार्थकता होती है।
यह देखो ! सवितृ मण्डल के बीच नारायण श्रीकृष्ण इस केन्द्र में अवस्थिति
कर ससूर्य राशि चक्र को कुलाल-चक्र की नाईं घुमाते हैं। श्रीकृष्ण इस कुलाल
चक्र का शक्तिमय मेधि काष्ठ हैं। सूर्यमण्डल--कुलाल चक्र को हड़काष्ठ और
राशि चक्र कुलाल चक्र का वेष्टन काष्ठ (बेलन काष्ठ) है। यही कुलाल चक्र
रासलीला का आदर्श (१) है।
गोपीगण (२७ नक्षत्र मय) राशिचक्र में अवस्थित रहकर सूर्य किरणरूपी
वस्त्र में आवृत हो जगत् के चक्षु पर रह कर लोगों के अदृश्यभाव में
(१) कुलालचक्रं प्रतिभं मण्डलं पद्मनाभशंकृतम् । इति उत्कलकलिका ॥
भूमिका ॥ २१
नृत्य-गीत में प्रमत्त हैं। कुलाल चक्र की नाईं सम्पूर्ण राशिचक्र घूमता है ।
किन्तु सूर्य केन्द्र को त्याग नहीं करते हहुकाष्ठ की भांति केवल घूमते हैं।
गोपीगण चक्र नृत्य में आदित्यदेव श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा करती हैं। क्या
सुदृश्य मनोहर व्यापार है ! विराट पुरुष का विराट व्यापार !*
विराट पुरुष के नाभि स्थल में सूर्य हैं। किन्तु, आदित्य देव पर्य्यन्त
काल के वशवर्त्ती हैं। तृतीय दिन आदित्य देव को श्रीराधा नक्षत्र त्याग
कर अनुराधा नक्षत्र में पदार्पण करना पड़ेगा । किस का साध्य है कि इस
नियम को तोड़ सके? इधर गोपीगण रास में उन्मत्ता हैं। अनुरोध तो सुनेंगी
नहीं; राम में बाधा डालेंगी नहीं। उधर श्रीकृष्ण ने अपना माया-जाल विस्तार
किया । विराट के नाभि देशस्थित सूर्य कदम्ब पर स्थापित हुए और अयन
मण्डल के दक्षिणस्थ गोलकार्द्ध निशामय हुआ। गोपी का-किरण वस्त्र अपहृत
(छीनागया) हुआ ? अभ्रज्जन, चन्द्रावली, चन्द्रलेखा, तुङ्गदेवी- चम्पकलता,
सुदेवी, और इन्दुलेखा प्रभृति तारा-सखियों को देख पाया। लज्जा से सखीगण
नील समुद्र (१) में निमज्जित हुयीं किन्तु परङ्गु-प्रयास । रूप छिपा नहीं !!!
इस रूपक में सूर्य श्रीकृष्ण कदम्ब कदम्बवृक्ष, तारागण गोपी, सूर्यकिरण
वस्त्र, नील अन्तरिक्ष, कालिन्दी-जल, महर्षिगणारचित इस सुधामय रूपक
वृक्ष ने जो विषमम फल धारण किया है, इस को देख कर महर्षिगण आत्म-
ग्लानि से दग्ध प्रायः हो गये । रासलीला भङ्ग हुयी । श्रीकृष्ण व्रज (अयन-
मण्डल) में चले । सम्मुख में अनुराधा नक्षत्र है। भ्रान्त आर्य्यकुल ! जो ज्योतिष-
शास्त्र तुम्हारे शयन में, स्वप्न में, उत्सव में, व्यसन में, शोक में, सुख में, समाज
में, विजन में, पाप में, पुण्य में, सहाय होता था; आज तुम लोग उसी ज्यो-
तिषशास्त्र को भूल कर श्रीराधाकृष्ण के आह्लीन, रासलीला के अस्तित्त्व में
विश्वास करते हो !!! कहां श्रीकृष्ण ! कहां राधा ! पृथिवी से करोड़ों योजन
से अधिक दूरी पर सूर्य, उस से लक्ष २ गुण योजन अन्तर पर राशिचक्र के
नक्षत्र श्रीराधा आदि अवस्थित, दुर्दशामें पड़ने से इतना मोह पैदा होता है।
आदि जात आदित्यदेव श्रीकृष्ण का राशिचक्र ही "सुदर्शनचक्र" है । चक्री
के उस चक्र के किरण जाल में प्रच्छन्न हो आर्य्यजाति, पुरस्थित प्राकृतिक
रासलीला को देखनेमें असम होरही है । रूपक रक्षाके अनुरोध से, श्रीकृष्ण की
रासलीला वर्णन में पुराणकार महर्षियों ने कौतुक छल से कुकथा में कहि-०
*(१) अन्तरिक्ष का नाम है। ऋग्वेद १० । ६८ । ६-१२
२२ आर्य्यभटीयम्-
पय दो २ अर्थवाले शब्दों का भी प्रयोग किया है। वेद और वेदाङ्ग ज्योतिष-
शास्त्र के पाठ और ज्योतिषशास्त्र के अनुशीलन में और ज्योतिषक मण्डल के
पर्यवेक्षण (Observation) से भारतीय आर्य्यजाति विमुख हो, महर्षि-
प्रणीत पुराणस्थ इन सब दो अर्थ वाले शब्दों के प्रकृत अर्थ ग्रहण में असम-
र्थ हो गयी, और महर्षिगण पूजित आदित्य देव में अधिष्ठित परम पुरुष
प्रकृतदेव श्रीहरि को भूल कर आर्य्यजाति अन्धे की नाई अपने गन्तव्य मार्ग
को भूल कर इधर उधर भटकती फिरती है। क्या आश्चर्य है! क्या आश्चर्य
है! क्या भयावह विधाट भारत में उपस्थित हुआ है! षडङ्ग को छोड़ कर
कौन पण्डित वेद का अर्थ कर सकता? गोलरूप ग्रह-नक्षत्र की गति विधि
छोड़ कर, कौन सुशिक्षित सुधीजन पुराण की व्याख्या कर सकते? इस
भ्रम प्रमाद में फसकर भारत माता के हृदय के अरविन्द मुख मणि श्रीकृष्ण में
भक्ति स्थापन करने से पराङ्मुख होकर, भौतिक कृष्ण के पदाश्रय ले रहे हैं।
कोई तो नवद्वीप में मानव-ईश्वर स्थापन में भूरि यत्नतः ललायित हो रहे
हैं। आर्यगण! एकवार आलस्य छोड़ कर नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, ग्रहों की गति
परीक्षा करो तो वेदोक्त श्रीकृष्ण (श्रीविष्णु) के चरित्र की निर्मलता हृदयङ्गम
कर सकोगे। खेड़-हारा हो कर आर्य्यजाति को निर्याक निरुत्तरभाव से अवन-
त मस्तक में, देश २ में, विदेश में, नगर नगर में, गांव २ में, गली २ में, मार्ग
में, घाट २ पर, श्रीकृष्णकी कलङ्क रटना और व्यङ्गोक्ति नहीं सुननी पड़ेगी।
इसी खेद से हम लोगों ने आज पुराण के रूपक जाल को फाड़ने में हाथ
डाला है। नहीं तो ऐसी मनोरम अपूर्व मरीचिका के ध्वंस करने में किस
की प्रवृत्ति हो सकती? अब इस के आगे सिद्धान्त ज्योतिष तथा आर्यभटीय
के विषय संक्षिप्त विचार किया जावेगा और अन्यान्य पुराणोक्त वा ब्राह्म-
णोक्त उपाख्यानों का वर्णन-सिद्धान्त शिरोमणि के अनुवाद की भूमिका में
लिखा जावेगा।
भूमिका ॥ २३
सिद्धान्तज्योतिषग्रन्थ ॥
भारतवासियो ! आप वेद और धर्मशास्त्र अध्ययन करते हैं, कोई वेद
और धर्मशास्त्र अध्ययनार्थ तैयार हैं; परन्तु आप जानते हैं ! यह क्या लिखा है-
“द्वे विद्ये वेदितव्यं इति हस्म यद्ब्रह्म विदोवदन्ति पराचैवा पराच ।
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षाकल्पो व्याकरणं निरुक्तं
छन्दो ज्यौतिषमिति” ॥ मुण्डक उ० १ । १ । ४, ५ ॥
अर्थात्-विद्या दो प्रकार की है, एक परा दूसरी अपरा । इन में ऋग्वेद
यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त एवं ज्योतिष अपरा
विद्या है। और जिस विद्या से अक्षर ब्रह्म का ज्ञान हो उसे परा विद्या कहते।
इन में से शिक्षा आदि वेदरूपी पुरुष के छः अङ्ग स्वरूप हैं जैसा कि कहा है-
“शब्द शास्त्रं मुखं ज्यौतिषं चक्षुषी, श्रोत्रमुक्तं निरुक्तञ्च कल्पः करौ ।
या तु शिक्षाऽस्य वेदस्य सा नासिका, पादपद्मद्वयं छन्द आदिर्बुधैः” ॥१०॥
अर्थात्-वेदरूपी पुरुष के व्याकरण तो मुख, ज्योतिष नेत्र, शिक्षा नासिका,
कल्प दोनों हाथ और छन्दः (शास्त्र) पैर हैं। क्या विना नेत्र के वेद पुरुष को
अन्धे रक्खेंगे एवं आप भी नेत्र हीन हो वेद के ज्योतिष सम्बन्धि गूढ़ मर्म
का ऊटपटाङ्ग अश्लील अर्थ कर आर्यों का प्राचीन गौरव नष्ट करेंगे ?
ज्योतिष शास्त्र कहने से-यह न समझ लीजिये कि केवल फलित के ग्रन्थों
ही को ज्योतिष कहते किन्तु संहिता, जातक आदि और सिद्धान्त मिल कर
ज्योतिष कहाता है। यह बात हम ही नहीं कहते किन्तु जगत् विख्यात पं०
बापूदेव शास्त्री जी की वक्तृता हमारे सू०सि० की भूमिकामें पढ़ लीजिये । और
महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी जी अपने “ गणक तरङ्गिणी ” नामक
ग्रन्थ में जिस में सिद्धान्त ज्योतिषियों का इतिहास लिखा है। लिखते हैं कि-
“ आधुनिका ज्योतिर्विदः फलमात्रैकवेदिनः ”
व्याकरण शास्त्र मज्ञात्वैव लघुपाराशरीबालबोधशीघ्रबोधमुहूर्त्तचिन्ता-
मणानीलकण्ठीवृहज्जातकजैमिनिसूत्राणामेकदेशेन मत्ता आत्मानं कृत कृत्यं-
ज्योतिषशास्त्रपारङ्गतमन्यन्ते। तत्र साहसिनो मकरन्दादिरचित सारण्यनुसारेण
तिष्याद्युपपत्तिं विनैवाऽऽधारसारणी च वस्तुतः शुद्धा वा नेति सर्वमबुद्ध्वैव
तिथिपत्रं विरचय्या ऽऽत्मप्रसिद्धिं कुर्वन्ति” । गणकतरङ्गिण्याम्” पृ० १३२ ॥
अर्थात्-आज कल प्रायः लोग, थोड़े से छोटे २ फलित ज्योतिष के ग्रन्थ शीघ्र
बोध, मुहूर्त्तचिन्तामणि आदि पढ़ २ कर आपे को ज्योतिषी मान बैठते और
२४ आर्य्यभटीयस्य-
तिथिपत्र बना २ कर अपनी प्रसिद्धि करते हैं और वास्तविक ज्योतिष
सिद्धान्त संहिता के ग्रन्थ नहीं पढ़ते इत्यादि । कतिपय ग्रन्थों में ज्योतिष
शास्त्र के पांच भेद लिखे हैं जैसा कि-
पञ्चस्कन्धमिदंशास्त्रं होरागणितसंहिता ।
केरलिशकुनश्चैव प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ प्रश्नरत्नटीकाकारः ।
अर्थात् ज्योतिषशास्त्र पांच प्रकार का है, १ होरा, २ गणित, ३ संहिता,
४ केरलि एवं ५ शकुन । इसी प्रकार पूर्वोक्त म० म० पं० सुधाकर जी ने उक्त
ग्रन्थ के प्रारम्भ में लिखा है कि- "अस्ति सिद्धान्तहोरासंहितारूपं स्कन्धत्र-
यात्मकमष्टादशमहर्षिप्रणीतं ज्योतिषशास्त्रं वेदचक्षूरूपं परम्परातः प्रसिद्धम् ।
अष्टादशमहर्षयश्च ज्योतिषशास्त्र प्रतिपादका ये तेषां नामानि प्रकाशितानि (१)
अत्र पुलस्त्य पौलिशयोर्भेदेन पराशरेण ज्योतिषशास्त्रप्रवर्त्तका एकोनविं-
शति संख्याका आचार्या अभिहिताः । केचनाष्टादशाचार्य्यानुरोधेन पुलस्त्यो-
मनुविशेषणपरश्चेति वदन्ति । नारदेन तु सूर्यं हित्वा सप्तदशाचार्या एव स्वसं-
हितायां प्रकाशिताः । तत्रापि ब्रह्माचार्यो वसिष्ठोऽत्रिरित्यादौ ब्रह्मसूर्यो वसि-
ष्ठोऽङ्गिरित्यनेपाठं वदन्ति ।
अथाहो एते संहिताकारा महात्मनो लगधस्य न कुर्व्वन्ति चर्चाम् । येन
महात्मना वेदाङ्गमूलरूपं ज्यौतिषं पञ्चवर्षयुगवर्णन परं विलक्षणं चक्रे ।
सूर्येण मयारुणकृते ब्रह्मणा नारदाय व्यासेन स्वशिष्याय वसिष्ठेन
माण्डव्यवामदेवाभ्यां पाराशरेण मैत्रेयाय पुलस्त्याचार्यो गर्गात्रिभिश्चैवं स्वस्व-
शिष्येभ्यो ज्योतिषशास्त्र विशेषाः प्रतिपादिताः । तथाचाह पराशरः ।
“नारदाय यथा ब्रह्मा, शौनकाय सुधाकरः ।
माण्डव्यवामदेवाभ्याम्, वसिष्ठोयतपुरातनम् ॥
नारायणो वसिष्ठाय, रामेशायापिचोक्तवान् ।
व्यासःशिष्याय सूर्योऽपि, मयारुणकृतेस्फुटम् ॥
पुलस्त्याचार्य्यगर्गात्रि, रोमकादिभििरीतम् ।
विवस्वता महर्षीणाम्, स्वयमेव युगेयुगे ॥
मैत्रेयाय मयाप्युक्तम्, गुह्यमध्यात्मसंज्ञकम् ।
शास्त्रमाद्यं तदेवेदम्, लोकेयच्चाति दुर्लभम् ॥
(१)-"सूर्यःपितामहो व्यासो वसिष्ठोऽत्रिपराशरः । कश्यपोनारदोगर्गो मरीचिर्मनुरङ्गिराः ॥
लोमशःपौलिशश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः । शौनकोऽष्टादशाश्चैते ज्योतिःशास्त्रप्रवर्त्तकाः ॥
पराशरश्च —विश्वसृङ्नारदो व्यासो वसिष्ठोऽत्रि पराशरः । लोमशोयवनः सूर्य श्च्यवनः कश्यपो भृगुः ॥
पुलस्त्यःमनुगाचार्यो पौलिशःशौनकोऽङ्गिराः । गर्गोमरीचिरित्येते ज्ञेयाज्योतिःप्रवर्त्तकाः॥
भूमिका ॥ २५
अथैतेषामाचार्याणां समयादिनिरूपणं तत्तद्रचितसिद्धान्तानामलाभेऽतीव
काठिन्यमतो ऽस्माभिस्तोत्रज्योतिषसिद्धान्तग्रन्थकारपुरुषाणा मुत्तरोत्तरं ख-
ण्डनप्रतिखण्डनद्वारेण बहुविशेषरचयितॄणां यावच्छक्यं तत्तद्ग्रन्थमर्मस्थलानां
सम्यगवलोकनेन समयादिकं निरूप्यते ॥
उपरोक्त संस्कृत का आशय—नीचे लिखे सिद्धान्तज्योतिष के ग्रन्थों के
नाम तो पाये जाते हैं पर ये ग्रन्थ नहीं मिलते अतएव ये ग्रन्थ कब २ बने
इस का पता लगाना कठिन है ॥
सिद्धान्त ज्योतिष ग्रन्थों के नाम ॥
ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ नाम ।
१ ब्रह्मसिद्धान्त । ६ मनुसिद्धान्त । ११ पुलस्तसिद्धान्त । १६ च्यवनसिद्धान्त
२ मरीचिसद्धान्त । ७ अङ्गिरस्सिद्धान्त । १२ वसिष्ठसिद्धान्त । १७ गर्गसिद्धान्त ।
३ नारदसिद्धान्त । ८ बृहस्पतिसिद्धान्त । १३ पराशरसिद्धान्त । १८ पुलिससिद्धान्त ।
४ कश्यपसिद्धान्त । ६ अत्रिसिद्धान्त । १४ व्याससिद्धान्त । १६ लोमशसिद्धान्त ।
५ सूर्य्यसिद्धान्त । १० सोमांसद्धान्त । १५ भृगुसिद्धान्त । २० यवनसिद्धान्त ।
आधुनिक पौरुष ज्योतिष ग्रन्थ ॥
ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ कर्त्ता ग्रन्थनिर्माणकाल स्थान
१ आर्य्यभटीय । पं० आर्य्यभट ४२३ शाके पटना
२ पञ्चसिद्धान्तिका । पं० वराहमिहिर ४२७ ,, कालपी
३ ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त । पं० ब्रह्मगुप्त ५२० ,, भीलमाल (दक्षिणपश्चिमोत्तर)
४ द्विती. यआर्य्य सिद्धान्त । द्विती.यआर्यभट ८७५ ,,
५ सिद्धान्त शिरोमणि । पं० भास्कराचार्य्य १०७२ ,, दौलताबाद
६ सिद्धान्तसार्वभौम । पं० मुनीश्वर १५२५ ,, एलचपुर
७ तत्त्वविवेक । पं० कमलाकर भट्ट १५८० ,, विदर्भ
आर्यभटीय ॥
उपलब्ध पौरुष ज्योतिष ग्रन्थों में सब से पुराना—“आर्यभटीय” है ।
आर्यभट नामक ज्योतिषी ने आर्याछन्द के १२० श्लोकों में इस ग्रन्थ को शाके
४२३ में—स्थान कुसुम पुर (बिहार प्रान्त के अन्तर्गत पाटलिपुत्र या पटना)
में बनाया और इस ग्रन्थ का नाम “आर्यभटीय” रक्खा । लोग इसे “आर्य-
सिद्धान्त,” “लघु आर्यसिद्धान्त” या “प्रथमार्य-सिद्धान्त” भी कहते हैं। आर्य-
भट स्वयं अपने जन्मस्थान एवं ग्रन्थ निर्माणकाल के विषय में यों लिखते हैं कि —
“ब्रह्म कु शशिशुधभृगुरविकुजगुरुकोणभगणान्ममस्कृत्य ।
आर्य्यभटस्त्विह निगदति कुसुम पुरेऽभ्यर्चितं ज्ञानम्॥१॥आ०भ०ग०प०१श्लो०
भा०:--पृथिवी, चन्द्रमा, बुध, शुक्र, आदि अधिष्ठित परब्रह्म को नम-
२६ आर्य्यभटीयम्-
स्कार कर आर्य्यभट इस 'कुसुम पुर' (पटना) के लोगों से समाहृत आर्य्यभटीय
ग्रन्थ को कहते हैं ॥ १ ॥ पुनः—
“षष्ट्यब्दानां षष्टिर्यदा व्यतीतास्त्रयश्च युगपादाः ।
त्र्यधिका विंशतिरब्दास्तदेह मम जन्मनोऽतीताः ॥ आ०भ०गी०३श्लो०॥१९॥
भा०:–इस वर्त्तमान २८ वीं चौयुगी के चतुर्थ भाग में से तीसरे भाग के
६० वर्ष बीतने पर मेरा (आर्य्यभट का) जन्म हुआ। और मेरे जन्म काल
से अब तक २३ वर्ष बीत गयीं। वर्त्तमान महायुग के चतुर्थपाद के ३६०० सौ
वर्ष बीतने पर मेरी उमर २३ वर्ष की हुई। इसी समय मैं ने इस ग्रन्थ को
रचा ॥ १० ॥ पुनः आर्य्यभट ने यह भी लिखा है कि मैं ने यह ग्रन्थ प्राचीन
वैदिक ज्योतिष के अनुसार ही बनाया है–इसे नवीन रचना समझ कर लोग
इस की निन्दा न करें:–
“सदसज्ज्ञान समुद्रात् समुद्धृतं देवताप्रसादेन !
सञ्ज्ञानोत्तमरत्नं मया निमग्नं स्वमति नावा ॥” आ०भा०गी०४श्लो०४९
भा०:–ज्योतिषशास्त्ररूपी समुद्र में अपनी बुद्धिरूपी नौका पर सवार हो
समुद्र में निमग्न होकर ब्रह्मा (ब्रह्माकृत वेदाङ्ग ज्योतिष) की कृपा से सद्ज्ञान
रूप रत्न को मैं ने (आर्य्यभट ने) बाहर किया अर्थात् प्रकाशित किया॥४९॥पुनः–
“आर्य्यभटीयं नाम्ना पूर्वं स्वायम्भुवं सदा सद्यत् ।
सुकृतायुषोः प्रणाशं कुरुते प्रति कञ्चुकं योऽस्य ॥ आ०भ०गी०४श्लो०५०
भा०:–आदि काल में जिस ज्योतिषशास्त्र को वेद से निकाल कर लोक
में प्रचार किया गया उसी ज्योतिषशास्त्र को अर्थात् वैदिक ज्योतिषशास्त्रको
मैं ने (आर्य्यभट ने) “आर्य्यभटीय” नाम से प्रकाशित किया। इस शास्त्र में
जो कोई व्यक्ति मिथ्या दोष दिखलाकर इस का तिरस्कार करेगा–उस के
सुकृत, पुण्य वा यश एवं आयु का नाश होगा ॥ ५० ॥
इस “आर्य्यभटीय” में दो मुख्य भाग हैं और १०८ आर्या छन्द के श्लोक हैं
अतएव कोई २ इस को “आर्याष्टशत” भी कहते हैं। इन दो भागों को कोई २
टीकाकार–भिन्न २ दो ग्रन्थ मानते हैं–जैसा कि–इस के टीकाकारों में से
सूर्ययज्वन्–टीकाकार ने–इन भागों को दो प्रबन्ध मानकर प्रत्येक की आदि
में विघ्न शास्त्र्यर्थ मङ्गलाचरण किया है; अतएव बहुत से लोगों ने इन दो भागों
को भिन्न २ ग्रन्थ माना है। परन्तु ग्रन्थ देखने से मालूम होता है कि एक
भाग दूसरे भाग पर अवलम्ब रखता है। अर्थात् यदि एक को छोड़ दिया जावे
तो दूसरे का कुछ उपयोग नहीं रहता। इस लिये दोनों को मिलाकर एक
सिद्धान्त मानना ठीक है। स्वयं आर्य्यभट ने भी प्रथम भाग का कोई पृथक नाम
भूमिका ॥ २७
• नहीं रक्खा है और न उस के अन्त में उपसंहार ही किया है, एकत्र पूरे
(दोनों भागों का) ग्रन्थ के अन्त में ही उपसंहार किया है और "आर्य-
भटीय" ऐसा नाम रक्खा है। इसीप्रकार ग्रन्थकार ने ग्रन्थ भर में चार
पाद रक्खे हैं पाद का अर्थ चौथा भाग है और चतुर्थ भाग किसी पूरे १६
अंशों की वस्तु में होता है-अतएव प्रथम पाद के पूर्व दो श्लोक, प्रथम पाद
में १० श्लो०, द्वितीय में ३३ श्लो०, तृतीय पाद में २५ और चतुर्थ में ५०, यों सब
मिल कर १२१ श्लोक हैं। परन्तु "आर्याष्टशत" इस लेख को देख कर बहुतसे
युरोपियन विद्वानों ने भ्रम से इस ग्रन्थ में ८०० श्लोकों का होना माना
है। जो श्रीमान् डाक्टर करण साहब के-सन् १८७४ ई० के छप वाये संस्कृत टीका-
सहित आर्यभटीय के देखने से पाश्चात्य विद्वानों का ८०१ आर्या श्लो० होने
का भ्रम दूर हुआ। आर्यसिद्धान्त नाम से एक दूसरा भी ज्योतिष ग्रन्थ-
प्रसिद्ध है-उस पर विचार किया जाता है।
द्वितीय आर्यसिद्धान्त ॥
द्वितीय आर्यभट शाके ८७५ में हुए "प्रथम आर्यभट" के अतिरिक्त यह
एक द्वितीय "आर्यभट" नवीन हुए; अतएव इन्हें "द्वितीयआर्यभट" और
इन के ग्रन्थ को "द्वितीयआर्यसिद्धान्त" कहते हैं। पूना के "दक्षिण-
कालिज" में "द्वितीय आर्यसिद्धान्त की एक प्रति है जिस पर "लघुआर्य-
सिद्धान्त" लिखा है, परन्तु स्वयं ग्रन्थकार ने अपने ग्रन्थ में ग्रन्थ का
नाम "लघु" या "बृहत्" कुछ भी नहीं लिखा है। इस ग्रन्थ के पहिली
"आर्या" (छन्द) में लिखा है कि-
"विधि ध खगागम पाटी कुट्टक बीजादि दृष्टशास्त्रेण ।
आर्यभटेन क्रियते सिद्धान्तो रुचिर आर्याभिः" ॥
भाः-इन ने अपने ग्रन्थ को "सिद्धान्त" ऐसा लिखा है इस के पूर्व के
"आर्यभट" से यह नवीन हैं, (जो आगे सिद्ध होगा) इसलिये इन को
"द्वितीय आर्यभट" और इन के सिद्धान्त को "द्वितीय आर्यसिद्धान्त" कहते हैं।
इन ने अपना ग्रन्थ निर्माण या जन्मकाल के विषय में कुछ नहीं लिखा
है। किन्तु "पराशरसिद्धान्त" ग्रन्थ का मध्यम मान दिया है इससे इन
ने दोनों सिद्धान्त ग्रन्थों का उल्लेख किया है।
"एतत् सिद्धान्तद्वयमषिष्ट्यादि कलौ युगे जातम्" ॥ २ ॥ अध्याय २ ॥
इस के अनुसार कलियुग के थोड़े ही समय बीतने पर ये दोनों सिद्धान्त
रचे गये ऐसा दिखलाने का-इन का उद्देश्य है।
२८ आर्यभटीयस्य-
परन्तु ब्रह्मगुप्त के अनन्तर यह ग्रन्थ रचा गया ऐसा स्पष्ट प्रतीत होता है।
इस का कारण यह है कि यह अपने सिद्धान्त को कलियुग के आरम्भ ही में
बनना बतलाते हैं, इस से अपने ग्रन्थ को पौरुष ग्रन्थकारों में गणना
करते हैं। ब्रह्म गुप्त के पहिले इन के ग्रन्थोल्लिखित वर्षमान या अन्यान्य
मानों का वस्तुतः कहीं प्रचार होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। और
ब्रह्म गुप्त ने अपने ग्रन्थ में आर्यभट-के दूषणों को सब से पहिले दिखलाया
है। इस से ब्रह्मगुप्त के पहिले प्रथम--आर्यभट हुए यह सिद्ध होता है।
द्वितीय आर्यभट के सिद्धान्त के किसी विषय का उल्लेख ब्रह्मगुप्त ने नहीं
किया, यदि द्वितीय-आर्यभटग्रन्थ उस समय या उससे पहिले बना होता
तो अवश्य इस का भी उल्लेख ब्रह्मगुप्त करते। "पञ्चसिद्धान्तिका" (जो
शाके ४२१ का बना है) में अय गति का उल्लेख कुछ भी नहीं दीखता। पहिला
आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, लल्ल, इन के ग्रन्थों में अयनगांते का वर्णन नहीं है और
इस द्वितीय आर्यसिद्धान्त में इसका वर्णन है। अधिक क्या कहा जावे-प्रथम आर्यभट
के जो २ दूषण ब्रह्मगुप्त ने दिखलाये हैं, उस २ के उद्धार का यत्न, द्वितीय,
आर्यभट ने किया है। इन के ग्रन्थ में युगपद्धति (सत, त्रेता, द्वापर, कलि)
है; कल्प का आरम्भ रविवार को माना है, और पहिला आ० भ०
में युग के आरम्भ में मध्यमग्रह एकत्र रहते, स्पष्टग्रह एकत्र नहीं रहते ऐसा
लिखा है। इसका खण्डन ब्रह्मगुप्त ने किया है (अ० २। आर्या ४६) परन्तु
द्वितीय आर्यभट के प्रमाण से सृष्टि के आरम्भ में स्पष्ट ग्रह एकत्र होते हैं इन
सब प्रमाणों से ब्रह्मगुप्त के अनन्तर अर्थात् शाके ५८१ के अनन्तर २रे आ०भ० थे।
यह उस समय का प्राचीन सिद्धान्त माना जाता और अर्वाचीन सिद्धान्त सब
से पहिले आर्यकुलभूषण पं० भास्करा चार्य ने रचा। सिद्धान्त शिरोमणि के
स्पष्टाधिकार के ६५ वें श्लोक में लिखा है कि " श्रीयर्यभटादिभिः सूक्ष्मत्वार्थं
दृक्कोशोदयाः पठिताः " दृक्क्रोश अर्थात् राशि का तीसरा अंश (१० अंश)।
प्रथम आर्यभट ने लग्नमान को तीस २ अंशों में किया है। दश २ अंशों का
नहीं। परन्तु द्वितीय आ० भ० ने अ० ४ आर्या ३८-४१ में दृक्कोशोदय (लग्न-
मान) कहा है। इस प्रमाण से दृक्कोशोदय साम्प्रत द्वितीय आर्यभट को छोड़
अन्य किसी ग्रन्थ में नहीं लिखा है। इस के अनुसार भास्कराचार्य के उक्त
वाक्यानुसार आ०भ० पहिला नहीं, किन्तु द्वितीय आ० सि० ही सिद्ध होता है।
जिस के अनुसार शाके १०७२ के पूर्व द्वितीय आर्यभट थे, ऐसा निश्चय होता
है। द्वितीय आ० भ० ने अयनांश निकालने की रीति दियी है, इस के अनु-
भूमिका ॥ २९
सार अयनगति एकसी नहीं रहती वरञ्च उस में बहुत न्यूनाधिक्य होता है।
परन्तु अयन गति सर्वदा एकसी रहती-ऐसा मानने पर भी इसकी सूक्ष्म
गति मानी जाती है जिससे उस में बहुत थोड़ा अन्तर पड़ता है। आधुनिक
सूर्य-सिद्धान्तोक्त अयनगति सब काल में एकसी रहती है परन्तु इस का
काल ज्ञात नहीं ऐसा लिखा है।
“राजमृगांक” ग्रन्थ में (शाके ९६४) अयनगति सब काल में एकसी
रहती है ऐसा लिखा है। इस ग्रन्थ को पूर्व के बने ग्रन्थों में इस विषय के
होने का प्रमाण अब तक नहीं मिला है। इस के अनुसार अर्यनगति का
ज्ञान (बराबर) होने के पहिले द्वि० आ० भ० भट्टोत्पल के टीका में लिखा
है। परन्तु दूसरे आ० भ० में ऐसा नहीं लिखा है जिस से द्वितीय आर्यभट
भट्टोत्पल के पहिले थे ऐसा निश्चय होता है।
उपरोक्त प्रमाणों से द्वि० आ० भट्टोक्त मेष-संक्रमण काल के उल्लेखानु-
सार-द्वितीय आर्यभट का समय ८७५-सिद्ध होता है।
इस द्वितीय आर्यसिद्धान्त में १८ अधिकार और ६२५ आर्या छन्द के श्लोक
हैं। प्रथम १३ अध्यायों में करण ग्रन्थ के निराले २ अधिकारों का वर्णन है,
चौदहवें में गोल सम्बन्ध विचार एवं प्रश्न हैं, १५ वें में १२० आर्या श्लो० में
अङ्क गणित एवं क्षेत्रफल, घनफल का वर्णन है, १६वें में भुवन कोश का वर्णन है,
१७वें में ग्रह मध्य की उपपत्ति इत्यादि हैं और १८ वें में बीजगणित, कुट्टक
गणितहैं। इस में ब्रह्म गुप्त के ब्र० सि० से भी अधिक विषय हैं। इन ने संख्या
दिखलाने का क्रम प्रथम आर्यभट से भी विलक्षण ही दिया है जैसा कि—
वर्णा वर्णबोधितसंख्या वर्णा संख्या
कँ, ट, प, य,= १ च, त, ष,= ६
ख, ठ, फ, र= २ छ, थ, स= ७
ग, ड, ब, ल= ३ ज, द, ह= ८
घ, ढ, भ, व= ४ झ, ध= ९
ङ, ण, म, श= ५ ञ, न= ०
“अङ्कानां वामतो गतिः” यह नियम प्रथम आर्यभट ने नहीं लिखा है।
हम ने यहां “द्वितीयआर्यभट” के समय आदि का विचार इस लिये किया है
कि जिस से पाठकों को यह भ्रम न हो कि दोनों आर्यभटीय ग्रन्थों में
पुराना कौनसा है-एवं दोनों ग्रन्थ एक ही ग्रन्थकार द्वारा बने या भिन्न २ द्वारा
३० आर्यभटीयम्-
इत्यादि। अब इस का आगे "प्रथम आर्यभटीय" का अनुवाद आरम्भ होगा
हमारे देशके बहुतसे अमूल्य ग्रन्थ तो अङ्गरेजों से पहिले के आये हुए विधर्मियों
के उपद्रव आदि कारणों से नष्ट भए हुए, उन से बचे बचाये ग्रन्थ, देश के
ईर्ष्यालु व मण्डूकों (मूर्खो) के पास सड़ते हैं और उनका प्रचार नहीं होता, इससे बचे
बचाये ग्रन्थ हमारे परम माननीय अङ्गरेजी गवर्नमेण्ट के सुप्रबन्ध से पुस्त-
कालयों तथा लन्दन, जर्मन आदि देशों में सुरक्षित हैं, परन्तु बड़े शोच
की बात है कि जिस भारतवासियों के घर का रत्न समुद्र पार जाये, वे
भड्डू के लड्डू की गाढ़ निद्रा में कुम्भकरण की नाईं खर्राट मार कर सोते हैं
और जगाने पर भी नहीं जगते-और इन्हीं अमूल्य ग्रन्थों का तर्जुमा विला-
यत आदि से होकर आता है तो जी की जी भाव में देखते हैं।
हमने असम देश के श्रीरण रक्षार्थ डूंढिंराज के पुराने ग्रन्थ-आर्यभटीय
की एक प्रति असम् देश से मंगवा कर पाठकों के अवलोकनार्थ सटीक सानुवाद
प्रकाशित किया है। आशा है कि हमारे पाठकगण इस की एक २ प्रति
मंगा कर अपने स्वदेशीय रत्नोंका संचय कर हमारे परिश्रम को सफल करेंगे
अनुवादक.
आर्य्यभटोयस्य विषयानां सूचीपत्रम् ॥
विषय पृष्ठाङ्क
मङ्गलाचरणपूर्वक वस्तु कथन १
संख्या ज्ञापक अक्षरों की परिभाषा ॥ २
चतुर्युग में सूर्यादि की भगणसंख्या । ४-५
चन्द्रोच्च बुध, शुक्र के शीघ्रोच्च भगण । ६-७
कल्पान्तर्गत मनु और गत काल । ७-८
राशि आदि विभाग, आकाशकक्षा योजन प्रमाण आदि । ८
योजन परिमित भूमि आदि का योजनप्रमाण । १०
ग्रहों के अपयान-प्रमाण और पुरुष-प्रमाण । ११
मङ्गलादि पांच ग्रहों का पात भगण और मन्दोच्चांश । १२
सूर्यादि के मन्दवृत्त और शनि आदि के शीघ्रवृत्त । १४
वक्री ग्रहों का युग्मपद में वृत्त एवं भू-वायु की कक्षा का प्रमाण । १५
चौबीश अर्ध्ज्या १६
दश गीतिका सूत्र परिज्ञान का फल । .१७
प्रथमपाद की विषयसूची समाप्त हुई ॥१॥ .
ग्रन्थकार के जन्मस्थान का वर्णन । १७
संख्या के दश स्थानों की संज्ञा और संज्ञा का लक्षण । १८
वर्ग और घन स्वरूप वर्णन । १९
वर्गमूल । १९
घनमूल । २०-२३
त्रिभुज क्षेत्रफल और घन त्रिभुज का फल । २३-२४
वृत्तक्षेत्रफल और घन समवृत्त क्षेत्रफल । २४
विषम चतुष्कोण आदि का क्षेत्रफल । २४-२५
सब क्षेत्रों का फल लाना और व्यासार्द्ध तुल्यज्या का ज्ञान । २५-२६
वृत्त की परिधि का प्रमाण । २६-२७
जीवा की परिकल्पना की विधि । २७-२९
गीतिकोक्त खण्डज्याओं के लाने का उपाय । २९-३०
वृत्तादि के परिकल्पना का प्रकार । ३०-३१
वृत्त के विष्कम्भार्द्ध का लाना । ३१
छाया का लाना । ३२
कोटी और भुजाओं का लाना । ३२-३३
कर्ण एवं अर्ध्ज्या का लाना । ३३
२ आर्यभटीयस्य विषयाणां सूचीपत्रम् ॥
विषय पृष्ठाङ्क
पार्श्वगत दो शरों का लाना । ३४
श्रेढीफल का लाना । ३४-३५
गच्छ का लाना । ३६
सङ्कलित धन का लाना । ३६-३७
वर्ग और घन के सङ्कलित का लाना । ३७-३८
दो राशियों के संवर्ग से दो राशियों का लाना । ३८
राशि के संवर्ग से दो राशि का लाना । ३८-३९
मूलफल लाना । ३९-४०
त्रैराशिक गणित । ४०
भिन्न २ राशियों का सवर्णीकरण । ४१
व्यस्तविधि । ४२
संघ धन का लाना । ४२-४३
अव्यक्त मूल्य का मूल्य दिखलाना । ४३-४४
ग्रहान्तरों से ग्रहयोग का लाना । ४४
कुट्टाकार गणित । ४५-४८
द्वितीय पाद की विषय सूची समाप्त हुयी ।
काल और क्षेत्रविभाग । ४८-४९
द्वियोग और व्यतीपात की संख्या । ४९-५१
उच्च नीच वृत्त का आधार और गुरुवर्ष की संख्या । ५१
सौर, चान्द्र, सावन, नाक्षत्र मानविभाग । ५२
अधिमास, अवम दिन वा क्षय दिन । ५२
मनुष्य, पितृ, देवताओं के वर्ष का प्रमाण । ५२-५३
ग्रहों के युगकाल, ब्राह्म दिन काल । ५३
काल की उत्सर्पिणी आदि विभाग । ५३-५४
शास्त्र का प्रणयन काल एवं ग्रन्थकार की आयु । ५४-५५
युगादि प्रारम्भ काल ५५-५६
ग्रहों का समगति होना । ५६
समगति वाले ग्रहों का शीघ्र गति होना । ५६
राशि, भाग, आदि क्षेत्रों का प्रमाण । ५६-५७
नक्षत्र मण्डल से अधोगत ग्रह कक्ष्या का क्रम । ५७
उक्त कक्ष्या क्रम से काल होराधिपति, दिनपति । ५७-५८
आर्यभटीयस्य विषयाणां सूचीपत्रम् ॥ ३
विषय पृष्ठाङ्क
दृष्टि के वैषम्य होने का कारण— ५८-५९
प्रतिमण्डल का प्रमाण और उस का स्थान— ५९
स्फुट ग्रहों का अन्तराल प्रमाण— ५९-६०
भ्रमण प्रकार— ६०-६१
उच्च, नीच वृत्त के भ्रमण का प्रकार— ६१-६२
मन्द और शीघ्र के ऋण और धन का विभाग— ६२-६३
शनि, गुरु, मङ्गल (स्फुट) ६३-६६
भ, तारा, ग्रहों का विवर लाना— ६६
तृतीय पाद की विषयसूची समाप्त हुई ।
अपमण्डल का संस्थान— ६७-६८
अपक्रम मण्डल चारी ग्रहगण— ६८
अपमण्डल के चन्द्रमा का पात उत्तर से दक्षिण— ६८-७०
चन्द्रमा आदि का दूर और निकटता से सूर्य प्रभा से उदयास्त ज्ञान— ७०-७१
स्वतः अप्रकाश भूमि आदि के प्रकाश का हेतु— ७१
कदम्बा और भूसंस्थान— ७१-७२
भूगोल के ऊपर प्राणियों का निवास— ७२
कल्प में भूमि की वृद्धि और ह्रास— ७२
भूमि का पूर्व की ओर चलना— ७२-७३
भपञ्जर के भ्रमण का कारण— ७३
मेरु प्रमाण और मेरु का स्वरूप— ७३-७४
मेरु, बड़वामुख आदि का अवस्थान— ७४
भूमि के चारों ओर पृथिवी के चतुर्थ भाग में ४ नगरियां— ७४-७५
लङ्का और उज्जयिनी के बीच का देश— ७५-७६
भूपृष्ठस्थित ज्योतिश्चक्र के दृश्य और अदृश्य भाग— ७६
ज्योतिश्चक्र में देवासुर दृश्य भाग— ७६-७७
देवादिकों का दिन प्रमाण— ७७-७८
गोल कल्पना— ७८-७९
क्षितिज में नक्षत्र और सूर्यादि ग्रहों का उदयास्त— ७९-८०
द्रष्टा के कारण ऊंचे नीचे का विभाग— ८०
दृङ्मण्डल, दृक्क्षेप मण्डल— ८०
४ आर्य्यभटीयस्य विषयाणां सूचीपत्रम् ॥
विषय पृष्ठाङ्क
गोल के भ्रमण का उपाय— ८०-८१
क्षेत्र कल्पना का प्रकार और अक्षावलम्बक— ८१-८२
स्वाहोरात्रार्द्ध— ८२
निरक्ष देश में राशि का उदय प्रमाण— ८२-८३
दिन रात्र की हानि वृद्धि । ८२
स्वदेशीय राशियों का उदय । ८३-८४
इष्टकाल में शङ्कु का लाना । ८५
शङ्कु अग्रा को लाना । ८५-८६
अर्क अग्रा का लाना । ८६
सूर्य का सम मण्डलप्रवेश काल में शङ्कु का लाना ८६-८७
मध्यान्ह 'शङ्क और उस की छाया । ८७
दृक्क्षेप ज्या का लाना । ८७-८८
दृग्गति, उयावलम्बन योजन का लाना । ८८-८९
चन्द्रादि के उदयास्त लग्न सिद्धि के लिये अपने २ विक्षेप दृक् कर्म । ८९
आयर्न दृक्कर्म । ८९-९०
चन्द्र, सूर्य, भूमि छाया के चन्द्र सूर्य ग्रहण के स्वरूप । ९०
ग्रहणकाल । ९०-९१
भूछाया का दैर्घ । ९१
भूछाया के चन्द्रकक्षा प्रदेश में व्यास योजन का लाना । ९१-९२
स्थित्यर्ध का लाना । ९२
विमर्दार्धकाल का लाना । ९२-९३
ग्रस्त शेष प्रमाण— ९३
तात्कालिक ग्रास परिमाण— ९३
स्पर्श मोक्षादि ज्ञान— ९३-९४
गृहीत विम्ब स्थान वर्णन— ९४-९५
सूर्यग्रहण में अदृश्य भाग— ९५
स्वशास्त्र प्रतिपादित ग्रह गति से दृक् संपात द्वारा स्फुटत्वं-- ९५-९६
शास्त्र का मूल— ९६
उपसंहार— ९६
आर्य्यभटीय की विषयसूची समाप्त हुई ॥
॥ ओ३म् ॥
अथार्यभटीयं ज्योतिषशास्त्रम् ॥
" यस्तेजः प्रेरयेत् प्रज्ञां सर्वस्य शशिभूषणम् ।
मृगटङ्काभयेष्टाङ्कन्त्रिणेत्रन्तमुपास्महे ॥
लीलावती भास्करीयं लघु चान्यच्च मानसम् ।
व्याख्यातं शिष्यबोधार्थं येन प्राक्तेनं चाधुना ॥
तन्त्रस्यार्यभटीयस्य व्याख्याल्पा क्रियते मया ।
परमादीश्वराख्येन नाम्नात्र भटदीपिका ॥"
तत्रायमाचार्य आर्यभटो विघ्नोपशमनार्थं स्वेष्टदेवतानमस्कारं प्रतिपा-
द्य वस्तुकथनञ्चार्यरूपया करोति ॥
प्रणिपत्यैकमनेकं कं सत्यां देवतां परं ब्रह्म ।
आर्यभटस्त्रीणि गदति गणितं कालक्रियां गोलम्॥
इति ॥ कं ब्रह्माणं एकं कारणरूपेणैकं अनेकं कार्यरूपेणानेकं सत्यां देवतां
देव एवदेवता। स्वयम्भूरैव पारमार्थिको देव अन्ये तेन सृष्टा इत्यपारमार्थिकाः।
परंब्रह्म जगतो मूलकारणं त्रिमूर्त्यतीतं सर्वव्याप्तं ब्रह्म स्वयम्भूरित्युक्तौ भ-
वति । आर्यभट एवं ब्रह्माणं प्रणिपत्य गणितं कालक्रियां गोलम्-इत्येतानि
त्रीणि वस्तूनि निगदति * परोक्षत्वेन निर्देशान्निगदतीति वचनम्। तत्र गणि-
तन्नाम सङ्कलितमिश्रश्रेढीदर्शधीकुट्टाकारच्छायाक्षेत्राद्यनेकविधम् । इह तु काल-
क्रियागोलयोर्यावन्मात्रं परिकरभूतं तावन्मात्रं सामान्यगणितमेव प्रायशः प्र-
तिज्ञातम् । अन्यच्च किञ्चित्। कालस्य क्रिया कालक्रिया । कालपरिच्छेदोपाय-
भूतं ग्रहगणितं कालक्रियेत्यर्थः । गोलनाम ब्रह्माण्डकटाहमध्यवर्त्याकाशम-
ध्यस्थसंहनक्षत्रकक्ष्यात्मकं स्वमध्यस्थघनवृत्तभूमिकमपक्रमाद्यशेषविशेषोपेतं
प्रवाहाख्यवायुप्रेरितं कालचक्रज्योतिश्चक्रभपञ्जरादिशब्दवाच्यं गोलः । स च
२ गीतिकापादः ॥
वृत्तक्षेत्रत्वाच्चतुरश्राद्यनेकक्षेत्रकल्पनाधारत्वाच्च गणितविशेषगोचर एव । एतच्च
यमपि द्विविधम् । उपदेशमात्रावसेयन्तन्मूलन्यायावसेयञ्चेति । तत्र युगप्रमाण
मन्दोच्चादिवृत्ताद्युपक्रमाद्युपदेशमात्रावसेयम् इष्टदिनग्रहगतीष्टापक्रमस्वाहोरा-
त्रचरदलादिच्छायानाडिकाद्युपदेशसिद्धयुगप्रमाणादितो न्यायावसेयम् । एवं द्वै-
विध्यम् ॥ अत्र स्वयम्भूप्रणामकरणेन करिष्यमाणस्य तन्त्रस्य ब्रह्मसिद्धान्तं
मूलमिति च प्रदर्शितम् ॥
अथोपदेशावगम्यान्युगभगणादीन् सङ्क्षेपेण प्रदर्शयितुं दशगीतिकासूत्रं क-
रिष्यन् तदुपयोगिनीं परिभाषामाह ॥
भा०:-अनेक दैवतायों में परमश्रेष्ठ ब्रह्मा-जगत् स्रष्टा (जिस ने अनेक
देवों को रचा ) को प्रणाम कर आर्यभट ( ग्रन्थकार ) ' गणित , 'कालक्रिया'
और ' गोल विद्या ' इन तीन वस्तुओं को वर्णन करते हैं ॥
वर्गाक्षराणि वर्गेऽवर्गे ऽवर्गाक्षराणि कात् ङ्मौ यः ।
खद्विनवके स्वरा नव वर्गेऽवर्गे नवान्त्यवर्गे वा ॥
इति=वर्गाक्षराणि वर्गे। ककारादीनि मकारान्तानि वर्गाक्षराणि । तानि
वर्गस्थाने एकशतायुताद्योजस्थाने स्थाप्यानि । एवं क्रमेण संख्या वेद्या ॥ अ-
वर्गे अवर्गाक्षराणि। यकारादीनि अवर्गाक्षराणि । तान्यवर्गस्थाने दशसहस्र-
लक्षादियुग्मस्थाने स्थाप्यानि । कात् ककारादारभ्य संख्या वेद्या । ककार-
एकसंख्यः खकारो द्विसंख्य एवं क्रमेण संख्या वेद्या । ञकारो दशसंख्यः । टकार-
एकादशसंख्यः । नकारो विंशतिसंख्यः । मकारः पञ्चविंशतिसंख्यः । एवं लि-
पिपाठक्रमेण संख्या वेद्या ॥ ङ्मौ यः । ङकारमकारयोर्योगेन तुल्यो यकारः
पञ्चसंख्यायाः पञ्चविंशतिसंख्यायाश्च योगस्त्रिंशत्संख्य इत्यर्थः । अत्र प्रथम-
स्थानमङ्गीकृत्य त्रिंशदित्युक्तं नतु द्वितीयस्थानमङ्गीकृत्य । द्वितीयस्थाने पि
त्रिसंख्यो यकारः । इत्युक्तं भवति । रेफादयः क्रमेण द्वितीयस्थाने चतुरादि-
संख्यास्स्युः। हकारो द्वितीयस्थाने दशसंख्यः शतसंख्यावाचक इत्यर्थः । एवम-
वर्गस्थानविहितापि हकारसंख्या संख्यान्तरत्वेन वर्गस्थाने स्थाप्यते । एवं ञ-
कारादिसंख्या वर्गस्थानविहिताप्यवर्गस्थाने संख्यान्तरत्वेन स्थाप्यते । एतद्धि
न्यायतस्सिद्धम्। अत्रगतुल्यो यकार इति वक्तव्ये ङ्मौ य इति वर्णाद्वयेन यद्रूपं
तेन संयुक्तैरप्यक्षरैस्संख्या प्रतिपादयिष्यत इति प्रदर्शितं भवति ॥ शून्यभूता-
नामनङ्गीकृतसंख्याविशेषाणां के प्रयुज्यन्ते । इत्यत्राह । खद्विनवके स्वरा न-