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अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)

Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary

लौगाक्षि भास्कर द्वारा

DevanagariHindipublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 84 में से

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पृष्ठ 12

६ : अर्थसंग्रहः—
वानयमिति नियमेन प्रतीतेः । यद्यस्माच्छब्दान्नियमतः प्रतीयते तत्तस्य
वाच्यम् । यथा गामानयेत्यस्मिन्वाक्ये गोशब्दस्य गोत्वम् ॥
उन दोनों (शब्दभावना और अर्थभावना) में पुरुष प्रवृत्ति (अनुकूल)
जनक जो प्रयोजकका व्यापार, उसीको शाब्दी भावना कहते हैं । वह शाब्दी
भावना लिङ्का अर्थ है । क्योंकि लिङ्के श्रवण होनेपर (मां प्रवर्तयति) मदीय-
प्रवृत्तिजनक व्यापार वाला यह है—यह नियमतः प्रतीत होता है, जो जिस शब्दसे
नियमतः प्रतीत होता है, वह उस शब्दका (वाच्य) अर्थ है यह व्याप्ति है ।
जैसे 'गामानय' इस वाक्यमें गोशब्दका अर्थ गोत्व है ।
शाब्द्या लौकिकवैदिकभेदौ ।
स च व्यापारविशेषो लौकिकवाक्ये पुरुषनिष्ठोऽभिप्रायविशेषः ।
वैदिकवाक्ये तु पुरुषाभावाल्लिङादिशब्दनिष्ठ एव । अत एव शाब्दी-
भावनेति व्यवह्रियते ।
वह लिङ्वाच्य व्यापार विशेष लौकिक वाक्यमें प्रवर्तक पुरुषनिष्ठ अभि-
प्राय विशेष है । और वैदिक वाक्यमें प्रवर्तक पुरुष नहीं है इसलिये लिङादि शब्द-
निष्ठ ही है (अतएव) शब्दनिष्ठ होनेके कारण ही यह शाब्दी भावनासे व्यवहृत
होता है । इसका विशद विचार भावनासामान्य लक्षण के अवसर पर किया है ।
सा च भावनांशत्रयमपेक्षते साध्यं साधनमितिकर्तव्यतां च, किं
भावयेत्, केन भावयेत्, कथं भावयेदिति ।
वह शाब्दीभावना अंशत्रयकी अपेक्षा करती है इसलिये भावना अंशत्रयवती
कहलाती है । साध्य साधन और इतिकर्तव्यता, किं भावयेत् (साधयेत्) यह
साध्याकांक्षाका आकार है, केन (हेतुना) भावयेत्, यह साधनाकांक्षाका आकार
है । कथं (किस प्रकार) भावयेत्, यह इतिकर्तव्यतऽऽकांक्षाका आकार है । इति-
कर्तव्यता शब्दका अर्थ उसीके विचारोंमें बतलायेंगे ।
तत्र साध्याकाङ्क्षायां वक्ष्यमाणांशत्रयोपेता आर्थीभावना साध्यत्वेना-
न्वेति एकप्रत्ययगम्यत्वेन समानाभिधानश्रुतेः । संख्यादीनामेकप्रत्यय-
गम्यत्वेऽप्ययोग्यत्वान्न साध्यत्वेनान्वयः ।
उनमें साध्यकी आकांक्षा होने पर—स्वर्गादि रूप साध्याद्यंशत्रय युक्त जो
आगे बतलायी जाने वाली आर्थी भावना है उसको साध्यत्वेन अन्वय होगा । अर्थात्