अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदीपिकाटीकासहितः । ३
अर्थ समझना चाहिये और इच्छाार्थक सन्प्रत्ययका जहल्लक्षणासे विचार अर्थ
समझना चाहिये । इसलिये “इस धर्मविचारशास्त्रका आरम्भ करना चाहिये” यहाँ
शास्त्रारम्भ ( अथातो धर्मजिज्ञासा ) सूत्रका अर्थ हुआ ।
यहाँपर यह शङ्का उठती है कि यागादि ही धर्म है अथवा चैत्य ( जिन )
वन्दनादि भी धर्म है और धर्मका लक्षण क्या है ? क्योंकि लक्षण और प्रमाणके
विना वस्तु की सिद्धि नहीं होती । कहा भी है ( मानाधीना ) प्रमाणके अधीन
(मेयसिद्धिः ) वस्तु की सिद्धि होती है और ( मानसिद्धिश्च ) प्रमाण की सिद्धि
(लक्षणात् ) लक्षणसे होती है । सजातीय विजातीय वस्त्वन्तरसे अपने लक्ष्यको
विभिन्न बतलाने वालेको ही लक्षण कहते हैं । जैसे गन्धवत्त्वसे पृथिवीमें सजातीय
( जलादिद्रव्य ) विजातीय ( गुणादि ) से भेद सिद्ध होता है इसलिये गन्धवत्त्व
पृथिवीका लक्षण है । इसलिये निम्न लक्षण प्रश्न आवश्यक है ।
धर्मलक्षणप्रश्नः ।
अथ को धर्मः, किं तस्य लक्षणमिति चेत् । उच्यते—यागादिरेव
धर्मः । तल्लक्षणं वेदप्रतिपाद्यः प्रयोजनवदर्थो धर्म इति । प्रयोजनेऽतिव्याप्ति-
वारणाय प्रयोजनवदिति । भोजनादावतिव्याप्तिवारणाय वेदप्रतिपाद्य इति ।
अनर्थकउक्तत्वादनर्थभूते श्येनादावतिव्याप्तिवारणायार्थ इति ।
यागादि ही धर्म है यहां एव शब्दसे चैत्यवन्दन धर्म नहीं है यह सूचित
होता है । आदि पदसे मंगलाचरण और दध्यादिरूप गुण प्रभृतिका संग्रह करना
चाहिए । जो वेदसे ( प्रतिपाद्य ) कहा गया हो, प्रयोजनवाला हो और अर्थ हो,
उसीको धर्म कहते हैं । इस लक्षणमें प्रयोजनवत् पद नहीं देनेसे स्वर्गादि-
रूप ( प्रयोजन ) अर्थमें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि स्वर्ग वेदप्रतिपाद्य
और ( अर्थ ) प्रयोजन है । प्रयोजनवत् पद देनेपर स्वर्गादि सुखादिरूप है
इसलिये इसका प्रयोजनान्तर नहीं है । अतः अतिव्याप्ति नहीं हुई ।
वेदप्रतिपाद्य पद नहीं देनेपर भोजनादिमें अतिव्याप्ति होगी क्योंकि भोजन
तृप्त्यादिरूप प्रयोजनवाला और अर्थ भी है । वेदप्रतिपाद्यपद देनेसे भोजन राग
प्राप्त है इसलिये अतिव्याप्ति नहीं होती । यद्यपि 'अष्टौ ग्रासा मुनेर्भक्ष्याः षोडशा-
रण्यवासिनाम् । द्वात्रिंशत्तु गृहस्थस्य यथेष्टं ब्रह्मचारिणाम् ॥' इत्यादि विधिबोधित भी
भोजन है तथापि इस वचनको ग्रासनियमपरक मानते हैं । इसलिये वेदप्रतिपाद्य