अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ अर्थसंग्रहः—
होगा उसीको लिङादि ज्ञानसे प्रवृत्ति होगी और जिसको प्राशस्त्य ज्ञान नहीं होगा
उसकी प्रवृत्ति नहीं होगी । “स प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्” इत्यादि अर्थवाद
वाक्यसे लक्षणया प्राशस्त्यका ज्ञान होता है । ‘यजेत स्वर्गकाम’ इत्यादि वाक्यसे
“पुरुषप्रवृत्तिस्वरूपाऽऽर्थीभावनासाध्यक, लिङादिज्ञानकरणक और अर्थवाद-
वचनबोधित प्राशस्त्यादि-इतिकर्त्तव्यताक लिङादिशब्दनिष्ठ व्यापार” यह शाब्द
बोध होगा । अर्थात् प्राशस्त्यविशिष्ट लिङादि ज्ञानसे यागमें प्रवृत्ति करनी चाहिए ।
आर्थीभावनालक्षणम् ।
प्रयोजनेच्छाजनितक्रियाविषयव्यापार आर्थीभावना । सा चाख्यातत्वां-
शेनोच्यते आख्यातसामान्यस्य व्यापारवाचित्वात् ।
स्वर्गादिप्रयोजनरूपफलविषयक जो इच्छा उससे ( जनित ) जन्य यागादि
रूप क्रियाविषयक व्यापारको ही आर्थी भावना कहते हैं । यह आर्थी भावना
( आख्यातत्वांशेनोच्यते ) लिङ का अर्थ है, क्योंकि मीमांसक मतमें आख्यात
मात्रका व्यापार ( भावना ) अर्थ है ।
आर्थीभावनाया अंशत्रयम् ।
साप्यंशत्रयमपेक्षते साध्यं साधनमितिकर्त्तव्यतां च किं भावयेत् ,
केन भावयेत , कथं भावयेदिति । तत्र साध्याकाङ्क्षायां स्वर्गादिफलं
साध्यत्वेनान्वेति । साधनाकाङ्क्षायां यागादिः करणत्वेनान्वेति । इति-
कर्तव्यताकाङ्क्षायां प्रयाजाद्यङ्गजातमितिकर्तव्यतात्वेनान्वेति ।
यह आर्थीभावना भी साध्य साधन और इतिकर्त्तव्यताकी आकांक्षा करती
है । किं भावयेदित्यादि साध्यकी आकांक्षाका आकार है । उसमें जब साध्यरूपकी
आकांक्षा होती है तो स्वर्गादि फलको साध्यत्वेन अन्वय होता है । साधनकी जब
आकांक्षा होती है तब यागादिका करणत्वेन अन्वय होता है । पूर्वोक्त रीतिसे इति-
कर्तव्यताकी आकांक्षा होनेपर प्रयाजादि जो अङ्ग (जात) समुदाय है उसका इति-
कर्तव्यतात्वेन अन्वय होता है । स्वर्गादिसाध्यक यागादिकरणक और प्रयाजादि
अङ्ग समुदायरूप इतिकर्तव्यताक आर्थीभावनाको ही प्रवृत्ति कहते हैं । यहां पर
यह जानने योग्य बात है कि—क्रियात्मक यागका अचिरेणैव नाश हो जाता है
इस यागसे कालान्तरभावि स्वर्ग नहीं हो सकता इसलिये अङ्गविशिष्ट यागानुष्ठानसे
चिरस्थायि एक अपूर्वकी उत्पत्ति होती है । ये अपूर्व, दर्श और पौर्णमासमें