अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें356 अपराजितपृच्छा
न पृष्ठतस्तथा चन्द्रं नववास्तुककर्मणि ॥ 50 ॥
नए वास्तुकर्म के प्रसङ्ग में न षडाष्टक, न त्रिकोण, न द्विद्वादशक, न द्विष्मक
योग को लेना चाहिए। इसी प्रकार आठवाँ, बारहवाँ चन्द्रमा भी न लें; न ही तीसरी,
पाँचवीं और सातवीं तारा को ग्रहण करें। न द्वितीय अंशक (यमांश) ले न आठवीं
आय (ध्वांक्ष) में कार्य करे। इसी प्रकार पृष्ठ का चन्द्रमा¹ भी नहीं लेना चाहिए।
नाधिकस्तु व्ययः कार्यों न वैरा ²विषमाग्रहा।
न स्वकुल अतिरिष्टं( ? ) न राशिवर्णबाह्यतः ॥ 51 ॥
इसी प्रकार निर्माण कार्य में क्षेत्र को जानकर आय से अधिक व्यय को न रखें
और न विषम ग्रहों के वैर रखें। न एक ही कुल के अति अरिष्टों को ले और न
राशि को वर्ण के बाहर से लें।
पदे पूज्याः स्थिताः सर्वे हिंसन्ति त्वपदे स्थिताः।
ग्रहा गावस्तथा विप्राः शापानुग्रहकारकाः ॥ 52 ॥
पद पर होने पर सभी पूज्य होते हैं और पदच्युत होने पर सभी उसकी हिंसा-
निन्दा करते हैं। ग्रह, गाय और विप्र सदा ही शाप और अनुग्रह के कारक बनते हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
व्ययांशकताराग्रहजीवमृत्युसर्वबलाधिकारो नाम षट्षष्टितमं सूत्रम् ॥ 66 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में व्यय-
अंशक-तारा-ग्रह-जीव-मृत्यु, सर्वबलाधिकार नामक छासठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 66 ॥
गृहं दूरात् परित्यजेत्॥ समसप्तकमेकर्षं तृतीयैकादशं तथा। चतुर्थदशकं चेति कर्तव्यं मन्दिरं सदा॥
षट्कोष्ठकं त्रिकोणं च वर्ज्यं द्विर्द्वादशं तथा। षट्कोष्ठके मृतिर्देव्यं वियोगश्च भवेद् गृहे॥ त्रिकोणे वसतां
दुःखं वैधव्यं च प्रजायते। द्विर्द्वादशे पुत्रपौत्रगुरुबन्धुधनक्षयः॥ (समराङ्गण. 26, 49-55) इस प्रकार
समराङ्गणसूत्रधार में इन अङ्गों को करण कहा गया है। यह मान्यता वशिष्ठसंहिता के निकट है जिसमें
योनि, तारा, व्यय, गृहांशक, आय व नाम इन छहों को करण नामाभिधान देते हुए गृहस्थ को इन पर
विचार करने को कहा है— त्वं योनित्वं तथा तारा व्ययोऽथ भवनांशकं आयोऽथ गृहनामानि करणानि
षडेष्विहि। गृहस्यैतानि चिन्त्यानि प्रयत्नेन च धीमता... (वशिष्ठसंहिता 39, 75)
- ज्योतिष व अन्य वास्तुग्रन्थों में कहा गया है कि आगे का चन्द्रमा आयु का हरण करता है व पृष्ठचन्द्र
धन का क्षय करता है, चन्द्रमा वाम-दक्षिण का हो तो धन-धान्यकर्ता है। तथापि यदि देवप्रासाद व
राजगृहादि का प्रसङ्ग हो तो आगे का चन्द्रमा दिया जाए अन्यत्र नहीं— अग्रतो हरते आयु पृष्ठतो हरते
धनं। वामदक्षिण तो चन्द्रो धनधान्य करस्मृतः ॥ (क्षीरार्णव 1, 19)
विशेषोञ्च— अग्रतो हरते ह्यायुः पृष्ठतो हरते धनम्। वामदक्षिणयोश्चन्द्रो धनधान्यकरः स्मृतः॥ प्रासादे
राजगृहे च चन्द्रं दद्यात् सदाग्रतः। अन्येषां तु न दातव्यं श्रीमन्तादिगृहेषु च ॥ (दीपार्णव 1, 58-59) - 'विमलाग्रहा?' इति प्रकाशित पाठः।