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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 535 में से

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पृष्ठ 396

सूत्र-६६ 351
स्वर्गादिभोगयुक्तानां नृत्यगीतमहोत्सवे ।
प्रजावने च पाण्डित्ये इन्द्रांशश्चोत्तमो मतः ॥ 27 ॥
स्वर्गादि भोगों से युक्त प्रतीति देने वाले नृत्य-गीत महोत्सवों में, प्रजावनों,
पाण्डित्य दर्शक कार्यों के मंत्रों में भी इन्द्रांशक को ही प्रशस्त माना गया है।
विविधं च वणिक्कर्म मद्यमांसादिकं तथा ।
इत्युक्तं क्रमतश्श्रेत्यं प्रशस्तं च यमांशके ॥ 28 ॥
इसी प्रकार विविध प्रकार के वणिक् कर्मों में, मद्य-मांसादिकों में यमांशक को
ही प्रशस्त कहा गया है।
गजाश्वरथक्रीडायां यानजम्भानकादिके ।
स्वर्गादितुल्यभोगाश्च राजांशक उदाहृताः ॥ 29 ॥
गज, अश्व, रथ, क्रीड़ा में, यान, जम्भानादिक (पालकी आदि) एवं स्वर्ग के
समान भोगों में राजांशक को प्रशस्त कहा गया है।
त्र्यक्षराणि त्रिभेदाश्च त्रिदेवास्त्रिहुताशनाः ।
त्रयः कालास्त्रिसन्ध्याश्च रजः सत्वतमस्त्रयम् ॥ 30 ॥
तीन ही अक्षर (ओ, ऊ, म्), तीन भेद (स्वजातीय, स्वगत, विजातीय), तीन
देव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश), तीन अग्नि (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि), तीन
काल (भूत, भविष्य, वर्तमान), तीन सन्धियाँ (स्वर, व्यञ्जन, विसर्ग या प्रातः
अपराह्न, सायंकाल) और (गुण भी) रज, सत्व और तम तीन हैं।
प्रमाणत्रयमेवं च ज्येष्ठमध्याधमैः क्रमात्।
त्र्यंशकं तु समानीय वास्तुवेदभवं ततः ॥ 31 ॥
इत्यंशकाधिकारः।
इस प्रकार के प्रमाणत्रय— ज्येष्ठ, मध्यम और अधम के क्रम से अंशकों को
भी लाकर वास्तुवेद बनता है।
अथ ताराधिकारः —
गणयेत्स्वामिनक्षत्राद्यावदृक्षं गृहस्य च ।
नवभिस्तु हरेद्भागं शेषास्ताराः प्रकीर्तिताः ॥ 32 ॥
स्वामी के नाम-नक्षत्र से लेकर गृह के नक्षत्र तक गणना करें और उसमें 9 का
भाग दें तो जो शेष रहे उसे 'तारा' कहा जाता है।
तारानामानि सफलं —
शान्ता मनोहरा क्रूरा विजया कलिका तथा।