अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
[ ४२ ]
प्रसह्य संकल्पपरम्पराणामुच्छेदने संततसावधानाम् ।
आलम्बभावादपचीयमाना शनैः शनैः शान्तिमुपैतिदृष्टिः ॥ ६८ ॥
संकल्प-परम्पराओं के बलात् उच्छेद में (विनाश करने में) सदा साव-
धान दृष्टि आलम्बन के अभाव से नष्ट (क्षीण) होती हुई धीरे-धीरे शान्त हो
जाती है ॥ ६८ ॥
यथा यथा सदाभ्यासान्मनसः स्थिरता भवेत् ।
वायुवाक्कायदृष्टीनां स्थिरता च तथा तथा ॥ ६६ ॥
सदा के अभ्यास से जैसे जैसे मन में स्थिरता आती है वैसे वैसे वायु,
वाणी और शरीर में स्थिरता आ जाती है ॥ ६६ ॥
दृश्यं पश्यति (!) येन सत्प्रियकरं श्राव्यं तथा शृण्वतः
घ्रातव्यं परिजिघ्रतोऽथवदतो ध्येयं सदा ध्यायतः ।
स्पर्शं च स्पृशतो निरन्धनशिखा प्रख्यं मनोऽत्र क्रमाद्
अद्वैताख्यपदस्य तत्त्वपदवीं प्राप्तस्य सद्योगिनः ॥ ७० ॥
सुन्दर दृश्य को देख रहे, मनोहारी श्रव्य को सुन रहे, सूंघने योग्य सुन्दर
पदार्थों को सूंघ रहे, वक्तव्य वचनों को बोल रहे, ध्येय तत्त्व का हृदय में ध्यान
कर रहे, स्पृश्य वस्तु का स्पर्श कर रहे, अद्वैत पद के तत्त्व को प्राप्त हुए सद्योगी
का मन क्रम से निरन्धन अग्निशिखा के तुल्य शान्त हो जाता है ॥ ७० ॥
यदा यत्र यथा यत्र स्थिरं भवति मानसम् ।
तदा तत्र तथा तस्माद् न तु चाल्यं कदाचन ॥ ७१ ॥
अतः जब जहाँ पर जिस प्रकार मन स्थिर हो तब वहाँ उसी प्रकार उसको
रहने देना चाहिये । वहाँ से उसे कदापि नहीं हटाना चाहिये ॥ ७१ ॥
यत्र यत्र मनो याति न निवार्यं ततस्ततः ।
अवारितं क्षयं याति वार्यमाणं तु वर्द्धते ॥ ७२ ॥
जहाँ जहाँ मन जाय वहाँ वहाँ से उसे निवृत्त करना (हटाना) नहीं
चाहिये । अवारित मन (न हटाया गया, न रोका गया मन) क्षय को प्राप्त
हो जाता है । यदि उसे रोका जाय तो वह बढ़ता है ।: ७२ ॥
[ ४३ ]
यथा निरंकुशो हस्ती कामान् प्राप्य निवर्तते ।
अवारितं मनस्तद्वत् स्वयमेव विलीयते ॥ ७३ ॥
जैसे निरंकुश हाथी अपने अभिलषित पदार्थों को प्राप्त कर लौट जाता है
वैसे ही अवारित ( न रोका गया ) मन भी अपनी इच्छा पूरी कर अपने आप
शान्त हो जाता है ॥ ७३ ॥
निवार्य्यमाणं यत्नेन तत्कर्तुं नैव शक्यते ।
न तिष्ठति क्षणेनैव मारुतस्य वशोदयात् ॥ ७४ ॥
मन प्रयत्नपूर्वक निवारित करने पर भी निवारित नहीं किया जाता है ।
वह ( मन ) वायु के वशीभूत रहने के कारण एक क्षण के लिये भी स्थिर
नहीं रहता ॥ ७४ ॥१
दुर्निवार्यं मनस्तद्वद्यावत्तत्त्वं न विन्दति ।
विदिते तु परे तत्त्वे मनो नौस्तम्भकाकवत् ॥ ७५ ॥
वैसे ही जब तक तत्त्व प्राप्त नहीं होता तब तक इधर उधर भागता हुआ
मन दुर्निवार्य है । पर-तत्त्व जब प्राप्त हो जाता है तब मन समुद्र में जहाज के
( स्तम्भ ) मस्तूल पर बैठे हुए कौए की तरह स्थिर हो जाता है ॥ ७५ ॥
यथा तुलां तुलाधारश्चंचलां कुरुते स्थिराम् ।
याने सौख्ये सदाभ्यासान्मनोवृत्तिस्तदात्मनि ॥ ७६ ॥
जैसे तराजू से तोलनेवाला बनिया चंचल तराजू को स्थिर कर देता है
उसी प्रकार सदा के अभ्यास से यान में तथा सुख में मनोवृत्ति सदा आत्मा में
स्थिर रहती है ॥ ७६ ॥
निष्पन्नाखिलभावशून्यनिस्तृजः ( मनसः ? ) स्वान्तःस्थितस्तत्क्षणा त्
निश्चेष्टश्लथपाणिपादकरणग्रामो विकारोज्झितः ।
१. चञ्चलं हि मनःकृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ( श्री० गीता ६/३४ )
[ ४४ ]
निर्मूलप्रविनष्टमारुततया निर्जीवकाष्ठोपमो
निर्वातस्थितदीपवत् १ सहजवान् यस्याः स्थितेर्लक्ष्यते २ ॥ ७७ ॥
जिस पुरुष का मन सब प्रकार के भावों से विहीन हो चुका उसकी तुरन्त
आत्मनिष्ठा हो जाती है । जिसमें निष्ठा होने पर सहजवान् पुरुष के हाथ,
पैर आदि इन्द्रिय-समूह निश्चेष्ट और शिथिल हो जाते हैं, विकार हट जाते
हैं, वायु के निर्मूल ( उखाड़ा हुआ ) अतएव विनष्ट होने के कारण वह
निर्जीव काठ के तुल्य तथा निर्वात स्थान पर स्थित दीपक की तरह निश्चल
दिखाई देता है ॥ ७७ ॥
निक्षिप्तं कनकं विहाय कलुषं यद्वद् भवेन्निर्मलं
निर्वातस्थितनिस्तरंगमुदकं स्वच्छस्वभावं परम् ।
तद्वत् सर्वमिदं विहाय सकलं देदीप्यते निष्कलं
तत्त्वं तत्सहजं स्वभावममलं जातेऽमनस्के ध्रुवम् ॥ ७८ ॥
अग्नि में डाला हुआ सोना जैसे कालिमा का त्याग कर निर्मल हो जाता
है एवं जैसे निर्वात ( वायु रहित ) स्थान पर जल तरंगरहित तथा स्वच्छ
स्वभाव रहता है वैसे ही अमनस्क हो जाने पर सकल ( कला-सहित ) तत्त्व
निश्चय ही इस प्रपंच का त्याग कर निर्मल, निष्कल सहज स्वभाव हो
जाता है ॥ ७८ ॥
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बन्धाय विषयासंगि मुक्तये निर्विषयं मनः ॥ ७६ ॥
मन ही मनुष्यों के बन्ध और मोक्ष का हेतु है । विषयों में आसक्त मन
बन्धन के लिए और निर्विषय मन मुक्ति के लिए कारण होता है ३ ॥ ७६ ॥
१. गीता ६।१६ देखिये ।
२. स्थितिलक्ष्यते ।
३. आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ गीता ० ६ । ५ ॥
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्तिर्निर्विषयं स्मृतम् ॥ ( पंचदशी )
[ ४५ ]
मनोदृश्यमिदं सर्वं यत् किंचित्सचराचरम् ।
मनसोऽप्युन्मनीभावेऽद्वैतभावः प्रकल्पते ॥ ८० ॥
जो कुछ चराचर जगत् है यह सब मन से दृश्य है । मन का उन्मनी भाव
( अर्थात् विलय ) होने पर अद्वैतभाव हो जाता है ॥ ८० ॥
जायमानामनस्कस्य ह्युदासीनस्य तिष्ठतः ( सर्वतः ? ) ।
मृदुत्वं च परत्वं ( लघुत्वं ? ) च शरीरस्याथ जायते ॥ ८१ ॥
अमनस्कता जिसमें उत्पन्न हो रही है और जो चारों ओर से सर्वं विषयों
में उदासीन रहता है और जो स्थितिशील हो गया है ऐसे योगी का शरीर
कोमल और श्रेष्ठ हो जाता है ॥ ८१ ॥
अमनस्के क्षणात्क्षीणां कामक्रोधादिवन्धनम् ।
नश्यतिष्करणस्तम्भं देहगेहं श्लथं भवेत् १ ॥ ८२ ॥
अमनस्क भाव का उदय होने पर क्षणभर में काम क्रोधादि बन्धन क्षीण
हो जाते हैं, इन्द्रिय-स्तम्भ ( इन्द्रियसमूह ) नष्ट हो जाते हैं, देहरूपी घर
शिथिल हो जाता है ॥ ८२ ॥
सहजेनामनस्केन मनःशल्ये नियोजिते ।
आतपत्रमिवास्तम्भं शरीरं शिथिलायते ॥ ८३ ॥
सहज अमनस्क के द्वारा मनरूपी कांटे को निकाल फेंकने पर शरीर बिना
डंडे के छाते के सदृश शिथिल पड़ जाता है ॥ ८३ ॥
अमनस्कखनित्रेण समूलोन्मूलने कृते २ ।
अन्तःकरणशल्ये तु सुखी संजायते मुनिः ॥ ८४ ॥
अमनस्क रूपी कुदारी से अन्तःकरण ( मन ) रूपी शल्य ( कांटे ) के
समूल ( जड़ सहित ) उन्मूलित होने ( उखाड़ फेकने ) पर तो मुनि ( योगी )
सुखी हो जाता है ॥ ८४ ॥
१. भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्व संशयाः ।
क्षीयन्ते चास्यकर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ ( श्रुति )
इस श्लोक का अंतिम चरण श्रीमद्भागवत ( ११.२०. ३० ) में इस
प्रकार है—"मयि दृष्टेऽखिलात्मनि ।"
२. समूलोन्मूलिते सति ( कृते ) ।
[ ४६ ]
कदलीव महामाया समनस्केन्द्रिये सदा ।
अमनस्क फलं दत्त्वा सर्वथैव विनश्यति ॥ ८५ ॥
कदली (केले के पेड़) के सदृश महामाया समनस्केन्द्रिय पुरुष को एक
बार अमनस्करूप फल प्रदान कर सर्वदा के लिए विनष्ट हो जाती है ॥८५॥
इन्द्रियग्राहपदयोः निश्वासोच्छ्वासपक्षयोः ।
संक्षीणयोर्मनः पक्षी स्थिरसत्त्वोऽवसीदति ॥ ८६ ॥
मनरूपी पक्षी, जिसके निःश्वास और उच्छ्वास रूप दो पंख हैं, जो
इन्द्रिय तथा विषयालम्बन से युक्त है, के सम्यक् रूप से क्षीण होने पर उसकी
सत्ता स्थिर हो जाती है और नाश को प्राप्त हो जाता है१। ॥ ८६ ॥
श्वाससूत्रशतोपेतमिन्द्रियालय संकुलम् ।
त्रोटयित्वा मनोजालं मीनवज्जायते सुखी ॥ ८७ ॥
जैसे मत्स्य शत सूत्रों से बने हुए और बहुत छिद्र सम्पन्न जाल को तोड़ने
पर निश्चिंत हो जाता है उसी प्रकार योगी श्वास-प्रश्वास से युक्त और इन्द्रियों
से प्रभावित मन का नाश कर सुखी हो जाता है ॥ ८७ ॥
प्रशान्तेन्द्रियपादातो बुद्धिशक्तिसमन्वितः ।
वायुयानयुतश्छित्वा मनः शत्रुं सुखी भवेत्२॥ ८८ ॥
अत्यन्त शान्त इन्द्रियां ही जिसकी पैदल सेना हैं, बुद्धि ही जिसके पास
शक्ति (शक्ति नामक शस्त्र) है एवं वायु ही जिसकी सवारी है ऐसा योगी
मनरूपी शत्रु को नष्ट कर सुखी हो ॥ ८८ ॥
गुणत्रयमयीं रज्जुं सुदृढामात्मबन्धनीम् ।
अमनस्कक्षुरेणैव च्छित्त्वा मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ८६ ॥
योगी सत्त्व, रज और तम रूपी तीन गुणों की बनी (माया) जो आत्मा
को बांधनेवाली मजबूत रस्सी है, को अमनस्क योग रूपी छुरे से ही काटकर
मोक्ष को प्राप्त हो ॥ ८६ ॥
१. अर्थात् श्वास के नष्ट होने पर मन का नाश हो जाता है ।
२. “प्रशान्तेन्द्रियपादातं बुद्धिशक्तिसमन्वितम् ।
वायुयानयुतं छित्वा मनः शत्रुं सुखी भवेत् ॥”
यह पाठ उपयुक्त प्रतीत होता है ।
[ ४७ ]
यथा संह्रियते सर्वमस्तं गच्छति भास्करे ।
कर जालं तथा सर्वममनस्के विलीयते ॥ ६० ॥
जैसे सूर्य के अस्त होने पर किरणजाल संहृत (छिन्न-भिन्न) हो जाते हैं
वैसे ही योगी के अमनस्क होने पर सब (विश्व) लीन हो जाता है ॥ ६० ॥
इन्द्रियग्राहनिर्मुक्ते निर्वाते निर्मलाम्ते ।
अमनस्कह्रदे स्नातः परामृतमुपाश्नुते ॥ ६१ ॥
जिस प्रकार मगर आदि जल जन्तुओं से मुक्त, वायुशून्य निर्मल जलवाले
सरोवर में स्नान करने पर तृप्ति-लाभ होता है उसी प्रकार इन्द्रियों के प्रभाव
से मुक्त तथा प्राण, अपान आदि क्रिया से शून्य अमनस्क अवस्था में अवगाहन
करने पर परा शान्ति (परमसुख) प्राप्त होती है ॥ ६१ ॥
इत्युक्तमेतत् सहजामनस्कं,
शिष्यप्रबोधाय शिवेन साक्षात् ।
नित्यं हि नूनं विगतप्रपंचं,
वाचामवाच्यं स्वयमेव बोध्यम् ॥ ६२ ॥
साक्षात् भगवान् शिव जी ने शिष्यों के प्रबोध (ज्ञान) के लिए यह सहज
अमनस्क योग इस प्रकार कहा । यह नित्य नूतन निष्कल, निष्प्रपंच, वाणी
द्वारा कथनीय नहीं है । इसे स्वयं ही जानना चाहिये अर्थात् यह स्वानुभवैक-
वेद्य है ॥ ६२ ॥
चित्ते चलति संसारोऽचले मोक्षः प्रजायते ।
तस्माच्चित्तं स्थिरीकुर्यादौदासीन्यपरायणः ॥ ६३ ॥१
चित्त के चंचल होने पर संसार का भान होता है और निश्चल होने पर
मोक्ष का उदय होता है । अतएव उदासीन (निष्क्रिय) होकर चित्त को स्थिर
करना चाहिये ॥ ६३ ॥
चतुविधा मनोवस्था विज्ञातव्या मनीषिभिः ।
विश्लिष्टं च गतायातं सुश्लिष्टं च सुलीनकम् ॥ ६४ ॥
विद्वान् पुरुषों को मनोवस्था चार प्रकार की जाननी चाहिये--१ विश्लिष्टा-
वस्था, २ गतागतावस्था, ३ सुश्लिष्टावस्था और ४ सुलीनावस्था ॥ ६४ ॥
१. चित्तमेव हि संसार । (मैत्रेयी उपनिषद्)
[ ४८ ]
विश्लिष्टं तामसं प्रोक्तं राजसं च गतागतम् ।
सुश्लिष्टं सात्त्विकं प्रोक्तं सुलीनं गुणवर्जितम् ॥ ६५ ॥
विश्लिष्टावस्था तामस कही गई है, गतागतावस्था राजस, सुश्लिष्टा-
वस्था सात्त्विक और सुलीनावस्था निर्गुण कही गई है ॥ ६५ ॥
विश्लिष्टं च गतायातं विकल्पविषयग्रहम् ।
सुश्लिष्टं च सुलीनं च विकल्प विषनाशनम् ॥ ६६ ॥
विश्लिष्ट और गतागत अवस्था में विकल्प और विषयों का ग्रहण होता
है। सुश्लिष्ट और सुलीन अवस्था में विकल्प रूपी विष का नाश हो
जाता है ॥ ६६ ॥
ततोऽभ्यासनियोगेन निरालम्बो भवेद् यदि ।
तदा सरिसभूतानि (सहजभूतात्मा ?) परमानन्द एव सः ॥६७॥
तदुपरान्त निरन्तर अभ्यासयोग से यदि योगी निरालम्ब हो जाय तो
उसका आत्मा सहजावस्था को प्राप्त करके परमानन्द ही बन जाता है ॥६७॥ १
अभ्यस्यतो मनःपूर्वं विश्लिष्टं चलमुच्यते ।
ततश्च निश्चलं किंचित् सानन्दं च गतागतम् ॥ ६८ ॥
सानन्दं निश्चलं चेतः ततः सुश्लिष्टमुच्यते ।
अतीव निश्चलीभूतं सानन्दं च सुलीनकम् ॥ ६६ ॥
अभ्यास कर रहे योगी का मन पहले चल रहने के कारण विश्लिष्ट
कहा जाता है। उसके बाद किंचित् निश्चल होने पर सानन्द कहा जाता है।
और अत्यन्त निश्चल हो जाने पर उसे सुलीन कहा जाता है ॥ ६८, ६६ ॥
बभूव तस्य कर्माणि पापपुण्यस्य संक्षयः ।
प्रयान्ति नैव लिम्पन्ति क्रियमाणानि साधुना ॥१००॥
साधु द्वारा किये जा रहे कर्म नष्ट हो जाते हैं, उसे लिप्त नहीं करते हैं,
क्योंकि उसके पाप और पुण्य का संक्षय हो चुका रहता है ॥ १०० ॥
१. यहाँ पर "सरिसभूतानि" शब्द उचित प्रतीत नहीं हो रहा है अतः 'सहजभू-
तात्मा" शब्द ही योग्य है ।
[ ४६ ]
उत्तुङ्ग सहजानन्दः सदाभ्यासरतः स्वयम्।
सर्वसंकल्पसंत्यक्तः स विद्वान् कर्मसंत्यजेत् । १०१॥
स्वयं सदा अभ्यास में निरत अतएव बहुत उन्नत सहज आनन्दवाला
तथा सब संकल्प और विकल्पों से मुक्त हुआ वह विद्वान् पुरुष कर्म का सम्यक्
त्याग कर दे ॥ १०१ ॥
ये तु विद्यार्थविज्ञाना¹ विद्वांस इति कीर्तिताः।
आत्मतत्त्वं न जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा ॥१०२॥
किन्तु जो लोग पुस्तकीय विद्या और धनार्थ अर्जित विज्ञानवाले विद्वान्
कहे जाते हैं वे आत्मतत्त्व को वैसे ही नहीं जानते हैं जैसे कि दर्वी ( करछुल)
पाक ( रसोई ) के रस ( स्वाद ) को नहीं जानती ॥ १०२ ॥
सांसारिकक्रियायुक्तं ब्रह्मज्ञोऽस्मीति वादिनम्।
कर्मब्रह्मोभयभ्रष्टं तं त्यजेदन्त्यजं यथा ॥१०३॥
जो सांसारिक क्रियाओं से युक्त हो और मैं 'ब्रह्मज्ञानी हूं' ऐसा दम भरता
हो, कर्म और ब्रह्म दोनों से भ्रष्ट उस तथाकथित ब्रह्मज्ञानी का अन्त्यज के
समान त्याग कर देना चाहिये ॥ १०३ ॥
वृथा देवान् परित्यज्य कर्मकाण्डविवर्जितान् ।
पाखण्डपण्डितान् मन्ये न ते किमपि जानते ॥ १०४ ॥
वृथा यजनीय देवताओं का परित्याग कर कर्मकाण्ड से रहित लोगों को मैं
पाखण्डी पण्डित मानता हूँ । वे कुछ भी नहीं जानते हैं ॥ १०४ ॥
न कर्माणि त्यजेद् योगी कर्मभिस्त्यज्यते ह्यसौ ।
कर्मणो मूलभूतस्य संकल्पस्यैव नाशतः ॥ १०५ ॥
योगी को कर्मों का त्याग नहीं करना पड़ता है, क्योंकि कर्मों के मूलभूत
संकल्प का नाश होने से वह स्वयं कर्मों द्वारा त्यागा जाता है ॥ १०५ ॥
१. 'विदितविज्ञाना' इति पाठान्तरम् ।
४
[ ५० ]
यदा यदा सदाभ्यासात् संकल्पविलयो भवेत् ।
योगिनो भवति श्रेयान् कर्मत्यागस्तदा तदा ॥ १०६ ॥
जब जब सदा अभ्यास से संकल्प का विनाश होता है तब तब योगी का
न्त श्रेयान् कर्मत्याग होता है ॥ १०६ ॥
दान्तानां कुशलानां च सततं मोक्षमिच्छताम् ।
श्रद्धावतां सुशिष्याणां शास्त्रमेतत्प्रकाशयेत् ॥ १०७ ॥
इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर चुके एवं सदा मोक्ष की इच्छा रखनेवाले
दक्ष श्रद्धावान् सत् शिष्यों के लिए इस शास्त्र को प्रकट करना चाहिये ॥१०७॥
शास्त्रमेतत् प्रयत्नेन सदाभ्यस्यं मुमुक्षुभिः ।
यस्य धारणामात्रेण स्वयं तत्त्वं प्रकाशते ॥ १०८ ॥
मुमुक्षु पुरुषों को इस शास्त्र का जतन से सदा अभ्यास करना चाहिये,
जिसके धारणामात्र से तत्त्व अपने आप प्रकाश में आता है ॥ १०८ ॥
न दिवा जागरितव्यं स्वपितव्यं नैव रात्रिभागेऽपि ।
रात्रावह्नि च सहजे स्वपितव्यं योगिना नित्यम् ॥ १०९ ॥
योगी को न तो दिन में जागरण करना चाहिये और न रात्रि में शयन ।
योगी को नित्य रात में और दिन में सहजतत्त्व में शयन करना चाहिये ॥१०९॥
निर्मनः सहजस्थिते पुरुषे न दिवारात्रिशब्दोऽस्ति ।
जागरणशयनवर्जित चिन्मात्रानन्दस्थानात् ॥११०॥¹
अमनस्करूप सहजतत्त्व में स्थित पुरुष के विषय में दिन और रात्रि शब्द
लागू नहीं होते हैं, क्योंकि वह जागरण और शयन से रहित चिन्मात्रानन्द में
स्थित रहता है ॥ ११० ॥
ॐ कारप्रमुखैर्विचित्रकरणैः प्रायस्य वा यो जपः²,
तेजाश्चिन्तनमन्तरालकमले शून्याम्बरालम्बनम् ।
१. स्वप्नः प्रबोधो न च योगमुद्रा नक्तं दिवा वापि न मे कदाचित् ।
अतुर्यतुर्यं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥
( अवधूतगीता ४-१७)
२. 'प्राणस्ययोजनम्' इतिपाठान्तरम् ।
[ ५१ ]
त्यक्त्वा सर्वमिदं.........१मत्वा मनो विभ्रमं ,
देहान्ते तदवाच्यमेकममनस्कत्वं बुधैः सेव्यताम् ॥१११।
ओंकारादि विभिन्न करणों से प्राण का संयोजन (१) हृदयकमल में ज्योति-
श्चिन्तन, (२) महाशून्य रूप आकाश का आलम्बन अर्थात् चित्त का निरा-
लम्बन, (३) इन सबका, मन के विभ्रम हेतु, त्यागकर अन्तिम समय में ज्ञानियों
को एकमात्र अवाच्य अमनस्क का सेवन करना चाहिये ॥ १११ ॥
अन्यजन्मकृताभ्यासात्स्वयं तत्त्वं प्रकाशते ।
सुप्तोत्थितः प्रत्यूषे ह्युपदेशाद् विना प्रबुद्ध्यते ॥ ११२ ॥
अन्य जन्मों में किये गये अभ्यास से तत्त्व स्वयं प्रकाशित होता है । सोकर
जागा हुआ पुरुष प्रातःकाल उपदेश के बिना ही जैसे सब कुछ जान
जाता है ॥ ११२ ॥
शुद्धाभ्यासस्य शान्तस्य सदैव गुरुसेवया ।
गुरु प्रसादात्तत्रैव तत्त्वज्ञानं प्रकाशते ॥ ११३ ॥
सदैव गुरुसेवा से जिसका अभ्यास शुद्ध है ऐसे शान्त पुरुष को गुरु के
साद से उसी जन्म में तत्त्वज्ञान प्रकाशित हो जाता है ॥ ११३ ॥
इति श्री ईश्वरवामदेव संवादेऽमनस्के योगशास्त्रे द्वितीयो लयः
॥ समाप्त ॥
१. (ख) करो नरवरं ।
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