अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ एवं मंगलाचरण
THE
HARIDAS SANSKRIT GRANTHAMALA
228
श्रीलौगाक्षिभास्करप्रणीतः
अर्थसंग्रहः
त्यागमूर्ति श्रोटाटाम्बरिस्वामिना
‘दीपिका’ हिन्दीटीकया समलङ्कृतः
न्याय-व्याकरणाचार्य-लब्धस्वर्णपदक-
पण्डित श्रीशोभितमिश्रेण सम्पादितः
THE
CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE
VARANASI-1 ( India )
प्रकाशक : चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी-१
मुद्रक : विद्याविलास प्रेस, वाराणसी-१
संस्करण : द्वितीय, वि० सं० २०२१
मूल्य : १-२५
© Chowkhamba Sanskrit Series Office,
P. O. Box 8, Varanasi.
( INDIA )
Phone : 3145
प्रस्तावना
प्रत्येक प्राणी स्वभावतः सुखप्राप्ति के लिये अनवरत कुछ न कुछ प्रयास
करता रहता है । वस्तुतः सुख प्राप्त करना ही जीवन का परम उद्देश्य समझा
जाता है, इसमें किसी का भी मतभेद नहीं है। परन्तु उसके सामने यह एक
जटिल प्रश्न उठ खड़ा होता है कि वह सुख कैसे प्राप्त हो ? इसी के समाधान
को दृष्टिकोण में रखते हुए महान आचार्यों ने कर्म के साथ-साथ उसके साधनों
की जानकारी प्राप्त करना ही परम उपाय बतलाया है । उनमें भी ज्ञान के
साथ कर्म का इतना गहरा सम्बन्ध है कि एक के बिना दूसरे का सफल होना
असम्भव है ; ऐसा कहें तो कोई अत्युक्ति न होगी। इसीलिये जगन्नियन्ता परम-
पिता प्रभु ने नानाविध विचित्र विश्वसर्जन कर्म कौशल को दर्शाते हुए विश्व को
ही कर्ममय एवं ज्ञानमय करने की भावना से कर्म-ज्ञान के भण्डार वेद को ही
अपना एक प्रतीक स्थापित किया है। उसी प्रभु की प्रेरणात्मक आज्ञा को वहन
करते हुए महर्षि भगवान् जैमिनि ने कर्मप्रधान जगत् में प्राणिमात्र के कल्याणार्थ
ऐहिकामुष्मिक उद्देश्यों के परम साधनभूत उत्तम कर्मों में प्रवृत्ति कराने की भावना
से प्रेरित होकर मानवों को वेदार्थतत्त्वों की जानकारी प्राप्त कराने के लिये कर्म-
काण्डप्रधान मीमांसा शास्त्र का द्वादश अध्यायों में निर्माण किया। उसी को
पूर्वमीमांसा या कर्ममीमांसा कहते हैं । उससे वेदों के वास्तविक अर्थतत्त्वों का
ज्ञान अच्छी तरह होता है । किन्तु उसमें अत्यन्त विशाल रूप से प्रतिपादित
जटिलतम कर्मकलापों का ज्ञान कराने में समर्थ किसी सरलतम ग्रंथ को नहीं
देखकर महामहोपाध्याय लौगाक्षि भास्कराचार्य ने उक्त मीमांसा शास्त्र में प्रवेश
कराने के लिये सभी वैदिक यज्ञ-सम्बन्धी पदार्थों का संक्षेप में संग्रह कर ‘अर्थ-
संग्रह’ नाम का ग्रन्थ बनाया। मीमांसा का सारभूत यह ग्रन्थ छोटा होने पर
भी कितना उपादेय है यह विषय प्रायः किसी से छिपा नहीं है। अतएव प्रत्येक
प्रान्त की संस्कृत परीक्षा में भी यह ग्रन्थ तत्तत्प्रान्तीय शिक्षासमिति द्वारा पाठ्य
पुस्तकों में निर्धारित किया गया है।
स्वतन्त्र भारत की वाणी ( हिन्दी ) से सुसज्जित होकर यह पुस्तक आज
प्रथम बार राष्ट्रभाषा का अभिनन्दन करने जा रही है-यह एक महान हर्ष का
विषय है, क्योंकि इसमें बहुत से ऐसे पारिभाषिक शब्द आ गये हैं, जिनके पूर्वापर
सम्बन्ध के साथ वास्तविक भावार्थों को एक सरल एवं ठोस रूप में जानने के
[ २ ]
लिये छात्रगणों को बहुत ही दिनों से बड़ी ही उत्कण्ठा बनी हुई थी । यद्यपि
इसकी बहुत सी संस्कृत टीकायें प्रकाशित हो चुकी हैं तथापि अल्प समय में
अत्यन्त सरल उपाय से विद्यार्थियों को समझाने के लिये वे अपर्याप्त ही मालुम
पड़ती थीं । इसलिये आधुनिक युग के अनुसार एक सामयिक भाषा टीका का
होना अत्यन्त ही आवश्यक समझा जाता था, जिसकी पूर्ति के लिये यह भगीरथ-
प्रयास किया गया है ।
इस ग्रंथ के रचयिता महामहोपाध्याय लौगाक्षिवंशोद्भव प्रसिद्ध नामधेय
महर्षि भास्कर हैं । आपने न्यायशास्त्र में भी प्रवेश कराने के लिये छात्रोपकारार्थ
'तर्ककौमुदी' नामक ग्रंथ रचा है । इससे स्थालीपुलाकन्यायेन आपका दर्शनशास्त्र-
विषयक प्रगाढ पाण्डित्य सूचित होता है ।
प्रस्तुत संस्करण के हिन्दी टीकाकार त्यागमूर्ति स्वामी श्री टाटाम्बरी जी
महाराज रामानन्द सम्प्रदाय के परम नैष्ठिक वैष्णव संन्यासी हैं । आपका
सारा जीवन परोपकार में ही हमेशा लगा रहता है । आपने दर्शनशास्त्र का
विशेष परिशीलन कर मीमांसा शास्त्र में अनुपम वैदुष्य प्राप्त किया है । अत्यन्त
प्राचीन होते हुए भी आपने छात्रों को अत्यन्त सुगमता से समझाने के लिये इस
टीका में अत्यन्त सुन्दर एवं सरल पथ प्रदर्शित किया है । टीका में यत्र-तत्र
आपने ग्रंथ के आशय को हृदय खोलकर रख दिया है—यह आपकी एक बड़ी
विशेषता है। मुझे पूर्ण आशा है कि इस टीका से विद्यार्थियों को पूर्ण सहयोग मिलेगा ।
स्वामी टाटाम्बरी जी महाराज की इस स्तुत्य कीर्ति को निज अर्थव्यय से
प्रकाशित करने वाले गोलोकवासी स्वनामधन्य श्रेष्ठिवर श्री हरिदास जी गुप्त के
आत्मज चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालयाध्यक्ष बाबू श्री जयकृष्ण दास जी गुप्त
महोदय भी विशेष धन्यवाद के योग्य हैं । आपने अपने ६२ वर्ष के वयोवृद्ध
विश्वविख्यात चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय द्वारा जो अनवरत संस्कृत की सेवा
की है, उसके लिये संस्कृत समाज ही नहीं प्रत्युत आज का स्वतन्त्र भारत भी
आपका कृतज्ञ है ।
विनीत—
वसन्त पंचमी | ताराकान्त झा शास्त्री
वि० सं० २००९ | प्रधानाध्यापक श्री रघुवीर विद्यालय,
शींगडा, काठियावाड़
अर्थसंग्रहविषयानुक्रमणिका ।
| विषयः | पृष्ठम् | विषयः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| मङ्गलाचरणम् | १ | द्वितीयारूपाया विनियोक्त्र्या उदाहरणं | २० |
| तन्त्रारम्भकसूत्रावतरणम् | २ | द्वितीयाविनियोक्त्र्या उदाहरणम् | २१ |
| धर्मविचारशास्त्रस्यावश्यकता | ,, | सप्तमीविभक्तिविनियोक्त्र्या उदाहरणम् | ,, |
| धर्मलक्षणप्रश्नः | ३ | अमूर्ताया अपि भावनाङ्गत्वम् | ,, |
| वेदस्य धर्मप्रतिपादकत्वम् | ४ | भावनाया आख्यातवाच्यत्वम् | २२ |
| भावनाविचारः | ५ | लिङ्गनिर्वचनम् | २६ |
| शाब्दीभावना | ,, | वाक्यनिर्वचनम् | २८ |
| शाब्द्या लौकिकवैदिकभेदौ | ६ | प्रकृतिविकृतिलक्षणम् | २९ |
| आर्थीभावनालक्षणम् | ८ | प्रकरणनिरूपणम् | ३१ |
| आर्थीभावनाया अंशत्रयम् | ,, | प्रकरणद्वैविध्यम् | ,, |
| वेदलक्षणविचारः | १० | महाप्रकरणम् | ,, |
| विधिमीमांसा | ,, | अवान्तरप्रकरणम् | ३२ |
| वाक्यभेददोषपरिहारः | ११ | संदंशलक्षणम् | ,, |
| गुणविध्यादिभेदाः | १२ | स्थाननिरूपणम् | ३५ |
| उभयविधित्वम् | १३ | पाठसादेश्येन विनियोगः | ,, |
| विधिश्चतुर्विधः | १४ | अनुष्ठानसादेश्येन विनियोगः | ३६ |
| उत्पत्तिविधिः | ,, | समाख्यानिरूपणम् | ३७ |
| यागस्य रूपद्वयम् | १५ | विनियोगविधिबोधिताङ्गानि | ३८ |
| विनियोगविधिः | १६ | संनिपत्योपकारकाणि | ,, |
| विधेः श्रुत्यादिषट्प्रमाणानि | १९ | आरादुपकारकाणि | ३९ |
| श्रुतिनिर्वचनम् | ,, | प्रयोगविधिः | ,, |
| विनियोक्त्री श्रुतिस्त्रिधा | ,, | क्रमस्वरूपम् | ४० |
| तृतीयाविभक्तिरूपाया उदाहरणम् | २० | श्रुत्यादिषट्प्रमाणानि | ४१ |
२ विषयानुक्रमणिका ।
विषयः पृष्ठम् | विषयः पृष्ठम्
श्रुतिलक्षणम् ४१ | देवतारूपेणाग्निप्रापकशास्त्रप्रश्नः ६०
अर्थक्रमलक्षणम् ४२ | तद्व्यपदेशेन कर्मनामधेयत्वम् ६२
पाठक्रमलक्षणम् ४३ | कर्मनामधेयत्वे उत्पत्तिशिष्टगुण-
स्थानलक्षणम् ४४ | बलीयस्त्वम् ६३
मुख्यक्रमलक्षणम् ४७ | निषेधमीमांसा ६४
प्रवृत्तिक्रमलक्षणम् ४८ | लिङर्थशब्दभावनाया नञर्थेनान्वयः ६५
अधिकारविधिलक्षणम् ५० | नञ्स्वभावकथनम् ६६
मन्त्रमीमांसा ५४ | बाधकं द्विविधम् ,,
नियमविधिः ,, | पर्युदासपक्षे नेक्षेतेत्यस्य वाक्यार्थः ६८
परिसंख्याविधिः ५५ | विकल्पप्रसक्तौ पर्युदासाश्रयणम् ,,
परिसंख्यायाः श्रौतीत्वलाक्षणि- | बाधाद्योगोपसंहारः ६९
कत्वभेदौ ५६ | पर्युदासोपसंहारयोर्भेदवर्णनम् ७१
परिसंख्याया दोषत्रयम् ,, | विकल्पे प्रतिविध्यमानस्थानर्थ-
नामधेयमीमांसा ५७ | हेतुत्वाभाववर्णनम् ७२
नामधेयत्वे निमित्तचतुष्टयम् ५८ | अर्थवादमीमांसा ७३
नामधेयत्वस्य वाक्यभेदप्रसङ्गरूप- | अर्थवादविभागः ७४
द्वितीयनिमित्तोदाहरणम् ५९ | अर्थवादस्य भेदत्रयम् ७५
तत्प्रख्यशास्त्रात्नामधेयत्वम् ६० | ग्रन्थोपसंहारः ,,
इत्यर्थसंग्रहस्थविषयानुक्रमणिका ।
॥ श्रीः ॥
अर्थसंग्रहः
'दीपिका' टीकया विभूषितः ।
। मङ्गलाचरणम् ।
वासुदेवं रमाकान्तं नत्वा लौगाक्षिभास्करः ।
कुरुते जैमिनिनये प्रवेशायार्थसंग्रहम् ॥ १ ॥
श्रीरामं जगदीश्वरं प्रभुवरं ध्येयं सदायोगिभि-
र्भक्तानन्दकरं प्रणम्य परमानन्दस्वरूपं विभुम् ।
वैदेहीसहितं हृदा गुरुगिरं ध्यात्वा परां सर्वदा
श्रीटाटाम्बरिणा हि कौतुकधिया भाषा शुभा तन्यते ॥
बालानां सुखबोधाय मीमांसापरिशीलने ।
विदुषां प्रीतये सेयमर्थसंग्रहदीपिका ॥
लौगाक्षिभास्करजी लक्ष्मीरमणरूपी वासुदेवको प्रणामकर वेद-वेदांगको
पढ़कर धर्ममें जिज्ञासा करनेवालोंको मीमांसा शास्त्रमें प्रवेशके लिये अर्थसंग्रह
नामके ग्रन्थकी रचना करते हैं । मीमांसक लोग ईश्वरको न मानते हुए भी
द्रव्यत्यागोद्देश्य विष्णुजीको देवता मानते हैं इसलिये उनका अत्यन्त क्लिष्ट ग्रन्थ
रचनाके प्रारम्भमें सकलविघ्ननिवारणार्थ और शिष्यशिक्षार्थ स्मरणादिरूप
मंगल करना अनुपयुक्त नहीं है । परमकारुणिक भगवान् जैमिनिने द्वादश अध्या-
यमें मीमांसा शास्त्र बनाया है उसीका संक्षेपसे इस ग्रन्थमें प्रतिपादन है इसलिये
इस ग्रन्थका अर्थसंग्रह नाम सार्थक है ।
अनुबन्धचतुष्टयविचार—"सम्बन्धश्चाधिकारी च विषयश्च प्रयोजनम् । विनाऽ-
नुबन्धं ग्रन्थादौ मंगलं नैव शस्यते ॥” इत्यादि अभियुक्त वचनोंसे ग्रन्थके आरम्भमें
अनुबन्धचतुष्टय अवश्य रहता है इसलिये इस ग्रन्थमें भी अनुबन्धचतुष्टय
२ अर्थसंग्रहः—
बतलाते हैं। यथा—प्रतिपाद्य-प्रतिपादक भाव सम्बन्ध है। वेद-वेदांग पढ़कर धर्म
जिज्ञासु अधिकारी है। धर्म विषय है। यद्यपि अधर्मका भी विचार है तथापि
निराकरण करने के लिये ही उसका प्रतिपादन किया गया है। विचारित धर्मानुष्ठानसे
होने वाला स्वर्गादि प्रयोजन है।
तन्त्रारम्भकसूत्रावतरणम्।
अथ परमकारुणिको भगवान्जैमिनिर्धर्मविवेकाय द्वादशलक्षणीं प्रणि-
नीय तत्रादौ धर्मजिज्ञासां सूत्रयामास-‘अथातो धर्मजिज्ञासे'ति। अत्रा-
थशब्दो वेदाध्ययनानन्तर्यवचनः। अतःशब्दो हि वेदाध्ययनस्य दृष्टार्थ-
त्वं ब्रूते।
धर्मविचारशास्त्रस्यावश्यकता।
'स्वाध्यायोऽध्येतव्य' इत्यध्ययनविधौ तदध्ययनस्यार्थज्ञानरूपदृष्टार्थ-
कत्वेन व्यवस्थापनात्। तथा च वेदाध्ययनानन्तरं यतोऽर्थज्ञानरूपदृष्टा-
र्थकं तदध्ययनमतो हेतोर्धर्मस्य वेदार्थस्य जिज्ञासा कर्त्तव्येति शेषः।
जिज्ञासापदस्य विचारे लक्षणा। अतो धर्मविचारशास्त्रमिदमारम्भणीय-
मिति शास्त्रारम्भसूत्रार्थः।
परमकारुणिक भगवान् जैमिनि ने वेदाध्ययनके बाद धर्मविचारके लिये
द्वादशाध्याय-लक्षणात्मक मीमांसा शास्त्रको हृदयमें रखकर निर्माणार्थ सर्वप्रथम
धर्मजिज्ञासा-सूत्र बनाया। इस सूत्रमें भी अथ शब्द वेदाध्ययनानन्तर्यका ही वाचक
है। यद्यपि अथ शब्दका कोशादिसे आनन्तर्यमात्र अर्थ प्रतीत होता है तथापि
किसके अनन्तर यह आकांक्षा होनेपर वेदाध्ययनका लाभ होता है। "स्वाध्यायोऽ-
ध्येतव्यः” इस अध्ययन विधिके विचारात्मक प्रथमाधिकरणमें वेदाध्ययनका वेदा-
र्थज्ञानरूप दृष्ट प्रयोजन बतलाया है इसलिये इस सूत्रमें भी अतः शब्दसे वेदाध्ययनके
दृष्टार्थत्व (दृष्टप्रयोजन) को, सूचित करते हैं। यहां पर 'कर्त्तव्या' इस पदका
अध्याहारकर जिस हेतुसे वेदाध्ययनका अर्थज्ञानरूप दृष्ट प्रयोजन है इसलिये वेदा-
ध्ययनके बाद वेदार्थधर्मकी जिज्ञासा करनी चाहिये। यहां पर जिज्ञासा शब्दका 'ज्ञान-
विषयक इच्छा' अर्थ है और कृधातुका बनाना अर्थ है अतः इच्छा बनायी नहीं जा
सकती क्योंकि जैसे घट, कुम्भकारके व्यापारका विषय होनेसे ही किया जाता है वैसे
इच्छा किसीके व्यापारका विषय नहीं है और इच्छामात्रसे अनुष्ठानोपयोगी धर्म ज्ञान
नहीं हो सकता। इसलिये ज्ञानार्थक ज्ञाधातुका अजहल्लक्षणासे अनुष्ठानोपयोगि ज्ञान
दीपिकाटीकासहितः । ३
अर्थ समझना चाहिये और इच्छाार्थक सन्प्रत्ययका जहल्लक्षणासे विचार अर्थ
समझना चाहिये । इसलिये “इस धर्मविचारशास्त्रका आरम्भ करना चाहिये” यहाँ
शास्त्रारम्भ ( अथातो धर्मजिज्ञासा ) सूत्रका अर्थ हुआ ।
यहाँपर यह शङ्का उठती है कि यागादि ही धर्म है अथवा चैत्य ( जिन )
वन्दनादि भी धर्म है और धर्मका लक्षण क्या है ? क्योंकि लक्षण और प्रमाणके
विना वस्तु की सिद्धि नहीं होती । कहा भी है ( मानाधीना ) प्रमाणके अधीन
(मेयसिद्धिः ) वस्तु की सिद्धि होती है और ( मानसिद्धिश्च ) प्रमाण की सिद्धि
(लक्षणात् ) लक्षणसे होती है । सजातीय विजातीय वस्त्वन्तरसे अपने लक्ष्यको
विभिन्न बतलाने वालेको ही लक्षण कहते हैं । जैसे गन्धवत्त्वसे पृथिवीमें सजातीय
( जलादिद्रव्य ) विजातीय ( गुणादि ) से भेद सिद्ध होता है इसलिये गन्धवत्त्व
पृथिवीका लक्षण है । इसलिये निम्न लक्षण प्रश्न आवश्यक है ।
धर्मलक्षणप्रश्नः ।
अथ को धर्मः, किं तस्य लक्षणमिति चेत् । उच्यते—यागादिरेव
धर्मः । तल्लक्षणं वेदप्रतिपाद्यः प्रयोजनवदर्थो धर्म इति । प्रयोजनेऽतिव्याप्ति-
वारणाय प्रयोजनवदिति । भोजनादावतिव्याप्तिवारणाय वेदप्रतिपाद्य इति ।
अनर्थकउक्तत्वादनर्थभूते श्येनादावतिव्याप्तिवारणायार्थ इति ।
यागादि ही धर्म है यहां एव शब्दसे चैत्यवन्दन धर्म नहीं है यह सूचित
होता है । आदि पदसे मंगलाचरण और दध्यादिरूप गुण प्रभृतिका संग्रह करना
चाहिए । जो वेदसे ( प्रतिपाद्य ) कहा गया हो, प्रयोजनवाला हो और अर्थ हो,
उसीको धर्म कहते हैं । इस लक्षणमें प्रयोजनवत् पद नहीं देनेसे स्वर्गादि-
रूप ( प्रयोजन ) अर्थमें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि स्वर्ग वेदप्रतिपाद्य
और ( अर्थ ) प्रयोजन है । प्रयोजनवत् पद देनेपर स्वर्गादि सुखादिरूप है
इसलिये इसका प्रयोजनान्तर नहीं है । अतः अतिव्याप्ति नहीं हुई ।
वेदप्रतिपाद्य पद नहीं देनेपर भोजनादिमें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि भोजन
तृप्त्यादिरूप प्रयोजनवाला और अर्थ भी है । वेदप्रतिपाद्यपद देनेसे भोजन राग
प्राप्त है इसलिये अतिव्याप्ति नहीं होती । यद्यपि 'अष्टौ ग्रासा मुनेर्भक्ष्याः षोडशा-
रण्यवासिनाम् । द्वात्रिंशत्तु गृहस्थस्य यथेष्टं ब्रह्मचारिणाम् ॥' इत्यादि विधिबोधित भी
भोजन है तथापि इस वचनको ग्रासनियमपरक मानते हैं । इसलिये वेदप्रतिपाद्य
४ अर्थसंग्रहः—
पदसे उसका भी वारण हो सकता है । अर्थपद नहीं देनेसे अनर्थभूत श्येनादिमें अति-
व्याप्ति होगी क्योंकि वह 'श्येनेनाभिचरन् यजेत' इत्यादि वेदप्रतिपाद्य और शत्रुवधरूप
प्रयोजनवान् भी है। यद्यपि नरकजनक ही अनर्थ होता है श्येनकर्म नरकजनक
नहीं है इसलिये अनर्थ भी नहीं है अत एव चतुर्थाध्याय में श्री जैमिनिजीने भी इष्ट-
साधनत्वेन वेदबोधित श्येनकर्मको भी धर्म कहा है, इसलिये अर्थ पदका व्यावत्र्य-
श्येन नहीं हो सकता तथापि शत्रुवध नरकजनक है अतः अनर्थफलकत्वात्
शत्रुवध द्वारा नरकजनक श्येनकर्म भी अनर्थ है । चतुर्थाध्यायमें साक्षादिष्टसाधन-
त्वेन वेदबोधित वधमात्र के अभिप्रायसे ही श्येनकर्मको धर्म कहा है पर वस्तुतः
परंपरया वह अनिष्ट (नरक) जनक है इसलिये चतुर्थोध्यायसे विरोध नही होता है ।
अत एव “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः” इस सूत्रमें अर्थ पद सार्थक होता है । जैसे
परामर्शसे व्यवहित व्याप्तिज्ञानमें अनुमितिजनकत्व माना गया है इसी तरह शत्रु-
वधव्यवहित श्येनकर्ममें भी नरकजनकत्व माननेमें कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
वेदस्य धर्मप्रतिपादकत्वम् ।
न च 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्म' इति सौत्रलक्षणविरोधः चोदनापद-
स्य विधिरूपवेदैकदेशपरत्वादिति वाच्यम् । तत्रापि चोदनाशब्दस्य वेद-
मात्रपरत्वात् । वेदस्य सर्वस्य धर्मतात्पर्यवत्त्वेन धर्मप्रतिपादकत्वात् ।
वेदप्रतिपाद्य घटित धर्मके लक्षणमें सूत्रकारोंने जो 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः'
यह धर्म का लक्षण बनाया इससे विरोध लगता है क्योंकि यहांपर चोदनापदका
अर्थ, विधिरूप वेदैकदेश है और उसके मतसे विधिरूप वेदैकदेश
प्रतिपादित जो अर्थ वही धर्म है और आपके मतसे वेदप्रतिपादित जो अर्थ
वह धर्म है अतः विरोध स्पष्ट है । यह शंका नहीं कर सकते हो क्योंकि सूत्र-
कारीय धर्मलक्षणमें चोदनापदका चोदना (विधि) प्रकरणपठित समस्त वेद अर्थ
है अतः सूत्रकारके मतसे भी वेदप्रतिपाद्यघटित ही धर्म का लक्षण है इसलिये
विरोध नहीं होगा। यहां पर “सोऽरोदीद् यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम् । स प्रजापतिरा-
त्मनो वपामुदखिदत्” इत्यादि चोदनाशेष वाक्योंसे धर्मप्रतिपादित नहीं है अतः
तत्प्रतिपाद्य अर्थमें अतिव्याप्ति होगी यह नहीं कह सकते हैं क्योंकि यह वाक्य भी
स्तुत्यादि प्रतिपादन द्वारा धर्मप्रतिपादक है इसलिये चोदना प्रकरण पठित
समस्त वेदोंके धर्ममें तात्पर्य होने से समस्त वेद धर्मप्रतिपादक ही है ॥
१. धर्म-लक्षण एवं भावना निरूपण (शाब्दी व आर्थी भावना)
दीपिकाटीकासहितः । ५
स च यागादिः 'यजेत स्वर्गकाम' इत्यादिवाक्येन स्वर्गमुद्दिश्य पुरुषं
प्रति विधीयते । तथा हि—यजेतेत्यत्रास्त्यंशद्वयं यजिधातुः प्रत्ययश्च ।
प्रत्ययेऽप्यस्त्यंशद्वयाख्यातत्वं लिङ्त्वं च । तत्राख्यातत्वं दशलकारसाधारणं
लिङ्त्वं पुनर्लिङ्मात्रे ।
'यजेत स्वर्गकामः' इत्यादि वाक्य स्वर्गको उद्देश्यकर पुरुषके प्रति यागका
विधान करता है । इस वाक्यसे स्वर्गसाधनत्वेन याग-विधानका लाभ होता है
परन्तु साधनत्ववाचक कोई पद देखनेमें नहीं आता इसलिये प्रकृतिप्रत्ययका
विभागपुरस्सर प्रत्ययांश विभागसे भावनाका प्रतिपादन करते हुए तत्सामर्थ्यसे
यागमें स्वर्गसाधनत्व बतलाते हैं । जैसे—'यजेत' यहाँ पर दो अंश हैं
यज धातु और प्रत्यय । प्रत्ययमें भी दो अंश ( भाग ) हैं आख्यातत्व और
लिङ्त्व उनमें आख्यातत्व (तिङ्त्व ) दश लकारों में है, लिङ्त्व केवल लिङ् में है।
भावनाविचारः ।
उभाभ्यामप्यंशाभ्यां भावनैवोच्यते । भावना नाम भवितुर्भवनानुकूलो
भावयितुर्व्यापारविशेषः । सा द्विधा—शाब्दीभावना आर्थीभावना चेति ।
दोनों ( आख्यातत्व और लिङ्त्व ) अंशोंसे भावना ही कही जाती है ।
'भावनैव'—यहां एवकारसे वैयाकरणाद्यभिमत कर्त्रादि अर्थका निरास होता है ।
अब भावनासामान्यका लक्षण करते हैं । ( भवितुः ) उत्पन्न होनेवालेका भवना-
नुकूल, उत्पत्तिजनक जो ( भावयितुः ) प्रयोजकका व्यापार विशेष वही
भावना है । जैसे लोकमें उत्पन्न होनेवाले ओदनकी उत्पत्ति ( विक्लेत्ति ) जनक
जो प्रयोजक देवदत्तादिनिष्ठ व्यापार उसीको आर्थी भावना कहते हैं । एवं उत्पद्य-
मान देवदत्त प्रवृत्तिकी उत्पत्तिका जनक जो प्रयोजक यज्ञदत्तादिका अभिप्राय विशेषा-
त्मक व्यापार, वही शाब्दी भावना है । वेदमें जैसे 'यजेत स्वर्गकामः'—यहांपर
उत्पद्यमान याग अथवा स्वर्गके उत्पत्तिजनकका प्रयोजक स्वर्गकामपुरुषनिष्ठ जो
व्यापार विशेष है वही आर्थी भावना है । एवं उत्पद्यमान स्वर्गकामपुरुष-प्रवृत्तिकी
उत्पत्तिका जनक जो लिङ्का व्यापार विशेष, वही शाब्दी भावना है । इस तरहसे
भावनाके दो भेद हुए—शाब्दी भावना और आर्थी भावना ।
शाब्दीभावना ।
तत्र पुरुषप्रवृत्त्यनुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषः शाब्दीभावना । सा
च लिडंशेनोच्यते । लिङ्श्रवणेऽयं मां प्रवर्तयति मत्प्रवृत्त्यनुकूलव्यापार-
६ : अर्थसंग्रहः—
वानयमिति नियमेन प्रतीतेः । यद्यस्माच्छब्दान्नियमतः प्रतीयते तत्तस्य
वाच्यम् । यथा गामानयेत्यस्मिन्वाक्ये गोशब्दस्य गोत्वम् ॥
उन दोनों (शब्दभावना और अर्थभावना) में पुरुष प्रवृत्ति (अनुकूल)
जनक जो प्रयोजकका व्यापार, उसीको शाब्दी भावना कहते हैं । वह शाब्दी
भावना लिङ्का अर्थ है । क्योंकि लिङ्के श्रवण होनेपर (मां प्रवर्तयति) मदीय-
प्रवृत्तिजनक व्यापार वाला यह है—यह नियमतः प्रतीत होता है, जो जिस शब्दसे
नियमतः प्रतीत होता है, वह उस शब्दका (वाच्य) अर्थ है यह व्याप्ति है ।
जैसे 'गामानय' इस वाक्यमें गोशब्दका अर्थ गोत्व है ।
शाब्द्या लौकिकवैदिकभेदौ ।
स च व्यापारविशेषो लौकिकवाक्ये पुरुषनिष्ठोऽभिप्रायविशेषः ।
वैदिकवाक्ये तु पुरुषाभावाल्लिङादिशब्दनिष्ठ एव । अत एव शाब्दी-
भावनेति व्यवह्रियते ।
वह लिङ्वाच्य व्यापार विशेष लौकिक वाक्यमें प्रवर्तक पुरुषनिष्ठ अभि-
प्राय विशेष है । और वैदिक वाक्यमें प्रवर्तक पुरुष नहीं है इसलिये लिङादि शब्द-
निष्ठ ही है (अतएव) शब्दनिष्ठ होनेके कारण ही यह शाब्दी भावनासे व्यवहृत
होता है । इसका विशद विचार भावनासामान्य लक्षण के अवसर पर किया है ।
सा च भावनांशत्रयमपेक्षते साध्यं साधनमितिकर्तव्यतां च, किं
भावयेत्, केन भावयेत्, कथं भावयेदिति ।
वह शाब्दीभावना अंशत्रयकी अपेक्षा करती है इसलिये भावना अंशत्रयवती
कहलाती है । साध्य साधन और इतिकर्तव्यता, किं भावयेत् (साधयेत्) यह
साध्याकांक्षाका आकार है, केन (हेतुना) भावयेत्, यह साधनाकांक्षाका आकार
है । कथं (किस प्रकार) भावयेत्, यह इतिकर्तव्यतऽऽकांक्षाका आकार है । इति-
कर्तव्यता शब्दका अर्थ उसीके विचारोंमें बतलायेंगे ।
तत्र साध्याकाङ्क्षायां वक्ष्यमाणांशत्रयोपेता आर्थीभावना साध्यत्वेना-
न्वेति एकप्रत्ययगम्यत्वेन समानाभिधानश्रुतेः । संख्यादीनामेकप्रत्यय-
गम्यत्वेऽप्ययोग्यत्वान्न साध्यत्वेनान्वयः ।
उनमें साध्यकी आकांक्षा होने पर—स्वर्गादि रूप साध्याद्यंशत्रय युक्त जो
आगे बतलायी जाने वाली आर्थी भावना है उसको साध्यत्वेन अन्वय होगा । अर्थात्
दीपिकाटीकासहितः । ७
शाब्दी भावनाका साध्य आर्थी भावना ही है क्यों कि शाब्दी भावना और आर्थी
भावना दोनों एक ही लिङ् प्रत्ययका अर्थ है इस लिये इन दोनोंका ( समाना-
भिधानश्रुतेः ) एक ही वाचक पद होनेसे परस्पर सम्बन्ध होना उचित है । यद्यपि
लिङ्वाच्य संख्या और कालभी एक प्रत्यय गम्य हैं तथापि वे दोनों शाब्दी भावना-
के साध्य नहीं हो सकते हैं । क्यों कि उन दोनोंमें पुरुषार्थत्व अथवा पुरुषार्थ-
साधनत्व नहीं है । इस लिये पुरुषार्थत्व अथवा तत्साधनत्व रूप साध्यत्व-योग्यता
नहीं रहनेसे अन्वय नहीं हुआ । प्रवृत्तिरूप आर्थी भावनामें पुरुषार्थ ( धर्मादि )
साधनत्वरूपयोग्यता है इस लिये आर्थीभावनाको साध्यत्वेन अन्वय हो सकता है ।
साधनाकाङ्क्षायां लिङादिज्ञानं करणत्वेनान्वेति । तस्य च करणत्वं न
भावनोत्पादकत्वेन, तत्पूर्वमपि तस्याः शब्दे सत्त्वात् । किंतु भावनाज्ञापक-
त्वेन शब्दभावनाभाव्यनिर्वर्तकत्वेन वा ।
जब शाब्दी भावनामें साधन (करण) की आकांक्षा होती है तब लिङादि ज्ञान-
का करणत्वेन अन्वय होता है । यद्यपि लिङादि ज्ञानमें शाब्दीभावनोत्पादकत्वेन कर-
णत्व नहीं है, अर्थात् शाब्दीभावनोत्पत्तिजनक लिङादि ज्ञान नहीं है इसलिये लिङादि
ज्ञानमें करणता नहीं है क्योंकि ( तत्पूर्वमपि ) लिङादि ज्ञानसे पहले भी शब्दमें
(सा) शाब्दी भावना है अतः शाब्दी भावनाका उत्पादक लिङादि ज्ञान कथमपि
नहीं हो सकता तथापि ( भावनाज्ञापकत्वेन ) भावनाका प्रकाशक होनेसे लिङादि
ज्ञानमें करणत्व माना गया है। अथवा शाब्दी भावनाके (भाव्य) साध्य जो आर्थी-
भावना ( तन्निर्वर्तकत्वेन ) उसका सम्पादक होनेसे ही करणता मानी गयी है ।
जैसे छिदिक्रियासाध्य-द्विधाभवनसम्पादकत्वेन कुठारको छिदि भावनाके प्रति करणत्व
होता है उसी तरह प्रकृत में भी समझना चाहिए ।
इतिकर्तव्यताकाङ्क्षायामर्थवादज्ञाप्यप्राशस्त्यमितिकर्तव्यतात्वेनान्वेति ।
अभी तकके प्रतिपादनसे यह प्रश्न उठता है कि पुरुषोंकी यागादिमें प्रवृत्ति यदि
लिङादि ज्ञानसे होती है तो सबोंकी प्रवृत्ति क्यों नहीं होती इसलिये इतिकर्तव्यता
(कैसे यागादि करे) का उत्थान करते हैं कि लिङादि ज्ञानसे कैसे भावना की जाय ।
इतिकर्तव्यताशब्दमें इतिशब्दका प्रकार अर्थ है । (कर्तव्यस्य इति=प्रकारः इति-
कर्तव्यता ) सामान्यका भेदक जो विशेष उसीको प्रकार कहते हैं अतः लिङादि
ज्ञानरूप कर्तव्य सामान्य है उसका भेदक जो कर्म-प्राशस्त्य रूप विशेष है उसीको
इति कर्तव्यतात्वेन अन्वय होगा । अर्थात् जिसको यागादि कर्ममें प्राशस्त्यका ज्ञान
८ अर्थसंग्रहः—
होगा उसीको लिङादि ज्ञानसे प्रवृत्ति होगी और जिसको प्राशस्त्य ज्ञान नहीं होगा
उसकी प्रवृत्ति नहीं होगी । “स प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्” इत्यादि अर्थवाद
वाक्यसे लक्षणया प्राशस्त्यका ज्ञान होता है । ‘यजेत स्वर्गकाम’ इत्यादि वाक्यसे
“पुरुषप्रवृत्तिस्वरूपाऽऽर्थीभावनासाध्यक, लिङादिज्ञानकरणक और अर्थवाद-
वचनबोधित प्राशस्त्यादि-इतिकर्त्तव्यताक लिङादिशब्दनिष्ठ व्यापार” यह शाब्द
बोध होगा । अर्थात् प्राशस्त्यविशिष्ट लिङादि ज्ञानसे यागमें प्रवृत्ति करनी चाहिए ।
आर्थीभावनालक्षणम् ।
प्रयोजनेच्छाजनितक्रियाविषयव्यापार आर्थीभावना । सा चाख्यातत्वां-
शेनोच्यते आख्यातसामान्यस्य व्यापारवाचित्वात् ।
स्वर्गादिप्रयोजनरूपफलविषयक जो इच्छा उससे ( जनित ) जन्य यागादि
रूप क्रियाविषयक व्यापारको ही आर्थी भावना कहते हैं । यह आर्थी भावना
( आख्यातत्वांशेनोच्यते ) लिङ का अर्थ है, क्योंकि मीमांसक मतमें आख्यात
मात्रका व्यापार ( भावना ) अर्थ है ।
आर्थीभावनाया अंशत्रयम् ।
साप्यंशत्रयमपेक्षते साध्यं साधनमितिकर्त्तव्यतां च किं भावयेत् ,
केन भावयेत , कथं भावयेदिति । तत्र साध्याकाङ्क्षायां स्वर्गादिफलं
साध्यत्वेनान्वेति । साधनाकाङ्क्षायां यागादिः करणत्वेनान्वेति । इति-
कर्तव्यताकाङ्क्षायां प्रयाजाद्यङ्गजातमितिकर्तव्यतात्वेनान्वेति ।
यह आर्थीभावना भी साध्य साधन और इतिकर्त्तव्यताकी आकांक्षा करती
है । किं भावयेदित्यादि साध्यकी आकांक्षाका आकार है । उसमें जब साध्यरूपकी
आकांक्षा होती है तो स्वर्गादि फलको साध्यत्वेन अन्वय होता है । साधनकी जब
आकांक्षा होती है तब यागादिका करणत्वेन अन्वय होता है । पूर्वोक्त रीतिसे इति-
कर्तव्यताकी आकांक्षा होनेपर प्रयाजादि जो अङ्ग (जात) समुदाय है उसका इति-
कर्तव्यतात्वेन अन्वय होता है । स्वर्गादिसाध्यक यागादिकरणक और प्रयाजादि
अङ्ग समुदायरूप इतिकर्तव्यताक आर्थीभावनाको ही प्रवृत्ति कहते हैं । यहां पर
यह जानने योग्य बात है कि—क्रियात्मक यागका अचिरेणैव नाश हो जाता है
इस यागसे कालान्तरभावि स्वर्ग नहीं हो सकता इसलिये अङ्गविशिष्ट यागानुष्ठानसे
चिरस्थायि एक अपूर्वकी उत्पत्ति होती है । ये अपूर्व, दर्श और पौर्णमासमें
दीपिकाटीकासहितः । ९
अनेकों तरहके हैं। जैसे फलापूर्व समुदायापूर्व उत्पत्त्यपूर्व और अङ्गापूर्व। इनमें
जिस अपूर्वसे स्वर्ग हो उसको फलापूर्व कहते हैं क्योंकि स्वर्गरूपफलका कारण
यही है। समुदायापूर्वसे फलापूर्वकी उत्पत्ति होती है। समुदायके दो भेद हैं उनमें
(दर्श) अमावास्यामें तीनयागोंका एक समुदाय और पौर्णमासीमें तीन यागोंका
दूसरा समुदाय इन दोनों समुदायोंसे जो अपूर्व होता है उसे समुदाया-
पूर्व कहते हैं। उक्त दोनों समुदायोंसे फलापूर्वकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है
क्योंकि दोनों समुदायोंके विभिन्न कालमें उत्पन्न होनेसे दोनोंका सम्मेलन नहीं
होता अतः फलापूर्वका कारण कैसे होगा। इसलिये दोनों समुदायोंसे दो अपूर्वों-
की उत्पत्ति अवश्य माननी होगी। अमावस्यामें 'ऐन्द्रं दध्यमावास्यायामैन्द्रं पय अमा-
वास्यायाम्' एतद्वाक्यविहित दो (सान्नाय्य) ऐन्द्रयाग और 'यदाग्नेयोऽष्टाकपालः'
एतद्वाक्य विहित एक आग्नेय यागका समुदाय होता है। एवं पौर्णमासीमें 'यदाग्ने-
योऽष्टाकपालोऽमावास्यायां च पौर्णमास्यां चाच्युतो भवति' एतद्वाक्यविहित आग्नेय
याग 'ताभ्यामेतमग्नीषोमीयमेकादशकपालं पूर्णमासे प्रायच्छत्' एतद्वाक्यविहित
अग्नीषोमीयाग और 'तावब्रूतामग्नीषोमावाज्यस्यैव तावुपांशु पौर्णमास्याम्' एतद्वा-
क्यविहित-'उपांशुयाजमन्तरा यजति' उपांशु यागका समुदाय होता है। इन दोनों
समुदायोंमें भी एक समुदायमें जो तीन याग हैं वे भिन्न २ कालमें होते हैं इसलिये
इन तीनोंके मिलनेसे जो समुदायापूर्वकी उत्पत्ति होती है वह नहीं होगी, इस
लिये उन पृथक् पृथक् तीनों यागोंसे तीन उत्पत्त्यपूर्वकी उत्पत्ति होती है। इन तीनों
उत्पत्त्यपूर्वोकी उत्पत्ति भी अंगोपकारक (द्रव्यादि) रूप अङ्गोंकी सहायताके विना नहीं
हो सकती है। और अङ्ग भी अलग २ समयमें होते हैं इसलिये अङ्ग सब मिलकर
उत्पत्त्यपूर्वके कारण नहीं हो सकते हैं। इसलिये उत्पत्त्यपूर्वके आरम्भके लिये अङ्गा-
पूर्वकी कल्पना करते हैं इसीको सन्निपत्योपकारक (जिसका लक्षण स्वयं ग्रन्थकार
कहेंगे) कहते हैं। यहां पर किसीका मत है कि सन्निपत्योपकारक रूप अवघात
और प्रोक्षणादिसे द्रव्य और देवताके संस्कार द्वारा यागस्वरूपमें ही अतिशय
(अपूर्व) की उत्पत्ति होती है अतः अवघातादिका व्यापार यागोत्पत्त्यपूर्वोत्पत्तिमें
है और उत्पत्त्यपूर्वद्वारा फलापूर्वमें भी व्यापार है इसलिये सन्निपत्योपकारक अङ्गापूर्व-
में यागोत्पत्त्यपूर्वके प्रति ही प्रयोजकता है। किसीका मत है कि फलापूर्वके प्रति
ही अङ्गापूर्वमें प्रयोजकता है। यागोत्पत्त्यपूर्वसे जायमान (उत्पन्न होने वाला)
फलापूर्वका ही आरादुपकारक (प्रयाजादि) साक्षात्कारण है। यद्यपि इस तरहसे
१० अर्थसंग्रहः—
अपूर्वोंके अनेक भेद हैं तथापि अपूर्वोत्पत्तिमें सहकारी ही सब अङ्ग होते हैं ।
वेदलक्षणविचारः ।
अथ को वेद इति चेत् । उच्यते—अपौरुषेयं वाक्यं वेदः । स च
विधि-मन्त्र-नामधेय-निषेधा-र्थवादभेदात् पञ्चविधः ।
धर्म लक्षणमें वेदका प्रवेश है इसलिये वेद क्या है यह प्रश्न उठता है ।
( उच्यते ) उत्तर करते हैं—अपौरुषेय वाक्यको ही वेद कहते हैं । वेदके
पांच भेद हैं—विधि, मन्त्र, नामधेय, निषेध और अर्थवाद । वेद-लक्षणमें
अपौरुषेय पद नहीं देनेसे अस्मदादिकृत वाक्यमें अतिव्याप्ति होगी इसलिये अपौ-
रुषेय पद दिया है । वाक्यपद नहीं देनेसे अपौरुषेय आत्मामें अतिव्याप्ति होगी इस
लिये वाक्य पद दिया है । दूसरे प्रमाणोंसे अर्थ ज्ञान होने पर जो बनाया जावे उसे
पौरुषेय कहते हैं जैसे चक्षुरादि प्रमाणसे घटज्ञान रहनेपर ही हम लोग 'घटमानय'
इत्यादि वाक्यका निर्माण करते हैं इससे यह वाक्य पौरुषेय है तद्भिन्न वाक्यको
अपौरुषेय कहना चाहिए । प्रश्न करते हैं—तत्र तो वेदको भी ईश्वरने प्रमाणान्तरसे
अर्थ जानकर बनाया है इसलिये वेद भी पौरुषेय ही है अपौरुषेय कैसे हो सकता
है ? उत्तर करते हैं—प्रमाणान्तरसे अर्थ प्राप्तकर ईश्वर ने वेद नहीं रचा है किन्तु
“वेदाध्ययनं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । वेदाध्ययनत्वाद्वर्त्तमानवेदाध्ययनवत्” इन अनुमान
से वेदाध्ययन गुरुपरंपरागत है और वेद भी गुरुपरम्परागत ही है और 'यः कल्पः
स कल्पपूर्वकः' इस न्यायसे संसार अनादि है और परमेश्वर सर्वज्ञ है इसलिये पूर्व
पूर्व कल्पीयवेदको स्मरण कर लोगोंको उपदेश देते हैं निर्माण नहीं करते अतः
वेदमें अपौरुषेयत्व सिद्ध हुआ ।
विधिमीमांसा ।
तत्राज्ञाताथज्ञापको वेदभागो विधिः । स च तादृशप्रयोजनवदर्थ-
विधानेनार्थवान् यादृशं चार्थं प्रमाणान्तरेणाप्राप्तं विधत्ते—यथा ‘अग्निहोत्रं
जुहुयात्स्वर्गकाम’ इति विधिर्मानान्तरेणाप्राप्तं स्वर्गप्रयोजनवद्धोमं विधत्ते
अग्निहोत्रहोमेन स्वर्गं भावयेदिति वाक्यार्थबोधः ।
उन वेदोंके भेदोंमें अज्ञात अर्थको समझाने वाले वेद भागको विधि कहते
हैं । वह विधि-जो अर्थ ( प्रमाणान्तर ) दूसरे प्रमाणसे ज्ञात नहीं है तादृश अर्थको
विधान करती है इसलिये प्रमाणान्तरसे अज्ञात प्रयोजनवद् अर्थके विधानसे ही विधि
सार्थक होती है । जैसे दूसरे प्रमाणसे स्वर्गप्रयोजन वाला होम का ज्ञान नहीं है केवल
दीपिकाटीकासहितः । ११
“अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः” इसीसे वेद ज्ञात होता है इसलिये इस वेद भागको
विधि कहनी चाहिए । यहां पर विधिमें कर्मका ही करणत्वेन अन्वय करके इस वेद
का ‘अग्निहोत्रहोमसे स्वर्ग का उत्पादन करे’ यह अर्थ समझना चाहिए ।
यत्र कर्म मानान्तरेण प्राप्तं तत्र तदुद्देशेन गुणमात्रं विधत्ते—यथा
‘दध्ना जुहोती’त्यत्र होमस्याग्निहोत्रं जुहुयादित्यनेन प्राप्तत्वाद्धोमोद्देशेन
दधिमात्रविधानं, ‘दध्ना होमं भावयेद्’ति । यत्र तूभयमप्राप्तं तत्र विशिष्टं
विधत्ते—यथा ‘सोमेन यजेते’ त्यत्र सोमयागयोरप्राप्तत्वात्सोमविशिष्टयाग-
विधानम् । सोमपदे मत्वर्थलक्षणया सोमवता यागेनेष्टं भावयेदिति वा-
क्यार्थबोधः ।
जिस गुण विधिमें कर्म ( यागादि ) दूसरे प्रमाणसे ही सिद्ध हो वहां पर उसी
कर्मको उद्देश करके अप्रधान गुण मात्रका विधान होता है जैसे ‘दध्ना जुहोति’ यहां
पर ‘अग्निहोत्रं जुहुयात्’ इस कर्म विधिसे होम ( याग ) सिद्ध है इस लिये होम
को उद्देश कर दधि (गुण) मात्रका विधान होता है । ‘दध्ना जुहोति’—इस वाक्यसे
दधिसे हवन करे यह बोध होता है । जहां पर गुण और कर्म दोनों अप्राप्त
( असिद्ध ) हैं वहां दोनों ( गुण विशिष्ट कर्म ) का विधान होता है जैसे ‘सोमेन
यजेत’ यहां पर सोम और याग दोनों असिद्ध हैं इसलिये सोमविशिष्ट यागका
विधान होता है । यहां पर सोम ( गुण ) मात्रका ही विधान नहीं हो सकता है
क्योंकि सोमलता द्रव्य है अतः क्रियात्मक याग सोम नहीं हो सकता इस लिये सोम
पदमें मत्वर्थ लक्षणा (सोमको सोमवत् में लक्षणा) करेंगे अर्थात् ‘अर्श आदिभ्योऽ-
च्’ इस पाणिनीय सूत्रसे सोमः अस्ति अस्मिन् इस अर्थमें अच् प्रत्यय करेंगे ।
“सोमवान् यागसे इष्ट ( स्वर्ग ) का उत्पादन करे” यह वाक्यार्थ होता है ॥
वाक्यभेददोषपरिहारः ।
न चोभयविधाने वाक्यभेदः, प्रत्येकमुभयस्याविधानात्, किन्तु विशि-
ष्टस्यैव विधानात् ।
यहांपर यह शंका उठती है कि गुण और कर्म दोनोंके विधानसे वाक्यभेद
होगा और वाक्यभेद किसीको भी इष्ट नहीं है । क्योंकि जहांपर वाक्यभेद होता है
वहां आठ दोष होते हैं । जैसे—‘व्रीहिभिर्यजेत यवैर्वा’ यहांपर यदि पहले व्रीहिसे याग
किया जाय तो ‘यवैर्वा’ इस शास्त्रमें स्वार्थानुष्ठापकत्व (यवसे अनुष्ठान बतलानेवाला)
रूप जो प्रामाण्य है उसका परित्याग करना पड़ता है । (१) और यवशास्त्रमें स्वार्थान-
२ अ० सं०
१२ अर्थसंग्रहः—
नुष्ठापकत्वरूप अप्रामाण्यका स्वीकार करना पड़ता है। (२) और यवसे अनुष्ठान
करनेपर यव शास्त्रमें छोड़ा हुआ प्रामाण्यका स्वीकार करना पड़ता है। (३) और
स्वीकृत अप्रामाण्यका परित्याग करना पड़ता है। (४) इस तरहसे यव शास्त्रमें
चार दोष हैं ! इसी तरह यदि प्रथम यवसे अनुष्ठान किया जाय तो ब्रीहि
शास्त्रमें प्रामाण्यका परित्याग करना पड़ता है। (१) एवं ब्रीहि शास्त्रमें अप्रामाण्यका
स्वीकार करना पड़ता है। (२) तथा ब्रीहिसे अनुष्ठान करनेपर ब्रीहि शास्त्रमें
पूर्वपरित्यक्त प्रामाण्यका स्वीकार । (३) और ब्रीहि शास्त्रमें पूर्व स्वीकृत अप्रा-
माण्यका त्याग करना पड़ता है। (४) इस तरह कुल मिलाकर आठ दोष होते हैं
वैसे ही प्रकृतमें वाक्य भेदसे आठदोष होंगे। ब्रीहि यव वाक्यके समान यहांपर
भी आठों दोष इष्ट हैं ऐसा नहीं कह सकते हैं क्योंकि वहां ब्रीहि और यवसे
पुरोडाश (हवनके लिये पदार्थ) रूप एक ही कार्य होता है इसलिये वाक्यभेद
इष्ट है और दूसरी कोई गति नहीं है। प्रकृतमें तो केवल गुणमात्र विधानसे भी
काम चल सकता है इसलिये उभय विधानसे वाक्य भेद करना अनुचित है। इस
शंकाका अब उत्तर करते हैं जहांपर व्यापार भेदसे प्रत्येक उभय पदार्थ (अलग २
दोनों) का विधान होता है वहींपर व्यापार भेदसे वाक्य भेद होता है। यहां
अलग २ दोनों पदार्थोंका विधान नहीं है किन्तु एक ही व्यापारसे गुण विशिष्ट
कर्मका विधान होता है इसलिये वाक्यभेद कथमपि नहीं होगा ।
गुणविध्यादिभेदः ।
न च 'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेते'ति विधिप्राप्तयागोद्देशेन सोम-
रूपगुणविधानमेवास्तु, सोमेन यागं भावयेदिति किं मत्वर्थलक्षणयेति
वाच्यम् । तस्याधिकारविधित्वेनोत्पत्तिविधित्वासंभवात् ।
यहांपर यह शंका उठती है कि—ज्योतिष्टोमेन–इत्यादि वाक्यसे सोम याग
रूपकर्म सिद्ध है अतः 'सोमेन यजेत' इससे सोमरूप गुणका ही विधान मानना चाहिये
विशिष्ट विधानके लिये मत्वर्थमें लक्षणा करनेसे जो गौरव होता है वह भी नहीं
होगा 'सोमेन यजेत' इस वाक्यसे 'सोम द्वारा यागकी भावना करे' ऐसा ही अर्थका
बोध होगा। इसका उत्तर करते हैं—'ज्योतिष्टोमेन'–यह विधि अधिकार विधि है
उत्पत्ति विधि नहीं हो सकती। इसका यह अभिप्राय है कि—कर्मस्वरूप मात्रके
बोधकको ही उत्पत्ति विधि कहते हैं और अधिकार विधिके, उत्पत्ति विधि विहित
दीपीकाटीकासहितः । १३
कर्मके फल विशेषके साथ सम्बन्ध मात्रका बोध होता है । जैसे 'आग्नेयोऽष्टा-
कपालो भवति' इस उत्पत्ति विधिसे विहित आग्नेय यागके स्वर्गरूप फलके साथ
'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत' इस विधिके सम्बन्ध मात्रका बोध होता
है । इसलिये 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामः' यह अधिकार विधि है उत्पत्ति विधि
नहीं है । इसी तरह 'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामः' इससे सम्बन्ध मात्रका विधान
होता है । इसलिये यह भी अधिकार विधि है । उत्पत्ति विधि नहीं है । अतः सोम-
याग स्वरूपका ज्ञानके लिये विशिष्ट विधान करना आवश्यक है ।
उभयविधित्वम् ।
ननु 'उद्भिदा यजेत पशुकाम' इत्यस्येव ज्योतिष्टोमेनेत्यस्याप्युत्पत्त्यधि-
कारविधित्वमस्त्विति चेत् । न । दृष्टान्ते उत्पत्तिवाक्यान्तराभावेनान्यथा-
नुपपत्त्या तथात्वाश्रयणात् । किञ्च ज्योतिष्टोमेनेत्यस्योभयविधित्वेऽनेनैव
यागस्तस्य फलसंबन्धोऽपि बोधनीय इति सुदृढो वाक्यभेदः । तद्वरं सोम-
पदे मत्वर्थलक्षण्या विशिष्टविधानम् ।
यहांपर पुनः शंका होती है कि जैसे 'उद्भिदा यजेत पशुकामः' यह उद्भिद्
नामक यागका बोधक है । इसीलिये उत्पत्ति विधि होनेपर भी इससे विहित उद्भिद्
यागके पशुरूप फलके साथ सम्बन्धका भी बोध होता है अतः 'उद्भिदा यजेत' यह
विधि = उत्पत्ति और अधिकार दोनों विधि हैं इसलिये इस वाक्यसे उद्भिन्नामक यागसे
पशु प्राप्त करे, यह शाब्द बोध होता है । इसी तरह 'ज्योतिष्टोमेन' यह भी उत्पत्ति
और अधिकार विधि हो सकती है । इसका उत्तर करते हैं—(दृष्टान्ते ) 'उद्भिदा यजेत'
यहांपर ( उत्पत्ति ) याग स्वरूपको बतलानेवाला कोई दूसरा वाक्य नहीं है और
( अन्यथानुपपत्त्या ) याग स्वरूप ज्ञानके विना, यागका संबन्ध विशेषके साथ
अन्वय का बोध नहीं हो सकता है । इसलिये अगत्या वहां दोनों विधि मानते हैं ।
पुनः शंका होती है कि—ज्योतिष्टोमेन' इस वाक्यको भी कर्म और फल उभयविधा-
यकत्व मानना चाहिये और 'सोमेन यजेत' यहांपर मत्वर्थलक्षणाके विना ही गुणका
विधान होगा । इसका उत्तर करते हैं ( किञ्चेति ) यदि 'ज्योतिष्टोमेन' इसीसे कर्म
और फल दोनोंका विधान मानाजाय तो इसी ( ज्योतिष्टोमेन ) वाक्यसे याग और
यागका फलके साथ संबन्ध भी समझना होगा तब वाक्य भेद अनिवार्य होजायगा ।
क्योंकि 'श्रोतव्यापारनानात्वे शब्दानामतिगौरवम् । एकोक्त्यवसितानां तु नार्थी-
१४ अर्थसंग्रहः—
क्षेपो विरुध्यते” इसका अर्थ यह है कि शब्दोंका श्रौत (शब्दोपात्त) व्यापार अनेक
रहे तो अतिशय गौरव होता है (तु) किन्तु (एकोक्त्यवसितानाम्) एक शक्तिसे
सम्बन्ध अर्थात् एक ही व्यापार जहाँ है वहांपर दूसरे अर्थका आक्षेप विरुद्ध नहीं
होता। प्रकृतमें दोनोंके विधान करनेसे व्यापारद्वय मानना ही पड़ेगा अतः गौरवरूप
वाक्यभेद अवश्य होगा। किन्तु ‘सोमेन यजेत’ इसको गुणविशिष्ट यागविधायकत्व
माननेपर वाक्यभेद दोष नहीं होता क्योंकि विशिष्ट विधिमें विशेष्यका विधान-
फलितार्थ रहता है अतः श्रूयमाण व्यापार द्वारा विशेषणका पृथक् विधान नहीं
होनेसे भिन्न व्यापार नहीं करना पड़ता। ‘सोमेन यजेत’ इस वाक्यको विशिष्ट
विधायकत्वमें यद्यपि मत्वर्थ लक्षणा दोष होता है तथापि वाक्यभेदसे लक्षणारूप
दोष न्यून है क्योंकि लक्षणा पदका दोष है और वाक्यभेद वाक्यका दोष है।
पददोष और वाक्यदोषमें पददोषको ही स्वीकार करना चाहिये। इसलिये
‘ज्योतिष्टोमेन’ इसको उभय विधायक माननेसे जायमान वाक्यभेद दोषकी अपेक्षा
सोमपदमें मत्वर्थलक्षणा मानकर (सोमेन) इस वाक्यसे सोमविशिष्ट यागका
विधान ही श्रेष्ठ है।
विधिश्चतुर्विधः।
विधिश्चतुर्विधः-उत्पत्तिविधि-विनियोगविधि-रधिकारविधिः-प्रयोग-
विधिश्चेति।
विधि के चार भेद हैं। उत्पत्तिविधि, विनियोगविधि, अधिकारविधि और
प्रयोगविधि।
उत्पत्तिविधिः।
तत्र कर्मस्वरूपमात्रबोधको विधिरुत्पत्तिविधिः। यथा ‘अग्निहोत्रं
जुहोती’ति। अत्र च विधौ कर्मणः करणत्वेनान्वयः, अग्निहोत्रहोमेनेष्टं
भावयेदिति।
उनमें कर्म (यागादि) स्वरूप मात्रके बोधक विधिको उत्पत्तिविधि कहते हैं।
यहांपर मात्रपदसे यह सूचित होता है कि उत्पत्तिविधिसे कर्मको फलके साथ सम्बन्ध-
का बोध नहीं होता है। ‘उद्भिदा यजेत पशुकामः’ यह श्रौत अधिकार विधि ही है।
परन्तु यागस्वरूप बोधक कोई दूसरी विधि नहीं है इसलिये उत्पत्ति विधिका फलितार्थ
लाभ होता है, इसलिये इस लक्षणमें कोई दोष नहीं लगता है। उदाहरण बतलाते हैं
जैसे ‘अग्निहोत्रं जुहोति’ इस विधिमें कर्म (अग्निहोत्र) का करणत्वेन अन्वय होता