अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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आने देना चाहिए, इसे वर्जनीय कहा है। इसी तरह सम आय-व्यय भी पिशाचों की
होती है। अस्तु, इसे भी शुभकर्मों में त्यागना समुचित है।
अथांशाकाधिकारः —
शृणु वत्स यथा चांशो वास्तुवेदे त्रिधा स्मृतः।
एकैकक्रमयोगो वै शुभश्चाशुभ उच्यते ॥ 21 ॥
हे वत्स सुनो ! अंश भी वास्तु वेद में तीन प्रकार के होते है। ये सभी क्रम योग
से एक-एक शुभ और अशुभ कहलाते हैं।
यदुक्त मूलराशो च आयातर्थेषु फलं कृतम्।
तत्र राशौ व्यये मिश्रे गृहनामाक्षराणि च ॥ 22 ॥
गुणैर्भक्ते व्यये शेषं अंशकं त्रिविधं विदुः।
इन्द्रौ यमश्च राजा च त्रिभिर्नामभिरंशकाः ॥ 23 ॥¹
जैसे कहा गया है कि मूल राशियाँ आयों के लिए फल निकालने में काम में
ली जाती है, वहाँ राशियों के साथ व्ययों को मिलाने से गृहों के नामाक्षरों से गुणा
करके व्यय का भाग दें, जो शेष बचे उनके 'अंशक' तीन प्रकार से जाने। ये
क्रमशः 1. इन्द्र, 2. यम और 3. राजा— तीनों अंशों के ये तीन नाम हैं।
प्रासाद-प्रतिमा-लिङ्गे-जगतीपीठ-मण्डपे।
वेदी-कुण्डश्रुक्षु चैव इन्द्रश्चैव ध्वजादिषु ॥ 24 ॥
क्षेत्रपाल² नागेन्द्रे गणाध्यक्षे च भैरवे।
ग्रहमातृगणे देव्यामादित्ये च यमांशकः ॥ 25 ॥
प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, जगतीपीठ, मण्डप, वेदी-कुण्ड, श्रुवा के निर्माणादि में
इन्द्र व्यय ध्वजादि आय के साथ दें। क्षेत्रपाल, नागेन्द्र या गजराज, गणाध्यक्ष, भैरव,
ग्रह-मातृगण, देवियों, आदित्य में यमांशक व्यय देते हैं।
पुर-प्राकार-नगर-खेट-कूटे च कर्वटे।
हर्म्ये च राजवेश्मादौ शस्तो राजा तथा मतः ॥ 26 ॥
इसी प्रकार पुर, प्राकार-परकोटा, नगर, खेट-खेड़ा, कूट, कर्वट, हर्म्य,
राजवेश्म आदि में राजा अंशक देना प्रशस्त मत है।
- तुलनीय— व्ययं क्षेत्रफले क्षिप्त्वा गृहनामाक्षराणि च॥ भागं त्रिभिर्हरेत् तत्र यच्छेषु सोंऽशको भवेत्।
चतुरस्रो यथा मन्त्रो मुख्यो लग्ने नवांशकः॥ तथा गृहादिषु प्रोक्तं मुख्यत्वेनांशकत्रयम्। इन्द्रो यमश्च राजा च
त्रयो नामाभिरंशकाः॥ स्वनामतुल्यफलदा विज्ञातव्यास्त्रयोऽपि च। (समराङ्गण. 26, 37-39) - 'क्षेत्राद्विसंक्षा ?' इति प्रकाशित पाठः।