अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६६ 347
आयाश्च कथिताः पूर्वं व्ययानां लक्षणं शृणु।
एकैका यस्य संस्थाने व्ययाश्च त्रिविधाः स्मृताः ॥ २ ॥
आयों के बारे में तो पहले कहा जा चुका है। अब तुम इन व्यय के लक्षणों के बारे में
सुनो। एक-एक व्यय अपने संस्थान में तीन (पिशाच, राक्षस व यक्ष) प्रकार की होती है।
समो व्ययः पिशाचश्च राक्षसस्तु व्ययोऽधिकः।
व्ययो न्यूनो यक्षश्चैव धनधान्यकरः स्मृतः ॥ ३ ॥
पिशाचों का व्यय समान होता है; राक्षसों का व्यय अधिक होता है और यक्षों
का व्यय न्यून होता है। इसलिए इनका व्यय धन-धान्यकर कहलाता है।
अनायव्यये कर्तरि आयहीने व्यये तथा।
व्ययाधिक विनश्यन्ति अचिरेणै सर्वदा ॥ ४ ॥
अनाय से व्यय छुरी या कैंची (कर्तरीदोष) का काम करता है। आय हीन से
भी व्यय होता है और व्यय अधिक होने पर तो शीघ्र और सदा-सर्वदा के लिए
विनाश हो जाता है।
ध्वजादिष्वष्टस्वायेषु अष्टौ शान्तादिका व्ययाः।
प्रत्येकव्ययसंस्थाने आयो न्यूनेत्तरः स्मृतः ॥ ५ ॥
ध्वजादि आठों आयों में आठों ही शान्तिकादिक व्यय हैं। अस्तु, प्रत्येक व्यय
के संस्थानों में आय बहुत ही कम होती है।
व्ययनामानि -
शान्तः पौरः प्रद्योतश्च श्रियानन्दो मनोहरः।
श्रीवत्सो विभवश्चैव चिन्तात्मा च व्ययाः स्मृताः ॥ ६ ॥
- शान्त, 2. पौर, 3. प्रद्योत, 4. श्रियानन्द, 5. मनोहर, 6. श्रीवत्स, 7. विभव
और 8. चिन्तात्मा— ये आठ व्यय कही गई हैं।
प्रशस्ताप्रशस्त व्ययमाह —
आयस्थाने व्ययो योज्यो ह्यप्रशस्तो व्ययोऽधिकः।
व्ययो न्यूनस्तथा श्रेष्ठो धनधान्यकरः स्मृतः ॥ ७ ॥
आय स्थान में व्यय को लगाना अप्रशस्त अर्थात् ठीक नहीं है, क्योंकि व्यय
अधिक है। व्यय तो न्यून ही श्रेष्ठ होता है जो धन-धान्यकारक माना जाता है।
स्मृतो ध्वजे शुभः शान्तः नित्यं कल्याणकारकः।
भोज्यं पूजाफलं शान्तिर्नृत्यं गीतं सुरालये ॥ ८ ॥