अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
सूत्र-६५ ३४१
गुणा करें। इससे क्षेत्रफल (लम्बाई x चौड़ाई = क्षेत्रफल) निकल जाता है। उस
फल को 8 से गुणा करके जो राशि आए उसमें 27 का भाग दें और उस भागफल
में जो शेष बचे, उसे गृह की नक्षत्र संख्या समझनी चाहिए।¹
त्रिविध नक्षत्रगणमाह —
देवनृराक्षसानां च नक्षत्राणां त्रिधा गणः।
यस्य यस्याऽनुगा मैत्री वैरं स्याच्च परस्परम् ॥ ३॥
स्वगणे परमा प्रीतिर्मध्यमा दैवमानुषे।
मर्त्यराक्षसयोर्मृत्युः कलहो देवरक्षसोः ॥ ४ ॥
गणानुसार नक्षत्रों के तीन प्रकार के गण होते हैं— देवगण, मनुष्यगण और
राक्षसगण। जो नक्षत्र एक से गण वाले है, उनमें आपस में मैत्री होती है जबकि
अन्य में साथ होने पर वैर होता है। स्वगण के साथ तो परम प्रीति होती है, देव
और मानुष गण में मध्यम प्रीति होती है और मनुष्य और राक्षस गण में तो मृत्यु ही
समझें जबकि देव और राक्षस गण में सदा कलह रहता है।
नव देवगणाः प्रोक्ता मानुषा नव कीर्तिताः ।
नव रक्षोगणाश्चैव नक्षत्राणां त्रिधा गणः ॥ ५ ॥
(कुल 27 नक्षत्रों में) नौ देवगण, नौ राक्षसगण और नौ ही मनुष्यगण कहे गए
हैं, इस तरह नक्षत्रों के तीन प्रकार के गण होते हैं।
कृत्तिका मघा विशाखा आश्लेषा शततारका।
चित्रायुक्ता धनिष्ठा च ज्येष्ठा मूलं च राक्षसाः ॥ ६ ॥
मृगोऽश्विनी रेवती च हस्तः स्वातिः पुनर्वसू ।
पुष्यानुराधाश्रवणमेते देवगणः स्मृतः ॥ ७॥
तिस्रः पूर्वाश्च भरणी आर्द्रा वै रोहिणी तथा ।
उत्तरात्रयसंयुक्तः कीर्तितो मानुषो गणः ॥ ८ ॥²
इति नक्षत्राधिकारः ।
- उदाहरण — क्षेत्र की लम्बाई 6 गज 1 अङ्गुल; क्षेत्र की चौड़ाई 6 गज 1 अङ्गुल। इनके अङ्गुल
बनाए— 145 × 145 = 21025 अङ्गुल फल। इस फल को 8 से गुणा करके उसमें 27 का भाग देने
पर, गणितानुसार 21025 × 8 / 27 शेष रहे 17 जो अश्विनी नक्षत्र से गिनने पर 17वाँ अनुराधा नक्षत्र
आया जो कि उस गृह का नक्षत्र समझना चाहिए। - समराङ्गण. के श्लोक तुलनीय है— मृगाश्विरेवतीस्वात्यौ मैत्रं पुष्यपुनर्वसू ॥ हस्तः श्रवण इत्येष देवाख्यो नवको
गणः। विशाखा कृत्तिकाश्लेषा नैर्ऋतं वारुणं मघा ॥ चित्रा ज्येष्ठा धनिष्ठेति नवको राक्षसो गणः ॥ आर्द्राभरण्यौ
रोहिण्या तिस्रः पूर्वास्तथोत्तराः ॥ इति नक्षत्र नवकं विज्ञेयं मानुषे गणे। (समराङ्गण. 26, 45-48)
342 अपराजितपृच्छा
राक्षसगण के अन्तर्गत— कृत्तिका, मघा, विशाखा, आश्लेषा, शतभिषा, चित्रा,
धनिष्ठा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र परिगणित है। देवगणान्तर्गत— मृगशिरा, अश्विनी,
रेवती, हस्त, स्वाती, पुनर्वसु, पुष्य, अनुराधा व श्रवण ये नौ नक्षत्र होते हैं। इसी
प्रकार मनुष्यगण में— तीनों पूर्वा (पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाभाद्रपद), भरणी
आर्द्रा, रोहिणी और तीनों उत्तरा (उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र
आते हैं।
अथ नक्षत्रान्राश्यानयनमाह —
अथ राशीः प्रवक्ष्यामि लब्ध्वा क्षेत्रफलेषु च।
तदनुक्रमयुक्तींश्च कथये तव साम्प्रतम्॥ ९॥
अब प्राप्त क्षेत्रफल के आधार पर राशि जानने की विधि कहता हूँ। उस विधि
को पूरे अनुक्रम के साथ बता रहा हूँ।
गृहक्षेत्रेषु यदृक्षं पञ्चत्रिंशशताहतम्।
षष्टिभिश्च हरेद्भागं भुक्तघट्यस्तु शेषतः॥ १०॥
ऋक्षभुक्तिक्रमयुक्ता स्वस्वराशिकसंज्ञिताः ?।
स्युर्मेषाद्या राशयश्च अश्विन्यादिक्रमेषु च॥ ११॥¹
गृहक्षेत्र का जो नक्षत्र आए, उसकी संख्या को 135 से गुणा करके जो फल आए,
उसको 60 से भाजित करे और जो शेष बचे वह क्रमयुक्त नक्षत्रभुक्ति होगी, उनकी
अपनी राशि बनेगी जो मेषादि राशि होगी जबकि अश्विन्यादि नक्षत्र क्रम होगा।
- पाठ शङ्कास्पद है, स्पष्ट न होने से इसे अन्य ग्रन्थों में देखना चाहिए। नक्षत्र से राशि जानने की विधि
'शिल्परत्नाकर' में इस प्रकार कही है— गृहक्षेत्रेषु यदृक्षं षष्टिघ्नं खशरोनितम्। पञ्चत्रिंशतशतैर्भक्ते शेषं वै
मेषकादयः ॥ (शिल्प. 1,125)
उदाहरण— माना कि क्षेत्र का नक्षत्राङ्क 5 (मृगशिरा है), उसको 60 से गुणा करने पर 60×5 = 300
आया। इस 300 से 50 घटाने पर 300-50 = 250 आया शेष। इस शेष को 135 से भाग देने पर
250/135 = 1 और शेष बचे 115 इस राशि को अङ्क 1 माने। उसे लब्धाङ्क 1 में जोड़े 1+1 = 2 तो
अङ्क 2 आया। यह 2 अङ्क या वृष राशि को बताता है। अस्तु, गृह की राशि वृष है।
यही बात ज्ञानप्रकाशदीपार्णव में इस प्रकार दी है— गृह क्षेत्रस्य यदृक्षं षष्टिभिर्गुणितं तथा। पञ्चत्रिंशच्छतं
भक्तं शेष मुक्तिरजादयः ॥ (दीपार्णव 1, 54)
उदाहरण—गृह के नक्षत्र (5) को 60 से गुणा करें (5 × 60 = 300) फिर उसे 135 से भाग दें जो
लब्धि आए उसे गत राशि और शेष रहे उसे चालू राशि जाननी चाहिए, 300 / 135 = 2, 30 / 135
अर्थात् लब्धि 2 से वृष राशि पूरी व शेष 30 से चालू राशि आई। मिथुन (शेष को 1 मानकर लब्ध 2 में
जोड़ें तो 2+1 = 3) मिथुन राशि। लगता है दीपार्णवकार ने 300 से 50 नहीं घटाया, इसी से यह अन्तर
आया है। यथा 300-50 = 250 / 135 गत राशि लब्धि 1 आती है शेष वृष हुई।
सूत्र-६५ ३४३
वास्तुचक्रादिचक्रेषु ग्रहवेधविशोधनैः।
अष्टाविंशतिरेवं च साभिजित् कृत्तिकादयः ॥ 12 ॥
वास्तु चक्रादि चक्रों को और ग्रह वेध के शोधन के लिए अभिजित् नक्षत्र के
साथ कृत्तिकादि अट्ठाईस नक्षत्र इस प्रकार लाने चाहिए।
वर्णानुसार प्रशस्तराशयः —
चातुर्वर्ण्यप्रशस्तांश्च राशीनथ वदाम्यहम्।
तत्र त्रयस्त्रयः प्रोक्ता विप्रशूद्रान्तमार्गतः ॥ 13 ॥
वृश्चिकः कर्कटो मीनो ब्राह्मणाः परिकीर्तिताः।
धनुर्मेषस्तथा सिंहो राजन्याश्च शुभाः स्मृताः ॥ 14 ॥
वृषः कन्या च मकर एते वैश्या उदाहृताः।
मिथुनं च तुला कुम्भस्त्रयः शूद्राः प्रकीर्तिताः ॥ 15 ॥
अब मैं चारों वर्णों के लिए जो-जो प्रशस्त राशियाँ हैं, उनके बारे में कहता हूँ।
ये तीन-तीन कही गई है जो कि विप्र से शूद्र वर्ण तक है। ब्राह्मण की राशियाँ
वृश्चिक, कर्क और मीन को कही है। क्षत्रिय या राजन्य की धनु, मेष तथा सिंह
राशि कही गई है। वैश्य के लिए वृष, मकर और कन्या राशि शुभ है और शूद्र वर्ण
के लिए मिथुन, तुला और कुम्भ राशियाँ शुभ कही गई हैं।
भवेद् द्वादशभिर्विप्रः क्षत्रियो नवभिस्तथा।
षड्राशिभ्यो भवेद् वैश्यस्त्रिभिः शूद्रः प्रशस्यते ॥ 16 ॥
इनमें 12 राशियाँ ब्राह्मण के लिए, 9 राशियाँ क्षत्रिय के लिए, 6 राशियाँ वैश्य
और 3 राशियाँ शूद्र के लिए प्रशस्त जाननी चाहिए।
चातुर्वर्णान्तरभेद एवमुक्तोऽपराजित।
प्रीत्यर्थं च पुनर्भेदं कथये तव साम्प्रतम् ॥ 17 ॥
हे अपराजित ! तुम्हें यह चातुर्वर्णान्तर भेद इस प्रकार से कहा गया। अब मैं
पुनः तुम्हारे स्नेह के कारण इनके भेद पूरी तरह कहता हूँ।
अथ षडष्टकादीनां —
षडष्टके ध्रुवं मृत्युः प्रीतिः स्यात् समसप्तमे।
अनिष्टं पञ्चनवमे पुष्टिर्दशचतुर्थके ॥ 18 ॥
इन राशियों में षडाष्टक (छठे-आठवें) होने पर निश्चय ही मरणान्तक पीड़ा
होती है परन्तु एक दूसरे के सम-सप्तम राशि होने पर प्रीति भी गाढ़ होती है।
344 अपराजितपृच्छा
राशिक नवपञ्चक होना अनिष्ट का सूचक है और चतुर्थ-दशम होना पुष्टिकारक
होता है।
तृतीयेकादशे मैत्री ¹द्वितीयद्वादशे रिपुः ।
राशयः षड्विधा एवमन्योन्यं पतिवेश्मनोः ॥ १९ ॥
राशि का तृतीय-एकादश होना मैत्रीकारक है परन्तु द्वितीय-द्वादश होना शत्रुता
का कारक है। इस तरह छह प्रकार से राशियों व गृहस्वामियों का अन्योन्य सम्बन्ध
बताया गया है।
चन्द्रस्थितिफलमाह —
गृहाग्रे च यदा चन्द्रो क्षयं वेश्म करोति हि।
राष्ट्रचौराग्निभयं घोरं चन्द्रे वै पृष्ठमागते ॥ २० ॥
धनधान्यक्षमारोग्यं कुरुते दक्षिणस्थिते ।
श्रीस्त्रीपुत्रा उत्तमाश्च चन्द्रे वै उत्तरे स्थिते ॥ २१ ॥
अब चन्द्र की स्थिति अनुसार फल देखते हैं। यदि गृह के आगे चन्द्र रहता है
तो गृह की क्षति करता है और चन्द्र पीछे रहता है तो रात्रि में चोरादि और अग्निभय
घोर होता है। चन्द्रमा यदि दायें हो तो धन-धान्य भूमि, आरोग्य प्रदाता होता है और
यदि चन्द्रमा उत्तर दिशा में स्थित हो तो स्त्री-पुत्रादि के लिए सर्वोत्तम होता है।
इत्यमनन्तर सप्तशलाक्यचक्रमाह —
सप्तोर्ध्वे स्थापयेद्रेखाः पुनर्भिन्नाश्च सप्तभिः ।
रेखाः प्रोक्तानि साभिजिन्नक्षत्राण्यष्टविंशतिः ॥ २२ ॥
कृत्तिकादीनीशान्यां शेषर्क्षाणि प्रदक्षिणे ।
हक्षेत्रोक्तमृक्षं च तत्र चन्द्रमुदीरयेत् ॥ २३ ॥
(सप्तशलाका चक्र के लिए) सात ऊर्ध्व रेखाएँ बनाएँ और सात ही इनको
काटती हुई आड़ी रेखाएँ बनाएँ। इस तरह अभिजित् सहित 28 नक्षत्रों की ये रेखाएँ
बनती हैं। कृत्तिकादि को ईशानकोण से आरम्भ करते हुए प्रदक्षिण क्रम में एक-
एक रेखाग्र पर नक्षत्रों के नाम लिखते जाएँ। इस क्षेत्र के इन नक्षत्रों पर चन्द्रमा की
स्थिति देखनी चाहिए।²
- मुद्रितपुस्तके 'तृतीयद्वादशे' इति पाठः। ज्योतिष की मान्यताओं में दो-बारह या बीया-बारहवाँ होना
वैरभाव का सूचक माना जाता है। - यह सप्तशलाका चक्र नक्षत्रों का वेध जानने हेतु बनाया गया है। आमने-सामने के नक्षत्रों का
सप्तशलाका वेध होता है। इनमें भी पाप ग्रह से वेध हो तो सम्पूर्ण नक्षत्र को त्यागना चाहिए और शुभ
सूत्र-६५ 345
ग्रहराश्यादि मैत्रीविचारः —
वेश्मपत्योर्भवेच्चैव गृहमैत्री परस्परम्।
द्वादशङ्गोक्ता राशयश्च नवैव च ग्रहास्तथा ॥ २४ ॥
गृह और गृहस्वामी की परस्पर ग्रह मैत्री हो, इन बारह राशियों और नवग्रहों
की भी ग्रह मैत्री होनी चाहिए।
तथैकराशिकाः केचित् केचिच्चैव द्विराशिकाः।
तदनुक्रमकं वक्ष्ये यदुक्तं परमेश्वरैः ॥ २५ ॥
कोई ग्रह एक राशि के स्वामी होते है और कोई ग्रह दो-दो राशियों के स्वामी
होते हैं, मैं यहाँ उनका अनुक्रम कहता हूँ, जैसा परमेश्वर ने पहले बताया था।
भौमस्य वृश्चिको मेषो भार्गवस्य तुला वृषौ।
बुधस्य कन्यामिथुने सोमस्यैवं तु कर्कटः ॥ २६ ॥
सिंहः सूर्यस्य क्षेत्रं स्याद् धनुर्मीनौ तथा गुरोः।
शनेश्च कुम्भमकरौ गृहक्षेत्राधिपा इति ॥ २७ ॥
मङ्गल की वृश्चिक और मेष राशि, शुक्र की तुला और वृष राशि, बुध की
कन्या व मिथुन राशि, चन्द्रमा की कर्क राशि, सूर्य की सिंह राशि, गुरु की धनु व
मीन राशि, शनि की कुम्भ और मकर राशि है— इसे ही गृह व गृहस्वामी के प्रसङ्ग
में भी समझें।
न पीडयन्त्यात्मक्षेत्रं स्नेहिनः क्षेत्रपालकाः।
रिपुगृहं पीडयन्ति भस्मीकुर्वन्ति विग्रहे ॥ २८ ॥
ये सभी क्षेत्रपाल राशिपति अपने स्वक्षेत्र को कभी हानि नहीं पहुँचाते और
अपने स्नेही मित्रों के क्षेत्र में होने पर भी हानि नहीं पहुँचाते परन्तु शत्रु के क्षेत्र में
आने पर ये ग्रह पीड़ाकारी हो जाते हैं और विग्रह कराते हैं।
स्यात्सूर्यमन्दयोर्वैरं तथा च कुजमन्दयोः।
गुरुशुक्रयोः स्याद्वैरं चन्द्रेण च बुधस्य तु ॥ २९ ॥
ग्रह से वेध हो तो केवल चरण वेध ही त्याज्य होता है। ऐसा नारदीय सूत्र का वचन है-
'पदभेवशुभैर्विद्ध अशुभैर्नैव कृत्स्नजः ।' मुहूर्त्ततत्त्वं में इसकी विधि आई है—सात रेखाएँ तिर्यक् और
सात ही रेखाएँ ऊर्ध्व रूप से खींचने पर सप्तशालाका चक्र बनता है। इसमें रुद्र अथवा ईशान की रेखा
पर कृत्तिका नक्षत्र लिखें और बाद में शेष नक्षत्रों का क्रमशः न्यास करें। यह न्यास अन्तिम सिरे तक
किया जाएगा और प्रत्येक रेखा के आमने-सामने नक्षत्र न्यास होगा। इन नक्षत्रों पर जो कोई ग्रह होगा
तो उसका सामने वाले नक्षत्र से वेध जानना चाहिए। यह वेध विवाहादि माङ्गलिक कार्यों के अतिरिक्त
अन्यत्र स्वीकार्य है। (मुहूर्त्त. 1, 5)
रवेरङ्गारकस्यैव मैत्री च गुरुचन्द्रयोः ।
एषां त्रयाणां वै मैत्री अन्येषां तु न विद्यते ॥ 30 ॥
सूर्य और शनि ग्रह में परस्पर वैर है। इसी तरह मङ्गल और शनि में भी वैर है।
गुरु व शुक्र का वैर है और चन्द्र व बुध का भी वैर है। सूर्य और मङ्गल की मैत्री है।
गुरु और चन्द्र की मैत्री है। इनकी तीनों में भी मैत्री है। अन्यों में यह मैत्री नहीं है।
स्पष्टार्थचक्र
| राशि | ग्रह | मित्रभाव | शत्रुभाव | समभाव |
|---|---|---|---|---|
| सिंह | सूर्य | चन्द्र गुरु मङ्गल | शुक्र शनि | बुध |
| कर्क | चन्द्र | सूर्य बुध | - | गुरु शुक्र मङ्गल शनि |
| मेष, वृश्चिक | मङ्गल | सूर्य चन्द्र गुरु | बुध | शुक्र शनि |
| मिथुन, कन्या | बुध | सूर्य शुक्र | चन्द्र | मङ्गल गुरु शनि |
| धन, मीन | गुरु | सूर्य चन्द्र मङ्गल | बुध शुक्र | शनि |
| वृषभ, तुला | शुक्र | बुध शनि | सूर्य मङ्गल | चन्द्र गुरु |
| मकर, कुम्भ | शनि | बुध शुक्र | सूर्य चन्द्र मङ्गल | गुरु |
| ग्रहाश्चत्वार एकत्र त्रय एकत्रसंस्थिताः । | ||||
| उभयोरन्तरं घोरं कालानल इवाऽपरः ॥ 31 ॥ | ||||
| यदि चार ग्रह एकस्थान पर एकत्र हो जाए या तीन ग्रह एक स्थान पर स्थित | ||||
| हो जाए अथवा इन दोनों के अन्तर की स्थितियाँ हो तो घोर विपत्ति (काल-अग्नि | ||||
| जैसी परिस्थितियाँ) होती है। | ||||
| इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां | ||||
| नक्षत्रराशिचन्द्रमैत्र्यनुक्रमो नाम पञ्चषष्टितमं सूत्रम् ॥ 65 ॥ | ||||
| इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में नक्षत्र- | ||||
| राशि-चन्द्र-मैत्री अनुक्रम नामक पैंसठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 65 ॥ | ||||
| व्ययांशकताराग्रहजीवमृत्युसर्वबलं षट्षष्टितमं सूत्रम् ॥ 66 ॥ | ||||
| अथ व्ययानयनं विश्वकर्मोवाच — | ||||
| नक्षत्रे वसुभि₈ भक्ते यच्छेषं व्ययमादिशेत् । | ||||
| अष्टौ व्ययास्तथाप्रोक्ता आयेष्वष्टसु योजिताः ॥ 1 ॥ | ||||
| विश्वकर्मा ने कहा कि नक्षत्र को 8 से भाजित करें, जो शेष रहे उसे 'व्यय' | ||||
| कहा जाता है। व्यय भी आठ कही गई है, जो आठ आयों के साथ योजित होती है। |
सूत्र-६६ 347
आयाश्च कथिताः पूर्वं व्ययानां लक्षणं शृणु।
एकैका यस्य संस्थाने व्ययाश्च त्रिविधाः स्मृताः ॥ २ ॥
आयों के बारे में तो पहले कहा जा चुका है। अब तुम इन व्यय के लक्षणों के बारे में
सुनो। एक-एक व्यय अपने संस्थान में तीन (पिशाच, राक्षस व यक्ष) प्रकार की होती है।
समो व्ययः पिशाचश्च राक्षसस्तु व्ययोऽधिकः।
व्ययो न्यूनो यक्षश्चैव धनधान्यकरः स्मृतः ॥ ३ ॥
पिशाचों का व्यय समान होता है; राक्षसों का व्यय अधिक होता है और यक्षों
का व्यय न्यून होता है। इसलिए इनका व्यय धन-धान्यकर कहलाता है।
अनायव्यये कर्तरि आयहीने व्यये तथा।
व्ययाधिक विनश्यन्ति अचिरेणै सर्वदा ॥ ४ ॥
अनाय से व्यय छुरी या कैंची (कर्तरीदोष) का काम करता है। आय हीन से
भी व्यय होता है और व्यय अधिक होने पर तो शीघ्र और सदा-सर्वदा के लिए
विनाश हो जाता है।
ध्वजादिष्वष्टस्वायेषु अष्टौ शान्तादिका व्ययाः।
प्रत्येकव्ययसंस्थाने आयो न्यूनेत्तरः स्मृतः ॥ ५ ॥
ध्वजादि आठों आयों में आठों ही शान्तिकादिक व्यय हैं। अस्तु, प्रत्येक व्यय
के संस्थानों में आय बहुत ही कम होती है।
व्ययनामानि -
शान्तः पौरः प्रद्योतश्च श्रियानन्दो मनोहरः।
श्रीवत्सो विभवश्चैव चिन्तात्मा च व्ययाः स्मृताः ॥ ६ ॥
- शान्त, 2. पौर, 3. प्रद्योत, 4. श्रियानन्द, 5. मनोहर, 6. श्रीवत्स, 7. विभव
और 8. चिन्तात्मा— ये आठ व्यय कही गई हैं।
प्रशस्ताप्रशस्त व्ययमाह —
आयस्थाने व्ययो योज्यो ह्यप्रशस्तो व्ययोऽधिकः।
व्ययो न्यूनस्तथा श्रेष्ठो धनधान्यकरः स्मृतः ॥ ७ ॥
आय स्थान में व्यय को लगाना अप्रशस्त अर्थात् ठीक नहीं है, क्योंकि व्यय
अधिक है। व्यय तो न्यून ही श्रेष्ठ होता है जो धन-धान्यकारक माना जाता है।
स्मृतो ध्वजे शुभः शान्तः नित्यं कल्याणकारकः।
भोज्यं पूजाफलं शान्तिर्नृत्यं गीतं सुरालये ॥ ८ ॥
348 अपराजितपृच्छा
ज्ञातव्य है कि ध्वज आय के साथ शान्त व्यय दिया जाना शुभ और नित्य
कल्याणकारक होता है तथा इससे भोज्य पदार्थ, पूजा के फल, शान्तिक नृत्य,
गीतादि मन्दिरों में बने रहते हैं।
धूमस्थाने यदा शान्तो हेमरत्नादिसम्भवः ।
अग्न्युपजीवकानां च धातुद्रव्यफलप्रदः ॥ 9 ॥
धूम आय के साथ यदि शान्त व्यय हो तो सोना-चाँदी रत्नादि सम्भव हो जाते
हैं जो अग्नि से उपजीविका चलाने वालों के लिए और धातु-द्रव्यों में फलप्रद है।
सिंहस्थाने च पौरश्चेत् सिंहवच्च पराक्रमैः ।
निहन्ति रिपुसैन्यानि ह्यात्मस्थाने महोत्सवाः ॥ 10 ॥
सिंह आय के स्थान पर पौर व्यय सिंह के समान ही पराक्रमी होता है, ऐसे
योग के फलस्वरूप रिपुओं के सैन्य दल स्वयं अपने स्थानों में मारे जाते हैं और
महोत्सव होते हैं।
प्रद्योतः श्वानसंस्थाने नित्यं भोगसुखावहः ।
शय्यासु वेश्मनि तथानेकभोगादिकामदः ॥ 11 ॥
श्वान आय के स्थान में प्रद्योत व्यय दिए जाने से नित्य भोग और सुख देने
वाला होता है। इससे गृह में विविध शय्या-सुख और ऐसे ही अनेक भोगादि से
मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
श्रियानन्दो वृषस्थाने नित्यं श्रीसुखशान्तिदम्।
व्यवहारोपस्करं च गुरुदेवार्चने रतिम् ॥ 12 ॥
वृष आय के स्थान में श्रियानन्द व्यय होने पर नित्य ही सुख और शान्ति बनी
रहती है। इससे व्यवहार में आने वाले सभी उपस्कर अर्थात् साधन सुलभ होते हैं
और गुरुदेव के पूजन-अर्चन में भी रुचि और प्रेम बना रहता है।
मनोहरः खरे युक्तः सर्वमनोरथप्रदः ।
समस्तभोगयुक्तानां तीर्थयात्राप्रकाशकः ॥ 13 ॥
खर आय के साथ मनोहर व्यय होने पर सब प्रकार के मनोरथ सिद्ध होते रहते
हैं। इससे समस्त भोगयुक्त साधन सुलभ होते हैं और तीर्थयात्रा का सौभाग्य भी
प्रकट होता है।
श्रीवत्सो गजसंस्थाने स्त्रीणां क्रीडात्मनः स्मृताः ।
शृङ्गारभोगयुक्तानां बलपुष्टिप्रदायकः ॥ 14 ॥
गज आय के संस्थान पर श्रीवत्स व्यय होने पर स्त्रियों में क्रीड़ा, आमोद-प्रमोद
सूत्र-६६ 349
का और शृङ्गार-भोग आदि के योग बनते है। अस्तु, ऐसा संयोग भी बल-पुष्टि
प्रदायक होता है।
विभवो ध्वाङ्क्षसंस्थाने शिल्पिनां हितकामदः।
सूत्रशास्त्रार्थसम्पन्ना भोगशृङ्गारनिश्चलाः ॥ 15 ॥
ध्वांक्ष आय के संस्थान में विभव व्यय होने पर शिल्पियों के हित और
कामनाओं की पूर्ति होती हैं। इससे वे सूत्रशास्त्रार्थ सम्पन्न होते है और उन्हें भोग-
शृङ्गार की उपलब्धि निश्चल बनी रहती है।
सर्वेषु शान्त आयेषु प्रशस्तः सर्वकामदः।
षट्सु सिंहादिषु शुभः पौरो धूमध्वजौ विना ॥ 16 ॥
सभी आयों में शान्त व्यय प्रशस्त और सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
सिंहादि से छह आयों में पौर व्यय शुभ है, इनमें धूम, ध्वज ये दो आय नहीं होनी
चाहिए।
ध्वजे धूमे तथा सिंहे प्रद्योतादीन् विवर्जयेत्।
शेषाणां सुप्रशस्ताश्च तथा स्थानेषु पञ्चसु ॥ 17 ॥
ध्वज आय में धूम आय में तथा सिंह आय में प्रद्योतादि व्यय विवर्जित है, शेष
पाँच स्थानों में ये सुप्रशस्त हैं।
खरे वृषे श्रियानन्दो गजे ध्वाङ्क्षे च शोभनः।
मनोहरं त्यजेत्सोऽथ खरे ध्वाङ्क्षे गजे शुभः ॥ 18 ॥
खर आय और वृष आय स्थान पर श्रियानन्द व्यय, इसी तरह से गज आय
और ध्वांक्ष आय के साथ भी श्रियानन्द व्यय शोभन, लाभप्रद है परन्तु खर आय,
ध्वांक्ष आय और गज आय— तीनों में मनोहर व्यय को त्यागना ही शुभ है।
श्रीवत्सश्च गजे ध्वाङ्क्षे विभवो ध्वाङ्क्षके शुभः।
व्ययो न्यूनतरः श्रेष्ठो ह्यधिकश्चैव राक्षसः ॥ 19 ॥
गज आय, ध्वांक्ष आय के स्थान पर श्रीवत्स व्यय शुभ है। ध्वांक्ष आय के
स्थान पर विभव व्यय भी शुभ है। अस्तु, व्यय सदा न्यूनतम रहना ही श्रेष्ठ है।
अधिक व्यय तो राक्षसों का होता है।
चिन्तात्मकं व्ययं चापि आयेष्वष्टसु वर्जयेत्।
पिशाचकमायसमं न कुर्याच्छुभकर्मसु ॥ 20 ॥
इति व्ययाधिकारः।
इसी प्रकार आठों आयों के स्थान पर कभी भूल से भी चिन्तात्मक व्यय नहीं
350 अपराजितपृच्छा
आने देना चाहिए, इसे वर्जनीय कहा है। इसी तरह सम आय-व्यय भी पिशाचों की
होती है। अस्तु, इसे भी शुभकर्मों में त्यागना समुचित है।
अथांशाकाधिकारः —
शृणु वत्स यथा चांशो वास्तुवेदे त्रिधा स्मृतः।
एकैकक्रमयोगो वै शुभश्चाशुभ उच्यते ॥ 21 ॥
हे वत्स सुनो ! अंश भी वास्तु वेद में तीन प्रकार के होते है। ये सभी क्रम योग
से एक-एक शुभ और अशुभ कहलाते हैं।
यदुक्त मूलराशो च आयातर्थेषु फलं कृतम्।
तत्र राशौ व्यये मिश्रे गृहनामाक्षराणि च ॥ 22 ॥
गुणैर्भक्ते व्यये शेषं अंशकं त्रिविधं विदुः।
इन्द्रौ यमश्च राजा च त्रिभिर्नामभिरंशकाः ॥ 23 ॥¹
जैसे कहा गया है कि मूल राशियाँ आयों के लिए फल निकालने में काम में
ली जाती है, वहाँ राशियों के साथ व्ययों को मिलाने से गृहों के नामाक्षरों से गुणा
करके व्यय का भाग दें, जो शेष बचे उनके 'अंशक' तीन प्रकार से जाने। ये
क्रमशः 1. इन्द्र, 2. यम और 3. राजा— तीनों अंशों के ये तीन नाम हैं।
प्रासाद-प्रतिमा-लिङ्गे-जगतीपीठ-मण्डपे।
वेदी-कुण्डश्रुक्षु चैव इन्द्रश्चैव ध्वजादिषु ॥ 24 ॥
क्षेत्रपाल² नागेन्द्रे गणाध्यक्षे च भैरवे।
ग्रहमातृगणे देव्यामादित्ये च यमांशकः ॥ 25 ॥
प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, जगतीपीठ, मण्डप, वेदी-कुण्ड, श्रुवा के निर्माणादि में
इन्द्र व्यय ध्वजादि आय के साथ दें। क्षेत्रपाल, नागेन्द्र या गजराज, गणाध्यक्ष, भैरव,
ग्रह-मातृगण, देवियों, आदित्य में यमांशक व्यय देते हैं।
पुर-प्राकार-नगर-खेट-कूटे च कर्वटे।
हर्म्ये च राजवेश्मादौ शस्तो राजा तथा मतः ॥ 26 ॥
इसी प्रकार पुर, प्राकार-परकोटा, नगर, खेट-खेड़ा, कूट, कर्वट, हर्म्य,
राजवेश्म आदि में राजा अंशक देना प्रशस्त मत है।
- तुलनीय— व्ययं क्षेत्रफले क्षिप्त्वा गृहनामाक्षराणि च॥ भागं त्रिभिर्हरेत् तत्र यच्छेषु सोंऽशको भवेत्।
चतुरस्रो यथा मन्त्रो मुख्यो लग्ने नवांशकः॥ तथा गृहादिषु प्रोक्तं मुख्यत्वेनांशकत्रयम्। इन्द्रो यमश्च राजा च
त्रयो नामाभिरंशकाः॥ स्वनामतुल्यफलदा विज्ञातव्यास्त्रयोऽपि च। (समराङ्गण. 26, 37-39) - 'क्षेत्राद्विसंक्षा ?' इति प्रकाशित पाठः।
सूत्र-६६ 351
स्वर्गादिभोगयुक्तानां नृत्यगीतमहोत्सवे ।
प्रजावने च पाण्डित्ये इन्द्रांशश्चोत्तमो मतः ॥ 27 ॥
स्वर्गादि भोगों से युक्त प्रतीति देने वाले नृत्य-गीत महोत्सवों में, प्रजावनों,
पाण्डित्य दर्शक कार्यों के मंत्रों में भी इन्द्रांशक को ही प्रशस्त माना गया है।
विविधं च वणिक्कर्म मद्यमांसादिकं तथा ।
इत्युक्तं क्रमतश्श्रेत्यं प्रशस्तं च यमांशके ॥ 28 ॥
इसी प्रकार विविध प्रकार के वणिक् कर्मों में, मद्य-मांसादिकों में यमांशक को
ही प्रशस्त कहा गया है।
गजाश्वरथक्रीडायां यानजम्भानकादिके ।
स्वर्गादितुल्यभोगाश्च राजांशक उदाहृताः ॥ 29 ॥
गज, अश्व, रथ, क्रीड़ा में, यान, जम्भानादिक (पालकी आदि) एवं स्वर्ग के
समान भोगों में राजांशक को प्रशस्त कहा गया है।
त्र्यक्षराणि त्रिभेदाश्च त्रिदेवास्त्रिहुताशनाः ।
त्रयः कालास्त्रिसन्ध्याश्च रजः सत्वतमस्त्रयम् ॥ 30 ॥
तीन ही अक्षर (ओ, ऊ, म्), तीन भेद (स्वजातीय, स्वगत, विजातीय), तीन
देव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश), तीन अग्नि (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि), तीन
काल (भूत, भविष्य, वर्तमान), तीन सन्धियाँ (स्वर, व्यञ्जन, विसर्ग या प्रातः
अपराह्न, सायंकाल) और (गुण भी) रज, सत्व और तम तीन हैं।
प्रमाणत्रयमेवं च ज्येष्ठमध्याधमैः क्रमात्।
त्र्यंशकं तु समानीय वास्तुवेदभवं ततः ॥ 31 ॥
इत्यंशकाधिकारः।
इस प्रकार के प्रमाणत्रय— ज्येष्ठ, मध्यम और अधम के क्रम से अंशकों को
भी लाकर वास्तुवेद बनता है।
अथ ताराधिकारः —
गणयेत्स्वामिनक्षत्राद्यावदृक्षं गृहस्य च ।
नवभिस्तु हरेद्भागं शेषास्ताराः प्रकीर्तिताः ॥ 32 ॥
स्वामी के नाम-नक्षत्र से लेकर गृह के नक्षत्र तक गणना करें और उसमें 9 का
भाग दें तो जो शेष रहे उसे 'तारा' कहा जाता है।
तारानामानि सफलं —
शान्ता मनोहरा क्रूरा विजया कलिका तथा।
352 अपराजितपृच्छा
पद्मिनी राक्षसी वीरा ह्यानन्दा नवमी स्मृता ॥ ३३ ॥
- शान्ता, 2. मनोहरा, 3. क्रूरा, 4. विजया, 5. कलिका, 6. पद्मिनी, 7.
राक्षसी, 8. वीरा और 9. आनन्दा— ये नौ ताराओं के नाम है।¹
शान्ता शान्तिकरी नित्यं मनोल्हादा मनोहरा ।
क्रूरा प्रवर्जिता प्राज्ञैश्चौराग्न्यादिभयङ्करी ॥ ३४ ॥
शान्ता तारा सदा शान्तिकारक होती है, मनोहरा तारा मन में आह्लाद उत्पन्न
करती है। क्रूरा तारा प्राज्ञों-विद्वानों के लिए वर्जित है और अग्नि आदि के भय
उत्पन्न करने वाली है।
विजया जयकल्याणा कलिका कलहप्रदा ।
पद्माया प्राप्यते सौख्यं महत्तीर्थफलं तथा ॥ ३५ ॥
विजया तारा विजय और कल्याण देने वाली तथा कलिका तारा कलह कराने
वाली है। पद्मिनी तारा से सुख मिलता है जैसे महान् तीर्थ का फल।
राक्षसी च तथा घोरा निशायां भयदायिनी ।
वीरा सौम्या भोगदा च ह्यानन्दानन्दकारिणी ॥ ३६ ॥
राक्षसी तारा भयङ्कर है और रात्रिकाल में भयोत्पादक है। वीरा तारा सौम्य है
और भोगों को देने वाली है तथा आनन्दा तारा आनन्द करने वाली है।
एवं नवविधाकारा निराकारा हि तारकाः ।
क्षीणश्चन्द्रो यदा वारे भवेत्तारा बलप्रदा ॥ ३७ ॥
इस प्रकार ये निराकार तारका नव प्रकार के आकार वाली है। जब चन्द्रमा
क्षीण होता है, तब उस वार के दिन तारा बलवान होती है।² - ताराओं के नामादि को लेकर शास्त्रों में दो रूप मिलते हैं। समराङ्गण. में कहा गया है—गणयेत्
स्वामिनक्षत्राद् यावत् स्याद् भवनस्य भम्॥ नवभिर्भाजिते तस्मिन् शेषं तारा प्रकीर्तिता।
जन्मसम्पद्विपत्क्षेमपापसाधकनैधनीः॥ मैत्रीपरममैत्र्यौ च प्राहुः संज्ञाः समाः फले।
त्रिसप्तपञ्चमीर्भर्तुर्गृहतारा विवर्जयेत्॥ आद्याद्वितीयाष्टम्यस्तु ताराः स्युरिह मध्यमाः। तथा ऋक्षेऽपि चानिष्टे
चन्द्रेऽष्टमगतेऽपि च॥ नयते दुरितं तारा चतुःषण्णवती नृणाम्। (समराङ्गण. 26, 40-44) इस प्रकार
यहाँ 1. जन्म, 2. सम्पद, 3. विपत्, 4. क्षेम, 5. प्रत्यरि, 6. साधक, 7. बध, 8. मित्र व 9. परममित्र
नाम से ताराओं की गणना हुई है। यही मत नारदसंहिताकार का है किन्तु जन्म सहित तीसरी, पाँचवीं व
सातवीं तारा को अशुभद बताया है— जन्मसम्पद्विपत्क्षेम प्रत्यरिस्साधको वधः। मित्रं परममित्रं च
जन्मभाच्च पुनः पुनः॥ जन्मत्रिप्रञ्चसप्ताख्या तारा नेष्टफलप्रदाः। (नारद. 13, 3-4) - कृष्ण पक्ष में चन्द्रबल की अपेक्षा ताराबल की प्रधानता होती है। क्षीण चन्द्रमा होने पर तारा वैसे ही
बलवान होती है जिस प्रकार पति के परदेश में होने पर पत्नी ही गार्हस्थ्य का सारा दायित्व निभाती है—
न खलु बहुलपक्षे शीतरश्मेः प्रभावः कथितमिह हि तारा वीर्यमार्यैः प्रधानम्। अतिविकल शरीरे प्रेयसि
सूत्र-६६ 353
क्रूरा च कलिका चैव राक्षसी तु तृतीयका।
क्रूराद्या इति वै तिस्रो वर्जयेच्छुभकर्मसु॥ ३८॥
शान्ता मनोहरा चैव विजया पद्मिनी तथा।
वीरा नन्देति षट्तारा नित्यं कल्याणकारिकाः॥ ३९॥
इति ताराधिकाराः।
उक्त ताराओं में पहली क्रूरा, दूसरी कलिका और तीसरी राक्षसी ताराओं को
'क्रूराद्यातिस्र' कहते हैं। इन्हें शुभ कर्मों में कभी नहीं लेना चाहिए, ये वर्जित हैं
परन्तु शान्ता, मनोहरा, विजया, पद्मिनी, वीरा, आनन्दा— ये छह ताराएँ नित्य ही
कल्याण करने वाली होती हैं।
अथाधिनायकमाह —
कर₂ राशि₁₂हतोत्था ये भागैर्हष्टं₈ तथोऽष्टभिः₈।
आधिपत्यं भवेच्छेषं नाम्ना च सदृशं फलम्॥ ४०॥
(अब अधिनायक के विषय में कहा जा रहा है) आधिपत्य ज्ञात करने के लिए
दो और बारह को गुणा कर (2 × 12 = 24), इनका चौंसठ (8 × 8 = 64) में
भाग दें तो जो शेष रहेगा, वह 'अधिपति' कहलाता है। जिस अधिपति का जो नाम
है, तद्नुसार ही उसका फल जानना चाहिए।
अधिपतिनामानि —
विकृत¹ कनकश्चैव धूम्रको विजयः स्वरः।
बिडालविजयौचैव दन्तः कान्तस्तथा मृगः॥ ४१॥
अधिपतियों के नाम हैं— विकृत, कनक, धूम्रक, विजय, स्वर, विडाल,
विजय, दन्त, कान्त और मृग।²
प्रोषिते वा प्रभवति खलु कर्तुं सर्वकार्याणि योषा॥ (ज्योतिषरत्नमाला 11, 5) लल्लाचार्य का भी यही मत
है— न कृष्णपक्षे शशिनः प्रभावो ताराबलं तत्र शुभं प्रदिष्टम्। देशान्तरस्थे विकले च पत्यौ सर्वाणि
कार्याणि करोति नारी॥ अत्रापि तारापतिवीर्यमेव वदन्ति पक्षद्वितयेऽपि केचित्। केचिच्च तासां
बलयुक्तमिन्दोर्बलं सदा देयमिति ब्रुवन्ति॥ (ज्योतिर्निबन्ध में उद्धृत पृष्ठ 49, श्लोक 8-9)
- 'वित्तत्य ?' इति प्रकाशित पाठः।
- यह पाठ त्रुटित जान पड़ता है। ज्ञानप्रकाशदीपार्णव में इसका पाठ मिलता है जो समझने योग्य है।
दीपार्णवकार का कहना है कि बुद्धिमान शिल्पी को गृह के उदय क्षेत्रफल के अङ्क के साथ गुणा करते
जो अङ्क आए उसे 8 से भाग करते जो शेष रहे, उसे अधिपति जाने और जो अधिपति सम हो वह शुभ
है। इनके नाम हैं—1. विकृत, 2. कर्णक, 3. धूम्रद, 4. वितथस्वर, 5. विडाल, 6. दुन्दुभि, 7. दान्त, 8.
कान्त—गेहस्योदयकं क्षेत्रफलने गुणयेद् बुधः। अष्टभिस्तु हरेच्छेषं शुभः सोऽधिपतिः समः॥ विकृतः
विषमआया भवेत्सम, आयहीना व्ययाः शुभाः ।
आधिपत्यं समं शान्तं शुभदं सर्वदा नृणाम् ॥ 42 ॥
इत्याधिपत्यम्।
विषम आय सात हैं और आयहीन व्यय शुभ होते हैं। आधिपत्य सम संख्यक
हो तो व्यक्ति के लिए सदा ही शान्त व शुभ होते हैं।
अथायुष्यत्थाविनाशः —
अष्टभिश्शु₈ हते क्षेत्रे फले षष्टि₆ विभाजिते ।
लब्धे दशगुणे जीवो मृत्युर्वै भूतभाजिते ॥ 43 ॥¹
पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च ।
पञ्च तत्त्वानि प्रोक्तानि विभक्तानि स्युरन्तके ॥ 44 ॥
जो क्षेत्रफल हो उसको 8 से गुणाकर जो फल आए उसे 60 की संख्या से
विभाजित करने पर जो अङ्क आए, उससे 10 को गुणा करें। इस लब्धि तक उस
वास्तु के जीवन-मृत्यु या आयुष्य को जानना चाहिए। साठ की संख्या से भाग करने
पर जो शेष रहे, उसे 5 से भाजित करने पर पञ्चतत्त्वों को
सूत्र-६६ 355
अप्सु चाद्भिर्भवेन्मृत्युस्तेजस्यग्निबलं भवेत्।
वायुर्वायुकरो देहे त्वाकाशे शून्यता भवेत् ॥ ४५ ॥
(पृथ्वी से चलन होने पर विनाश) आप से जल या वृष्टि के कारण विनाश,
तेज से अग्निकाण्ड से विनाश, वायु देह में वायुविकार की भाँति है जबकि आकाश
से शून्यता होती है।
धनधान्येषु नष्टेषु देहः पतति जर्जरः।
इत्थं मृत्युः प्रभवति पञ्चतत्त्वविनाशतः ॥ ४६ ॥
जब धन-धान्य नष्ट हो जाए व देह जर्जर हो जाए और गिर पड़े तो इस प्रकार
की अवस्था को मृत्यु कहते हैं यह पञ्चतत्त्वों के नष्ट होने से होती है (वैसे ही वास्तु
के सन्दर्भ में भी विचार करना चाहिए)।
अन्यदप्याह —
आयव्ययांशनक्षत्रं ताराचन्द्रमैत्र्यादिकम्।
प्रीतिरायुश्च मृत्युश्च चिरं नन्दति चेच्छुभाः ॥ ४७ ॥¹
(इस प्रकार उपर्युक्त) आय, व्यय, अंशक, नक्षत्र, तारा, चन्द्र की मैत्री आदि,
प्रीति, आयु, मृत्यु आदि के लक्षण यदि शुभ हो तो चिरकाल तक आनन्द देते हैं।
तथा च शुभानि —
त्रिभिः श्रेष्ठैस्तु श्रेष्ठं स्यात् पञ्चभिश्चोत्तमोत्तमम्।
सप्तभिः सर्वकल्याणं नवभिर्जयसम्पदा ॥ ४८ ॥
इसमें से तीन के श्रेष्ठ होने पर सब कुछ श्रेष्ठ होता है, पाँच के श्रेष्ठ होने पर उत्तमोत्तम
माना जाता है और यदि नौ ही तत्त्व-निर्देश श्रेष्ठ हो तो जय एवं सम्पदा मिलती है।
वास्तुकर्मे अशुभानि —
न षट्काष्टकं त्रिकोणं द्वादशी द्वितीयाष्टमी।
न चाष्टद्वादशे शशी तारा त्रिपञ्चसप्तमी ॥ ४९ ॥
न द्वितीयांशकं कुर्यात् तथा चाष्टममायकम्।²
- तुलनीय— आयव्ययांशनक्षत्रं ताराचन्द्रमैत्रादिकम्। प्रीतिआयुष्य मृत्युश्च शुभं नन्दति चच्चिरं ॥ (दीपार्णव 1,
- तथा च— आयर्ऋक्ष चन्द्रगण व्ययतारांशक राशयः। राशिमैत्री ग्रहमैत्री नाडीवेधाधिपतिः ॥
लग्नतिथिर्वारोत्पत्ति अधिपति वर्गवैरकं। योनिवैरं ऋक्षवैरं स्थितिर्नाशीक विंशतिः ॥ (तत्रैव 1, 51-52)
- समराङ्गण में आया है— आयो व्ययश्च योनित्वं ताराश्च भवनांशकाः ॥ गृहनामेति चिन्त्यानि करणानि
गृहस्य षट्। त्रिभिः शुभैः शुभं वेश्म द्वाभ्यामेकेन चाशुभम् ॥ करणैश्चतुराद्यैस्तु शुभैरतिशुभं भवेत्। न
समायव्ययं वेश्म नाव्ययं नाधिकव्ययम् ॥ न द्वितीयांशमसहगयोनिभं च न कारयेत्। भर्तुस्तुल्याभिधानं च
356 अपराजितपृच्छा
न पृष्ठतस्तथा चन्द्रं नववास्तुककर्मणि ॥ 50 ॥
नए वास्तुकर्म के प्रसङ्ग में न षडाष्टक, न त्रिकोण, न द्विद्वादशक, न द्विष्मक
योग को लेना चाहिए। इसी प्रकार आठवाँ, बारहवाँ चन्द्रमा भी न लें; न ही तीसरी,
पाँचवीं और सातवीं तारा को ग्रहण करें। न द्वितीय अंशक (यमांश) ले न आठवीं
आय (ध्वांक्ष) में कार्य करे। इसी प्रकार पृष्ठ का चन्द्रमा¹ भी नहीं लेना चाहिए।
नाधिकस्तु व्ययः कार्यों न वैरा ²विषमाग्रहा।
न स्वकुल अतिरिष्टं( ? ) न राशिवर्णबाह्यतः ॥ 51 ॥
इसी प्रकार निर्माण कार्य में क्षेत्र को जानकर आय से अधिक व्यय को न रखें
और न विषम ग्रहों के वैर रखें। न एक ही कुल के अति अरिष्टों को ले और न
राशि को वर्ण के बाहर से लें।
पदे पूज्याः स्थिताः सर्वे हिंसन्ति त्वपदे स्थिताः।
ग्रहा गावस्तथा विप्राः शापानुग्रहकारकाः ॥ 52 ॥
पद पर होने पर सभी पूज्य होते हैं और पदच्युत होने पर सभी उसकी हिंसा-
निन्दा करते हैं। ग्रह, गाय और विप्र सदा ही शाप और अनुग्रह के कारक बनते हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
व्ययांशकताराग्रहजीवमृत्युसर्वबलाधिकारो नाम षट्षष्टितमं सूत्रम् ॥ 66 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में व्यय-
अंशक-तारा-ग्रह-जीव-मृत्यु, सर्वबलाधिकार नामक छासठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 66 ॥
गृहं दूरात् परित्यजेत्॥ समसप्तकमेकर्षं तृतीयैकादशं तथा। चतुर्थदशकं चेति कर्तव्यं मन्दिरं सदा॥
षट्कोष्ठकं त्रिकोणं च वर्ज्यं द्विर्द्वादशं तथा। षट्कोष्ठके मृतिर्देव्यं वियोगश्च भवेद् गृहे॥ त्रिकोणे वसतां
दुःखं वैधव्यं च प्रजायते। द्विर्द्वादशे पुत्रपौत्रगुरुबन्धुधनक्षयः॥ (समराङ्गण. 26, 49-55) इस प्रकार
समराङ्गणसूत्रधार में इन अङ्गों को करण कहा गया है। यह मान्यता वशिष्ठसंहिता के निकट है जिसमें
योनि, तारा, व्यय, गृहांशक, आय व नाम इन छहों को करण नामाभिधान देते हुए गृहस्थ को इन पर
विचार करने को कहा है— त्वं योनित्वं तथा तारा व्ययोऽथ भवनांशकं आयोऽथ गृहनामानि करणानि
षडेष्विहि। गृहस्यैतानि चिन्त्यानि प्रयत्नेन च धीमता... (वशिष्ठसंहिता 39, 75)
- ज्योतिष व अन्य वास्तुग्रन्थों में कहा गया है कि आगे का चन्द्रमा आयु का हरण करता है व पृष्ठचन्द्र
धन का क्षय करता है, चन्द्रमा वाम-दक्षिण का हो तो धन-धान्यकर्ता है। तथापि यदि देवप्रासाद व
राजगृहादि का प्रसङ्ग हो तो आगे का चन्द्रमा दिया जाए अन्यत्र नहीं— अग्रतो हरते आयु पृष्ठतो हरते
धनं। वामदक्षिण तो चन्द्रो धनधान्य करस्मृतः ॥ (क्षीरार्णव 1, 19)
विशेषोञ्च— अग्रतो हरते ह्यायुः पृष्ठतो हरते धनम्। वामदक्षिणयोश्चन्द्रो धनधान्यकरः स्मृतः॥ प्रासादे
राजगृहे च चन्द्रं दद्यात् सदाग्रतः। अन्येषां तु न दातव्यं श्रीमन्तादिगृहेषु च ॥ (दीपार्णव 1, 58-59) - 'विमलाग्रहा?' इति प्रकाशित पाठः।
सूत्र-६७ 357
शास्त्रच्छन्दनिर्णयोनाम सप्तषष्टितमं सूत्रम् ॥ ६७ ॥
अपराजित उवाच -
छन्दश्च क्रमशः प्रोक्तं शाश्वतं शास्त्रकौशलम्।
तदनुक्रमयुक्तीश्च कथयस्व प्रसादतः ॥ १ ॥
अपराजित बोले कि हे प्रभु! कृपा करके शाश्वत शास्त्र कौशल में बताए गए
सभी छन्दों को क्रमवार बताएँ और उनकी अनुक्रम से युक्ति भी कहें।
विश्वकर्मावाच -
एकाक्षरा क्षरे भिन्नं व्याप्तं चैतच्चराचरम्।
त्रैलोक्यस्योत्पत्तिकरं छन्दो मेरुसृष्ट्युद्भवम् ॥ २ ॥
विश्वकर्मा बोले कि एक तो अक्षर और दूसरे क्षर इन भिन्न-भिन्नौं से चराचर
व्याप्त है। इनसे तीनों लोकों की उत्पत्ति करने वाले सभी छन्द मेरुसृष्टि से उद्भूत हैं।
तथा शम्भुश्च-मेरुश्च-चिन्तामणि-वृत्तार्णवः।
चतुर्विधं छन्दशास्त्रमेकाद्याक्षरतः क्रमात् ॥ ३ ॥
अस्तु, एक छन्दशास्त्र से, एकाक्षर से क्रमानुसार चार प्रकार के छन्द उत्पन्न हुए
यथा, १. शम्भु, २. मेरु, ३. चिन्तामणि और ४. वृत्तार्णव।
एकाक्षरोद्भवः शम्भुस्तथामेरुश्च युग्मतः।
चिन्तामणिस्त्रिभिश्चैव वेदैर्वृत्तार्णवः स्मृतः ॥ ४ ॥
एकाक्षर से उत्पन्न मेरु तथा शम्भु का युग्म तथा चिन्तामणि तीन से और
वृत्तार्णव चार अक्षर से बने माने जाते हैं।
छन्दश्चतुर्विधमाह -
छन्दांश्चतुर्विधाः प्रोक्ता वेदान्ताश्चैकतः पृथक्।
गुरुलघूद्भवा मात्रा प्लुतह्रस्वादि सञ्ज्ञकाः ॥ ५ ॥
छन्द भी चार प्रकार के कहे गए हैं। एक से चार तक अलग-अलग इनकी
गुरु [ ऽ ] और लघु मात्रा [ । ] को प्लुत और ह्रस्व संज्ञा दी गई है।
सानुस्वारा विसर्गान्ता वेदान्तोद्भवकल्पना।
भिन्नाभिन्नास्तथानेके भेदाश्छन्दसमुद्भवाः ॥ ६ ॥
अनुस्वार से विसर्गान्त तक चार प्रकार की उत्पत्ति की कल्पना की गई है।
इनको भिन्न-भिन्न स्थान पर रखते जाने से कई भेदों की उत्पत्ति होती है।
358 अपराजितपृच्छा
एकाक्षरो द्रुतमात्रो भेदः सूर्यः स उच्यते ।
निबन्धपादाः पङ्क्तौ च वेदसंख्याः प्रकीर्तिताः ॥ ७ ॥
कलिकादिकवृत्तानां त्र्यष्टकं प्रोच्यते तथा ।
एकाक्षर और द्रुत मात्रा होने से उसे 'सूर्य' भेद (बारह) कहते हैं। निबन्ध
पादपङ्क्तियों (दस) को 'वेदसंख्या' भेद (चार) तथा कलिकादिक वृत्तों को
'त्र्यष्टक' भेद (तियासी) कहते हैं।
तेषां अभिधानपङ्क्तिमाह —
तदभिधानपङ्क्तिं च कथयिष्याम्यनुक्रमात् ॥ ८ ॥
अब मैं इनकी अभिधानपङ्क्ति को भी अनुक्रम से कहता हूँ।
कलिकाविकास्यवज्राः कुमारललितानुष्टुप् ।
अक्षमश्चैव प्रणम्योपेन्द्रवज्राजलानि च ॥ ९ ॥
करणराज्यं वसन्ततिलका चैव मालिनी ।
तिलगर्जतं चाद्भुता तथा च गिरिकर्णिका ।
शार्दूलविक्रीडितं च तथा चैवातिवृत्तकम् ॥ १० ॥
स्रग्धरा मदना मदनलता च मधुकरा ।
कलिका विकास्य, वज्रा, कुमारललिता, अनुष्टुप, अक्षम और प्रणम्य,
उपेन्द्रवज्रा, जलवृत्त और करणराज्य, वसन्ततिलका, मालिनी और तिलगर्जत
अद्भुता, गिरिकर्णिका, शार्दूलविक्रीडित, अतिवृत्तक, स्रग्धरा औरं मदना तथा
मदनलता मधुकरा।
अथ निबन्धमाह —
निबन्धश्चाथ गोविन्दः प्रोक्ता मुक्ताफला तथा ॥ ११ ॥
शुद्धसमो विषमश्च विषमसमकस्तथा ।
समस्तुल्यपदैः ख्यातो विषमो विषमैः पदैः ॥ १२ ॥
विषमाक्षरगस्त्वेवं समवर्णगतस्तथा ।
विषमसमसञ्ज्ञश्च दशभेदाः ₁₀ क्रमोदिताः ॥ १३ ॥
इसके अतिरिक्त निबन्ध, गोविन्द, मुक्ताफल, शुद्धसम, विषम, विषमासम व
समतुल्यपद के कारण और विषम-विषम पदों के कारण ख्यात हैं विषमाक्षरों में
गए हुए भी ऐसे ही है, समवर्णगत की तरह विषमसम संज्ञा वाले— ऐसे दस भेद
क्रमोदित हैं।
सूत्र-६७ ३५९
अथ गुणाः —
शान्तिः कर्णश्च सम्पातः सिंहो बाणश्च पल्लवः ।
कर्णकारः शुक्रः शङ्कुस्तथाधर्मो गुणा दश ॥ 14 ॥
शान्ति, कर्ण, सम्पात, सिंह, बाण, पल्लव, कर्णकार, शुक्र, शङ्कु और धर्म— ये
दस गुण कहे गए हैं।
जयमाला तथा नन्दा मेघा च सिंहगर्जना ।
तथा कल्लोलतरङ्गा रत्नावली पुष्पोद्गिरा ॥ 15 ॥
पत्रोद्गवा अत्युद्गुता अतिच्छन्दा दशोदिताः ।
एते दशाभिधानाश्च विषमा वाद्यकन्दतः ? ॥ 16 ॥
जयमाला, नन्दा, मेघा, सिंहगर्जना, कल्लोलतरङ्गा, रत्नावली, पुष्पोद्गिरा,
पत्रोद्गवा, अत्युद्गुता और अतिच्छन्दा— ये दश, इतने दशाभिधान है।
अथार्याच्छन्दोद्भूत छन्दं —
शान्ताद्भुता मुख्या सौम्या रम्या च रमणी पुरा ।
मुखोद्गीर्णा चपलाख्या भैरवी भुवनोत्तमा ॥ 17 ॥
शृङ्गारी हास्यकरणी तिलकारा पद्मोद्भवा ।
विकारास्या प्रज्ञावती प्रबला वीरसम्भवा ॥ 18 ॥
प्रकारणाक्षसम्भूर्तिर्विकास्याथ प्रभामला ।
चतुर्विंशतिरार्याणां छन्दसां च समुद्भवाः ॥ 19 ॥
(पूर्व श्लोकानुसार) विषमा, शान्ता, अद्भुता, मुख्या, सौम्या, रम्या, रमणी, पुरा,
मुखोद्गीरा, चपला, भैरवी, भुवनोत्तमा, शृङ्गारी, हास्यकरणी, तिलकारा, पद्मोद्भवा,
विकारास्या, प्रज्ञावती, प्रबला, वीरसम्भवा, प्रकारण, अक्षसम्भूर्ति, विकास्या और
प्रभामला— ये चौबीस आर्या छन्दों से सम्भूत है।
प्रकरणादीनां —
प्रकरणसूत्रसन्धिपरिच्छेदाध्यायास्तथा ।
अङ्ककाण्डसर्गखण्डवर्गाद्या ग्रन्थसम्भवाः ॥ 20 ॥
(ग्रन्थ रचना में विषय-वस्तु के विभाजन के लिए) प्रकरण, सूत्र, सन्धि,
परिच्छेद, अध्याय, अङ्क, काण्ड, सर्ग, खण्ड, वर्ग (विरचन, उल्लास) आदि से ग्रन्थ
रचना सम्भव होती है।
.
Wait, in line 5: it curves to the left, which is ु (u). So स्वयंभुक्त,.
Wait, let's check मनुमन्दिरः ? ।:
There is clearly a question mark ? before the danda ।.
Yes, मनुमन्दिरः ? ।
प्रभामणिश्च ह्लादश्च ह्यङ्गाष्टकमुदाहृतम् ॥ २१ ॥- Wait,
ह्लादश्चorह्रादश्च?
Look atह्लाद: the conjunct isहwithलattached below.
In Devanagari,ह्लhasलbelowह.ह्रhas a diagonal slash.
Here it clearly has theलshape belowह! So it isह्लादश्च.
Andह्यङ्गाष्टकमुदाहृतम् ॥ २१ ॥.
- Wait,
स्वयंभुक्त, तलकीर्ण, शान्त, मनु, मन्दिर, प्रभा, मणि, ह्लाद— इनको अङ्गाष्टककहा गया है।क्षराक्षरपदादीनां —- Wait, is it
क्षराक्षरपदादीनां —?
- Wait, is it