अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपिकाटीकासहितः । ९
अनेकों तरहके हैं। जैसे फलापूर्व समुदायापूर्व उत्पत्त्यपूर्व और अङ्गापूर्व। इनमें
जिस अपूर्वसे स्वर्ग हो उसको फलापूर्व कहते हैं क्योंकि स्वर्गरूपफलका कारण
यही है। समुदायापूर्वसे फलापूर्वकी उत्पत्ति होती है। समुदायके दो भेद हैं उनमें
(दर्श) अमावास्यामें तीनयागोंका एक समुदाय और पौर्णमासीमें तीन यागोंका
दूसरा समुदाय इन दोनों समुदायोंसे जो अपूर्व होता है उसे समुदाया-
पूर्व कहते हैं। उक्त दोनों समुदायोंसे फलापूर्वकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है
क्योंकि दोनों समुदायोंके विभिन्न कालमें उत्पन्न होनेसे दोनोंका सम्मेलन नहीं
होता अतः फलापूर्वका कारण कैसे होगा। इसलिये दोनों समुदायोंसे दो अपूर्वों-
की उत्पत्ति अवश्य माननी होगी। अमावस्यामें 'ऐन्द्रं दध्यमावास्यायामैन्द्रं पय अमा-
वास्यायाम्' एतद्वाक्यविहित दो (सान्नाय्य) ऐन्द्रयाग और 'यदाग्नेयोऽष्टाकपालः'
एतद्वाक्य विहित एक आग्नेय यागका समुदाय होता है। एवं पौर्णमासीमें 'यदाग्ने-
योऽष्टाकपालोऽमावास्यायां च पौर्णमास्यां चाच्युतो भवति' एतद्वाक्यविहित आग्नेय
याग 'ताभ्यामेतमग्नीषोमीयमेकादशकपालं पूर्णमासे प्रायच्छत्' एतद्वाक्यविहित
अग्नीषोमीयाग और 'तावब्रूतामग्नीषोमावाज्यस्यैव तावुपांशु पौर्णमास्याम्' एतद्वा-
क्यविहित-'उपांशुयाजमन्तरा यजति' उपांशु यागका समुदाय होता है। इन दोनों
समुदायोंमें भी एक समुदायमें जो तीन याग हैं वे भिन्न २ कालमें होते हैं इसलिये
इन तीनोंके मिलनेसे जो समुदायापूर्वकी उत्पत्ति होती है वह नहीं होगी, इस
लिये उन पृथक् पृथक् तीनों यागोंसे तीन उत्पत्त्यपूर्वकी उत्पत्ति होती है। इन तीनों
उत्पत्त्यपूर्वोकी उत्पत्ति भी अंगोपकारक (द्रव्यादि) रूप अङ्गोंकी सहायताके विना नहीं
हो सकती है। और अङ्ग भी अलग २ समयमें होते हैं इसलिये अङ्ग सब मिलकर
उत्पत्त्यपूर्वके कारण नहीं हो सकते हैं। इसलिये उत्पत्त्यपूर्वके आरम्भके लिये अङ्गा-
पूर्वकी कल्पना करते हैं इसीको सन्निपत्योपकारक (जिसका लक्षण स्वयं ग्रन्थकार
कहेंगे) कहते हैं। यहां पर किसीका मत है कि सन्निपत्योपकारक रूप अवघात
और प्रोक्षणादिसे द्रव्य और देवताके संस्कार द्वारा यागस्वरूपमें ही अतिशय
(अपूर्व) की उत्पत्ति होती है अतः अवघातादिका व्यापार यागोत्पत्त्यपूर्वोत्पत्तिमें
है और उत्पत्त्यपूर्वद्वारा फलापूर्वमें भी व्यापार है इसलिये सन्निपत्योपकारक अङ्गापूर्व-
में यागोत्पत्त्यपूर्वके प्रति ही प्रयोजकता है। किसीका मत है कि फलापूर्वके प्रति
ही अङ्गापूर्वमें प्रयोजकता है। यागोत्पत्त्यपूर्वसे जायमान (उत्पन्न होने वाला)
फलापूर्वका ही आरादुपकारक (प्रयाजादि) साक्षात्कारण है। यद्यपि इस तरहसे